श्याम सिंह रावत-
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी है जो भारत पर 1 अगस्त से लागू होगा। साथ ही भारत द्वारा रूस से तेल और रक्षा उत्पादों की खरीदारी करने पर भी अलग से जुर्माना लगाने की भी घोषणा की है।
अमेरिकी टैरिफ नीतियों को एक प्रकार का ‘आर्थिक आतंकवाद’ मानना होगा, जो भारत जैसे देशों पर आर्थिक दबाव डालने का एक उपकरण है। इस आतंकवाद के साथ-साथ अमेरिकी टैरिफ नीतियों का विश्लेषण और उनका भारत पर दुष्प्रभावों को जानना जरूरी है। इसलिए यह विश्लेषण आर्थिक, सामाजिक और भू-राजनीतिक प्रभावों पर केंद्रित है, जिसमें टैरिफ को एक आक्रामक नीति के रूप में देखा गया है।

अमेरिकी टैरिफ को ‘आर्थिक आतंकवाद’ कहना उसकी टैरिफ नीतियों को एक ऐसी रणनीति के रूप में देखना है, जो भारत की अर्थव्यवस्था को जानबूझकर कमजोर करने, व्यापारिक अस्थिरता पैदा करने और भू-राजनीतिक दबाव डालने के प्रयास के रूप में हमारे सामने है। इस दृष्टिकोण से यह टैरिफ न केवल आर्थिक दबाव का साधन है, बल्कि भारत की संप्रभुता और आर्थिक स्वायत्तता पर हमले का एक रूप भी है। इसके निम्नलिखित दुष्प्रभाव हो सकते हैं—
- आर्थिक दुष्प्रभाव—
अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए 25% टैरिफ से भारत के उत्पादन, निर्यात, रोजगार, लॉजिस्टिक, कर वसूली तथा अन्य वाणिज्यिक गतिविधियों में भारी कमी होगी।
भारत का अमेरिका को निर्यात ($66 बिलियन) का 87% हिस्सा प्रभावित हो सकता है। टैरिफ के कारण भारतीय उत्पाद जैसे कपड़ा ($10.8 बिलियन), रत्न-आभूषण ($8 बिलियन) और फार्मास्यूटिकल्स ($6 बिलियन) महंगे हो जाएँगे, जिससे माँग में कमी आएगी।
मिथिला मखाना जैसे विशिष्ट उत्पाद, जो बिहार से निर्यात होते हैं और अमेरिका में 75-80 डॉलर प्रति किलो की कीमत पर बिकते हैं, टैरिफ के कारण और भी ज्यादा महंगे हो सकते हैं, जिससे उनकी माँग और निर्यात प्रभावित होगा। परिणामस्वरूप भारत को प्रति वर्ष $7 बिलियन का नुकसान हो सकता है, जो अर्थव्यवस्था पर एक ‘आर्थिक हमले’ जैसा प्रभाव डालेगा।
भारत के निर्यात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले मध्यम, लघु एवं कुटीर उद्योग टैरिफ के कारण लागत में वृद्धि और मार्जिन में कमी का सामना करेंगे। यह लाखों नौकरियों को खतरे में डाल सकता है, खासकर कपड़ा, हस्तशिल्प (जैसे मधुबनी पेंटिंग) और कृषि-आधारित उत्पादों में। सूरत, जयपुर और तिरुचिरापल्ली के हीरा उद्योग को इससे भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
यह ‘आर्थिक आतंक’ छोटे उद्यमियों और श्रमिकों के लिए जीविका का संकट ही पैदा नहीं करेगा बल्कि सामाजिक विसंगतियों को बढ़ावा दे सकता है।
टैरिफ के कारण भारत की जीडीपी में 0.19% की कमी आ सकती है, जो प्रति परिवार औसतन 2396 रुपये की वार्षिक हानि के बराबर है। यह आम नागरिकों के लिए अप्रत्यक्ष आर्थिक संकट होगा।
निर्यात आय में कमी से भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ेगा, जिससे तेल जैसी महत्वपूर्ण आयातित वस्तुएँ महंगी होंगी और मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। इससे टैरिफ भारत की आर्थिक स्थिरता को कमजोर करने का एक सुनियोजित प्रयास प्रतीत होता है।
