
संजय कुमार सिंह
प्रधानमंत्री के पक्ष में प्रचार और इस कारण आज के लीड के शीर्षक गौर करने लायक हैं। शांति का पक्षधर भारत सक्रिय भूमिका को तैयार – नवोदय टाइम्स। यूक्रेन व रूस बिना समय गंवाए संघर्ष के समाधान के लिए करें बात मोदी। उपशीर्षक है, ऐतिहासिक यात्रा पर कीव पहुंचे पीएम ने कहा – भारत शांति स्थापना में सक्रिय भूमिका निभाने को तैयार, हम तटस्थ नहीं … हमेशा शांति के साथ – अमर उजाला। इंडियन एक्सप्रेस में तो बैनर है, भारत ने यूक्रेन को कंधा दिया। ऐतिहासिक यूक्रेन दौरे पर मोदी ने कहा, न्यूट्रल नहीं शांति की तरफ – हिन्दुस्तान टाइम्स। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है, ‘शांति चाहिये जितनी जल्दी संभव हो’ : प्रधानमंत्री ने यूक्रेन के राष्ट्रपति से कहा पुतिन से बात करें। द हिन्दू का शीर्षक वही है जो हिन्दुस्तान टाइम्स का है। द हिन्दू ने ऐतिहासिक यूक्रेन दौरा नहीं लिखा है। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, मोदी रन्स विद जेलेनस्की, हंट्स विद पुतिन। यह सिर्फ मोदी ज़ेलेंस्की के साथ दौड़ते हैं, पुतिन के साथ शिकार करते हैं जैसी बात नहीं है। यह एक भाव है जिसे समझा जा सकता है।
आज यह खबर द टेलीग्राफ को छोड़कर मेरे सभी अखबारों में लीड है। इतनी बड़ी विदेशी और अंतरराष्ट्रीय खबरों के बीच आप जानते हैं कि मणिपुर साल भर से ज्यादा से जल रहा है। सैकड़ों लोग मर चुके हैं, हजारों लोग शिविरों में रह रहे हैं और प्रधानमंत्री ने अभी तक वहां जाना तो दूर, शांति की अपील भी नहीं की है और की तो उसे पार्टी या सरकार के स्तर पर प्रचारित नहीं किया है। यही नहीं, इन दिनों मणिपुर के मुख्यमंत्री की टेलीफोन बातचीत का एक शर्मनाक ऑडियो / वीडियो मीडिया में है। दूसरी ओर, हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने पर खबर है, “बांग्लादेश के बॉर्डर गार्ड्स ने भारत बांग्लादेश सीमा पर भारतीय सीमा सुरक्षा बल को पशुओं के लिए बाड़ बनाने से रोक दिया”। अब समझ सकते हैं कि भारत की हालत क्या है। हालांकि 2019 के चुनाव में घुस कर मारने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री अब कह रहे हैं (द टेलीग्राफ की खबर से) “हम बुद्ध की भूमि से आते हैं जिसमें युद्ध के लिए कोई जगह नहीं है। हम महात्मा गांधी की भूमि से आते हैं जिन्होंने पूरी दुनिया को शांति का संदेश दिया।“
लाइव हिन्दुस्तान डॉट कॉम के अनुसार बांग्लादेश सीमा पर यह तनाव हफ्ते भर में दूसरी बार है। मामला कूच बिहार स्थित सीमा क्षेत्र का है जहां जानवरों को रोकने के लिए मवेशी बाड़ बनाई जा रही थी। अक्तूबर में (कम से कम 35 दिन बाद) दोनों देशों के सैन्य बलों के बीच होने वाली बैठक के दौरान यह मुद्दा उठाया जायेगा। खबर के अनुसार, …. बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रही हिंसा के चलते कुछ लोग भारत आने का रास्ता तलाश रहे हैं। असल में भारत-बांग्लादेश सीमा पर बहुत सख्ती नहीं है और लोग अवैध रूप से पार करते रहे हैं। पिछले दिनों मैंने एक वीडियो की चर्चा की थी जिसमें लोग बाड़ फांद कर आराम से सीमा में प्रवेश करते नजर आ रहे थे। पहले भी ऐसा होता रहा है और धर्म विशेष के ऐसे लोगों को ‘घुसपैठिये’ कहा जाता है और उसके लिये सीमाई राज्यों को दोषी ठहराया जाता है जबकि अंतरराष्ट्रीय सीमा की रक्षा का काम केंद्र सरकार की एजेंसियों का है और इनमें सीमा सुरक्षा बल प्रमुख है। हाल में खबर छपी थी कि ससश्त्र सीमा बल के महानिदेशक ने सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक का अतिरिक्त कार्यभार संभाला। इस महत्वपूर्ण बल के महानिदेशक का पद खाली है और अतिरिक्त महानिदेशक से काम चलाया जा रहा है।
