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आज के अखबार : विमान हादसे की जांच की मांग और हादसे में राजनीति न लाएं कहना स्पष्ट राजनीति है

संजय कुमार सिंह

एक विमान हादसे में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजीत पवार और उनके साथ चार अन्य लोगों की दुखद मौत आज मेरे सभी अखबारों की लीड है। खबर है कि ममता बनर्जी ने जांच की मांग की तो शरद पवार ने कहा, हादसे में राजनीति न लाएं (अमर उजाला)। देशबन्धु ने दो कॉलम में ममता बनर्जी की फोटो के साथ लिखा है, अजित पवार की मौत पर उठाए सवाल, कहा पवार भाजपा का साथ छोड़ने वाले थे। कोलकाता डेटलाइन से खबर है, महाराष्ट्र के बारामती में हुए विमान हादसे पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गंभीर आरोप लगाए हैं। ममता ने कहा कि अजित पवार अपने पुराने खेमे में लौटने वाले थे और इससे पहले यह हादसा हुआ। इस देश में लोगों की कोई सुरक्षा नहीं है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पत्रकारों से बात करते हुए कहा, ‘पहले अहमदाबाद में इतने लोगों की जान गई और अब इस हादसे में अजित पवार की जान गई। हम इस हादसे से बहुत परेशान हैं और हमारे पास इसको व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं है। इस देश में आम लोगों की तो बात ही छोड़िए, राजनेता भी सुरक्षित नहीं हैं। दो दिन पहले मुझे पता चला था कि किसी दूसरी पार्टी के किसी व्यक्ति ने बयान दिया था कि पवार भाजपा छोड़ने को तैयार थे और अब आज यह हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भी इसे बेहद दुखद कहा है और जांच जरूरी बताई है। नई दिल्ली डेटलाइन से छपी खबर के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने इस घटना को बेहद दुखद बताया। उन्होंने कहा कि अजित पवार का देहांत प्रीमेच्योर यानी समय से पहले हुआ और यह उन लोगों के लिए एक बड़ा आघात है जो उनके साथ काम करते थे। खड़गे ने कहा कि उनके परिवार वालों को यह दुख सहन करने की शक्ति मिले, यही हम सभी प्रार्थना कर सकते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस हादसे की जांच होना जरूरी है क्योंकि यह एक अननैचुरल एक्सीडेंट है। नवोदय टाइम्स ने भी अमर उजाला की तरह ममता बनर्जी और शरद पवार के कहे को एक साथ छापा है।

द टेलीग्राफ का शीर्षक है, क्रैश कर्स फेल्स अनदर लीडर (विमान हादसे ने एक और नेता को लील लिया)। इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर का शीर्षक है, चाचा की छाया से छूट कर अजीत पवार ने अपना रास्ता खुद बनाया। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, विमान हादसे में अजीत पवार का निधन, महाराष्ट्र की राजनीति गड़बड़ाई। एक और खबर है, अजीत ने प्रतिद्वंद्वी एनसीपी को फिर से जोड़ने की कोशिश की, उनकी मृत्यु ने नए सवाल उठाए हं। हिन्दुस्तान टाइम्स ने बारामती की उनकी इस हवाई यात्रा को त्रासद गृहयात्रा लिखा है। द हिन्दू ने शीर्षक में ही लिखा है, राज्य सरकार ने साजिश से इनकार किया। पता नहीं लोग जांच से क्यों डरते हैं और तब भी डर रहे हैं जब जानते हैं कि जांच न हो तो मामला बना रहता है। और भविष्य के हादसों को उलझाते रहेंगे। मुझे लगता है कि एक राजनीतिक की मौत की जांच की मांग करना राजनीति नहीं है, इससे इनकार करने का कारण होना चाहिए और यह जज लोया की मौत की जांच हो गई होती तो माना जाता कि मौत में राजनीति नहीं होती है। जज लोया की मौत की जांच रोकने के लिए जो राजनीति हुई उसमें अजीत पवार की भागीदारी साफ न भी हो तो महाराष्ट्र सरकार की है और महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी की ही सरकार रहे इसके लिए जो राजनीति हुई उससे देश परेशान और तबाह है। इसके बावजूद जांच हो न हो, मांग करना राजनीति नहीं है और महाराष्ट्र की राजनीति में अजीत पवार ने जो सब किया वह उनके निधन के बाद तो जवाब मांगता ही है। संभव है, शरद पवार को पता हो इसलिए जांच की जरूरत नहीं लगती हो। अखबारों का काम था कि उस कारण को बताते या जांच की मांग को महत्व देते। दोनों नहीं है तो आइए कुछ पुराने मामले याद कर लेते हैं। मुझे लगता है कि हादसे में हस्ती के निधन के बाद खबरों में जो भी लिखा पढ़ा जाए बात एक ही होती है और हादसे का कारण (अगर हो) जानने की इच्छा किसी को भी होती है। आइए, भारतीय जनता पार्टी के गुजरात मॉडल वाले शासन में महाराष्ट्र की भूमिका को समझें फिर आप समझ जाएंगे कि जांच जरूरी नहीं है तो क्यों या क्लिन चिट का क्या मतलब होता है। खासकर हाल के इस खुलासे के बाद कि अब जजों का तबादला भी सरकारी अफसरों की तरह होता है और न्यायपालिका पर सरकार का दबाव है। खबरों में यह सब नहीं के बराबर होता है।  

