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एंकर या रिपोर्टर बनना चाहते हैं? तो ये ज़रूर पढ़ें..

मेघा उपाध्याय-

लगभग हर दिन मेरे इनबॉक्स में एक ही सवाल आता है—क्या कोई फ्रेशर सीधे एंकर या रिपोर्टर बन सकता है?

इसका छोटा और सीधा जवाब है— हां, बिल्कुल संभव है।

मैंने खुद कई ऐसे फ्रेशर्स देखे हैं जिन्होंने करियर की शुरुआत सीधे रिपोर्टिंग और एंकरिंग से की। इसमें मेरी अपनी जर्नी भी शामिल है। मेरे पास न कोई इंटर्नशिप थी, न पहले का अनुभव, फिर भी मैंने सीधे ABP में रिपोर्टर के तौर पर शुरुआत की। इसलिए यह सिर्फ थ्योरी नहीं, हकीकत है।

अब इंडस्ट्री के भीतर से एक ईमानदार बात— अगर आप रिपोर्टर बनना चाहते हैं, तो सीधे फील्ड में जाना सबसे बेहतर और सुरक्षित रास्ता है। क्योंकि एक बार अगर आप न्यूज़रूम में प्रोड्यूसर या बैकएंड रोल में चले गए, तो फील्ड रिपोर्टिंग में शिफ्ट होना बेहद मुश्किल हो जाता है। हां, अपवाद होते हैं, लेकिन ज्यादातर सफल रिपोर्टर्स ने करियर की शुरुआत फील्ड से ही की है। कई चैनल आज भी फ्रेश टैलेंट को ट्रेन करने में निवेश करते हैं, लेकिन यह रास्ता उतना आसान नहीं जितना दिखता है।

एक फ्रेशर रिपोर्टर के तौर पर चुने जाने के लिए ज़रूरी है—

  • मजबूत कम्युनिकेशन स्किल और साफ़ आवाज़
  • आत्मविश्वास और कैमरे के सामने सहजता
  • खबरों, करंट अफेयर्स और जन मुद्दों की समझ
  • ग्राउंड पर दबाव झेलने की क्षमता
  • और बहुत कुछ, जिसे शब्दों में समेटना मुश्किल है।

अब बात करते हैं एंकरिंग की—एंकरिंग एक बिल्कुल अलग खेल है।

बड़े नेटवर्क्स में फ्रेशर का सीधे एंकर बनना बहुत दुर्लभ है। ज़्यादातर एंकर पहले रिपोर्टर होते हैं और सालों की फील्ड रिपोर्टिंग के बाद एंकरिंग में आते हैं। कुछ लोग वॉइस-ओवर या प्रोडक्शन रोल से स्किल के दम पर एंकरिंग तक पहुंचते हैं।

हालांकि, रीजनल और लोकल चैनलों में लोग सीधे एंकरिंग से शुरुआत करते हैं और समय के साथ नेशनल प्लेटफॉर्म तक पहुंचते हैं।

कुल हासिल क्या है?

इस इंडस्ट्री में कोई तय नियम नहीं हैं। यहां मेहनत, सही समय, स्किल, किस्मत और सही कनेक्शन—सब मायने रखते हैं। हर जगह अपवाद मिलेंगे, लेकिन एक सच्चाई हमेशा रहेगी—कुछ भी आसान नहीं है, और कुछ भी नामुमकिन नहीं है।

उम्मीद कभी मत छोड़िए, बस यह तय कीजिए कि आप सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

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1 Comment

1 Comment

  1. Deepak Kumar

    December 15, 2025 at 2:26 pm

    मोहतरमा, आपने बहुत अच्छी बात लिखी. इससे पहले भी मैंने आपके आर्टिकल को ध्यान से पढ़ा था. जैसा कि आपने लिखा है कि आपकी शुरुआत एक प्रतिष्ठित चैनल से हुई है. इसलिए आपके लिए ये थोड़ा सा आसान रहा होगा. पर एक बार आप ग्राउंड पर जाइए. एक फ्रेशर के तौर पर नौएडा के ही सेक्टर 62 में चल रहे कई न्यूज की फैक्ट्री में जाकर देखिए.

    जहां न बच्चों को सैलरी समय पर मिलती है. न ही आत्मसम्मान है. न शिफ्ट का समय, उपर से धमकी अलग कि करियर बर्बाद कर देंगे. ऐसे में कई लोगों के सारे सपने बस रौंद दिए जाते हैं. कई कहानियां तो ऐसी है जो सामने लाई नहीं जाती. बस साथी एक दुसरे का सहारा बनकर दुख बांट लेते हैं.

    एक बार आप हिम्मत करके बिना किसी पहचान के इन फैक्ट्रियों में धावा बोलें. फिर देखिए सच्चाई कुछ और ही नजर आएगी.

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