देश की आबादी 140 करोड़ है। योग्य लोगों की कमी नहीं है और लोग रोजगार न होने के कारण परेशान है। सरकार की भी स्थिति बुरी है। पर हालात ऐसे ही हैं। देश के हालात बताने वाली आज की दूसरी खबरों पर आने से पहले आज की दूसरी महत्वपूर्ण खबर की चर्चा जरूरी है। खबरों के अनुसार सेबी ने फंड डायवर्सन के लिए अनिल अंबानी और 24 अन्य सहयोगियों पर 624 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। इन सभी लोगों को पांच साल तक प्रतिभूति बजार से प्रतिबंधित कर दिया गया है। इन्हें 45 दिन में जुर्माना देना है। आप जानते हैं कि सेबी वही संस्था है जिसकी प्रमुख अदाणी के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के कारण चर्चा में हैं औऱ इस कारण उनके कई अनुचित कारनामे भी सार्वजनिक हो चुके हैं जो अभी तक लोगों को मालूम नहीं थे और जनकी वजह से उन्हें सेबी प्रमुख नहीं बनाया जाना चाहिये था। इस मामले में कार्रवाई की जगह आज सेबी की कार्रवाई की खबर निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। आज इस खबर को मिली प्रमुखता से पाठकों को लगेगा कि प्रधानमंत्री कितने मजबूत हैं। यह अलग बात है कि उनकी मजबूती नीतिश कुमार और तेलुगू देशम पर निर्भर पर लेकिन वह अलग मुद्दा है। सेबी प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने का कोई कारण नहीं है और यह वैसे ही है जैसे सांसद ब्रजभूषण सिंह को यौन उत्पीड़न के आरोपों से बचाया गया। मामला सेबी प्रमुख के पति को मलाईदार काम मिलने का भी है पर वह सब चर्चा का विषय नहीं है। आप इसे हेडलाइन मैनेजमेंट कह सकते हैं।
हेडलाइन मैनेजमेंट के इस दौर में आज, पहले और उससे पहले के अधपन्ने की खबरों में कई ऐसी है जो भारत में प्रशासन की योग्यता, क्षमता और कार्यशैली पर प्रश्न उठाती हैं। आप जानते हैं कि सेबी प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई तो नहीं हो रही है, दिल्ली के निर्वाचित मुख्यमंत्री के खिलाफ नशे के सौदागरों के लिए बनाये गये सख्त पीएमएलए के कानून के तहत मुकदमा दायर किया गया है। सबूत नहीं है और इस बारे में प्रधानमंत्री सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि वे ‘अनुभवी चोर’ हैं (इसलिए सबूत नहीं है) फिर भी उनकी जमानत नहीं हुई है। दूसरी ओर, वर्षों अदाणी के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने वाले सेबी और सेबी प्रमुख (पूर्व भी) के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो रही है, सेबी अपनी प्राथमिकता के अनुसार काम करने के लिए स्वतंत्र है लेकिन निर्वाचित मुख्यमंत्री को जमानत नहीं मिल रही है जैसे कोई खूंखार आतंकवादी हो जबकि खूंखार आतंकवादी को भी छोड़ने का भारतीय जनता पार्टी का ही इतिहास है।
मुख्यमंत्री के खिलाफ मामले की जांच ईडी के साथ सीबीआई भी कर रही है और पूर्व में ईडी के अफसरों के साथ सीबीआई ने अपने अफसरों को भी रिश्वत लेने के आरोप में पकड़ा है जबकि मुख्यमंत्री के ऐसे अपराध का ना कोई उदाहरण है ना सबूत। आज की एक खबर यह भी है कि सीबीआई के अनुसार निष्पक्ष जांच के लिए मुख्यमंत्री की गिरफ्तारी जरूरी है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार दिल्ली के लाट साब यानी उपराज्यपाल ने उत्पाद शुल्क मामले में