
संजय कुमार सिंह
मैंने कल यहां लिखा था कि भाजपा (और उसके सहयोगी संगठन) बिहार और फिर बंगाल के चुनावों के मद्देनजर देश में हिन्दू मुसलमान के विवाद बढ़ाने में लगे हैं। ज्यादातर अखबार उनका पूरा साथ दे रहे हैं। इस क्रम में आज कई अखबारों की लीड, संसद में वक्फ संशोधन विधेयक पेश किये जाने की खबर है। अमर उजाला में इसका शीर्षक है, लोकसभा में वक्फ संशोधन विधेयक आज पेश होगा, तेलुगूदेशम-जदयू का भी समर्थन। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, वक्फ पर आर-पार का दिन आज। इंडियन एक्सप्रेस में इस खबर का शीर्षक है, सरकार आज सदन में वक्फ विधेयक पेश करेगी, विपक्ष ने कहा, एजंडा को बुलडोज करना है। उपशीर्षक है, इंडिया ब्लॉक की 22 पार्टियों ने चर्चा में भाग लेने और विधेयक पर वोट देने का निर्णय़ किया है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह विधेयक सरकार के मुस्लिम विरोधी एजंडा का भाग है और इसलिए सरकार इसे पास कराना चाहती है। दूसरी ओर, सच्चाई यह है कि सुप्रीम कोर्ट में 1991 के पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के खिलाफ और इसे लागू करने की मांग करने वाली याचिकाओं की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर आज छपी खबर के अनुसार इस अधिनियम की वैधता की चुनौती देने वाली अश्विनी कुमार की याचिका पांच साल से लंबित है। अब उनके बेटे नितिन उपाध्याय ने भी इस मामले में अपील की है जिसपर सुप्रीम ने विचार करने से इनकार कर दिया।
आप इस अधिनियम को जानते हों तो इसका उद्देश्य समझना मुश्किल नहीं है लेकिन देश में संरचनाओं की स्थिति 15 अगस्त 1947 के अनुसार निश्चित कर दिये जाने की इस ‘एकतरफा’ कार्रवाई को चुनौती दी गई है। इसपर विचार होना है, कोर्ट ने इसे सरसरी तौर पर खारिज नहीं किया है, स्वतः स्फूर्त कार्रवाई भी अब सुनने में नहीं आती और सरकार को कॉलेजियम सिस्टम से परेशानी है ये सब अलग मुद्दे हैं। यह भी कि नोटबंदी के अलग-अलग पहलुओं को चुनौती देने वाली 58 याचिकाओं पर सुनवाई शुरू करने से पहले केंद्र सरकार ने इन्हें अकादमिक मुद्दा क़रार दिया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘यदि मुद्दा अकादमिक है तो अदालत का समय बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है। क्या हमें समय बीतने के बाद इसे इस स्तर पर उठाना चाहिए?’ इस स्थिति में देश का मुस्लिम पक्ष पूजा स्थल अधिनियम को उसके शब्दों और भावना के अनुसार लागू करने की मांग कर रहा है। मानना पड़ेगा कि इससे मस्जिदों नीचे के मंदिर ढूंढ़ने का काम खत्म हो सकता है वरना सांप्रदायिकता उभार सकने वाली सरकारें मंदिर बनवाती और चुनाव जीतती (या बहुमत के विवेक के अनुसार हारती रहेंगी)। खबर के अनुसार भारत के मुख्य न्यायाधीश, संजीव खन्ना ने इस मामले में नई अपीलों पर रोक लगा रखी है।
आज जब वक्फ विधेयक पेश किये जाने और ‘आर-पार का दिन’ होने की बात की जा रही है तो तथ्य यह है कि वक्फ विधेयक पास भी हो जाये तो भविष्य में उसे इसी तरह चुनौती दी जा सकेगी और अगर यही चलता रहा तो सरकार जो काम करेगी उसपर सुप्रीम कोर्ट (और अन्य अदालतों) में विचार होगा। सुप्रीम कोर्ट के पास दूसरे मामलों के लिए समय नहीं होगा और सरकार के पास दूसरे काम के लिए समय नहीं होगा या जरूरत ही नहीं रहेगी। भाजपा सरकार के कितने ही निर्णयों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है अब तो गिनना मुश्किल है। नोटबंदी जैसी कार्रवाई करने वाली सरकार किसानों के लिये बिना मांगे, बिना सलाह किये कानून ले आई, भारी विरोध के बाद उसे वापस लिया और प्रधानमंत्री ने कहा कि तपस्या में कोई कमी रह गई होगी पर अभी तक किसानों की मांग पूरी नहीं हुई है और ना उनसे ढंग से बात-चीत करके सहमति बनाने और कोई रास्ता निकाला जा सका है। पर मुकदमे कितने हुए और चुनाव कैसे लड़े गये हैं उसे याद कीजिये तो इस सरकार की उपयोगिता समझ में आ जायेगी।
छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराये जाने के मद्देनजर यह देशहित में एक अच्छा कानून है और पूजा स्थल से संबंधित विवाद तथा सामाजिक समस्या को स्थायी तौर पर खत्म करने की दिशा में अच्छा प्रयास है। जो संभव है। मुसलमानों को खत्म करने या एक कोने में घेरकर रखना फिलहाल तो संभव नहीं लग रहा है। ऐसे में 15 अगस्त 1947 की स्थिति को स्वीकार करने में कोई दिक्कत भी नहीं होनी चाहिये वरना इस बात के लिए तैयार रहना चाहिये कि हर धार्मिक शासक अपनी शक्ति स्थापित करने के लिए खुद को दूसरे धर्म के ऊपर साबित करने में लगा रहेगा तो काम (जनता की सेवा और चौकीदारी) कब करेगा। ऐसे में भाजपा तो छोड़िये, आरएसएस भी भरपूर तौर पर सक्रिय है। राकेश कायस्थ ने कल की खबरों पर लिखा था, टाइम्स ऑफ इंडिया (मुंबई) ने अपने आज के एडिशन में आरएसएस से जुड़ी एक नहीं बल्कि चार खबरों को जगह दी है। पहले पन्ने की लीड हेडलाइन में बताया गया है कि संघ ने कहा है कि औरंगजेब की कब्र जहां है, वहीं रहेगी। पेज नंबर नौ पर उपर दत्तात्रेय होसबेले हैं और ठीक नीचे भइया जी जोशी, वो भी पर्याप्त जगह घेरे हुए। होसबेले साहब कह रहे हैं कि अगर आरएसएस के सदस्य चाहे तो मथुरा और काशी के आंदोलन में शामिल हो सकते हैं लेकिन उन्हें मस्जिदों को निशाना नहीं बनाना चाहिए। इसके नीचे वाली खबर पहले पन्ने पर छपी उस खबर का विस्तार है, जिसमें भइया जी जोशी औरंगजेब के कब्र विवाद को ठंडा करने का प्रयास कर रहे हैं। पहले पन्ने पर लगभग 500 शब्द और फिर पेज नंबर नौ पर 700-800 शब्द संघ को समर्पित हैं। लेकिन कवरेज यही खत्म नहीं हुई। पेज छह पर स्वयं सरसंघचालक मोहन भागवत अवतरित हैं, जो कह रहे हैं कि ये दुनिया की मजबूरी है कि वैश्विक नेतृत्व के लिए वो भारत की ओर देखे। घोषित तौर पर एक गैर-राजनीतिक संगठन से संबंधित बयानों को इतनी जगह। यह सब अकारण नहीं है।
आप जानते हैं कि औरंगजेब के मकबरे पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री क्या कहते रहे हैं। इससे आप भाजपा की राजनीति समझ सकते हैं। अखबारों को चाहिये कि वह जनहित में लोगों को यह सब समझाये लेकिन वह सरकार की सेवा में लगा है यह डर से दबा पड़ा है। ऐसे में आज गुजरात की अवैध पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट से 21 मरे – बड़ी खबर है। द हिन्दू में लीड है। दूसरे अखबारों में भी है लेकिन वैसे नहीं है जैसे छपनी चाहिये थी। हिन्दुस्तान टाइम्स की खबर के अनुसार, गुजरात के बनासकांठा जिले के डीसा कस्बे में मंगलवार को एक अवैध पटाखा फैक्ट्री के गोदाम में बॉयलर फटने से लगी आग में कम से कम 21 लोगों की मौत हो गई और छह अन्य घायल हो गए। फैक्ट्री की ओर से लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए दिसंबर में किया गया आवेदन पुलिस निरीक्षण की प्रतिकूल रिपोर्ट के बाद खारिज कर दिया गया था। आप समझ सकते हैं कि लाइसेंस का नवीकरण नहीं होने के बावजूद वहां लोग काम कर रहे थे और सबको पता था। ऐसे में विस्फोट हुआ और वो लोग मर गये जिनका कोई दोष नहीं था। जाहिर है, वे इस स्थिति में नहीं रहे होंगे कि लाइसेंस का नवीकरण नहीं हुआ तो काम करने नहीं जाते। उनकी मजबूरी उनके लिए मौत का कारण बनी और ऐसे ही गुजरात मॉडल का प्रचार करके नरेन्द्र मोदी सत्ता में आये और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सरकार का नेतृत्व करने के लिए न सिर्फ उनका चुनाव किया बल्कि 2014 से अब तक उनके सही गलत कामों का (मौन साधकर ही सही) समर्थन भी कर रहा है।
