संयोग या सिस्टम का संकेत? जिस सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाएँ सख़्त टिप्पणियों के साथ ख़ारिज कीं, उसी बेंच ने उसी दिन अडानी पावर को गुजरात एसईज़ेड से जुड़े कस्टम ड्यूटी विवाद में बड़ी राहत दे दी। फैसलों की वैधानिकता पर बहस अलग है, लेकिन न्यायिक प्राथमिकताओं और संवेदनशीलता को लेकर उठते सवाल अनदेखे नहीं किए जा सकते।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने अडानी पावर लिमिटेड को बड़ी राहत देते हुए गुजरात हाईकोर्ट के वर्ष 2019 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें कंपनी को विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) से घरेलू टैरिफ क्षेत्र (DTA) में आपूर्ति की गई बिजली पर कस्टम ड्यूटी से छूट देने से इनकार किया गया था।
शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि वैध चार्जिंग प्रावधान के अभाव में SEZ से DTA में भेजी गई बिजली पर कस्टम ड्यूटी नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा इस मद में वसूली गई राशि कानून के अधिकार के बिना थी और उसे लौटाना होगा।
क्या है मामला?
अडानी पावर गुजरात के मुंद्रा पोर्ट स्थित अपने कोयला आधारित थर्मल पावर प्लांट से SEZ में बिजली उत्पादन कर उसे DTA में सप्लाई करती है। वर्ष 2010 में केंद्र सरकार ने 26 जून 2009 से प्रभावी रूप से बिजली पर कस्टम ड्यूटी लगाने का नोटिफिकेशन जारी किया था।
गुजरात हाईकोर्ट ने वर्ष 2015 में इस ड्यूटी को मनमाना, अवैध और असंवैधानिक करार देते हुए कहा था कि बिजली पर कस्टम ड्यूटी केवल भविष्य में किसी ठोस कानून के जरिए ही लगाई जा सकती है। कोर्ट ने यह भी माना था कि कच्चे माल पर पहले ही टैक्स दिए जाने के बाद बिजली पर ड्यूटी लगाना दोहरा कराधान (डबल टैक्सेशन) है।
हालांकि, इसके बाद 2010 और 2012 में नए नोटिफिकेशन जारी कर ड्यूटी वसूली जारी रखी गई। जब अडानी पावर ने फिर से हाईकोर्ट का रुख किया तो 2019 में राहत देने से इनकार कर दिया गया, जिसके खिलाफ कंपनी सुप्रीम कोर्ट पहुंची।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन.वी. अंजनिया की पीठ ने कहा कि—2015 का गुजरात हाईकोर्ट का फैसला केवल उस अवधि या किसी एक नोटिफिकेशन तक सीमित नहीं था, बल्कि उसने कानून के तौर पर यह घोषित कर दिया था कि बिजली पर कस्टम ड्यूटी लगाने का अधिकार ही नहीं है।
2010 और 2012 के नोटिफिकेशन केवल ड्यूटी की दर बदलते थे, कोई नया टैक्स लगाने का अधिकार नहीं देते। बार-बार एक जैसे नोटिफिकेशन को चुनौती देना जरूरी नहीं है, जब मूल कानूनी स्थिति पहले ही तय हो चुकी हो।
अदालत ने कहा कि 2019 में गुजरात हाईकोर्ट की समन्वय पीठ (को-ऑर्डिनेट बेंच) 2015 के फैसले से बंधी हुई थी। यदि उसे उस फैसले पर संदेह था, तो मामला बड़ी पीठ को भेजना चाहिए था, न कि फैसले की सीमा को संकुचित करना।
रिफंड का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि—
“जब यह साबित हो जाए कि टैक्स की वसूली कानून के अधिकार के बिना हुई है, तो राज्य उस राशि को अपने पास नहीं रख सकता। ऐसी स्थिति में राशि की वापसी (रिस्टिट्यूशन) आवश्यक है।”
इसके साथ ही अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के 28 जून 2019 के आदेश को रद्द करते हुए कस्टम विभाग को निर्देश दिया कि वह आठ सप्ताह के भीतर सत्यापन कर अडानी पावर को वसूली गई राशि लौटाए।
पत्रकार सौरव दास की टिप्पणी-
वही जस्टिस अरविंद कुमार की पीठ, जिसने हास्यास्पद तर्कों के आधार पर उमर ख़ालिद को ज़मानत देने से इनकार किया था, उसी पीठ ने आज गुजरात के एसईज़ेड से ली गई बिजली पर अडानी पावर को कस्टम ड्यूटी से छूट दे दी है। मैं मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ, केवल इस तथ्य की ओर ध्यान दिला रहा हूँ।
वरिष्ठ पत्रकार शीतल पी सिंह लिखते हैं-
संयोग…….. उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज करने वाली सुप्रीम कोर्ट के जजेज की बेंच में शामिल न्यायाधीशों के बारे में कुछ जानकारी:
- न्यायाधीश अरविंद कुमार: गुजरात उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत।
- न्यायाधीश एन वी अन्जारिया: गुजरात उच्च न्यायालय में अपने प्रारंभिक करियर के दौरान वकील के तौर पर प्रैक्टिस करते थे, फिर वे उसी अदालत में न्यायाधीश बने, और बाद में कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त हुए।
- इसी बेंच ने आज ही अडानी पावर नाम की कंपनी को गुजरात सेज से विवाद में कस्टम ड्यूटी से राहत प्रदान की।


