
संजय कुमार सिंह
आज सभी अखबारों में वक्फ विधेयक पास हो जाने की खबर लीड है लेकिन आज से लागू होने वाले ट्रम्प के जवाबी अमेरिकी टैरिफ और भारत द्वारा टैरिफ कम किये जाने के ट्रम्प के दावों पर भारत सरकार की किसी अधिकृत क्रिया, प्रतिक्रिया या योजना की खबर नहीं है। अव्वल तो आज से जवाबी शुल्क या टैरिफ लागू होने की खबर भी नहीं के बराबर है। हेडलाइन मैनेजमेंट के इस दौर में यह खबर भी नहीं ही है कि न्यायमूर्ति निर्मल यादव के मामले में विशेष जज अल्का मलिक ने सीबीआई की खिंचाई की है। 89 पेज की अपनी रिपोर्ट में न्यायमूर्ति अल्का मलिक ने स्पष्ट कहा है कि अभियोजन के एक प्रमुख गवाह, आरके जैन के जरिये सबूत गढ़ने की बजाय सीबीआई को क्लोजर रिपोर्ट फाइल करनी चाहिये थी। अदालत ने कहा है कि जैन की गवाही पूरी तरह अविश्वसनीय थी। कहने की जरूरत नहीं है कि 2008 का यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट के जज के घर में आग लगने पर स्टोर में रखे नोट जलने की खबरों के बीच खास तौर से महत्वपूर्ण है। न्यायमूर्ति निर्मल यादव से संबंधित यह खबर आज सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर है।
जहां तक अमेरिकी टैरिफ का मामला है, अमर उजाला की खबर का शीर्षक है, ट्रम्प ने भारत पर लगाया 26% जवाबी शुल्क। उपशीर्षक से पता चलता है कि ट्रम्प ने पूर्व घोषित समय पर नए शुल्क की घोषणा कर दी है और भारत के लिए कहा है कि यह रियायती कर है। खबर में बताया गया है कि भारतीय विशेषज्ञों के अनुसार इस प्रतिशोधी शुल्क का कृषि, ऑटोमोबाइल, दवा, स्वर्ण आभूषण जैसे क्षेत्रों पर बड़ा असर हो सकता है। खबर में यह नहीं बताया गया है कि भारत सरकार इस मामले में क्या कर रही है या कुछ कर सकती भी है अथवा नहीं। आप जानते हैं कि सरकार किसानों के लिए जबरन कानून बनाकर उसे वापस ले चुकी है और किसानों की मांग पर कई वर्षों बाद तक ढंग से बातचीत भी नहीं हुई है। दूसरी ओर, बिना मांग कल वक्फ विधेयक पास हो गया और नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है, यह कानून सभी को स्वीकार करना पड़ेगा। अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने इसे गरीब मुसलमानों की तकदीर बदलने वाला विधेयक कहा है। आप जानते हैं कि पार्टी (और सरकार) में मुसलमान ढूंढ़ने पर शायद कहीं मिल जायें लेकिन गरीब मुसलमानों की तकदीर बदलने के तरीके इन्हें मालूम हैं। किसानों के बारे में सरकार ने कुछ कहा नहीं है जबकि उनकी आय दूनी करने का वादा था और उसका समय निकल चुका है।
द टेलीग्राफ की लीड का आज का शीर्षक है, सहयोगियों ने वक्फ मामले में भाजपा को कामयाबी पाने में मदद की। दि एशियन एज ने सिंगल कॉलम की खबर से बताया है कि विपक्ष ने इसे असंवैधानिक कहा है जबकि एनडीए के सहयोगियों ने इसे मुस्लिम विरोधी नहीं माना है। अमर उजाला ने लिखा है, शाह ने दिये एक-एक जवाब जबकि अखिलेश यादव ने इस विधेयक को पास कराने को, नाकामी छिपाने की कोशिश कहा है। इसके बराबर में गौरव गोगोई का दावा है, बिल से मुकदमेबाजी बढ़ेगी। नवोदय टाइम्स ने लिखा है, सदन में चर्चा के दौरान ओवैसी ने विधेयक की प्रति फाड़ी, कहा – बिल का मकसद मुसलमानों को जलील करना है। इंडियन एक्सप्रेस ने अमित शाह के इस दावे को शीर्षक बनाया है कि (वक्फ विधेयक) मुसलमानों के धार्मिक मामले में हस्तक्षेप नहीं है, विपक्ष अपने वोट बैंक के लिए डर फैला रहा है। इसके साथ चार कॉलम के शीर्षक में विपक्ष के कोरस की चर्चा है, सरकार एक समुदाय को निशाना बनाने, संविधान को कमजोर करने और नाकामियों को छिपाने में लगी हुई है। आज के अखबारों को देखकर कहा जा सकता है कि ज्यादातर इसमें सरकार का पूरा सहयोग कर रहे हैं।
