संजय कुमार सिंह
दागी नेताओं पर शिकंजे के लिए पेश संविधान संशोधन विधेयक संयुक्त संसदीय समिति को भेज दिया गया है। सरकार ने विधेयक पेश करके हेडलाइन मैनेजमेंट का अपना काम कर लिया है। जब सरकार पर वोट चोरी से चुनाव जीतने का गंभीर आरोप है, मुख्य चुनाव आयुक्त अपनी तरह की पहली प्रेस कांफ्रेंस करके भी सरकार का बचाव नहीं कर पाये और यह प्रेस कांफ्रेंस अनुराग ठाकुर के तुरुप के पत्ता चलने के बाद करना पड़ा था तो सरकार के लिये यह बताना मजबूरी थी कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ है और उसका विरोध इसी कारण हो रहा है। यह अलग बात है कि इसपर कौन यकीन करेगा पर प्रचारक और समर्थक अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। यह विधेयक उसी का नतीजा है और अमर उजाला का शीर्षक बता रहा है कि इससे क्या संदेश देने की योजना है। अमित शाह की तेवरदार फोटो के साथ छपी इस खबर का शीर्षक है, “जनता तय करे… पीएम, सीएम या मंत्री को जेल से सरकार चलानी चाहिये या नहीं”। इस तरह विधेयक पास हो या नहीं, कानून बने या नहीं, भाजपा ने इस विधेयक से यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए तन-मन-धन से लगी हुई है और जनता को तय करना है कि जेल से सरकार चलाना चाहिये या नहीं। अमर उजाला ने इसके साथ अमित शाह की वो फोटो नहीं छापी जो खबर है। दूसरे अखबारों में चर्चा है और उसकी खबर भी कि संसद में इस विधेयक पर भारी हंगामा हुआ और इसकी प्रतियां फाड़ कर गृहमंत्री के मुंह पर फेंकी गईं। उसका वीडियो और फोटो सार्वजनिक है लेकिन अमर उजाला का चुनाव सरकारी भावना के अनुकूल पर अलग है।
इस विधेयक को पेश किये जाने और आज उसकी खबर में यह मुद्दा ही नहीं रह गया है कि वोट चोरी से जीते गठबंधन को सत्ता में रहना चाहिये या नहीं। अगर उसका मानना है कि वोट चोरी का आरोप निराधार है तो कोई संतोषजनक कारण बताया जाये। अपनी बात साबित करें। ऐसा करने की बजाय भाजपा ने एक नया आदर्श छोड़ दिया है और मीडिया का बड़ा वर्ग उसी का प्रचार कर रहा है। मेरे ज्यादातर अखबारों में यह खबर, खबर की तरह ही पेश की गई है। द टेलीग्राफ अपवाद है। विधेयक के विरोधियों के बारे में कहा जा सकता है कि वे भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा सरकार (या नरेन्द्र मोदी) की तरह ना खाउंगा ना खाने दूंगा में यकीन करते हैं। राजनीतिज्ञों के लिए यह एक मुश्किल स्थिति है। शशि थरूर भी यह कहते हुए दिखाये गये कि, ‘इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखता, लेकिन…’। उन्होंने कहा है, यह तो कॉमन सेंस की बात है कि अगर आप 30 दिन जेल में बितातें हैं तो क्या आप मंत्री पद पर बने रह सकते हैं। इसमें यह बात भुला दी गई कि भ्रष्टाचार के तमाम आरोपी वाशिंग मशीन पार्टी में हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई जबकि आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल को पीएमएलए कानून के कारण जेल में रहना पड़ा और झारखंड के मुख्यमंत्री को जमानत नहीं मिले इसके लिए उनके खिलाफ भूमि घोटाले का जो मामला है उसमें पीएमएलए का एंगल भी जोड़ दिया गया है।
पीएमएलए कानून की समीक्षा का मामला अदालत में लंबित है। आम आदमी पार्टी के सत्येन्द्र जैन महीनों जेल में रहे। उनके खिलाफ मामला अब कोर्ट ने बंद कर दिया है। और भी कई मामले हैं जिनसे साफ होता है कि सरकार ने ईडी, सीबीआई और अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया तथा विपक्षी नेताओं को जेल में रखकर परेशान किया। इलेक्टोरल बांड के जो खुलासे सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हुए उससे तो सरकार के खिलाफ वसूली अभियान चलाने का भी संदेह है। ऐसे में सरकार का यह विधेयक चाहे कितने ही नेक उद्देश्य से लाया गया हो, मुख्य रूप से विरोधियों से निपटने के लिए और मजबूती हासिल करने की कोशिश ही है। यह केंद्र सरकार की छवि सुधारने की कोशिश भी हो सकती है। हालांकि, कहा यह भी गया है कि इसका उपयोग भाजपा के खिलाफ भी किया जा सकता है। लेकिन मुझे उसकी संभावना बहुत कम लगती है। तमाम कानूनों के बावजूद पत्रकार सिद्दीक कप्पन को सरकारी आरोप पर एक साल से ज्यादा जमानत नहीं मिली। दूसरी ओर, बकाया पैसे न मिलने से आत्महत्या के लिए मजबूर होने का दावा करने वाले मृतक के साथ न्याय करने के लिये गिरफ्तार अर्नब गोस्वामी को हफ्ते भर में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल गई। फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने जो आदर्श की बातें की वह कप्पन पर तो नहीं ही लागू हुआ, मुख्यमंत्रियों पर भी नहीं हो पाया। गिरोह के लोग चुप रहे। कारण चाहे जो हो, अरविन्द केजरीवाल को चुनाव प्रचार के लिए जमानत मिली तो सुप्रीम कोर्ट पर जो टिप्पणियां हुईं वो आपको याद होगा।
