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‘वॉशिंगटन पोस्ट’ में प्रकाशित अडानी-मोदी की इस बड़ी स्टोरी के बाद एलआईसी में जनता का पैसा सवालों के घेरे में!

सौमित्र रॉय-

नरेंद्र मोदी और गौतम अदानी के बीच की नज़दीकी को अब दुनिया समझने लगी है। ‘वाशिंगटन पोस्ट’ को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि इस साल मई में अमेरिकी नोटिस के बावजूद मोदी सत्ता ने LIC का 3.9 बिलियन डॉलर अदानी की कंपनियों में क्यों झोंकने के लिए कहा था।

LIC का पैसा मोदी अपने घर से नहीं लाया। यह देश की आम जनता की ज़िंदगी भर की बचत है। अखबार दावा कर रहा है कि मोदी सत्ता ने LIC को राज़ी किया कि अदानी की कंपनियों में पैसा लगाना सुरक्षित है।

यही दबाव अदानी को 88 हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा का लोन देने के लिए बैंकों पर भी डाला गया होगा।

क्या 35 साल तक भीख मांगने वाला इतने बड़े लोन की गारंटी लेता है?

अखबार ने यह दिखाने के लिए यह खबर की है कि मोदी सत्ता के बिना अदानी इस कदर अमीर बन नहीं सकता था। अदानी के लिए मोदी सत्ता रातों–रात नियम कानून बदल देती है।

यहां तक कि उसकी घूसखोरी पर पर्दा डालने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून की भी धज्जियां उड़ाई जाती हैं।

अभी तक किसी मीडिया चैनल ने यह सुर्खी पेश नहीं की कि एप्स्टीन फाइल्स की तरह अदानी के पास नरेंद्र मोदी की वह कौन सी फाइल है, जिसके सहारे वह उसे नचा रहा है।

शायद अदानी की गिरफ्तारी या मोदी के झोला उठाकर निकलने के बाद ये राज़ खुले।

ये राज़ बेशक भारत के लोकतंत्र की अदानी–अंबानी जैसे सेठों की गुलामी का काला अध्याय होगा। फिर भी हाशिए पर पड़ी 130 करोड़ अवाम को होश नहीं आएगा।

Washington Post की रिपोर्ट में मोदी सरकार पर क्रोनी बिलेनियर के लिए रुपये 32,370 करोड़ का बेलआउट (वित्तीय राहत) देने का खुलासा किया गया है।

वाशिंगटन पोस्ट ने यह खुलासा किया है कि मोदी सरकार ने अडानी समूह के लिए $3.9 बिलियन (लगभग Rs. 32,370 करोड़) की वित्तीय राहत (बेलआउट) का निर्देश दिया, जबकि समूह पर अमेरिका में धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी के आरोप थे।

​सरकारी स्वामित्व वाली LIC (भारतीय जीवन बीमा निगम) और अन्य सार्वजनिक एजेंसियों को अडानी की कंपनियों में भारी निवेश करने का आदेश दिया गया था ताकि “विश्वास दिखाया जा सके,” भले ही LIC को पहले ही अडानी के शेयरों पर अरबों का नुकसान हो चुका था।

​रिपोर्ट इसे क्रोनी कैपिटलिज्म (यारी-दोस्ती पूंजीवाद) के रूप में दर्शाती है—जिसमें सार्वजनिक धन का उपयोग मोदी के करीबी सहयोगी को बचाने के लिए किया गया, जिससे सरकारी नीति और निजी लाभ के बीच की रेखा धूमिल हो गई।

यह रिपोर्ट भ्रष्टाचार, करदाताओं के पैसे के दुरुपयोग, और पारदर्शिता की कमी के बारे में गंभीर चिंताएँ उठाती है, जो यह संकेत देती है कि मोदी के शासन में राजनीतिक वफादारी को जनहित से ऊपर रखा जाता है।


पैसे की कमी से परेशान गौतम अडानी को मोदी सरकार ने जीवन बीमा निगम में विधवा महिलाओं के लिए रखा गया 3.28 लाख करोड़ रूपया निकाल कर दे दिया है. यह तो पक्का है अडानी यह पैसा कभी वापस नहीं करेगा. मोदी से पैसा वापस मांग सके इतना दम भारत में किसी के पास है नहीं. कोई मोदी जी से अपने पैसे वसूली की कोशिश करेगा तो फिर मोटा भाई की पिस्टल है ही. तुम मस्जिदों के आगे डांस करो भारतीय लोगों, तुम्हारी यही औकात है. एक पुरानी अंग्रेजी कहावत है पीपल गेट द गवर्नमेन्ट दे डिज़र्व.

-हिमांशु कुमार


तनवीर एहसान- बेशर्मी की हदें पार कर दी हैं मोदी सरकार ने अडानी को फ़ायदा पहुँचाने और उसके कुकृत्य को बचाने के लिए। अमेरिका की SEC (सेबी का अमरीकी संस्करण) ने वहाँ की अदालत में रिपोर्ट दाखिल कर दी है कि भारत सरकार ने अडानी को समन नहीं भिजवाए। समझ में नहीं आता है कि ऐसी कौन सी कमज़ोर नस अडानी के हाथ में है जो यह देश की इज़्ज़त की भी परवाह नहीं कर रहा है?

स्वप्न विश्वास- अब LIC के पास अपने पालिसी धारकों को बोनस और अन्य मदों में देने का पैसा नहीं है परन्तु मोदी जी के कहने से अडानी पर लुटाने के लिए भरपूर पैसा है. ऐसी हालत बन चुकी है कि अब नौजवान LIC की नई पालिसी लेने को तैयार नहीं है.

अमृत दासगुप्ता– बार बार हर बार ईशारा किया हूँ कि अडानी और मोदी के बीच कोई अनैतिक, अवैध और असामाजिक व्यक्तिगत/पारिवारिक सम्बन्ध है वरना मोदी को इतना गैरकानूनी कदम उठाने के लिये अडानी मजबूर नहीं कर सकता था।

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