पुरानी खबरों के अनुसार, सीबीआई के विशेष न्यायाधीश बीएच लोया सोहराबुद्दीन शेख़ फर्जी मुठभेड़ मामले की सुनवाई कर रहे थे। 1 दिसंबर 2014 को नागपुर में हृदय गति रुकने (कार्डियक अरेस्ट) के कारण उनकी मौत हो गई थी। भारी मांग के बावजूद उसकी जांच नहीं हुई। पत्रकार निरंजन टाकले ने इसपर एक किताब लिखी है, हू किल्ड जज लोया। पुस्तक के उपसंहार में शरद पवार के हवाले से लिखा है, …साजिशकर्ता अभी भी आजाद हैं। जांच की जरूरत है। हम इसके लिए क्या कर सकते हैं। यह 20 नवंबर 2020 की बात है और यह लेखक का जन्मदिन था। उपसंहार की शुरुआत इसी से होती है। साल 2005 में सोहराबुद्दीन शेख़, उसकी पत्नी कौसर बी और उनके साथी तुलसीराम प्रजापति को कथित रूप से गुजरात पुलिस द्वारा फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया था। इस घटना में गुजरात पुलिस अधिकारी और बाद में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह जैसे उच्च-पदस्थ लोग भी आरोपी बने थे। जांच के दौरान पाया गया अमित शाह (तब गुजरात के गृह मंत्री) और कुछ पुलिस अधिकारियों के बीच फोन कॉल के रिकॉर्ड्स हैं। सीबीआई ने इन्हें “असामान्य” बातचीत के रूप में पेश किया था। इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में सीबीआई को सौंपा और 2012–13 के बीच गुजरात से ट्रायल को मुंबई स्थानांतरित कर दिया। इसके बाद जज लोया की संदिग्ध मौत हुई। जज लोया की मौत हार्ट अटैक से हुई बताई गई लेकिन कई कारणों से इसे संदिग्ध माना गया और जांच की मांग की गई। बाद में स्वतंत्र जांच की मांग वाली जनहित याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल हुई, तो महाराष्ट्र सरकार ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि पहले से की गई जांच पर्याप्त है और सुप्रीम कोर्ट को देखना चाहिए। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2018 में आदेश दिया कि बॉम्बे हाईकोर्ट इस मामले में सुनवाई न करे और सारे केस सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कर दिए जाएं। महाराष्ट्र सरकार ने जज लोया मौत मामले में मुकुल रोहतगी और हरीश साल्वे को नियुक्त किया। खबरों के अनुसार महाराष्ट्र सरकार ने मुकुल रोहतगी को ₹1.21 करोड़ बतौर फीस दी। साल्वे की फीस के बारे में जानकारी सार्वजनिक नहीं है।

कल्पना कीजिए कि महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार नहीं होती और (उद्धव ठाकरे की सरकार ने) जांच की अनुशंसा की होती और ईडी की तमाम जांच की तरह सीबीआई की जांच अमित शाह के खिलाफ चल रही होती तो क्या होता। जो भी होता, अमित शाह यह दावा नहीं कर पाते कि, जब तक उन्हें अदालत ने निर्दोष साबित नहीं किया गया था, उन्होंने कोई संवैधानिक या केंद्रीय पद नहीं लिया। उन्होंने यह भी कहा कि वे नैतिकता के तहत गुजरात के गृह मंत्री के पद से इस्तीफा दे चुके थे। बेशक यह भाजपा में इस्तीफे नहीं होते से अलग और कुछ खास मामलों में था। आइए इसकी पूरी क्रोनोलॉजी समझ लीजिए, इस प्रकार है।