इसलिये कहा जा सकता है कि भाजपा की सरकार या यह व्यवस्था कानून का उपयोग अपने हित में करना जानती है। ऐसे में खबर यह भी है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि उन्हें (मतलब प्रधानमंत्री को) भी विधेयक के प्रभाव क्षेत्र में रखा जाये। अमित शाह ने ऐसा कहा है और यह टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर मूल खबर के साथ छपा है जो लीड है। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री को अपनी महानता दिखानी ही हो तो बनारस के वोटर लिस्ट की डिजिटल कॉपी और सीसीटीवी का फुटेज सार्वजनिक कर देना चाहिये। इसकी बजाय भाजपा संवैधानिक संस्था के खिलाफ कैसे बोल दिया जैसी दलीलों का सहारा ले रही है जबकि संवैधानिक संस्था के मुखिया की नियुक्ति नियमानुसार नहीं की गई है और इससे संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में तारीख पर तारीख जैसी सामान्य स्थिति में लंबित है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अमित शाह की जो फोटो छापी है उसमें उनके चेहरे के पास कागज का टुकड़ा दिख रहा है और फोटो कैप्शन में बताया गया है कि विपक्ष के सांसदों ने विधेयकों की प्रतियों की फाड़ दिया जब वे इसे सदन के पटल पर रख रहे थे। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी यह खबर लीड है और शीर्षक सामान्य खबर जैसी है। अमित शाह ने लोकसभा में तीन विधेयक पेश किये, हंगामे के बीच संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया। सिंगल कॉलम में हंगामे की खबर भी है। लेकिन पीएम, सीएम और मंत्री के 30 दिन जेल में रहने पर पद छोड़ना पड़ेगा – यह तथ्य न तो शीर्षक में है ना हाईलाइट किया गया है। कहा जा सकता है कि विधेयक जिस उद्देश्य से पेश किया गया है उसे हिन्दुस्तान टाइम्स ने अच्छी तरह पूरा किया है।
दि एशियन एज में भी यह खबर लीड है और शीर्षक सरकारी ही है, “सरकार ने अपराधी मंत्रियों को हटाने के लिए लोकसभा में तीन विधेयक पेश किये; विपक्ष ने विरोध किया”। विधेयक पर राहुल गांधी की टिप्पणी के साथ अमित शाह का एक स्पष्टीकरण भी है। इसके अनुसार, “मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि मेरे खिलाफ जब झूठे आरोप लगाये गये तो मैंने नौतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया था और जब तक अदालत से बरी नहीं हुआ, मैंने कोई संवैधानिक पद स्वीकार नहीं किया।” सुनने में तो यह अच्छा लगता है और कल जब संसद में आरोप लगे तो यह जवाब दिया गया पर सच्चाई यह भी है कि अभी वोट चोरी के आरोपों पर ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है और मुख्य चुनाव आयुक्त की मनमानी नियुक्ति के बावजूद संवैधानिक संस्था की आड़ क्यों ली जा रही है। इसके अलावा, सरकार को जज लोया की संदिग्ध मौत की जांच कराने में क्या दिक्कत थी? जज को ईनाम का उदाहरण तो है ही। एक राज्य के गृहमंत्री से केंद्रीय गृहमंत्री के पद तक की तरक्की भी सामान्य नहीं है।
