
संजय कुमार सिंह
आज टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड के अनुसार दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज, यशवंत वर्मा के घर में भारी मात्रा में नकदी मिली। इसकी सूचना मिलने पर मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें वापस उनके मूल हाईकोर्ट, इलाहाबाद भेज दिया। इतने से बात नहीं बनी और कॉलेजियम के कुछ लोगों का कहना है कि इससे न्यायपालिका की छवि खराब होगी। एक खबर के रूप में यह पुराना मामला है और कहने की जरूरत नहीं है कि इसे छिपाने-दबाने की कोशिश कामयाब रही और आज टाइम्स ऑफ इंडिया में छपने से पहले बहुत सारे लोगों को मालूम रही होगी फिर भी खबर नहीं छपी तो इसका मतलब यही है कि पूरी व्यवस्था चौपट हो चुकी है। मामला पैसे का है इसलिए यह प्रत्यक्ष तौर पर भ्रष्टाचार हो या नहीं, परोक्ष रूप से भ्रष्टाचार तो है ही। भले खबर नहीं करने के बदले पैसे (या विज्ञापन) पाने का मामला सीधा जुड़ा हुआ न हो। जज के घर में नकदी का मामला उनके घर में आग लगने के कारण खुला और इससे भी साबित होता है कि पंच परमेश्वर के देश में सब कुछ ठीक नहीं है। चौकीदार चोर है का आरोप लगा पर जांच ही नहीं हुई और यह वैसे ही है कि जज की संदिग्ध मौत की जांच नहीं हुई तो फैसलों से यह तय करना मुश्किल है कि वह डर के कारण तो नहीं है और ऐसा की कारण नहीं है जो जजों को निडर होकर फैसले देने के लिए प्रेरित करे। अब एक जज के घर में पैसा मिलना दूसरे जजों के फैसले को भी संदिग्ध बनाता है और मामला सिर्फ एक जज का था तो छिपाया नहीं जाना चाहिये था। राजनीतिक कारणों से खबरें छिपाने और गलत या झूठी खबरें छपवाने का मकसद तो समझा जा सकता है लेकिन मामला सिर्फ एक जज का था तो छिपाये जाने का कोई कारण नहीं है। मीडिया की मिलीभगत का मामला तो हो ही सकता है।
दूसरी ओर, ‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा’ की स्पष्ट घोषणा के बावजूद संबंधित एजेंसियों को (इसमें सरकारी पैसों से चलने वाले खुफिया विभाग शामिल हैं) घर में नकदी होने का पता नहीं चलना पर्याप्त संदिग्ध है। अदालती काम-काज पर टिप्पणी मेरा काम नहीं है लेकिन डिजिटल भारत में जब आम आदमी छोटे-मोटे लेन देन भी नकद नहीं कर रहा है, नकद लेन-देन कम करने के लिए सबसे बड़ा नोट 500 का ही रखा गया है (भले नोटबंदी और 2000 के नोट के बाद) तब किसी जज के घर में भारी मात्रा में नकदी होने का कोई कारण नहीं है। काला है या सफेद यह तो बहुत बाद की बात है। अभी तो यही पता नहीं चला है कि कितने रुपये थे। दिलचस्प यह है कि राष्ट्रपति जब निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के खिलाफ सबूत नहीं होने और आजाद भारत में किसी मंत्री के सबसे ज्यादा जेल में रह चुके होने के बावजूद उसी मंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दे रही हैं तब नकद बरामदगी पर सिर्फ तबादले जैसी कार्रवाई हुई है। ईडी की कार्रवाई में सिर्फ दो प्रतिशत सफलता की खबर भी अभी हाल की ही है और इससे पता चलता है कि सरकार ने ईडी को किस काम में लगा रखा है। राष्ट्रपति ने जिन (पूर्व) मंत्रियों के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी है वे देश भर में सबसे अच्छा काम करने के लिए जाने जाते हैं और उस पार्टी की सिफारिश पर दी है जो व्यवस्था चौपट करने के लिए याज की जायेगी।

