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टाइम्स ऑफ इंडिया का एक शीर्षक है, “उनके नेतृत्व में बांग्लादेश संपन्न हुआ पर लोकतंत्र कमजोर हुआ”

संजय कुमार सिंह-

द टेलीग्राफ का शीर्षक हिन्दी में होता हसीना गईं, भारत पहुंचीं। ऐसे में आज हिन्दुस्तान टाइम्स में एक खबर का शीर्षक है, ढाका की हार, दिल्ली की सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षाटाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर का शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, भरोसेमंद मित्र के (सत्ता से) बाहर होने पर दिल्ली-ढाका के संबंध जल्दबाजी में नये बनेंगेइंडियन एक्सप्रेस की ऐसी ही एक खबर का शीर्षक है, “नई दिल्ली को नए ढाका से डील करना होगा: 1971 के बाद 5 चुनौतियां। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत के लिए इस घटना का खास महत्व है और ऐसे में खबर इस लिहाज से लिखी जानी चाहिये थी। वैसे भी, मूल खबर कल ही आ गई थी और ऐसे में आज के अखबारों के लिए यह सूचना बासी है कि बांग्लादेश में तख्ता पलट हुआ या हो गया है।

बांग्लादेश की खबर मोटे तौर पर बहुमत के मुकाबले जनता की ताकत के प्रदर्शन की खबर है। यह संयोग ही है कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना उस दिन अपदस्थ हुईं और उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा जो कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने की पांचवीं सालगिरह है। उसका जो नफा-नुकसान हुआ वह अपनी जगह है मैंने कल लिखा था कि इंडियन एक्सप्रेस ने उसपर श्रृंखला शुरू की है और आज वह अखबार का बॉटम है। बताया गया है कि कल इस बात पर चर्चा होगी कि राज्य में चुनाव को लेकर क्यों अभी भी अनिश्चिय की स्थिति है। पूरे मामले में पांच साल कितनी खबरें छपी हैं और क्या चर्चा हुई है उससे अलग, आज के अखबारों में खबर है, “प्रधानमंत्री ने कहा इसे हटाया जाना एक ऐतिहासिक क्षण था”हिन्दुस्तान टाइम्स ने आज पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर इसे सिंगल कॉलम में छापा है और इस खबर को उसी पन्ने पर उसी कॉलम में लगभग उतनी ही जगह दी है जितने में यह बताने वाली खबर छापी है कि गुजरात में अंतरधार्मिक विवाह करने के कारण 24 साल के एक युवक की हत्या कर दी गई। आज के अखबारों में एक और खबर है जो मोटे तौर पर बताती है कि दिल्ली के उपराज्यपाल और शक्तिशाली हो गये हैं।

द हिन्दू की खबर के अनुसार, “सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया है कि दिल्ली के उपराज्यपाल दिल्ली नगर निगम में 10 एल्डरमैन नामांकित कर सकते हैं”। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की लीड का शीर्षक है, “सुप्रीम कोर्ट ने एमसीडी में एल्डरमैन नियुक्त करने के एलजी के अधिकार को कायम रखा”। पहली नजर में यह खबर अटपटी लगती है लेकिन इस खबर का इंट्रो है, “सक्सेना दिल्ली सरकार की सहायता और सलाह से बंधे हुए नहीं हैं : कोर्ट”। खबर में बताया गया है कि उपराज्यपाल संसद में बनाये गये कानून से अधिकृत हैं। यह बड़ा मामला है और यह तो नहीं कहा जा सकता है कि शेख हसीना को अपस्थ किया जाना भी हेडलाइन मैनेजमेंट है लेकिन उनकी खबर के चक्कर में भारत में लोकतंत्र की हत्या और अघोषत इमरजेंसी की यह खबर दब गई है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर अरविन्द केजरीवाल की गिरफ्तारी को जायज बताने वाले हाईकोर्ट के फैसले को लीड बनाया है। आम आदमी पार्टी ने इसकी आलोचना की है और खबर में यह सब है और आज यह खबर केंद्र सरकार की तानाशाही की याद करा रही है।

भारत में लोगों के लिए यह सूचना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि तख्ता पलट के बाद 76 साल की शेख हसीना दिल्ली (भारत) आई हैं और उनका विमान हिन्डन पर उतरा। उनकी आगवानी करने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल गये थे। मुझे लगता है कि भारत में भारत के पाठकों के लिए यह खबर भारत के संदर्भ में लिखी जानी चाहिये थी। अंग्रेजी अखबार अपवाद हो सकते हैं और वे अपने पाठकों की पसंद के अनुसार खबर दे सकते हैं। आज मैं यही बताने की कोशिश करूंगा कि अखबारों ने इस खबर को कैसे पेश किया है। उससे पहले खबर से संबंधित मोटी बातें जिनमें भारत में लोगों की दिलचस्पी हो सकती है। जैसे, डोभाल के साथ आगवानी करने पहुंचे लोगों में सर्वोच्च खुफिया और सैनिक अधिकारी थे।

