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आज के अखबार : अटल बिहारी के ‘दाढ़ी वाले’, “तमिलनाडु के मोदी” को उपराष्ट्रपति बना देने की कहानी

अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील, मुकाबले और हश्र की खबर छपी नहीं है, जज के मामले में धनखड़ गये, उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार पूर्व जज के खिलाफ आरोप और इस सरकार की रीति नीति विस्तार में….

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों का पहला पन्ना मुख्य रूप से दो ही खबरों से भरा है। नेपाल की कहानी के साथ राजग उम्मीदवार के उपराष्ट्रपति चुने जाने की खबर तो सभी अखबारों में होनी है लेकिन अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील का क्या हुआ, मुकाबले में कौन था और कैसे टक्कर दी गई जैसी खबरें अखबारों में नहीं होनी है पर मैं उसे विस्तार से बताउंगा। ज्यादातर अखबारों में जब नेपाल की खबर लीड है और उपराष्ट्रपति चुनाव की सेकेंड लीड तब टाइम्स ऑफ इंडिया ने उपराष्ट्रपति चुनाव की खबर को पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड बनाया है जबकि पहले पन्ने पर नेपाल की खबर लीड है। द हिन्दू में उपराष्ट्रपति चुनाव के नतीजे की खबर लीड है और नेपाल की खबर बराबर में। एशियन एज में उल्टा है। नेपाल की खबर लीड और उपराष्ट्रपति की बर बराबर में। इंडियन एक्सप्रेस में नेपाल की खबर छह कॉलम में लीड है जबकि उपराष्ट्रपति चुनाव की खबर दो कॉलम में है। हिन्दुस्तान टाइम्स में अधपन्ने पर हमास नेताओं पर इजराल के हमले की खबर लीड है जबकि नेपाल की खबर मुख्य अखबार में लीड है। उपराष्ट्रपति की कबर साथ में तीन कॉलम में है। द टेलीग्राफ में नेपाल की खबर लीड है और उपराष्ट्रपति की खबर नीचे दो कॉलम में और उसके साथ हमास पर इजराइल के हमले की खबर है। इस खबर का शीर्षक है, इजराइल ने अमेरिका के सहयोगी कतर में हमास पर हमला बोला। नवोदय टाइम्स में नेपाल की खबर लीड और उपराष्ट्रपति चुनाव की खबर बराबर में है। अमर उजाला में नेपाल की खबर आधे पन्ने से ज्यादा में है. बाकी में उपराष्ट्रपति चुनाव। इस तरह आज खबरों के बारे में लिखने के लिए कुछ है ही नहीं।

तथ्य है कि उपराष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आ गये हैं और यह साफ हो गया है कि अंतरात्मा की आवाज पर वोट नहीं पड़े या जो वोट पड़े अगर अंतरात्मा की आवाज पर हैं तो बहुमत की अंतरात्मा की आवाज पर सोचने की जरूरत है। असल में संख्या बल तो राजग उम्मीदवार के साथ था पर इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार ने अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील की थी। इसे क्रॉस वोटिंग बताने की कोशिश चलती रही और इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार जस्टिस बी सुदर्शन रेड्डी अंत तक कहते रहे कि उन्होंने क्रॉस वोटिंग के लिए नहीं कहा है, एक बार भी इस शब्द का उपयोग नहीं किया है और अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील की है। नतीजे बताते हैं कि मतदान पार्टी लाइन पर हुई और क्रॉस वोटिंग हुई भी हो तो दूसरी तरफ हुई। सबसे दिलचस्प है 15 वोट को अवैध करार दिया जाना। हालांकि ऐसा पहले से होता आया है और अनिल मसीह के मामले में सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग या व्यवस्था ने कुछ नहीं किया तो अब उसकी क्या बात करूं। फिर भी जिन स्थितियों में चुनाव हो रहा था उनमें अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील की मतलब था और मुझे उम्मीद थी कि ऐसा होगा। अखबारों में यह सब नहीं छपता है। यह खबरों का भाग नहीं है और पहले पन्ने पर हो नहीं सकता लेकिन आज की खबर यही है कि उपराष्ट्रपति चुनाव में अंतरात्मा की आवाज नहीं सुनी गई या सुनी गई तो वह मौजूदा व्यवस्था को जारी रखने के पक्ष में है। नेपाल की कल की घटना के आलोक में यह चिन्ता की बात है इसलिये आज इसपर चर्चा होनी चाहिये थी लेकिन भारतीय मीडिया ने ऐसे मुद्दों पर चर्चा बहुत पहले से छोड़ रखी है।