आज दूसरे अखबारों में 30 माओवादियों को मारे जाने की खबर लीड है। इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक के अनुसार छत्तीसगढ़ में हुए मुठभेड़ में 30 माओवादी मारे गये। 2025 के तीन महीनों में कल के 30 माओवादियों को मिलाकर 123 लोग मारे जा चुके हैं। यह छोटी-मोटी संख्या नहीं है। 2024 में 200 से ज्यादा माओवादियों के मारे जाने की खबर है। मुठभेड़ में इतनी बड़ी संख्या में मनुष्यों की मौत चिन्ताजनक है और ऐसी खबर अक्सर आती रही है। माओवादियों से वार्ता, समर्पण आदि की कोशिश की खबर उतनी ही दुर्लभ है। किसी का माओवादी होना सुरक्षा बलों के हाथों मुठभेड़ में मार दिये जाने का लाइसेंस नहीं हो सकता है पर कोई देखने वाला नहीं है। मारे गये लोग कौन थे, उनका अपराध क्या था और उनका मारा जाना कैसे सही है, क्या उन्हें गिरफ्तार कर मुकदमा चलाकर सजा नहीं दी जानी चाहिये थी – आदि सवाल न पूछे जाते हैं और ना बताये जाते हैं। सरकार ने हर जगह समर्थकों को बैठा रखा है और ऐसे में मीडिया का दायित्व काफी बढ़ जाता है लेकिन उसकी हालत यह है कि दिल्ली में हाईकोर्ट के जज के घर में नकद होने की सूचना नहीं मिलती है। पहले सरकारी अधिकारी अगर किसी मामले में कार्रवाई नहीं कर पाते थे तो वे खबर लीक कर देते थे और फिर सरकार कार्रवाई करने के लिए मजबूर होती थी। अब ऐसा नहीं होता है और सरकार पर वसूली का आरोप लगता है। ऐसे में वास्तविक स्थिति क्या होगी उसकी कल्पना की जा सकती है। फिर भी सरकार के समर्थक और कार्यकर्ता-प्रचारक ही नहीं निष्पक्ष और स्वतंत्र होने का दावा करने वाले पत्रकार भी सरकार के प्रचारक बने हुए हैं और नागपुर दंगा नहीं समझ रहे हैं। संघ परिवार, मुख्यमंत्री और सरकार को शक के घेरे में नहीं रख रहे हैं।
मुझे लगता है कि माओवादियों की हत्या का यह मामला उतना सीधा-सरल नहीं है जितना अखबारों की खबरों से लगता है। बगैर कानूनी कार्रवाई मौत और फिर माओवादी कह दिया जाना, ऐसे लोगों को मनुष्य होने का न्यूनतम सम्मान भी नहीं मिलना अति है। सरकारी उपेक्षा और मनमानी है। स्ट्रेचर या अर्थी की बजाय बांस में बांधकर ले जाये जाते एक शव की तस्वीर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में है। अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में केंद्रीय गृहमंत्री का दावा छपा है कि अगले साल 31 मार्च से पहले देश नक्सल मुक्त हो जायेगा। आप जानते हैं कि गृहमंत्री न सिर्फ आतंकवाद मुक्त होने का दावा कर चुके हैं बल्कि पाकिस्तान के ‘सभी’ आतंकवादियों को खत्म किये जाने का दावा भी किया जा चुका है। कश्मीर चुनाव के समय आतंकवाद खत्म करने का दावा और तीन लोगों की लाश मिलने पर उसे आतंकवादी कार्रवाई कहना, बाद में यह आशंका जताना कि वे डूबकर मरे होंगे – ऐसी हालत में गृहमंत्री के किस दावे पर यकीन किया जाये और किसपर नहीं, तय करना मुश्किल है। फिर भी दोनों अखबारों ने उनके दावे को हाईलाइट किया है। करें भी क्यों नहीं, केंद्रीय गृहमंत्री का दावा है।
कर्नाटक में हनी ट्रैप
देश में जो व्यवस्था है उसका हाल बताने वाली आज की अगली खबर दि एशियन एज में है। खबर के अनुसार, राज्य में नेताओं को हनीट्रैप करने की कोशिश की जा रही है और यह सत्तारूढ़ दलों के नेताओं के खिलाफ खासतौर से है। हालांकि सभी दलों के विधायकों ने इस कोशिश का आरोप लगाया। यह सब कौन कर-करा सकता है समझना मुश्किल नहीं है और इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार को अस्थिर किये जाने की कोशिशें चल रही हैं। राज्य विधानसभा में इसकी जांच की घोषणा की गई है पर कितने ही मामलों की जांच अंतिम नतीजे पर नहीं पहुंचती है और इसका कारण समझना भी मुश्किल नहीं है। इससे इसका मकसद और दल विशेष की राजनीतिक व राजनीतिक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। अन्य खबरों के साथ आज श्रीनगर डेटलाइन से एक खबर यह भी है कि जम्मू और कश्मीर के भाजपा नेता तथा पूर्व निर्दलीय विधायक गुरेज फकीर मोहम्मद खान ने अपनी सरकारी घर में सुरक्षा कर्मी के राइफल से गोली मारकर खुदकुशी कर ली।
