भुवनेश्वर/रायगढ़ा: ओडिशा के रायगढ़ा जिले के कंतामाल गांव में 7 अप्रैल को शुरू हुई पुलिस और स्थानीय आदिवासी समुदायों के बीच हिंसक झड़प अबतक खत्म नहीं हुई है। इस झड़प में अबतक करीब सैकड़ों लोग घायल हो चुके हैं। घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव बना हुआ है और पुलिस कार्रवाई को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, विवाद की जड़ सिजिमाली पहाड़ियों में प्रस्तावित बॉक्साइट खनन परियोजना और उससे जुड़ी सड़क निर्माण योजना है। स्थानीय आदिवासी समुदाय इस परियोजना का लंबे समय से विरोध कर रहे हैं।
रात में पुलिस कार्रवाई के आरोप
कांग्रेस की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने 10 अप्रैल को अपनी जांच के बाद दावा किया कि 6 अप्रैल की रात करीब 3 बजे पुलिस गांव में दाखिल हुई, बिजली सप्लाई काट दी गई, घरों के दरवाजे तोड़े गए और विरोध कर रहे लोगों को हिरासत में लिया गया। कांग्रेस ने इसे “राज्य मशीनरी का दुरुपयोग” बताया है।
सड़क परियोजना पर क्यों विरोध?
प्रस्तावित करीब 3 किलोमीटर लंबी सड़क के लिए लगभग 5 हेक्टेयर वन भूमि को साफ करना होगा। यह सड़क Vedanta Limited की बॉक्साइट खनन परियोजना तक पहुंच के लिए बनाई जा रही है।
यह खनन परियोजना 1,549 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली है, जिसमें 699 हेक्टेयर वन भूमि शामिल है। अनुमान है कि यहां 311 मिलियन टन बॉक्साइट का भंडार है और हर साल 9 मिलियन टन उत्पादन का लक्ष्य है।
2023 से जारी है विरोध
स्थानीय आदिवासी समुदाय 2023 से इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं, जब राज्य सरकार ने वेदांता को 50 साल की लीज पर यह खनन परियोजना आवंटित की थी। ग्रामीणों का कहना है कि इससे उनकी जमीन, आजीविका और पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ेगा।
मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप
बेंगलुरु के National Law School of India University की एक स्टडी में भी परियोजना को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार—
- आदिवासियों के जमीन और सांस्कृतिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है
- विस्थापन और आजीविका के नुकसान को कम करके दिखाया गया है
- पर्यावरण और जल स्रोतों पर दीर्घकालिक नुकसान की आशंका है
- अभी अंतिम मंजूरी नहीं
गौरतलब है कि इस सड़क परियोजना को अभी केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय से अंतिम (Stage-II) मंजूरी नहीं मिली है। फिलहाल इसे केवल प्रारंभिक (Stage-I) क्लियरेंस ही प्राप्त है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं तेज
बीजेडी नेता रणेंद्र प्रताप स्वैन ने पुलिस कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे “बर्बर दमन” बताया। वहीं कई राजनीतिक दलों ने ग्राम सभा की अनुमति के बिना परियोजना आगे बढ़ाने पर सवाल उठाए हैं।
राज्यसभा सांसद सस्मित पात्रा ने केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री जुएल ओराम को पत्र लिखकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
कांग्रेस की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने कई मांगें रखी हैं—
- निष्पक्ष और पारदर्शी ग्राम सभा प्रक्रिया
- लंबित वन अधिकारों का तत्काल निपटारा
- निर्दोष ग्रामीणों पर दर्ज मामलों को वापस लेना
- पूरे मामले की स्वतंत्र जांच
यह पूरा विवाद विकास बनाम पर्यावरण और आदिवासी अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। फिलहाल, स्थिति संवेदनशील बनी हुई है और सभी की नजरें सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।
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