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सुख-दुख

उज्ज्वल दादा की इस पोस्ट को महिलाओं ने दिल पर ले लिया!

शोभा शामी-

हमारे आसपास के प्रगतिशील मर्द. मुझे कोई हैरानी नहीं. और ऐसे तमाम लोगों में इतने गट्स हैं कि आकर ये भी कहेंगे कि अरे ‘मज़ाक़ था’.

मज़ाक़, चुटकुलों, कॉमेडी फ़िल्मों, स्टैंड अप कॉमेडी से मुझे इसीलिए नफ़रत है. आप ह्यूमर के नाम पर सारी प्रॉबलेमैटिक चीज़ों को नॉरमलाइज़ करते हैं. उसे बार बार दुहराते हैं और कोई टोक दे तो एक नज़र देखने सोचने की बजाय आप ‘मज़ाक़ कर रहा था’ बोलकर लोगों को ह्युमिलिएट करने की कोशिश करते हैं, जैसे उन्होंने ही कोई ग़लत बात कह दी हो.

बात बस इतनी है कि आप बौद्धिक विमर्श का लबादा ओढ़ सकते हैं लेकिन कब तक? एक दिन हक़ीक़त सामने आ ही जाती है कि आप दरअसल क्या सोचते हैं.

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