यह संयोग हो या प्रकृति का प्रयोग अथवा रामराज्य का उदाहरण कि आज ही दिल्ली के झंडेवालां मेट्रो स्टेशन के पास एक कमर्शियल बिल्डिंग में आग लगने की खबर है। इसमें किसी के हताहत होने की सूचना तो नहीं है पर पास खड़ी कई गाड़ियां भी जल गईं। अवैध पटाखा फैक्ट्री में विस्फोट से मौत और कमर्शियल बिल्डिंग में आग की खबर के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि बिल्डिंग में अग्निशमन की क्या व्यवस्था थी और थी भी कि नहीं। मुझे किसी अखबार की खबर में इसका विवरण नहीं मिला। पर नवभारत टाइम्स की यह खबर अच्छी और उल्लेखनीय लगी, “रहें अलर्ट : गर्मी के साथ देश में आग की घटनाएं बढ़ीं”। कहने की जरूरत नहीं है कि आम आदमी के साथ अग्नि शमन से जुड़े लोगों को भी सतर्क रहने की जरूरत है और सभी सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि उनके क्षेत्र में सभी इमारतों (आवासीय भी) का अग्निशमन ऑडिट किया जाये, बचाव के उपाय हैं कि नहीं उसकी रिपोर्ट ली जाये और जहां नहीं है वहां इसकी व्यवस्था सुनिश्चित की जाये। सरकारी कार्रवाई अमूमन हादसे के बाद होती है लेकिन सत्ता संभाल कर “ना खाउंगा, ना खाने दूंगा” का एलान करने के बाद भी वही सब चलता रहे तो फायदा क्या हुआ? पूछना अखबारों का काम था, वे अधिकारियों और जनता को अलर्ट भी नहीं कर रहे हैं। आज की दूसरी बड़ी खबर, जिसकी कई अखबारों ने उपेक्षा की है वह है, टैरिफ पर बड़ा फैसला आज, ट्रंप बोले – भारत टैक्स घटायेगा। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक हिन्दी में लगभग यही है। इसमें महत्वपूर्ण यह है कि ट्रम्प भारत के बारे में क्यों और कैसे बोल रहे हैं और भारत उसपर चुप क्यों है। दोनों है तो अखबार यानी संपादक-प्रचारक क्या कर रहे हैं। हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस ने उपशीर्षक से बताया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप से द्विपक्षीय करार के लिए संदर्भ की शर्तों को अंतिम रूप देने में मदद मिली। लीड के साथ की खबर में बताया गया है कि आज टैरिफ की खबर से पहले सेनसेक्स 1.8 प्रतिशत गिर गया।
देश-समाज को बांटने, संघ अनुकूल और भाजपा मय बनाने की कोशिशों के तहत अखबारों ने आज शीर्षक में यह नहीं बताया है कि बुलडोजर न्याय के पीड़ितों को 10-10 लाख रुपये प्रत्येक देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड है और यह शीर्षक का दूसरा भाग है। पहले के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, आश्रय का अधिकार बुनियादी अधिकार है। खबर के अनुसार अदालत ने इस अवैध कार्रवाई के लिए प्रयागराज विकास प्राधिकरण की आलोचना की है। इस मामले में अदालत की सख्त टिप्पणी के बावजूद भाजपा के नेता-प्रवक्ता और प्रचारक यह कहने की हिमाकत करते हैं कि सबको अपनी सीमा में रहना चाहिये। दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति से संबंधित कॉलेजियम प्रणाली से परेशानी सर्वविदित है और सबको पता है कि वह एनजेएसी के पक्ष में काम कर रही है जबकि सुप्रीम कोर्ट उसे रद्द कर चुका है। 2015 में एक संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से फैसला सुनाया था कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम और 99वां संविधान संशोधन अधिनियम असंवैधानिक है। इसने उच्च न्यायपालिका में न्यायाधीशों के चयन के लिए कॉलेजियम प्रणाली को बहाल कर दिया था। फिर भी सोशल मीडिया पर कॉलेजियम के खिलाफ अभियान चलता रहता है। व्हाट्सऐप्प पर लेख फॉर्वार्ड किये जाते रहते हैं।