शेख हसीना अभी अपने अगले गंतव्य को लेकर निश्चिंत नहीं हैं और फैसला करने तक यहां रहेंगी। उन्हें एक सुरक्षित आवास में रखा गया है और सरकार ने आश्वासन दिया है कि वे घर जैसा महसूस करें। इससे पहले हसीना ने इसकी इजाजत मांगी थी जो तुंरत दे दी गई। उनकी बेटी सैमा वाजेद (पुतुल) विश्व स्वास्थ्य संगठन के लिए काम करती हैं और दिल्ली में तैनात हैं। उनकी बहन रेहाना इस समय उनके साथ हैं। उनका बेटा, सजीब वाजेद किसी और देश में रहता है। उनके रिश्तेदार सिंगापुर, लंदन और अमेरिका मे रहते हैं। बांग्लादेश में रोजगार के लिए आरक्षण को लेकर आंदोलन चल रहा था और जब वह घातक हो गये तो शेख हसीना ने इस्तीफा देकर बांग्लादेश छोड़ दिया है। उनके बेटे ने राजनीतिक वापसी की संभावना से इनकार किया है। यह सब जानकारी आज के अखबारों के शीर्षक और शुरू के एक-दो पैराग्राफ में है।

वैसे, आज मुझे सबसे अच्छा शीर्षक द टेलीग्राफ का लगा और टेलीग्राफ ने फ्लैग शीर्षक में भारत से संबंधित एक और जानकारी दी है। वह है, सेना तैनात किये जाने से बंगाल सीमा पर तनाव। अमर उजाला में यह और कुछ दूसरी खबर बॉटम है। शीर्षक है, (बांग्लादेश का) भारत से रेल-वायु संपर्क कटा, सीमा पर सख्ती। बीएसएफ कर्मियों की छुट्टियां रद्द, मैत्री एक्सप्रेस का संचालन भी बंद। टेलीग्राफ की खबर के अनुसार छात्रों के कुछ हफ्तों के विरोध में कम से कम 400 जानें गई हैं और आंदोलन ने उनके खिलाफ बगावत का रूप ले लिया था जबकि सशस्त्र सेना ने उनके शासन का अब और बचाव करने से इनकार कर दिया। अखबार ने आगे लिखा है, जब हजारों लोगों ने ढाका में उनके आधिकारिक आवास पर धावा बोल दिया तो लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई पांच सरकारों का नेतृत्व करने में गर्व महसूस करने वाली शेख हसीना देश छोड़कर भागने के लिए मजबूर हुईं। पहले एक हेलीकॉप्टर और फिर सेना के विमान में सवार हो गईं, बिल्कुल किसी बर्खास्त (अपदस्थ हल्का है, जनता ने बर्खास्त ही किया है) तानाशाहों की शैली में।

टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, सूत्रों ने कहा कि शाम को भारत पहुंचीं हसीना ने ब्रिटेन में शरण मांगी थी। इस बीच यह दावा भी है कि एक राजनेता के तौर पर उन्होंने अपनी वापसी से इनकार कर दिया है। शेख हसीना की शाश्वत प्रतिद्वंद्वी और बीएनपी नेता, पूर्व प्रधान मंत्री खालिदा जिया को रिहा कर दिया गया है। भ्रष्टाचार के आरोप में उन्हें जेल में डाल दिया गया था। दोपहर बाद लगभग सवा तीन बजे (भारतीय समयानुसार पौने तीन बजे) राष्ट्र के नाम एक संबोधन में, सेना प्रमुख जनरल वेकर-उज़-ज़मान ने घोषणा की कि हसीना ने इस्तीफा दे दिया है और एक अंतरिम सरकार देश चलाएगी। आइये अब देखें कि मोटे तौर पर इस खबर को मेरे सात अखबारों ने कैसे छापा है।

