मध्य प्रदेश में राज्य संपादक के रूप में अपनी पत्रकारिता यात्रा के लिए गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र चौधरी ने अब एक नई भूमिका में कदम रखा है। उन्होंने राजस्थान पत्रिका में राजस्थान राज्य संपादक के रूप में नई जिम्मेदारी संभाल ली है।
अपने फेसबुक पोस्ट में उन्होंने लिखा—
कर्मयोग: अब राजस्थान में… स्थान बदलते हैं, समय बदलता है, पर कुछ अनुभव जीवन का स्थायी हिस्सा बन जाते हैं। पत्रकारिता की इस यात्रा में मेरा रिश्ता कई नगरों, कई नगरवासियों और कई परिस्थितियों से बना। पहले मध्यप्रदेश का इंदौर, फिर राजस्थान के कोटा और जयपुर, और फिर एक बार घर वापसी— ग्वालियर, इंदौर… और फिर संपूर्ण मध्यप्रदेश की जिम्मेदारी।
यह केवल स्थानांतरण नहीं थे, यह पत्रकारिता के एक नए मुकाम पर पहुंचना था— जहां संवाद की सीमा एक शहर नहीं, पूरा प्रदेश हो गया। प्रदेश की विविधताओं, संवेदनाओं और आवाजों को जोड़ने का जो दायित्व मिला, वह मेरे जीवन की सबसे बड़ी साधना थी। अब, एक बार फिर राजस्थान की ओर प्रस्थान है। यह बदलाव नहीं, यह एक आंतरिक प्रवास है—जहां स्मृतियां, संस्कार और संकल्प सब साथ चल रहे हैं।
मध्यप्रदेश ने मुझे बहुत कुछ दिया। यह प्रदेश विविधता की जीवित मिसाल है। विंध्य की गहराइयों में पुरातनता की परंपरा बसी है, तो महाकौशल में विचारों की गंभीरता। बुंदेलखंड ने हर कठिन परिस्थिति में अडिग रहने की प्रेरणा दी, वहीं मालवा की मिठास ने संवाद को सरल बनाया। निमाड़ की सहजता ने जनजीवन को समझना सिखाया और चंबल की कठोर भौगोलिकता ने पत्रकारिता को साहस और स्पष्टता का स्वाद चखाया। ये क्षेत्र मेरे अंतस में अब केवल स्मृति नहीं हैं, वे मेरे विचार, निर्णय और लेखन की धड़कन बन चुके हैं।
और अब राजस्थान की जिम्मेदारी। राजस्थान एक ऐसा प्रदेश है जहां रेत भी बोलती है और हवाएं भी इतिहास कहती हैं। यहां की माटी में जुड़ाव का जो गुण है, वह केवल भौतिक नहीं, सांस्कृतिक और भावनात्मक भी है। हाड़ौती की सरलता, ढूंढाड़ की परंपरा, शेखावाटी की चित्रित स्मृतियां, मेवाड़ की शौर्यगाथा, मारवाड़ की आत्मीयता, वागड़ की हरियाली, मेवात की विविधता, ब्रज का माधुर्य और अरण्य प्रदेश की शांति— राजस्थान को केवल प्रदेश कहना उसकी आत्मा को सीमित करना है। यह एक जीवित परंपरा है, जहां हर क्षेत्र, हर भाषा, हर व्यक्ति में एक पूर्ण संस्कृति बसती है।
पत्रिका प्रबंधन ने जो विश्वास व्यक्त किया है, वह मेरे लिए सम्मान भी है और उत्तरदायित्व भी। राजस्थान की यह पुनर्नियुक्ति मेरे लिए एक अवसर है—मध्यप्रदेश की अनुभूतियों को साथ लेकर राजस्थान की गरिमा में समाहित होने का। इस संक्रमण में कोई टूटन नहीं है, केवल विस्तार है। जो सीखा है, अब उसे एक नई भूमि पर उपयोग में लाना है। जो जिया है, उसे अब नई चुनौतियों में सिद्ध करना है।
इस यात्रा में मैं अकेला कभी नहीं था। जो कुछ भी बना, जो कुछ भी कर पाया—उसमें मेरे परिवार का धैर्य, मित्रों की सलाह, साथियों का सहयोग और पाठकों का विश्वास बराबर का सहभागी रहा है। न्यूजरूम की चहल-पहल से लेकर फील्ड की धूल तक, हर कदम पर कई चेहरों, कई हाथों ने साथ दिया। संवाददाताओं ने खबरों को हकीकत की शक्ल दी, संपादकों ने दृष्टि दी और सहयोगियों ने हर चुनौती में संबल बनकर साथ निभाया। मैं उन तमाम खबरनवीसों, सहकर्मियों और सहयोगियों के प्रति कृतज्ञ हूं, जिनकी मेहनत, संवाद और सुझावों ने हर स्थान को घर और हर दिन को शुभ बना दिया।
परिवार के त्याग के बिना यह संभव नहीं था। उन्होंने मेरी अनुपस्थिति में भी मेरे हिस्से की जिम्मेदारियां उठाईं और कभी शिकायत नहीं की। जो समय मैंने पाठकों के साथ जिया, वह समय परिवार ने मुझसे त्याग किया— मैं इस अघोषित समर्पण को कभी विस्मृत नहीं कर सकता। आज जब एक नई जमीन पर कदम रख रहा हूं, तो साथ बहुत कुछ चल रहा है—संवाद, संस्कार और सभी वो रिश्ते, जिनसे मैंने सीखा, जो मेरी यात्रा की नींव रहे। आप सबका स्नेह, सहयोग और विश्वास ही मेरे कर्म का असली संबल है।
और अब, आगे की राह स्पष्ट है। अपना मुकाम अब जयपुर रहेगा—वह शहर, जो संवाद और संस्कृति दोनों का संगम है। हम मिलेंगे झालाना स्थित पत्रिका की उस पवित्र इमारत में, जहां सिर्फ समाचार नहीं गढ़े जाते, विश्वास की स्याही से भविष्य लिखा जाता है। यहीं से आगे की जिम्मेदारियां निभानी हैं—मध्यप्रदेश की अनुभूतियों को साथ लेकर, राजस्थान की माटी में नए कर्म का बीजारोपण करना है। यहां से आगे—नए साथी होंगे, नए संदर्भ होंगे, नए संकल्प होंगे।
पर आत्मा वही रहेगी—पत्रकारिता की शुचिता, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और सत्य के प्रति आग्रह।