2005

• सोहराबुद्दीन शेख, उसकी पत्नी कौसर बी और बाद में तुलसीराम प्रजापति की मौत।

• मामला फर्जी मुठभेड़ का बना; जांच बाद में सीबीआई को सौंपी गई।

2010

• सीबीआई ने अमित शाह (गुजरात के तत्कालीन गृह मंत्री) सहित कई पुलिस अधिकारियों को आरोपी बनाया।

• अमित शाह की गिरफ्तारी हुई और उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दिया।

2012

• सुप्रीम कोर्ट ने निष्पक्ष सुनवाई के लिए ट्रायल को गुजरात से महाराष्ट्र (मुंबई) ट्रांसफर किया।

• सुनवाई सीबीआई की विशेष अदालत, मुंबई में शुरू हुई।

2013

सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस पी सदाशिवम की अध्यक्षता में) ने सीबीआई की दूसरी एफआईआर को खारिज किया जो अमित शाह से जुड़ी थी।

2014

• केस की सुनवाई जज जेटी उत्पत कर रहे थे; उनका तबादला हुआ।

• इसके बाद जज बीएच लोया को यह मामला सौंपा गया।

26 अप्रैल 2014 – जस्टिस सदाशिवम सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त हुए।

5 सितंबर 2014 – उन्हें केरल का राज्यपाल नियुक्त किया गया। 4 सितंबर 2019 तक केरल के 21वें राज्यपाल रहे।

1 दिसंबर 2014

• जज बीएच लोया की नागपुर में हृदयाघात से संदिग्ध मृत्यु हो गई।

30 दिसंबर 2014

• सीबीआई की विशेष अदालत, मुंबई (जज एमबी गोस्वामी) ने

अमित शाह को आरोपों से मुक्त कर दिया।

2018

• सोहराबुद्दीन–प्रजापति केस में बाकी सभी आरोपी भी सबूतों के अभाव में बरी कर दिए गए।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन आरोपों का समर्थन करने वाला विश्वसनीय साक्ष्य नहीं है और स्वतंत्र जांच से इनकार किया।

2019

अमित शाह भारत के गृहमंत्री बनाए गए।

पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम को 21 अगस्त 2019 को सीबीआई (और बाद में ईडी) ने गिरफ्तार किया। स्वयं अधिवक्ता होने के बावजूद उन्हें जमानत मिलने में 105 दिन लग गए। मामले का क्या हुआ पता नहीं है।

(पी चिदंबरम 30 नवंबर 2008 को केंद्रीय गृह मंत्री बने, जब तत्कालीन गृह मंत्री शिवराज पाटिल के इस्तीफे के बाद उन्हें यह पद सौंपा गया। उन्होंने 31 जुलाई 2012 तक गृह मंत्री के रूप में सेवाएँ दीं। 31 जुलाई 2012 से 26 मई 2014 तक पी. चिदंबरम केंद्रीय वित्त मंत्री रहे।)

महाराष्ट्र सरकार का संबंध एक मौत की जांच का विरोध करने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं को लाखों की फीस देने से है। फिर महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री की जांच की मांग राजनीति कैसे है और है तो क्या राजनीति में हत्याएं नहीं होंतीं? अखबार इसपर शांत हैं। मामला सीबीआई के जज बीएच लोया की संदिग्ध मौत का है। स्वतंत्र जांच की मांग वाली जनहित याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल हुई, तो महाराष्ट्र सरकार ने इस मांग का विरोध करते हुए कहा कि पहले से की गई जांच पर्याप्त है और मामला सुप्रीम कोर्ट को देखना चाहिए। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2018 में आदेश दिया कि बॉम्बे हाईकोर्ट इस मामले में सुनवाई न करे और सारे केस सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कर दिए जाएं। अब जब सुप्रीम कोर्ट के चार जजों की प्रेस कांफ्रेंस और जजों पर सरकार के दबाव का मामला सामने आ चुका है तो क्या शरद पवार किसी दबाव में हैं? हों या नहीं, देश की राजनीति जरूर दबाव में है। ईवीएम का विरोध करने वाली भाजपा अब ईवीएम का बचाव करती है। इसके विरोध को तकनीक विरोध से जोड़ा जा रहा है जबकि डिजिटल इंडिया में डिजिल वोटर लिस्ट नहीं दी जा रही है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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