आइये आज देखते हैं कि चुनाव के मुद्दे क्या थे, उम्मीदवार कौन थे, चुनाव प्रचार क्या हुआ और अंततः जीत जिसकी हुई और जो हार गये वे क्या हैं। जाहिर है कि यह सब चुनाव प्रचार का हिस्सा है और अंग्रेजी-हिन्दी में छपता रहा है। कुछ पढ़ा हुआ याद है, कुछ देखकर लिख रहा हूं, जो हिन्दी में मिल गया वह कॉपी पेस्ट भी है और इसका मकसद यह बताना है कि भाजपा ने उपराष्ट्रपति चुनाव में भी वही किया जो वह चुनाव जीतने के लिए करती रही है। इसमें कुछ खास नहीं है या वह सब कुछ है जो किसी भी तरह काम आ सकता है। मां की गाली को मुद्दा बनाने से लेकर 13 को मणिपुर और 17 को गयाश्री जाने तक। पंचायत प्रमुख, मेयर या विधायक अथवा सांसद बनाने के लिए भी पार्टी बहुत मेहनत करती है। प्रधानमंत्री भी कोई कसर नहीं छोड़ते। इसके बाद पार्टी या परिवार के लोगों को मंत्री, मुख्यमंत्री या कुलपति और राज्यपाल बनाना शामिल है। तमाम पद और ईनाम चुनावी लाभ के लिए भी दिये जाते हैं। यह सब बताना और समझना इसलिए भी जरूरी है कि उपराष्ट्रपति का यह चुनाव जगदीप धनखड़ जैसे सत्ता समर्थक व्यक्ति को जबरन उपराष्ट्रपति जैसे पद से हटा दिये जाने के कारण हुआ। मैं बचपन में पंच परमेश्वर की कहानी से प्रभावित हुआ और बाद में रूसी मोदी के इस कथन से मेरे ज्ञान चक्षु खुल गये कि भ्रष्टाचार व्यक्ति और उसकी समझ के बीच का मामला है। मोटे तौर पर उन्होंने जो कहा उससे मैंने समझा कि एक व्यक्ति के लिए जो भष्टाचार हो सकता है वह दूसरे के लिए नहीं भी हो सकता है और यही चोरी को स्वीकार करने के मामले में है। मैं और बहुत सारे लोग मानते हैं कि चोर हीरे का हो या खीरे का चोर ही होता है। वैचारिक तौर पर भ्रष्ट और बेईमान किसी सड़क छाप चोर से बहुत बुरा होता है लेकिन सजा छोटे चोर को मिलती है वैचारिक चोरी और बेईमानी करने वाले महान भी बन जाते हैं। ऐसे में मेरा मानना रहा है कि गिरोह के सरगना को भी नैतिक होना चाहिये अपने नियमों से नहीं डिगना चाहिये। वाशिंग मशीन पार्टी के शासन ने दिखा और समझा दिया कि एक बार आप गिरोह से जुड़ जाओ तो बने रहना और छोड़ना दोनों मुश्किल होता है। यहां तक कि निकाल भी दिया जाये तो जीने की आजादी जाती रहती है। पर वह अलग मुद्दा है।

आप जानते हैं कि दो जजों के खिलाफ कार्रवाई का मामला सरकार (या संसद) के समक्ष था। एक इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज हैं जो विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रम में अपने सांप्रदायिक बयानों के कारण चर्चा में आये लेकिन मौजूदा व्यवस्था में उनका अपराध अगर कुछ था भी तो उसपर कार्रवाई नहीं होनी थी। दूसरा मामला एक जज के घर में नकदी देखे जाने और उसके जल जाने के वीडियो का था। पहले मामले में जज साहब के बोलने की बात थी उन्होंने जो बोला उसका वीडियो है। दूसरा मामला जज साहब के घर के आउट हाउस (या बाहर के कमरे) का था, जब आग लगी तो वे वहां नहीं थे और पैसों से उनका संबंध इतना ही सामने आया था कि वह घर उनका था। ऐसे में आशंका यह भी है कि पैसा वहां उन्हें फंसाने के लिए रख गया होगा। पर सरकार उनके खिलाफ कार्रवाई करने पर आमादा थी। किसी के घर पर भारी राशि रखकर, उसके जलने के बाद किसी को फंसाने का मामला आपको अटपटा लगे तो बता दूं कि एक जज साहब को एक मामले में 100 करोड़ की रिश्वत की पेशकश करने की कहानी है। उन्होंने रिश्वत स्वीकार नहीं की, उनकी संदिग्ध मौत हो गई, बाद वाले जज ने एक अभियुक्त को राहत दी जो आज देश में बेहद प्रभावशाली पद पर है और सब कुछ भूल भी जाऊं तो यह नहीं भूलता कि जज साहब की मौत की जांच नहीं होने दी गई। यह निर्णय महाराष्ट्र सरकार को करना था। अदालत में खूब पैसा बहाये गये पर जांच नहीं हुई। इसलिये भी सरकार गिरा दी गई। फिर चोरी के वोट से सरकार बनाने की शिकायत है, उसपर 30 मिनट से ज्यादा के वीडियो और उसकी सूचना भेजने के लिए ट्राई द्वारा बल्क एसएमएस की इजाजत का मामला 70 मिनट में खारिज कर दिये जाने जैसी शिकायते हैं।

दूसरी ओर, जज की मौत की जांच की जरूरत नहीं होने के समर्थन में दिलचस्प तर्क था कि उनकी मौत साथी जजों के साथ रहते हुए हुई इसलिए कुछ संदिग्ध नहीं है और शक करना साथी जजों पर शक करना है। मोटा-मोटी मामला यही है तकनीकी तौर पर कुच अलग तरीके से कहा जा सकता है। कुल मिलाकर, हुआ यह कि एक जज की मौत के मामले में साथी जजों का बयान पर्याप्त माना गया और दूसरे जज को फंसाने के मामले में उसी के बयान (या दलील) पर भरोसा नहीं किया जा रहा है। पूरा मामला भले सरकार का है लेकिन लगता किसी अपराधी गिरोह का है। बाद में जगदीप धनखड़ के इस्तीफे की खबर आई तो बताया गया कि मामला जज के खिलाफ कार्रवाई से संबंधित है। इंडियन एक्सप्रेस ने अपने संपादकीय में लिखा था कि जगदीप धनखड़ को ख़ुद आगे आकर इस्तीफ़े की वजह बतानी चाहिए। लेकिन नये उपराष्ट्रपति का चुनाव होने तक वे नजरबंद हैं या उनकी कोई सार्वजनिक उपस्थिति नहीं है। पहले तो उनका लोकेशन भी नहीं मिल रहा था बाद में पता चला कि वे रिटायरमेंट के बाद मिलने वाला सरकारी आवास तैयार नहीं होने के कारण उपराष्ट्रपति निवास खाली करके एक नेता के फार्म हाउस में रह रहे हैं। लेकिन अपने इस्तीफे का (असल) कारण उन्होंने अभी तक नहीं बताया है। बीच में खबर यह भी थी कि राष्ट्रपति भवन में उनके राष्ट्रपति से मिलने और इस्तीफा देने का कोई रिकार्ड नहीं है और तो और इस्तीफा राष्ट्रपति द्वारा स्वीकार किये जाने का भी रिकार्ड नहीं था। आरटीआई के जवाब में गृहमंत्रालय की अधिसूचना को ही इस्तीफा स्वीकार किये जाने का आधार बताया गया। बाद में कुछ लीपा-पोती की चर्चा थी पर मुझे मिला नहीं पर मामला निपटा नहीं है। इस्तीफे से संबंधित संदेह अपनी जगह बने हुए हैं।

ऐसे में मुझे बहुत उम्मीद थी कि अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील का असर हो सकता है। मौका था। लेकिन नहीं हुआ तो आइये बताऊं कि इसका मुकाबला करने के लिए क्या सब हुआ। इसके लिए सबसे पहले इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार के बारे में यह बताना उचित होगा कि वे सुप्रीम कोर्ट के जज थे। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने सुदर्शन रेड्डी पर हमला करते हुए कहा था, विपक्ष के प्रत्याशी सुदर्शन रेड्डी वही हैं, जिन्होंने वामपंथी उग्रवाद को मदद करने के लिए सलवा जुडूम का जजमेंट दिया था। अगर यह जजमेंट न दिया गया होता तो वामपंथी नक्सलवाद 2020 तक ख़त्म हो गया होता। यही सज्जन हैं, जिन्होंने विचारधारा से प्रेरित होकर सलवा जुडूम का जजमेंट दिया। आप जानते हैं कि अमित शाह कश्मीर चुनाव के समय आतंकवाद खत्म होने का दावा करते थे और उसके बाद पुलवामा हो गया तो ऑपरेशन सिन्दूर से युद्ध विराम और टैरिफ तक क्या सब हुआ और हमारी सरकार ने क्या सब किया या नहीं किया। उधर, अमित शाह के बयान पर जस्टिस रेड्डी ने कहा कि वह उनका व्यक्तिगत फ़ैसला नहीं था बल्कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय था। उन्होंने संविधान की व्याख्या के आधार पर यह कहा था कि राज्य को अनियंत्रित नहीं छोड़ा जा सकता और किसी भी नागरिक को हथियार नहीं सौंपे जा सकते। सुप्रीम कोर्ट (पीठ में जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी और जस्टिस एसएस निज्जर शामिल थे) ने सलवा जुडूम के निर्णय में लिखा था – ‘राज्य सरकार हिंसा से निपटने के लिए नागरिकों को हथियार नहीं सौंप सकती। लोकतांत्रिक राज्य का कर्तव्य है कि वह नागरिकों के अधिकारों और जीवन की रक्षा करे, न कि उन्हें लड़ाई में धकेले।’

कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार के हिसाब से नक्सलवाद विकास को रोकता है और स्थानीय जनता को डर में जीने पर मजबूर करता है। अदालतें अभियान की जरूरत को तो स्वीकार करती हैं, परन्तु बार-बार याद दिलाती हैं कि संविधान के तहत नागरिक अधिकारों की रक्षा सर्वोपरि है। इस संतुलन को बनाए रखना ही सरकार और न्यायपालिका दोनों की जिम्मेदारी है। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ में सुरक्षा बलों के अभियान में लगातार वृद्धि हुई है। 2024 में दर्ज मौतों की संख्या पिछले वर्षों से कहीं अधिक थी और 2025 में यह तेजी से बढ़ गई। 357 माओवादियों के मारे जाने की खबर है। प्रमुख अभियानों ने नक्सली संरचनाओं को तोड़ दिया, लेकिन इसके साथ ही सुरक्षा बलों और नागरिकों पर भी कुछ हमले हुए हैं। जनवरी 2025 में बीजापुर में आईईडी हमले में 8 जवान शहीद हुए थे। वर्ष 2024 में कम से कम 153 माओवादी हताहत हुए थे। दूसरी ओर, हिन्दू आतंकवाद के मामले में ज्यादातर या लगभग सभी आरोपी बरी हो गये हैं। इस सरकार ने ऊपरी अदालत में अपील नहीं की है और हाल में ऐसा ही मालेगांव मामले में हुआ जिसमें पूर्व सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर भी अभियुक्त थीं। मालेगांव ब्लास्ट केस 2008 का है। इसके पीड़ित परिवारों ने मंगलवार (9 सितंबर) को स्पेशल कोर्ट के फैसले के खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया है। 31 जुलाई 2025 को स्पेशल कोर्ट ने बीजेपी नेता प्रज्ञा ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित और पांच अन्य को बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ अब पीड़ित परिवारों ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। निसार अहमद, सैय्यद बिलाल और पांच अन्य ने वकील मतीन शेख के जरिए अपील दाखिल की और हाई कोर्ट से स्पेशल कोर्ट के फैसले को रद्द करने की अपील की है। वैसे तो यह काम राज्य सरकार को करना था लेकिन सरकार खुद आरोपियों को बचाने में लगी है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि स्पेशल एनआईए कोर्ट का सातों आरोपियों को बरी करने का फैसला कानूनी दृष्टि से गलत है इसलिए इसे रद्द किया जाना चाहिए।

जाहिर है कि बुलडोजर न्याय के जमाने में सरकार जैसे काम कर रही है उसमें जस्टिस रेड्डी की संवैधानिक बात गृहमंत्री अमित शाह को पसंद नहीं आनी थी। यह विचारधारा का मामला है और आम जनता तक यह अंतर मीडिया ने कितना पहुंचाया, मैं नहीं नहीं जानता। तथ्य यह है कि जस्टिस रेड्डी की उम्मीदवारी पर उनके फैसलों को लेकर टिप्पणी पूरी न्यायिक विरासत और संवैधानिक व्यवस्था पर हमला है जबकि लोकतंत्र में सरकार के काम पर नियंत्रण के लिए मजबूत न्यायिक व्यवस्था जरूरी है और यह सरकार उसे कमजोर करती दिख रही है। विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रम में धार्मिक भाषण देने वाले जज के खिलाफ कार्रवाई तो नहीं कर रही है पर उस जज के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले जनता को यह आश्वस्त करने की जरूरत भी नहीं समझती कि उनके घर पर जले नोट उनके ही थे और उन्होंने किन फैसलों से कमाये थे। यही नहीं, सत्तारूढ़ दल ने जजों को ईनाम देने का रिकार्ड बनाया है। एक जज को चुनाव लड़ने का टिकट देकर सांसद बनाया है तो मुंबई हमले के आरोपी अजमल कसाब को बिरयानी खिलाने की कहानी गढ़कर तबकी सरकार को बदनाम करने वाले सरकारी वकील उज्जवल निकम को वेतन-भत्ता लेकर कसाब को फांसी दिलाने के लिए राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया है। उन्हें साल 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। इस बीच उन्हें भाजपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ाया गया और हार जाने पर मनोनीत कर दिया गया।

