Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

यूनीवार्ता के स्वामित्व की लड़ाई अब क़ीमती जमीन पर क़ब्ज़े का प्रकरण बन गया है!

शकील अख़्तर-

पिछले साल ही हमने कहा था की UNI की हजारों करोड़ की संपत्ति निशाने पर है। आज पत्रकारों को पुलिस बल के जरिए बाहर किया गया और दफ्तर सील कर दिया गया। पिछले साल की पोस्ट पढ़िए!

नेशनल हेरल्ड का मामला कुछ नहीं है! देश की सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित न्यूज़ एजेंसी रही UNI के गुपचुप बिकने और उसकी हजारों करोड़ों की संपत्ति पर कब्जा करने का मामला बहुत बड़ा घोटाला है।

नेशनल हेराल्ड के मामले में तो वहां कार्यरत पत्रकारों और गैर पत्रकारों के सारे बकायों का भुगतान किया गया था और सबको एक हैंडसम VRS दिया गया था। जो उस पर 90 करोड़ का कर्ज था उसमें से 67 करोड केवल कर्मचारियों के भुगतान में खर्च हुए थे।

मगर यू एन आई के मामले में पत्रकारों में भारी चिंता और घबराहट का माहौल है वहां कई सालों से उन्हें वेतन नहीं मिला है। एक-एक पत्रकार का कई कई लाख बकाया है। मगर संस्थान के बिकने के बाद उसकी जो शर्तें बाहर आ रही है उनके मुताबिक उन्हें उनकी बकाया तनखा का एक बहुत छोटा हिस्सा देने की बात कही जा रही है।

और इस सारे मामले में सबसे आश्चर्यजनक तथ्य है कि हजारों करोड रुपए की संपत्ति और एक चलती हुई एजेंसी 100 करोड़ से भी कम में खरीदी गई है। जिससे कई गुना ज्यादा का तो उसके नई दिल्ली (लुटियंस जोन) स्थित रफी मार्ग के मुख्यालय की कीमत है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इसकी सीबीआई जांच की मांग हो रही है।

आश्चर्य है कि नेशनल हेराल्ड में तो सारा मामला कांग्रेस की अंदरूनी कंपनियों तक ही सीमित है। बाहर की कोई कंपनी या व्यक्ति इसमें शामिल नहीं है और ना ही एक पैसे का भी लेनदेन हुआ है।

केवल जैसा कि ऊपर बताया की 90 करोड़ का जो कर्जा हो गया था उसे देने के लिए एक नई कंपनी बनाई और उसने कांग्रेस से लेकर वह पैसा दिया।

मगर यहां तो दिल्ली सहित देश भर में यू एन आई के पास हजारों करोड़ों की अचल संपत्ति है।

न्यूज़ एजेंसी चल रही है। और इसकी हिंदी सर्विस वार्ता तो आज भी देश भर में सबसे ज्यादा हिंदी के समाचारों का संकलन और प्रसारण करती है। पीटीआई ने बहुत कोशिश की हिंदी की सर्विस भाषा बनाई लेकिन वह वार्ता का स्थान नहीं ले सकी।

दूसरी अहम बात की यूएनआई को स्टेट्समैन ने खरीदा है जो खुद एक मरा हुआ अखबार बन गया है। बताया जा रहा है की स्टेट्समैन के पीछे कोई और बड़ा नाम है जो अभी सामने नहीं आ रहा है।

दो चिंताएं सबसे बड़ी हैं। एक भारत जैसे बड़े देश में जैसे पहले थीं यूएनआई और पीटीआई दो प्रतिस्पर्धी न्यूज़ एजेंसियां होना चाहिए। एक वह भी टाइम था कि दोनों के बीच एक एक सेकंड की कंपटीशन होती थी की किसकी खबर पहले रिलीज हुई। वह ब्रेकिंग न्यूज़ का जमाना नहीं था फ्लैश का था।

रिपोर्टर अपनी जेब में हमेशा 10 पैसे के सिक्के रखते थे कि जैसे ही खबर मिली टेलीफोन बूथ पर जाकर 10 पैसे का सिक्का डालकर तत्काल खबर लिखाते थे।

देश के ज्यादातर बड़े पत्रकार इन न्यूज एजेंसी में ही काम करके तथ्यात्मकता ऑब्जेक्टिविटी क्रॉस चेक निष्पक्षता हर पक्ष से बात और सबसे बड़ी चीज निर्भयता सीखे हैं।

दूसरी चिंता इन्हीं परंपराओं से निकले पत्रकारों की ही है। जैसे नेशनल हेराल्ड ने सारा बकाया वेतन दिया और साथ में VRS भी ऐसा ही यूएनआई में भी दिया जाना चाहिए।

पत्रकार को और उनके संगठनों को अब लड़ने की स्थिति में नहीं छोड़ा गया है। भारी दबाव में और कमजोर स्थिति में हैं। यूएनआई में ही पिछले दिनों एक पत्रकार ने दफ्तर के पंखे से लटक कर आत्महत्या की थी।


जयंत सिंह तोमर-

दिल्ली में रफ़ी मार्ग पर समाचार समिति ‘यूनीवार्ता ‘ के दफ्तर को जिस तरह भारी पुलिस बल के सहारे आनन फानन में खाली करवाने की कार्रवाई की खबरें आ रही हैं वह इस बात के संकेत देती है कि इस बेशकीमती जमीन को किसी तरह हड़पने का यह प्रयास है।

जिस समय पुलिस बल यूनीवार्ता के दफ्तर को खाली कराने पहुंचा उस समय पत्रकार अपनी खबरें लिखने और सम्पादित करने में व्यस्त थे।

यूनीवार्ता के स्वामित्व का स्वरूप आज चाहे जैसा हो, यह अंततः प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा के बजाय बेशकीमती जमीन पर आधिपत्य का मामला ज्यादा है।

पत्रकारिता में पढ़ाई के बाद मैंने दूरदर्शन में इंटर्नशिप किया था और फिर पहली नौकरी की UNI में.

वहाँ सरकार को छापा नहीं डालना था, वह एजेंसी सरकार के हिसाब से काम करती रही है, जैसे कोई एजेंसी करती है.

बाद में एजेंसियों के मालिकाने में बदलाव हुआ होगा, मुझे नहीं पता है.

-प्रकाश के रे

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन