विकास मिश्रा-
मित्र पीयूष पांडे को अब तक लोग व्यंग्य लेखक के तौर पर जानते थे, लेकिन ‘उसने बुलाया था’ के जरिए उन्होंने पहली बार उपन्यासों की दुनिया में दस्तक दी है। यह दस्तक बहुत ही जोरदार है। कल रात ही मैंने इस उपन्यास को पूरा किया है। जब तक पूरा पढ़ नहीं लिया, तब तक किसी और काम में मन नहीं लगा।
हास्य-व्यंग्य से सबको गुदगुदाने वाले पीयूष पांडेय का यह उपन्यास एक क्राइम थ्रिलर है। उपन्यास के शुरुआत में ही एक हत्या होती है, उसके बाद लगातार कुछ मौतों का सिलसिला। केस की तफ्तीश के दौरान पाठक खुद पुलिस के साथ हो लेता है। उपन्यास में एक बहुत ही दिलचस्प प्रयोगशाला है और यह प्रयोगशाला अचेतन होकर भी कहानी के केंद्र में है।
पीयूष पांडे ने इस जोनर में पहली बार हाथ आजमाया है, लेकिन लगता नहीं कि वह नौसिखिए हैं। कहीं भी कहानी पर पकड़ ढीली नहीं पड़ने दी है। पढ़ने वाले की आंखों के सामने एक फिल्म सी चल पड़ती है, वह पाठक नहीं बल्कि दर्शक हो जाता है। वह कहानी में उलझता है, निकलता है, डूबता है, उतराता है। झटके पर झटके लगते हैं। जैसे ही आप कोई सीन पढ़कर कुछ प्रेडिक्ट करते हैं, अगले पल ही वो थ्योरी धराशायी हो जाती है। जैसा कि ऐसे उपन्यासों में होता है कि क्लाइमेक्स चौंकाने वाला होता है। वैसे ही इसका भी क्लाइमेक्स है। सारे सवालों के जवाब क्लाइमेक्स में मिलते हैं।
पीयूष पांडे चूंकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मंझे हुए पत्रकार रहे हैं इस नाते इनकी भाषा बेहद प्रवाह लिए हुए है। कहीं कोई बाधा नहीं। थोड़ी नाटकीयता की छूट जरूर ली है। आजतक जैसे न्यूज चैनल में उनके रहने का असर भी दिखता है। आजतक में कुछ साल पहले एक साथ दो नई एंकर्स आई थीं। मल्लिका मल्होत्रा और अर्पिता आर्या। तो उपन्यास की पात्र एक एंकर का नाम उन्होंने रखा है-मल्लिका आर्या।
उपन्यास की भूमिका में ही पीयूष जी ने कई लोगों का नाम लिया है, जिन्होंने इस उपन्यास के पूरे होने में अपना सहयोग दिया है। एक नाम हम लोगों की सहकर्मी एंकर मीनाक्षी कंडवाल का भी है। मैं सोच रहा था कि मीनाक्षी ने क्या योगदान दिया होगा। उपन्यास पढ़ते वक्त जब गढ़वाली भाषा में कुछ डायलॉग आए तो अंदाजा लगा कि हिंदी से गढ़वाली वाला अनुवाद मीनाक्षी ने किया होगा।
‘उसने बुलाया था’ उपन्यास का जोनर और अंदाज लगभग वही है जो कभी वेद प्रकाश शर्मा, ओम प्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, कर्नल रंजीत और इब्ने सफी जैसे लोकप्रिय उपन्यासकारों का होता था। वरिष्ठ पत्रकार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मेरे पहले बॉस संजीव पालीवाल जी ने इस विधा को ‘नैना’ और ‘पिशाच’ नाम के उपन्यासों से एक नई संजीवनी दी थी। पीयूष पांडे का यह उपन्यास उसी विधा की अगली कड़ी है।
उपन्यास में मनोरंजन का भरपूर मसाला है। चुटीले संवाद हैं, लेकिन कहीं अश्वीलता नहीं है, जैसा कि उनके जोनर के उपन्यासकार करते रहे हैं। उन्होंने आधुनिक प्रचलित गाली-गलौज वाली भाषा का इस्तेमाल भी नहीं किया बस जरूरत पड़ने पर इशारा कर दिया है। उपन्यास रोमांचक है, कौतुहल जगाए रहता है, घटनाक्रम बांधे रखते हैं, पठनीयता जोरदार है।
वैसे भी सोशल मीडिया पर मुझसे पहले तमाम लोगों ने इस किताब के बारे में अपनी राय रखी है। मैं थोड़ा लेट लतीफ हूं। देर से पढ़ा देर से लिखा। आप भी पढ़ सकते हैं, पूरा पैसा वसूल है। यह उपन्यास अमेजन पर सिर्फ 212 रुपये में उपलब्ध है।