दूसरी ओर उपराष्ट्रपति चुने गये सीपी राधाकृष्णन 2014 में कोयंबटूर सीट से चुनाव लड़कर हार गये थे। उन्होंने 389,701 वोट प्राप्त किए लेकिन एआईडीएमके के पी नागराजन से 42,016 वोटों से पीछे रह गये थे। हिन्दुस्तान टाइम्स ने 22 अगस्त को सुनेत्र चौधरी की एक रिपोर्ट छापी थी इसके अनुसार, उपराष्ट्रपति पद के लिए चुने गए राधाकृष्णन दो बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होने से चूक गए, एक बार नाम में कन्फ्यूजन की वजह से। खबर के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अंदरूनी सूत्रों में सीपी राधाकृष्णन की उम्मीदवारी पर खुशी है (थी)। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि वे तमिलनाडु के जमीनी स्तर के नेता हैं, बल्कि यह भी कि 68 वर्षीय राधाकृष्णन दो बार हाई-प्रोफाइल लुटियंस पद से चूक गए थे। राधाकृष्णन की टीम और बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने अखबार को बताया था कि अगर सब कुछ योजना के अनुसार होता, तो वे 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी की दिल्ली सरकार में और फिर 2014 में नरेंद्र मोदी की पहली सरकार में केंद्रीय मंत्री होते। कहानी यह है कि 70 के दशक में भाजपा (तब जनसंघ) में शामिल होने के बाद राधाकृष्णन अटल बिहारी वाजपेयी जैसे केंद्रीय नेताओं को अच्छी तरह जानते थे। वे संघ की राज्य कार्यकारिणी समिति के सदस्य थे और कोयंबटूर लोकसभा सीट से भारी अंतर से जीते थे। इसलिए 2000 में जब वाजपेयी अपने मंत्रिमंडल में फेरबदल करना चाहते थे तो उन्होंने राधाकृष्णन को भी शामिल करना तय किया था। इसका पता 29 सितंबर को शपथ ग्रहण समारोह में चला जब राधाकृष्णन की बारी आने पर वाजपेयी ने अपने सहयोगी एलके आडवाणी से पूछा, वो दाढ़ी वाला कहां है?

दरअसल पार्टी ने नागरकोइल के सांसद पोन राधाकृष्णन को संदेश भेज दिया था और उन्होंने शपथ ले ली थी। विकीपीडिया के अनुसार, पोन राधाकृष्णन ने 1999 का लोकसभा चुनाव नागरकोइल निर्वाचन क्षेत्र से जीता और 1999-2004 की अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में युवा मामलों के राज्य मंत्री बने । बाद में, उन्होंने शहरी विकास और गरीबी उन्मूलन राज्य मंत्री के रूप में भी कार्य किया। 2014 में सीपी राधाकृष्णन फिर केंद्रीय मंत्री बन सकते थे लेकिन इस बार वे चुनाव हार गये थे। यह अलग बात है कि स्मृति ईरानी को चुनाव हारने पर भी शिक्षा मंत्री बना दिया गया था। उनकी डिग्री का मामला भी चर्चा में रहा है। सीपी राधाकृष्णन का आरएसएस से जुड़ाव कालेज की उम्र से है और प्रचारक से शुरुआत करके अब वे उपराष्ट्रपति बन गये हैं। 1998 और 1999 में दो बार लोकसभा सदस्य चुने जाने और मंत्री पद से चूक जाने के बाद तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष रहे हैं तथा “तमिलनाडु के मोदी” के उपनाम से पहचाने जाते हैं। भाजपा जब दक्षिण में पांव जमाने की कोशिश कर रही है और चुनाव में उपराष्ट्रपति का उपयोग करने से संकोच नहीं करती तो उनका उपराष्ट्रपति बनना पार्टी के लिए संयोग है या प्रयोग यह शायद कभी पता भी न चले। इससे पहले आप 2016–20 में कॉइर बोर्ड के अध्यक्ष और महाराष्ट्र, झारखंड, तेलंगाना के राज्यपाल तथा व पुडुचेरी के उप–राज्यपाल रह चुके हैं।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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