अमर उजाला में आज ऊपर से नीचे तक चार कॉलम का विज्ञापन है। बाकी चार कॉलम में यह लीड है और दो लाइन का शीर्षक है, बांग्लादेश में हिंसा के बाद पीएम हसीना का इस्तीफा, भारत पहुंची। उपशीर्षक है, सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों का प्रधानमंत्री आवास पर कब्जा…. संसद में घुसे, लूट-पाट की। सेना ने संभाला नियंत्रण, राष्ट्रपति बोले संसद भंग कर बनायेंगे अंतरिम सरकार। लीड के साथ की खबरों में एक खबर है जो ऊपर नहीं है। इसके अनुसार, ब्रिटिश विदेशमंत्री डेविड लैमी ने कहा, बांग्लादेश के लोगों को हक है कि वहां हाल में हुई घटनाओं की संयुक्त राष्ट्र की अगुआई में समग्र व स्वतंत्र जांच होनी चाहिये

नवोदय टाइम्स में तीन कॉलम का विज्ञापन ऊपर तक है। यहां लीड पांच कॉलम में है और शीर्षक एक लाइन का है, बांग्लादेश में तख्ता पलट। एक और खबर का शीर्षक है, जयशंकर ने मोदी को दी जानकारी। संभव है, दूतावास से खबर विदेशमंत्री को मिली हो और उन्होंने अपने प्रधान को यह खबर पहुंचाई हो। हालांकि, खबर के अनुसार, बताया जा रहा है कि जयशंकर ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को भी घटनाक्रम से अवगत कराया। जयशंकर मंगलवार को पड़ोसी देश के हालत पर संसद में बयान देंगे। मुझे इस खबर का स्रोत और इसका मकसद दोनों नहीं समझ में आया। पर आजकल पीआईबी खबरें कम देता है, फैक्ट चेक ज्यादा करता है। और वह अलग मुद्दा है।

इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर बैनर है, एक लाइन का शीर्षक है – हसीना की सत्ता गई, भागीं; सेना ने ढाका को नियंत्रण में लिया। इसके साथ की एक खबर का शीर्षक है, हसीना भारत पहुंचीं, डोवाल से मिलीं, सुरक्षित घर में ले जाई गईं; ब्रिटेन जाने की तैयारी। एक और खबर का शीर्षक है, “नई दिल्ली को नए ढाका से डील करना होगा: 1971 के बाद 5 चुनौतियां। इस शीर्षक का मतलब दूसरी खबरों और शीर्षक से समझ में आयेगा। फिलहाल मामला यह हो गया है कि हर बात के लिये नेहरू को जिम्मेदार ठहराने वाली सरकार के समय में ऐसी स्थितियां बन गई हैं जो 1971 के बाद 1975 में लगी इमरजेंसी को 2024 में याद करने वालों को अघोषित इमरजेंसी जैसी स्थितियों में इमरजेंसी से भी पहले की स्थितियों की याद दिलायेंगी।

हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, हसीना बांग्लादेश से भागीं। उपशीर्षक है, “बांग्लादेश में हिंसक प्रदर्शन के कई हफ्तों बाद प्रधानमंत्री का 15 साल का शासन खत्म हुआ; हिन्डन हवाई पट्टी पर उतरीं, एनएसए डोभाल से मिलीं, ब्रिटेन रवाना हो सकती हैं। एक और खबर का शीर्षक है, सेना ने नियंत्रण में लिया, (खालिदा) जिया की रिहाई के आदेश। वाशिंगटन से प्रशांत झा की बाईलाइन वाली खबर का शीर्षक है – ढाका की हार, दिल्ली की सबसे बड़ी कूटनीतिक परीक्षा। इससे आप समझ सकते हैं कि भारत के लिए यह घटना कितनी महत्वपूर्ण है। पर ज्यादातर खबरें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लिखी गई हैं। अखबार में आधा पेज विज्ञापन है। बाकी खबरें  ढाका से संबंधित ही हैं।  

टाइम्स ऑफ इंडिया ने पहले पन्ने पर मुख्य खबर के अलावा पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने के पीछे बांग्लादेश का इतिहास याद किया है और सुबीर भौमिक का एक आलेख प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है, “उनके नेतृत्व में बांग्लादेश संपन्न हुआ पर लोकतंत्र कमजोर हुआ”। लेखक के बारे में बताया गया है कि वे बीबीसी के संवाददाता और ढाका से चलने वाले बीडीन्यूज24 डॉट कॉम के संपादक रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया में मूल खबर बैनर है। उपशीर्षक में बताया गया है कि उन्हें विदाई भाषण रिकार्ड कराने के लिए भी समय नहीं मिला। द हिन्दू में यह पांच कॉलम की लीड है जिसका शीर्षक है, विरोध बढ़ा तो हसीना ने इस्तीफा दिया, बांग्लादेश छोड़कर भारत पहुंची। अखबार में  सामान्य दिनों की तरह पहले पन्ने पर दूसरी कई खबरें हैं।

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