इसीलिए, अमेरिकी शुल्क की खबर कम है और सरकार की प्रतिक्रिया नहीं है उसकी चर्चा भी नहीं है। अखबार यह बताने में लगे हैं कि सरकार हिन्दू-मुसलमान करने की अपनी राजनीति में लगी है और चुनाव ईवीएम से जीते या मतदाता सूची में हेरा-फेरी करके, जनता को यह लगे कि वह हिन्दुओं की सरकार और मुसलमानों को परेशान करके रखा हुआ है। उनके वोट की परवाह नहीं करती आदि आदि। जो भी हो, मुझे तथ्य बताना था और वह यह है कि आज सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स ने पहले पन्ने पर अनाम भारतीय अधिकारियों के हवाले से कहा है कि ट्रम्प के टैरिफ पर किसी धमाकेदार जवाब की संभावना नहीं है। इस खबर के अनुसार दो अधिकारियों ने बुधवार को कहा कि वीरवार को नए जवाबी (और प्रतिशोधी) टैरिफ लागू किये जाने की संभावना के जवाब में भारत जल्दबाजी में आयात शुल्क कम नहीं करेगा। अखबारों ने इस खबर को भी महत्व नहीं दिया है जबकि ट्रम्प के दावे के मुकाबले भारत टैरिफ कम करने के लिए तैयार हो गया था। भाजपा और सरकार का हेडलाइन मैनेजमेंट में जितना जोर रहता है उस लिहाज से यह भी खबर हो सकती थी पर नहीं है। आज छपी खबर के अनुसार अनाम अधिकारियों में से एक ने कहा है, भारत किसी जोरदार प्रतिक्रिया से बचेगा खासकर ऐसे समय में जब दोनों देश एक आपसी लाभप्रद बीटीए के लिए चर्चा कर रहे हैं। द हिन्दू में दो कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, “अमेरिकी ‘लिब्रेशन डे’ के मौके पर भारत टैरिफ के लिए तैयार”। दि एशियन एज की खबर का शीर्षक है, “ट्रम्प के टैरिफ ने दुनिया भर को चिन्ता में डाल रखा है”।
हेडलाइन मैनेजमेंट
द टेलीग्राफ में आज हेडलाइन मैनेजमेंट वाली एक खबर है। इसके अनुसार पाकिस्तान पर युद्धविराम उल्लंघन का दुर्लभ आरोप लगाया गया और फिर मामला धुंधला गया। नवोदय टाइम्स में यह खबर टॉप पर है जिसका शीर्षक है, “एलओसी पर पाक सैनिकों ने की थी घुसपैठ की कोशिश : सेना”। मुजफ्फर रैना ने श्रीनगर डेलटाइन से लिखा है, सेना ने बुधवार को पाकिस्तानी सैनिकों पर युद्धविराम के उल्लंघन और एलओसी के भारतीय तरफ एक माइन ब्लास्ट करने का आरोप लगाया लेकिन बाद में इसपर चुप्पी सी साध ली। इससे पहले, मंगलवार को दोनों पक्षों के बीच तनाव फैल गया था हालांकि भारतीय सेना ने इस घटना को लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया। बुधवार को सेना ने असामान्य दावा किया कि पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठ की है। अखबार ने लिखा है कि एलओसी पर घुसपैठ बहुत कम होती है और इसे सेना द्वारा स्वीकार करने के मामले उससे भी कम होते हैं। इस संबंध में भास्कर डॉट कॉम की खबर इस प्रकार है, जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर सेना ने 4-5 पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार गिराया। हालांकि, इसे लेकर सेना का आधिकारिक बयान नहीं आया है। घटना मंगलवार शाम को पुंछ में नियंत्रण रेखा पर कृष्णा घाटी सेक्टर के फॉरवर्ड एरिया में हुई।
एलओसी से सटे इलाके में तीन माइन ब्लास्ट हुए और पाकिस्तान की ओर से फायरिंग भी हुई थी। दावा है कि इसी समय आतंकियों ने घुसपैठ की कोशिश की थी। भारतीय सेना ने जवाबी फायरिंग की थी। जिसमें 4 से 5 घुसपैठिये मारे गए। फायरिंग और ब्लास्ट को लेकर सेना से दैनिक भास्कर ने बात की। सेना ने कहा- एक अप्रैल को एलओसी के उस पार से पाकिस्तानी सेना ने घुसपैठ की कोशिश की। इसके कारण कृष्णा घाटी सेक्टर में एक माइन ब्लास्ट हुआ। पाकिस्तानी सेना ने बिना उकसावे के फायरिंग की और संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया।’ सेना ने कहा- हमारे सैनिकों ने फायरिंग का जबाव दिया। स्थिति नियंत्रण में है और इस पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है। भारतीय सेना एलओसी पर शांति बनाए रखने के लिए साल 2021 के डीजीएसएमओ समझौते को बनाए रखने की अपील करती है।