बिहार में हथियार
आप जानते हैं कि बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं और भाजपा की तैयारी शुरू है। ऐसे में बिहार की दो खबरें गौर करने लायक है। पहली खबर है, केंद्रीय मंत्री राजभूषण निषाद के रिश्तेदार पर हमला, बेगूसराय में ताबड़तोड़ फायरिंग से हड़कंप। खबर के अनुसार, निषाद के चचेरे मामा मालिक सहनी पर गुरुवार रात को अपराधियों ने गोली मार दी। उनका बेगूसराय के सदर अस्पताल में इलाज चल रहा है। एक दिन पहले ही भागलपुर जिले के नवगछिया में केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय के भांजों ने आपसी झगड़े में गोली चलाई जिससे एक भांजे की मौत हो गई। मंत्री की बहन भी घायल है। दोनों खबरों में नहीं लिखा है कि हथियार लाइसेंस वाला था या अवैध। यह रिपोर्टिंग की चूक है और सुशासन में दो भाइयों को लाइसेंस दिया गया था और वे आपस में लड़ मरे या नहीं दिया गया था तब यह रिपोर्टिंग की चूक है और सुशासन में दो भाइयों को लाइसेंस दिया गया था और वे आपस में लड़ मरे या नहीं दिया गया था तब भी लड़ गये – महत्वपूर्ण है। इससे शासन और समाज की स्थिति का पता चलता है।
ससंद सांसदों के लिए है
आज जो खबर नहीं छपी है या कम छपी है वह है, नारे लिखे टी शर्ट पहनकर आने पर लोक सभा और राज्यसभा दोनों में कार्यवाही स्थगित। यह खबर आज मेरे दो ही अखबारों में पहले पन्ने पर है। नवोदय टाइम्स में यह चार कॉलम में है। इसका शीर्षक है,परिसीमन पर नारे लिखे टी-शर्ट पहन संसद पहुंचे द्रमुक सदस्य। दि एशियन एज में यह तीन कॉलम की खबर है। यहां बताया गया है कि भाजपा ने आज बजट पर मतदान के लिए उपस्थित करने के लिए अपने सांसदों को व्हिप जारी किया है। जो भी हो, नारे लिखे टी शर्ट पहनने पर सांसदों को संसद जाने से हीं रोका जा सकता है। संसद स्कूल नहीं है कि हेडमास्टर साब ने जो कह दिया उसे मानना पड़ेगा या कपड़े पहनने से पहले हेडमास्टर साब का रौद्र रूप याद आ जाये। सदस्य किसी दूसरे स्कूल में जाने की सोचे। यहां पांच (और छह) साल के लिए चुने गये सदस्य चला जाये।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता से परेशानी
द टेलीग्राफ की आज की लीड प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर पूछे गये सवालों का ग्रोक का जवाब और इसपर सरकारी कार्रवाई की खबर है लेकिन इस मामले में दिलचस्प सूचना टाइम्स ऑफ इंडिया में है। इसके अनुसार, मस्क के ग्रोक से पूछे जाने वाले उकसाने वाले सवालों के खिलाफ सरकार आपराधिक कार्रवाई कर सकती है। दिल्ली में कानून व्यवस्था की स्थिति बताने वाली खबर भी आज टाइम्स ऑफ इंडिया में ही है। यह एक महिला की हत्या की खबर है जो चलती कार में की गई और फिर शव को नाले में फेंक दिया गया। उसका शव 17 मार्च को मिला। यह भी पुरानी खबर है जो समय पर नहीं छपी और आज सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रमुखता से है। आज अगर मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया की सबसे ज्यादा खबरों की चर्चा की है तो तथ्य यह है कि इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर विज्ञापन नहीं है। अमूल का जो रोज रहता है उसे छोड़कर। इसलिये यहां एक पड़ताल की बड़ी सी रिपोर्ट छपी है।