इंडियन एक्सप्रेस में दोनों पक्ष की बातें हैं। शीर्षक सरकार की ही बात कर रहा है और इसमें यह भी है कि गिरफ्तार मंत्रियों को हटाने के सरकार के विधेयक का विपक्ष ने विरोध किया। द हिन्दू ने सरकार की और अच्छी सेवा की है। शीर्षक है, गिरफ्तार पीएम, सीएम को पद से हटाने के विधेयक पर संसद में हंगामा। कहने की जरूरत नहीं है कि मुख्यमंत्री और मंत्री के साथ पीएम या प्रधानमंत्री कहने से लगता है कि उन्हें अलग नहीं रखा गया है और विशेष दर्जा नहीं दिया गया है। लेकिन जो दो मुख्यमंत्रियों के मामले जानता है वह समझेगा कि इसका उद्देश्य उसी क्रम में है और तब केजरीवाल की कुर्सी नहीं गई तो अब जायेगी और सही हो या गलत, उसी की व्यवस्था की गई है। लेकिन द हिन्दू ने इसे पीएम, सीएम लिखकर बेहद खास बना दिया है। ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री के मामले में कुछ विशेष है। उपशीर्षक है, केंद्र (सरकार) का कहना है कि विधेयकों का मकसद राजनीतिक में नैतिकता को वापस लाना है। सच्चाई यह है कि नैतिकता तो मामूली रेल दुर्घटना पर इस्तीफा देने से लेकर कपड़े बदलने पर पद से हटा दिये जाने तक रही ही है। उसमें राजनाथ सिंह कह चुके हैं, हमारे यहां इस्तीफे नहीं होते। ऐसे में ये विधेयक किस लिये पेश किये गये हैं समझना मुश्किल नहीं है और यह भी तय है कि इसका मकसद और जो हो, नैतिकता को वापस लाना नहीं हो सकता है। वह भी तब जब वोट चोरी के आरोप को हल्का करने के लिए सीएसडीएस के संजय कुमार के ट्वीट डिलीट करने और माफी मांगने को आधार बनाया जा रहा है।
द टेलीग्राफ की लीड के शीर्षक से लगता है कि यह विधेयक आसन्न खतरे को देखते हुए पेश किया गया है। यह अखबार की अपनी राय हो सकती है। खबरों का शीर्षक यह है कि विपक्ष ने राज्यों को परेशान करने वाले विधेयक को अमित शाह के मुंह पर फाड़ दिया। इसके साथ एक और खबर का शीर्षक है, एक पार्टी के शासन की चेतावनी। आप जानते हैं कि नरेन्द्र मोदी कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते थे। राहुल गांधी ने तभी कहा था कि हम भाजपा मुक्त भारत की बात नहीं करेंगे। हम भाजपा को हरायेंगे। राहुल गांधी अपना काम कर रहे हैं और भाजपा की परेशानी दिखाई दे रही है। यह एक नजरिया हो सकता है और जरूरी नहीं है कि सबको शत प्रतिशत सही ही लगे। लेकिन पार्टी की लाइन के अनुसार अमर उजाला का शीर्षक और द टेलीग्राफ का यह शीर्षक आज की पत्रकारिता के दो छोर हैं। बाकी सब इनके बीच में ही है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, पीएम, सीएम, मंत्री 30 दिन जेल में रहे तो चली जायेगी कुर्सी। उपशीर्षक है, संविधान संशोधन समेत तीनों विधेयक जेपीसी भेजे गये। देशबन्धु में लीड का शीर्षक है, 30 दिन जेल में रहने पर जायेगा मंत्री पद। खबर के साथ अमित शाह और केसी वेणुगोपाल का पक्ष है। अमित शाह ने सफाई दी है कि इसका मकसद किसी दल विशेष की सरकार को अस्थिर करना बिल्कुल नहीं है। लेकिन इससे अलग कोई उद्देश्य हो तो इसकी जरूरत ही नहीं है। कांग्रेस की सरकार में इस्तीफे होते रहे हैं, हेमंत सोरेन ने राजनीतिक कारण से ही सही, दे ही दिया था और अरविन्द केजरीवाल का मामला सब लोग जानते हैं। इसीलिए वेणुगोपाल ने कहा है और देशबन्धु ने प्रमुखता से छापा है कि यह विधेयक देश के बुनियादी सिद्धांत को नुकसान पहुंचाने वाला है। इसमें चुने हुए प्रतिनिधियों को हटाने की व्यवस्था की गई है।
कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव जीतक मंत्री बने किसी व्यक्ति ने अगर जेल जाने और 30 दिन जेल में रहने वाला अपराध किया या वह सार्वजनिक हुआ तो निश्चित रूप से कोई भी इस्तीफा देगा ही। लेकिन किसी को फंसाया जाये, सत्ता से हटाने के लिए सत्तारूढ़ पार्टी अपनी ईडी-सीबीआई शाखा या उसके प्रभारी का उपयोग करे, उसे सेवा विस्तार देकर अपना काम कराये, विपक्षी पार्टी के विरोध का मुकाबला करने के लिए केंद्र में सत्ता में होने का लाभ उठाया जाये तो उसका विरोध होगा ही। ऐसे में यह विधेयक राजनीतिक लगता है। खासकर इसलिये कि सरकार के दो बैसिखियों को नियंत्रण में रखना जरूरी है और मुश्किल समय चल रहा है। चुनाव जीतने वाली सरकार जानती है कि वह चुनाव जीत जायेगी पर लोकसभा चुनाव में जो सीटें कम आई हैं उनका उपाय भी तो जरूरी है। दूसरी ओर राहुल गांधी यह साबित करने की बात कर रहे हैं कि बहुमत के लिए आवश्यक 25 सीटें चोरी के वोट से जीती गई हैं। पार्टी को तो इसका सच पती ही होगा इसलिये डरना स्वाभाविक है और इस डर का मतलब समझना मुश्किल नहीं है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का भी अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।



Mahendra Manuj
August 26, 2025 at 8:23 pm
बढ़िया , तटस्थ विश्लेषण ..