अमित शाह का जवाब और उसकी गहराई
आज के अखबारों में एक और खबर को खूब महत्व मिला है। अखिलेश यादव ने लोक सभा में कहा कि भाजपा अपना अध्यक्ष नहीं चुन पा रही है तो अमित शाह ने कहा कि विपक्ष की पार्टियों को अपना अध्यक्ष पांच लोगों में से चुनना हाता है जबकि भाजपा को करोड़ों कार्यकर्ता तय करते हैं। इसलिए भाजपा को समय लगता है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपा को समय लगता है तो इसका इंतजाम उसे ही करना है। कार्यकाल उसे ही तय करना है और चुनने में लगने वाला समय भी उसे ही तय करना है। इसके अलावा भाजपा औरों से अलग होने का दावा करती रही है। अगर अध्यक्ष का चुनाव नहीं हो पा रहा था तो अध्यक्ष को मंत्रिमंडल में लेने की क्या जरूरत थी और उनका कार्यकाल बढ़ाया ही जाना चाहिये था। लेकिन भाजपा ऐसी पार्टी है कि उसने अपने कोषाध्यक्ष को केद्रीय मंत्री बना दिया और कोषाध्यक्ष का पद महीनों खाली रहा। यह व्यवस्था की खामी है, योग्य लोगों की कमी या उन्हें तलाशने की प्रक्रिया लंबी होने के कारण भी हो सकता है पर इससे पद खाली नहीं रहे, पार्टी अक्षम या अयोग्य नहीं लगे इसे देखना भी पार्टी का ही काम है और नहीं देखा जायेगा तो आलोचना भी होगी ही और वैसे ही होगी जैसे भाजपा दूसरी पार्टियों की आलोचना करती है। अखबारों के साथ दिक्कत यह है कि उन्हें भाजपा के आरोप और तर्क तो पसंद आते हैं लेकिन उसकी कमजोरी नहीं दिखती है।
कांग्रेस पर यह आरोप लगता रहा कि पार्टी का अध्यक्ष गांधी परिवार से ही कोई होता है और वंशवाद है। पर राहुल गांधी (या प्रियंका ने) पद नहीं लिया। चुनाव हुआ और मल्लिकार्जुन खड़गे अध्यक्ष बने। बीबीसी की एक खबर के अनुसार, बीजेपी के मौजूदा अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल क़रीब दो साल पहले समाप्त होने के बाद उन्हें लगातार एक्सटेंशन दिया जा रहा है। बीजेपी के इतिहास में यह पहला मौक़ा है जब किसी अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद इतने लंबे समय तक नया अध्यक्ष नहीं चुना गया है। अमित शाह ने अखिलेश यादव से यह भी कहा था कि वे 25 साल तक अपनी पार्टी के अध्यक्ष बने रहेंगे। लेकिन मुद्दा भाजपा के अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया उसका पालन और उसमें होने वाली देरी तथा नया उम्मीदवार नहीं मिलने पर भी अध्यक्ष को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने की मजबूरी का था। सपा अपने संविधान से चलती है और वह सबको मालूम है। निश्चित रूप से उसकी आलोचना भी हो सकती है लेकिन अखबार क्यों नहीं बताते कि भाजपा में क्या हो रहा है या उन्हें अमित शाह की बात ही क्यों पसंद आती है। जहां तक चुने गये लोगों की बात है, अमित शाह पूर्व तड़ीपार हैं और फिर भी 140 करोड़ लोगों में से चुने गये हैं। स्मृति ईरानी को जब शिक्षा मंत्री बनाया गया तो उनकी ऐसी कोई योग्यता नहीं थी और बाद में पता चला कि उन्हें डिग्री और सर्टिफिकेट में अंतर भी नहीं पता था। मौजूदा शिक्षा मंत्री भी कोई विद्वान नहीं हैं। ऐसे तमाम उदाहरण हैं। भाजपा में वंशवाद कम नहीं है। तो आलोचना सिर्फ अखिलेश यादव की क्यों? और उसपर चटखारे लेने का मतलब?