यद्यपि सेवा क्षेत्र पर सीधे टैरिफ का प्रभाव नहीं पड़ता, लेकिन अमेरिकी उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति में कमी और व्यापारिक तनाव के कारण भारतीय आइटी कंपनियों को आउटसोर्सिंग अनुबंधों में कमी का सामना करना पड़ सकता है। यह भारत की सेवा-आधारित अर्थव्यवस्था पर एक ‘प्रछन्न हमले’ की तरह है।
- भू-राजनीतिक दुष्प्रभाव—
टैरिफ को अमेरिका की एकतरफा नीति के रूप में देखा जाए, तो यह भारत की भू-राजनीतिक स्थिति को कमजोर करने का प्रयास है। जैसा कि ट्रंप ने भारत पर टैरिफ का एक कारण रूस से तेल और सैन्य उपकरणों की खरीद को बताया है। यह भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर एक ‘कूटनीतिक आतंक’ के रूप में देखना चाहिए, क्योंकि भारत को अपनी ऊर्जा और रक्षा जरूरतों के लिए रूस पर निर्भरता कम करने के लिए इसके जरिए मजबूर किया जा रहा है।
इससे भारत की विदेश नीति में जटिलताएँ बढ़ेंगी और इसे रूस के साथ अपने दीर्घकालिक सम्बंधों की पुनर्समीक्षा करने के लिए बाध्य होना पड़ सकता है। रूस परंपरागत रूप से भारत का मित्र और इसके विकास तथा आड़े वक्त में मददगार रहा है लेकिन मोदी एंड कंपनी की अदूरदर्शिता से उसके साथ अब पहले जैसे सम्बंध नहीं रहे। फिर भी उसे चीन-पाकिस्तान-तुर्कीए धुरी में शामिल होने से रोकना आवश्यक है।
यह कोई आश्चर्यजनक नहीं है कि अमेरिका ने उसी समय पाकिस्तान के साथ नए व्यापार समझौते और तेल भंडार विकास की योजना की घोषणा की, जबकि भारत पर टैरिफ लगाए। यह भी उसके ‘भू-राजनीतिक आतंक’ का रूप है, क्योंकि अमेरिका द्वारा पाकिस्तानी आतंकवाद को समर्थन तथा आर्थिक लाभ दिया जा रहा है, जबकि भारत को दंडित किया जा रहा है।
अमेरिका का यह कदम भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा को कमजोर कर सकता है, क्योंकि पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के माध्यम से मिलने वाली आर्थिक सहायता आतंकवादी गतिविधियों को अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दे सकती है।
टैरिफ के कारण भारत को वैकल्पिक व्यापारिक साझेदारों की तलाश करनी पड़ेगी, जिसमें चीन भी शामिल हो सकता है। जबकि उसके साथ पहले ही द्विपक्षीय व्यापार में भारत एक सौ अरब डॉलर घाटे में चल रहा है। ऐसे में भारतीय व्यापार का चीन की ओर बढ़ना खतरनाक और इसकी रणनीतिक नीतियों को जटिल बना सकता है।
- सामाजिक और सांस्कृतिक दुष्प्रभाव—
टैरिफ के कारण बिहार जैसे क्षेत्रों में मिथिला मखाना और मधुबनी पेंटिंग जैसे उत्पादों का निर्यात प्रभावित होगा। यह स्थानीय समुदायों, विशेषकर महिलाओं और कारीगरों, की आजीविका पर आर्थिक दबाव का कारण बन सकता है।
टैरिफ से सामाजिक अस्थिरता बढ़ सकती है, क्योंकि इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम होने से लोग आर्थिक तंगी का सामना करेंगे और उनके अपराधों की ओर प्रवृत्त होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
अमेरिका की यह नीति भारत के लिए एकतरफा, असुविधाजनक और राष्ट्रीय आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाने वाली है। लोग इसे मोदी सरकार की कूटनीतिक असफलता के रूप में ले रहे हैं जिससे जनता में असंतोष और विरोध पनप रहा है।


