कौशल शर्मा-
दादा हम माफी चाहते हैं…
गणेश शंकर विद्मार्थी के बाद पत्रकारिता को जीविका का साधन नहीं, मिशन मानकर आपने जिया और अपने लिये जो मानक निर्धारित किये, उस पर सदा अडिग रहे। 1970 के दशक में अखबारी दुनिया के बादशाहों के खिलाफ पत्रकारों के हक हकूकों के लिये आपने अपना सर्वोत्तम न्यौछावर करके संघर्ष के बीज बो दिये थे। नौकरी खोने के भय से आम पत्रकार मालिकों की मनमानी झेलने के लिये अभिशप्त था। आपने उस दौर में उनको स्वर दिया, साहस दिया और व्यथा कहने की आजादी दिलाई।
मुझे याद है, जागरण के विरूद्ध संघर्ष के दौरान श्रम न्यायालय के समक्ष एक पत्रकार से उसका नाम पूछकर आपने न्यायालय से कहा था कि इसका नाम गद्दारी का पर्याय है, इसलिये अब इससे कुछ नहीं पूछना। आपकी इस प्रतिपरीक्षा से केवल गवाह नहीं, खुद नरेन्द्र मोहन शर्मिंदा हुये थे। “वस्त्राभाव के कारण कार्यालय आ पाने में असमर्थ हूँ” लिखकर अवकाश केवल आप ही माँग सकते थे। इस तरह का अवकाश प्रार्थनापत्र लिखकर आपने मालिकों को शान्तिपूर्ण तरीके से पत्रकारों की दयनीय आर्थिक स्थिति से अवगत कराया था।
ट्रेड यूनियन आन्दोलन आज कमजोर हो गया है लेकिन आपने पत्रकार साथियों के भरपूर विरोध के बावजूद एक अखबार के स्थानीय सर्वे-सर्वा को प्रेस क्लब का अध्यक्ष नहीं बनने दिया जबकि उन दिनों आप उसी अखबार में सेवारत थे।
दादा, अखबारी जगत में आपकी उपलब्धियाँ सभी को पता हैं लेकिन आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि कम लोग जानते हैं। आप सदा एक निर्दयी शिक्षक रहे और ठीक उसी समय आप एक संवेदनशील संरक्षक और मार्गदर्शक भी होते थे। “सिखाते समय कोई दया नहीं, कोई छूट नहीं” की आपकी आदत के कारण ही आज अंशुमान जी जैसे कई आपके शिष्य गोदी मीडिया के दौर में भी अपनी बेबाक लेखनी के लिये जाने पहचाने जाते हैं।
शुद्ध शब्द और भाषा के प्रति आपका आग्रह उस समय अखरता था लेकिन आज वकालती जीवन में जब कोई मेरे किसी ड्राफ्ट की तारीफ करता है, तो मन खुद ब खुद आपके प्रति श्रद्धा से भर उठता है।
दादा आप हम सबको क्षमा करें, हम आपकी तरह सरमायेदारों के समक्ष उनके विरूद्ध तनकर खड़े नहीं हो पा रहे हैं। आपने तो अभावों में भी गर्व करना सिखाया और खुद के लिये पत्रकारिता से न्यूनतम लिया, और अधिकतम दिया है लेकिन हमारी पीढ़ी आर्थिक दबावों में डरपोक हो गयी है। अपनी असहमति के अधिकार के साथ समझौते कर लेती है। हम भगवान से प्रार्थना करते हैं कि हम सबको आपके जुझारू व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर सामाजिक दायित्वों के निर्वहन की शक्ति और साहस दें।
आनंद शुक्ला-
विष्णु त्रिपाठी : हिन्दी पत्रकारिता के तरुतात…
राष्ट्रीय आंदोलन से उपजी हिन्दी की मिशनवादी पत्रकारिता की अंतिम पीढ़ी के वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं सम्पादक विष्णु त्रिपाठी अब हमारे बीच नहीं रहे।
विष्णु जी ने हिन्दी पट्टी के प्रमुख समाचार पत्रों- नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका, दैनिक विश्वमित्र, दैनिक जागरण, आज, स्वतंत्र भारत और अमर उजाला आदि में पत्रकारिता के आदर्शों और मानकों का आजीवन निर्वाह करते हुए हिन्दी पत्रकारिता को नई धार और दिशा प्रदान की।
वह पत्रकार संघ तथा पत्रकारिता संस्थानों में भी बहुत सक्रिय रहे और जहाँ एक ओर पत्रकारों की सेवा शर्तों की बेहतरी के लिए कई आंदोलनों का नेतृत्व किया वहीं दूसरी ओर पत्रकारिता के पाठ्यक्रम निर्माण और नवाचार में उल्लेखनीय योगदान दिया।
विष्णु जी ने ‘मध्य उत्तर प्रदेश की हिन्दी पत्रकारिता के इतिहास’ पर उल्लेखनीय काम किया था। उन्होंने प्रतिष्ठित पत्रकार-साहित्यकार गणेश शंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आदि के जीवन और कर्म पर महत्वपूर्ण लेखन और संपादन कार्य किया है।
उन्होंने नवम्बर २०१२ से नवम्बर २०१३ तक ‘प्रताप शताब्दी समारोह’ के माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता की विगत परम्परा, महत्ता और अर्थवत्ता को सामने रखने के साथ पत्रकारिता के समकालीन सकटों और चुनौतियों को सम्बोधित करने का महनीय काम किया। एक वर्ष तक निरंतर आयोजित हुए कार्यक्रमों में वरिष्ठ लेखकों पत्रकारों, विचारकों, संपादकों, संस्कृतिकर्मियों ने हिस्सा लिया और पूरे देश में इन कार्यक्रमों की चर्चा हुई।
विष्णु जी का व्यक्तित्व नैतिक, निर्भीक, सिद्धान्तप्रिय, विश्वसनीय और ईमानदार रहा है। नब्बे के दशक में परिचय होने से लेकर निरंतर उनके सान्निध्य का अवसर मिला है। उनकी भौतिक अनुपस्थिति हम सब के लिए दुखद है।
विष्णु जी को याद करते हुए, विनम्र श्रद्धांजलि!
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