
नई दिल्ली। देश के प्रमुख अखबार The Times of India में प्रकाशित एक फुल-पेज विज्ञापन को लेकर नई बहस छिड़ गई है। “G-Spot Tracker Condom” जैसे बोल्ड शब्दों वाले इस विज्ञापन को कुछ लोग अश्लील बता रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ इसे यौन स्वास्थ्य जागरूकता से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
विज्ञापन में आधुनिक तकनीक से जुड़े दावे के साथ कंडोम को पेश किया गया है, लेकिन इसके शब्द चयन और प्रस्तुति को लेकर आपत्ति जताई जा रही है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह के विज्ञापन पारिवारिक अखबारों की मर्यादा के खिलाफ हैं, जहां हर आयु वर्ग के लोग कंटेंट पढ़ते हैं।
समाज पर असर को लेकर चिंता
विशेषज्ञों का मानना है कि मीडिया में इस तरह की सामग्री का असर खासकर बच्चों और किशोरों पर पड़ सकता है। खुले शब्दों में यौन विषयों की प्रस्तुति जहां एक ओर जागरूकता बढ़ा सकती है, वहीं दूसरी ओर इसे ‘असहज’ या ‘असमय exposure’ भी माना जा रहा है।
दूसरी तरफ: जागरूकता का तर्क
वहीं, कुछ मीडिया विश्लेषकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का तर्क है कि कंडोम जैसे उत्पादों का प्रचार यौन स्वास्थ्य और सुरक्षित संबंधों को बढ़ावा देता है। उनके मुताबिक, भारत जैसे देश में जहां अब भी सेक्स एजुकेशन को लेकर झिझक है, वहां इस तरह के विज्ञापन जागरूकता बढ़ाने में मददगार हो सकते हैं।
मीडिया की जिम्मेदारी पर सवाल
यह मामला एक बार फिर इस सवाल को सामने लाता है कि क्या अखबारों को विज्ञापन छापते समय सामाजिक संवेदनशीलता का ध्यान रखना चाहिए? या फिर बाजार और जागरूकता के बीच संतुलन बनाना ज्यादा जरूरी है?
फिलहाल, इस विज्ञापन को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं और यह बहस जारी है कि ‘जागरूकता’ और ‘अश्लीलता’ के बीच की रेखा आखिर कहां खींची जानी चाहिए।
अभी-अभी अख़बार उठाते ही उसमें छपा यह ऐड दिखा। हम अपने बच्चों से कहते हैं अखबार पढ़ा करो! लगता है अब टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार छिपा कर पढ़ना पड़ेगा।
मैं जानता हूँ कि ऐसे ट्वीट पर मुझे लोग दकियानूस कहेंगे, रूढ़िवादी सोच वाला कहेंगे! लेकिन सोचकर देखिए, आपके सामने रखे अख़बार को आपके पास बैठा आपका बेटा या बेटी भी पढ़ रहे हैं! -प्रभाकर कुमार मिश्रा, पत्रकार


