
संध्या द्विवेदी-
अमित शाह के बयान को हल्के में न लें, ये शाह हैं बेमतलब बोलना इनकी आदत नहीं…अविमुक्तेश्वरानंद को देश के गृहमंत्री अमित शाह क्या शंकराचार्य (सनातन धर्म में सबसे बड़ी पदवी) नहीं मानते हैं, क्या उन्हें सनातनी नहीं मानते?
सवाल इसलिए क्योंकि गुजरात के गांधीनगर में उन्होंने बयान दिया कि सनातन का अपमान करने वाले दोबारा सत्ता में नहीं आते।
अगर अविमुक्तेश्वरानंद सनातन के दायरे में आते हैं तो उनका अपमान करने का आरोप यूपी सरकार पर लग रहा है। तो क्या बयान का बाण योगी पर चला? या फिर मामला राजनीतिक है।
यूपी में कुछ तो गड़बड़ है। फिलहाल यूपी के मुख्यमंत्री के सुर उपमुख्यमंत्रियों से मैच भी नहीं खा रहे। ब्रजेश पाठक बटुकों को भोज करा रहे। तो मौर्य ने भी अविमुक्तेश्वरानंद को भगवान शंकराचार्य कहा था। अब गृहमंत्री शाह का ये बयान? बेमतलब तो नहीं।
या तो सीएम योगी पर ये निशाना था या फिर अविमुक्तेश्वरानंद को सनातन के दायरे में मानने से दिल्ली का इनकार था। क्या था? ये तो दिल्ली वाले खास लोग जानें…लेकिन यूपी के सीएम योगी को अपने हितैषियों से रिव्यू लेकर ही आगे बढ़ना चाहिए।
चन्द्रकान्त प्रसाद सिंह-
चंडूखाने में चर्चा है कि साहेब जी २०२९ से पहले- पहले योगी से मुक्ति चाहते हैं और अगले साल ही सुनहरा मौका है। योगी जी अगर यूपी की सत्ता से बाहर हो गए तो शिवराज सिंह चौहान की तरह केंद्र में मंत्री का पट्टा पहनाकर उनपर पूरा कब्जा।
दूसरी रणनीति यह कि इस बीच यूपी के बड़े ठेके अपने चहेतों को दिलाकर महाराज जी को इतना कमजोर कर दें कि कोई भी मोटा असामी २०२९ के लोकसभा चुनाव से पहले उनपर प्रधानमंत्री की दावेदारी के लिए पैसा लगाने तैयार ही नहीं हो।
चूंकि साहेब को सामने से पंगा लेने की ट्रेनिंग नहीं है और अपनों की पीठ में चाकू घोंपने का पुराना हिंदू अनुभव है, इसलिए यूजीसी को बलि का बकरा बना दिया गया। यूपी के २०२७ के चुनाव से पहले यूजीसी प्रकरण ठंडा न पड़ जाए यह सुनिश्चित करने का काम पार्टी का IT सेल बखूबी निभा रहा है।
राजनीति का ककहरा समझने वाले भी बहुत खुलकर यह बात कह रहे हैं कि वर्तमान भाजपा नेतृत्व हिंदी पट्टी के किसी भी बड़े राज्य में किसी भी कद्दावर नेता को राज्य की सत्ता की चाभी एकदम नहीं देना चाहता। वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। नड्डा और नितिन नबीन इसी सिक्के के दूसरे पहलू हैं। बिहार भाजपा में नई पीढ़ी में स्थानीय नेतृत्व को नहीं उभरने देना इसी रणनीति का तीसरा उदाहरण है।
आप पूछ सकते हैं कि हिंदी पट्टी के बड़े राज्य और खासकर यूपी क्यों उनके निशाने पर है? इसके दो कारण हैं और दोनों ही काफी महत्वपूर्ण हैं: पहला यह कि यूपी से होकर केंद्र की सत्ता तक पहुंचना आसान है। दूसरा यह कि १९४७ से लेकर अबतक केंद्र में सत्तासीन पार्टियों को मोटा चंदा देने वाले उद्योगों के मालिकान यह नहीं चाहते कि हिंदी पट्टी में एक सीमा से अधिक औद्योगिक विकास हो क्योंकि अगर विकास हुआ तो औद्योगिक रूप से अधिक विकसित राज्यों को सस्ता मजदूर कैसे मिलेगा?