अमर उजाला में यह खबर टॉप पर छह कॉलम में है और छह सप्ताह के भीतर 10-10 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दूसरा उपशीर्षक है। इससे पहले अखबार ने अपने पाठकों को बताया है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा – आश्रय का अधिकार और कानून की उचित प्रक्रिया भी कोई चीज होती है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह बात बतानी पड़ रही है – यही अपने आप में सबसे बड़ी खबर है या फिर सच जानते हैं तो आप सब समझ सकते हैं। आज की इस खबर पर सरकार की प्रतिक्रिया भी जरूरी थी और पुराने समय में इसके लिए लोगों के मुंह में माइक ठूंस दिये जाते थे। वैसे तो माइक अभी भी ठूंसे जाते हैं पर सिर्फ विपक्षी नेताओं के मुंह में। आज किसी अखबार ने सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के मद्देनजर मुख्यमंत्री और उनके समर्थकों-प्रचारकों की प्रतिक्रिया नहीं दी है। एक टेलीविजन चैनल में भाजपा प्रवक्ता जरूर सबको अपने दायरे में रहने की जरूरत बता रहे थे (पहले भी कहा गया है) पर आज कुछ अखबारों में मुख्यमंत्री का बयान है। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने पर फोटो के साथ दो कॉलम में छपी खबर का शीर्षक है, “बुलडोजर की कार्रवाई उपलब्धि नहीं बल्कि जरूरत: योगी”। खबर के अनुसार, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी सरकार के विवादास्पद, ‘बुलडोजर न्याय’ का बचाव किया, साथ ही उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के भीतर मतभेदों की अटकलों को खारिज कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीति उनके लिए पूर्णकालिक व्यवसाय नहीं है। समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “यह [बुलडोजर की कार्रवाई] कोई उपलब्धि नहीं है, यह यहां (यूपी में) एक जरूरत थी और उस जरूरत के संबंध में हमें जो भी जरूरी लगा…।” राजनीति में कब तक बने रहने की योजना है, इस पर मुख्यमंत्री ने कहा, “इसके लिए भी एक समय सीमा होगी।” यह पूछे जाने पर कि क्या उनके जवाब का मतलब यह है कि राजनीति उनका स्थायी व्यवसाय नहीं है, आदित्यनाथ ने दोहराया, “हां, मैं यही कह रहा हूं।”
मुझे लगता है कि योगी आदित्यनाथ के बारे में यहां यह भी बताया जाना चाहिये था कि यूपी पुलिस की बर्बरता का वर्णन करते हुए वे संसद में रो पड़े थे। फूट-फूट कर रोने का उनका वीडियो सार्वजनिक है फिर भी वे ध्वस्तीकरण जैसी बुलडोजर कार्रवाई को जरूरी बता रहे हैं और राजनीति को स्थायी व्यवसाय नहीं मानते हैं। वे 1998 में 26 वर्ष की आयु में पहली बार सांसद बने थे और लगातार पांच बार एक ही क्षेत्र से जीत चुके हैं। 2017 में मुख्यमंत्री बने। नवोदय टाइम्स ने उनके इस इंटरव्यू को पहले पन्ने पर टॉप के तीन कॉलम में फोटो के साथ छापा है और शीर्षक है, राजनीति मेरे लिए फुल टाइम जॉब नहीं है। इस इंटरव्यू में उन्होंने यहा भी कहा है, लूट-खसोट का अड्डा बन गये हैं वक्फ बोर्ड। द टेलीग्राफ में आज यही खबर लीड है। शीर्षक है, घरों को ध्वस्त करना अमानवीय, अवैध है। फ्लैग शीर्षक है, बुलडोजर कार्रवाई ने सुप्रीम कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोर दिया।