तीन साल में 100 बाघ का शिकार
इंडियन एक्सप्रेस की इस पड़ताल के अनुसार, तीन साल में देश में 100 बाघ मारे जा चुके हैं। और यह संख्या बढ़ रही है। खबर के अनुसार नये जमाने का शिकार माफिया तकनीक, डिजिटल भुगतान के साथ हवाला नेटवर्क का भी उपयोग कर रहा है। खबर के अनुसार अधिकारियों ने बताया कि गिरफ्तारियों से पता चलता है कि भिन्न गिरोहों में गठजोड़ है, इनकी पहुंच देश भर में है, इसके लिए परिवहन संचालकों और म्यामार के रूट का उपयोग किया जाता है। कहने की जरूरत नहीं है कि देश में इतने बड़े पैमाने पर अगर अवैध शिकार हो रहा है और सरकार रोक नहीं पा रही है तो उसके अपने मायने हैं और इसे इस तथ्य से जोड़ दीजिये कि 18 घंटे काम करने, छुट्टी न लेने वाले प्रधानमंत्री अभी हाल में एक निजी चिड़ियाघर को सात घंटे और प्रचार का पूरा मौका दे आये तो मुद्दा यह भी है कि प्रधानमंत्री को क्या करना चाहिये और वे क्या कर रहे हैं – इसमें तालमेल है कि नहीं और नहीं है तो कौन देखेगा? सरकार तो अपने बचाव के उपाय में व्यस्त है।
किसानों का मामला स्पष्ट नहीं
पहले पन्ने की खबरों में आज हिन्दुस्तान टाइम्स की किसी भी खबर की चर्चा नहीं है। कहने के लिए आधे पन्ने का विज्ञापन है लेकिन वो तो टाइम्स ऑफ इंडिया में भी है। हिन्दुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने की खबरों में आज की सेकेंड लीड किसी और अखबार में इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी। दो कॉलम की फोटो के साथ तीन कॉलम की इस खबर का शीर्षक है, किसानों पर पंजाब सरकार की कार्रवाई के बाद सड़क खुली। इससे जरूरी यह जानना और बताना था कि आंदोलन का क्या हुआ। खत्म या स्थगित किया गया है और सका कारण क्या है। आप जानते हैं कि किसानों का आंदोलन अचानक खत्म करा दिया गया और कल के अखबारों की खबर स्पष्ट नहीं थी। मैंने लिखा था कि खबर में केंद्रीय मंत्रालय के हवाले से जो कहा गया था उससे लगता है कि किसानों ने सरकार को समय दिया और पंजाब सरकार ने किसानों को उखाड़ फेंका। दोनों सही भी हों तो दूसरे की जरूरत नहीं थी। पंजाब सरकार को ऐसी भी क्या जल्दी थी। अगर पंजाब सरकार ने केंद्र सरकार से मिलीभगत कर किसी लालच या दबाव में ऐसा किया है तो पंजाब सरकार को किस्तों में बदनाम करने का क्या मतलब है? एक साथ पूरा खेल क्यों नहीं बताया जा रहा है? अखबार पढ़ने वाला कोई भी आदमी जानता है कि केंद्र सरकार जो कहेगी या चाहेगी वह बिना संपादन छप सकता है। वैसे भी जो छप रहा है वह पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार को बदनाम ही कर रहा है तो खुलकर क्यों नहीं? दिलचस्प यह भी है कि आम आदमी पार्टी ने अभी तक कुछ नहीं कहा है (या कहा हो तो छपा नहीं है)। जो सड़क करीब साल भर से बंद या बाधित थी, जब बंद रही तो उपयोग करने वालों की तकलीफ नहीं बताई गई और जब खुल गई तो यह इतनी बड़ी खबर कैसे हो गई। निश्चित रूप से यह राजनीति है। किसी को चिढ़ाना या खुश करना है। ए और बी टीम की खास राजनीति। इसमें आम आदमी पार्टी अपना पक्ष रखने लायक नहीं है, भाजपा श्रेय लेने लायक नहीं है पर मीडिया भाजपा का श्रेय देने और आप को बदनाम करने की कोशिशों में लगा दिख रहा है।


