अमृत तिवारी-
सीधी बात NO बकवास!…. पश्चिम बंगाल में अगर दीदी को हराना है, तो बीजेपी को दीदी जैसा ही कोई महिला चेहरा लाना होगा. जो उतना ही तेज़-तर्रार और सेल्फ़ सफिशिएंट हो जितनी की दीदी यानी ममता बनर्जी हैं. पश्चिम बंगाल में कंटेंट के नाम पर खूब इफ़-एंड-बट परोसा जा रहा है. मजमा- जुटाऊ पत्रकार पाँच ग्राम फैक्ट्स के साथ पाँच किलो का ज्ञान ठेल रहे हैं.
जनाब, सिंपल सा फैक्ट है. पश्चिम बंगाल में बीजेपी के हक़ में तमाम इंस्ट्रूमेंट काम कर रहे हैं. सिर्फ़ एक इंस्ट्रूमेंट नहीं है, और वह है– ममता बनर्जी. यह मैं इसलिए कह रहा हूँ. क्योंकि पब्लिक में ‘डर’ और ‘डेडिकेशन’ का कॉकटेल ही ममता बनर्जी की मज़बूती का सबसे बड़ा राज है. फायरब्रांड इमेज उनके समर्थकों में अव्वल दर्जे का कॉन्फ़िडेंस देता है. और सबसे अहम बात कि वह बंगाली हैं. बंगाली महिला हैं. और बंगाल एक महिला प्रधान राज्य है.
होल्ड योर नर्व्स एंड थिंक क्वाइटली
पत्रकार बंधुओं! माहौल और मजमा देखकर हिस्टीरिकल मत होइए. ख़ुद कैमरे का फ़्रेम बनाते-बनाते उसके वशीभूत मत हो जाइए. बिना किसी पूर्वाग्रह के पश्चिम बंगाल के एक कोने में बैठ जाइए. फिर विचार कीजिए. सब क्रिस्टल क्लियर हो जाएगा. क्योंकि, मैंने बंगाल में रुककर देखा और पाया कि — जनता दिल्ली की “ब्रांडिंग” से काफ़ी हद तक दूर है. बंगाली समाज वैसे भी लाव-लश्कर और ब्रांड का वशीभूत नहीं होता. वह KFC के बाहर मूढ़ी चॉप खाकर आनंदित हो लेगा. लेकिन, स्टारबक्स आदि को भाव नहीं देगा. सेम साइकोलॉजी पॉलिटिक्स में भी अप्लाई होता है.
इसलिए जिस मानसिकता से आप पीएम मोदी और अमित शाह को देख रहे हैं, आम बंगाली वैसे नहीं देख रहा है. खैर, निजी तौर पर मैंने सारे समीकरणों का लेखा-जोखा करके देख लिया है और पाया है— बीजेपी धड़ल्ले से बढ़ेगी, लेकिन बहुमत के नीचे ही रहेगी. खूब दिलदारी दिखाएँगे तो 77 सीटों में 35-45 सीटें जोड़ लीजिए. मामला यहीं पर चित्त हो जाएगा.
इंडिकेटर्स को पकड़ो
पिछले कई चुनावों में हमारी पत्रकार बिरादरी फ़्लॉप रही है. इसका मूल कारण रहा कि आँख पर प्रचार का भक मारे रहता है. जबकि, संकेत बार-बार सामने से गुजरते हैं. बंगाल में भी संकेत खुलकर मिल रहे हैं. पत्रकार भाइयों और विश्लेषकों से अपील है कि संकेतों को पकड़ लें. क्लारिटी यहाँ भी मिल जाएगी.
- पश्चिम बंगाल में जब सेंटिमेंट ‘माँ, माटी, मानुष’ है, जबकि बीजेपी के सबसे बड़े चेहरे नॉन बंगाली हैं. पीएम मोदी और अमित शाह ही हर जगह यज्ञ ठाने हुए हैं. यह एक बड़ा सेटबैक है.
- कम्युनिकेशन में बड़ा गैप है. बंगाली भाषा में आराम से जनेऊ लड़ाने की गुंजाइश है. “आमी बांगाली”— इतना ही काफ़ी है. बीजेपी के बड़े स्टार प्रचारक इससे महरूम हैं. जबकि, टीएमसी धड़ल्ले सीधा-सपाट कम्युनिकेशन का गेम खेल रही है.
- फुट सोल्जर कहां है??? टीएमसी को आप गरियाइए ये अलग विषय है. गुंडागर्दी तो उनके कार्यकर्ताओं की है. गाँव-गांव में उनके कार्यकर्ता लफंटर हैं. दूसरे पार्टी के कार्यकर्ता खुले में पैर रखने से थरथरा रहे हैं. ऐसे में बिना कार्यकर्ता कैसे पोलिंग करा पाएँगे? हाँ, बांग्लादेश से जुड़े सीमावर्ती इलाक़ों, जंगलमहल, आसनसोल और दुर्गापुर जैसे इलाक़ों में बीजेपी बराबर का टक्कर रखती है.
- बीजेपी की रणनीति मीडिया नैरेटिव बनाकर चुनावी बयार पर सवारी करने की है. पहले चरण की बंपर वोटिंग को अपने हिस्से में जोड़ दिया. अगले ही दिन अमित शाह की प्रेस कॉन्फ़्रेंस भी हो गई. मसलन, पहले चरण के शोर के ज़रिए दूसरे चरण के मतदान को प्रभावित करने की कोशिश.6. पीएम साहब का झालमुढ़ी खाते, तो कभी हावड़ा ब्रिज और हुगली नदी में फ़ोटोग्राफ़ी की तस्वीरें वायरल हो रही हैं. कुल मिलाकर पीएम साहब अपना बंगाल प्रेम सिद्ध करने में लगे हैं. जबकि, ममता बनर्जी इन सब प्रचार से अलग हैं. क्योंकि, उन्हें सिद्ध करने की ज़रूरत नहीं है.
- टीएमसी अंदरूनी तौर पर टीएमसी के नैरेटिव पर चलना. नेताओं का मंगलवार को मछली खाना और ऐलान करना की सीएम बंगाली मीडिया से पढ़ा बंगाली ही होगा.
आँकड़ों को समझो
बंगाल में इलोक्टोरल टूरिज़्म करने वाले नए पत्रकार यदि यहाँ तक अपना मनोविज्ञान दुरुस्त कर लेते हैं, तब आँकड़ों का आँकलन करें. मसलन, ममता बनर्जी की सबसे ज़्यादा ताक़त प्रेसिडेंसी वाला इलाक़ा रहा है. प्रेसिडेंसी बोलो तो- कलकत्ता, हावड़ा, नादिया, उत्तर और दक्षिण 24 परगना. इस क्षेत्र में कुल 111 विधानसभा सीटें हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में टीएमसी को इस डिविज़न से 96 सीटें मिली थीं. जबकि, बीजेपी को मात्र 14. चूँकि, मैंने बंगाल का बहुत शॉर्ट-टाइम दौरा किया. लेकिन, इस इलाक़े को तसल्ली से समझा. टीएमसी का पानी इस क्षेत्र में उतरा नहीं है. हालाँकि, यहाँ पर फ़र्स्ट-टाइम वोटरों में पीएम मोदी को लेकर लोकप्रियता ज़रूर देखने को मिली. कुछ वर्ग नाराज़ भी है, लेकिन डरा हुआ भी है.
कुल मिलाकर दूसरे फ़ेज़ के मतदान में इन सीटों की अहम भूमिका रहने वाली है. प्रत्यक्ष और आँकड़ों के हिसाब से ममता का पलड़ा यहाँ भारी है. अब चूँकि, पहले चरण का मतदान हो गया है. 93 फ़ीसदी हुआ है. यहाँ भी सत्य है कि पहले चरण में बीजेपी घोषित रूप से फाइल में थी. क्योंकि, पिछले विधानसभा चुनाव 2021 में उसे 77 में से 55 के क़रीब सीटें इन्हीं इलाक़ों से मिले थे. इस बार बीजेपी निःसंदेह इन इलाक़ों में अच्छा कर रही है. लेकिन, जी हाँ. यहाँ भी लेकिन है. इस क्षेत्र में एकतरफ़ा वोट नहीं ले जा पाएगी. टीएमसी इस क्षेत्र में फ़ेस टू फ़ेस खड़ी है.
AIMIM और आम जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुमायूं कबीर पहले ही सिमट गए हैं. हुमायूँ कबीर के ऑडियो क्लिप ने काफ़ी डेंट डाल दिया था. ज़मीनी रिपोर्ट ये है कि हुमायूँ सिर्फ़ रेजीनगर के आस-पास ही अपना प्रभाव रखने में कामयाब हुए हैं. ऐसे में सिंपल सी बात अंडरस्टैंड करने वाली हैं. टीएमसी यहाँ से भी सीट निकालेगी.
कुल मिलाकर बहुत सारे पॉइंट्स हैं. जिसके बिनाह पर मैंने अपनी पहली लाइन लिखी हैं. मोबाइल पर टाइप करते करते मेरी उँगलियाँ थक गई हैं. बस ये समझिए कि पश्चिम बंगाल का कुल इतना ही चुनावी लफड़ा है कि बंगाल से दीदी नहीं जा रही. SIR के बावजूद.
अगर यहाँ तक आपने पढ़ लिया है और आगे भी कुछ समझना हो तो कॉमेंट बॉक्स में बता दीजिए. वीडियो बनाकर अलग से डाल दूँगा. वर्ना मैं भी नौकरी-पेशा वाला आदमी हूँ भाई. वेल्ला टाइम इतना नहीं कि बिना पैसा सोशल मीडिया पर लंबा लेख लिखूं. हालाँकि, लिखने का शौक़ रहा है, इसलिए दौड़ती-भागती ज़िंदगी में थोड़ा लिख लेता हूँ.