मुख्यमंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी है। यह विडंबना ही है कि राज्यपाल के खिलाफ मामले की सुनवाई नहीं हो रही है क्योंकि वे संवैधानिक पद पर हैं और उन्हें इससे राहत मिली हुई है। मोदी सरकार में सीबीआई के प्रमुख को आधी रात में हटाने और नये की नियुक्ति में नियमों को किनारे करने के उदाहरण भी हैं। लंबे समय से मुख्यमंत्री को जमानत नहीं मिलना तथ्य है और इस खबर के बावजूद है कि आज ही हिन्दुस्तान टाइम्स में उसी पन्ने पर एक खबर है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है – “पहली बार के जो आरोपी लंबे समय से जेल में हैं उन्हें छोड़ दिया जाये”। यह उन लोगों के लिए है जो संबंधित अपराध की अधिकतम सजा का एक तिहाई जेल में पूरा कर चुके हैं।
आप जानते हैं कि कश्मीर में 10 साल बाद चुनाव हो रहे हैं। अनुच्छेद 370 हटाने के बाद भी भाजपा सरकार ने चुनाव नहीं करवाये और अब करवा रही है तो सुप्रीम कोर्ट के दबाव में। लोकसभा चुनाव में उसने घाटी में उम्मीदवार ही नहीं खड़े किये और अब कर पायेगी इसमें संदेह है। दूसरी ओर, कांग्रेस या राहुल गांधी की चुनाव लड़ने की तैयारी है। वे कश्मीर और लद्दाख जाते रहे हैं और भारत यात्रा के समय भी गये थे और चर्चा में रहे हैं। ऐसे में भाजपा की खिसियाहट समझना मुश्किल नहीं है और कल कांग्रेस से दस सवाल पूछकर अमित शाह ने अपनी खिसियाहट सार्वजनिक कर दी। मोटे तौर पर ये सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब सरकार को देना चाहये और सरकार से पूछा जाना चाहिये। पर कौन पूछे और कौन बताये। इस फेर में गृहमंत्री ने ही सवाल दाग दिये हैं। मैंने कल ही उसकी चर्चा सुनी पर आज वह पहले पन्ने पर नहीं दिखा। अब नवोदय टाइम्स में दिखा है। शीर्षक है, अमित शाह ने पूछा (यह 10 में से एक सवाल है और जो शीर्षक बनाने लायक लगा होगा), क्या 370 बहाल करने के वादे का समर्थन करती है कांग्रेस। मुझे लगता है इसमें कोई दम नहीं है और इसके हां (या चुप्पी) से भाजपा अपने प्रचारकों को यह यकीन दिलाने में सफल रहेगी कि कांग्रेस सत्ता में आई तो 370 फिर बहाल हो सकता है।
होगा कि नहीं, समय बतायेगा। पर मेरा मुद्दा है कि भाजपा बताये, क्यों नहीं होना चाहिये? अगर इससे कोई लाभ हुआ होता को भाजपा ने बताया होता। नहीं हुआ है तभी भाजपा ने नहीं बताया है। हमने महसूस नहीं किया, गोदी वालों ने प्रचार भी नहीं किया और यह सब यह मानने के लिए पर्याप्त है कि 370 हटाने से भाजपा के प्रशंसक खुश हुए हों और कुछ नहीं हुआ। इसीलिए केंद्रीय गृहमंत्री के दिमाग में कांग्रेस के लिए यह सवाल है। पर मोटी सी बात है कि किसी भी विवाद को (कश्मीर की विशेष स्थिति) निपटाने के लिए उसपर वार्ता होनी चाहिये और हमेशा से वार्ता की पहली शर्त रही है, यथास्थिति बहाल हो। अगर कोई समझता हो कि 370 हटाकर स्थिति खराब की गई है तो वह इसकी मांग करेगा ही। ऐसे में इसके बिना तो आगे की बात हो ही नहीं सकती है और मुझे लगता है ऐसा करना ही पड़ेगा। भाजपा चाहे तो अनंतकाल तक इंतजार कर सकती है। कांग्रेस को मौका मिला तो वह अपने हिसाब से काम करेगी। फिर भी, यह सवाल और कांग्रेस पर यह आरोप कि वह सत्ता के लालच में काम कर रही है बताता है कि भाजपा सत्ता में रहे तो काम नहीं करने को भी काम समझती है। उसने कांग्रेस पर सत्ता के लालच में होने का आरोप लगाया है। पर मुद्दा यह है कि अमित शाह जिसे सत्ता का लालच कह रहे हैं वह जनता को निर्वाचित सरकार देने की जिम्मेदारी भी है।
ऐक्ट ऑफ गाॉड?
एक कोचिंग इंस्टीट्यूट में बाढ़ का पानी भर जाने से तीन छात्रों की मौत का मामला याद होगा। आप जानते हैं कि बारिश से पूरे मोहल्ले में पानी भर गया था, सड़कों पर पानी था और ऐसे में बेसमेंट में पानी भरने से हुई मौतों की जिम्मेदारी लेने और जिम्मेदार को सजा देने की बजाय यह विवाद चलता रहा कि बेसमेंट में लाइब्रेरी क्यों थी? अब वह मामला पुराना हो गया तो खबरों में नहीं है लेकिन आज खबर है, दिल्ली में बारिश के कारण 15 साल के एक युवक की डूबने से मौत हो गई जबकि दो लोगों की करंट लगने से। यह देश की राजधानी की हालत है। डिफेंस कॉलोनी में बिजली की तारें भूमिगत नहीं है और दावा पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था तता विश्व गुरू होने का है। मुझे लगता है कि हमें इस बात का भी हिसाब करना चाहिये कि हम अपना हर साल कितनी अस्वाभाविक मौतों की कीमत पर गुजारते हैं। नरेन्द्र मोदी ने 2016 में कोलकाता में पुल गिरने को ऐक्ट ऑफ गॉड नहीं ऐक्ट ऑफ फ्रॉड कहा था। जाहिर है उनकी राय में ऐक्ट ऑफ गॉड भी कुछ होता होगा और इन दिनों देश के नागरिक खासकर तीर्थ यात्री भी मुश्किल में हैं। कभी उन पर आतंकी हमला हो जाता है तो कभी कोई बुजुर्ग अपने समूह से अलग हो जाता है, नहीं मिलता है।
आज खबर है कि नेपाल में तीर्थयात्रियों की एक बस खाई में गिर गई। इससे 27 भारतीय तीर्थयात्रियों की मौत हो गई है। 16 जख्मी हैं। इनमें उत्तर प्रदेश के साथ महाराष्ट्र के भी लोग हैं और महाराष्ट्र सरकार ने घायलों तथा शवों को ले जाने के लिए वायु सेना के विशेष विमान की मांग की है। उधर, कोलकाता के आरजी कार अस्पताल में डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या के बाद शुरू हुई हड़ताल अभी खत्म नहीं हुई है और आज द टेलीग्राफ में यही लीड है। आप समझ सकते हैं कि इससे सरकारी अस्पताल के मरीजों को कितनी असुविधा हो रही होगी पर मुद्दा यह है कि तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के विरोध में इस आंदोलन को हवा देने और हत्याकांड पर राजनीति करने वाले लोग अब चुप हैं। अमूमन ट्रोल सेना ऐसे मामलों में डॉक्टरों को अपने कर्वतव्य की या दिलाने लगते हैं। पर कोलकाता का मामला अभी द टेलीग्राफ की लीड भर है।


