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सियासत

माइक म्यूट : संवाद के बिना कैसा लोकतंत्र?

पीयूष बबेले-

ज लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी नीट परीक्षा के बारे में चर्चा करना चाहते थे, लेकिन अध्यक्ष ने पहले तो उनकी बात सुनने से इनकार किया और फिर बाद में उनका माइक म्यूट कर दिया गया।

इसी तरह राज्य सभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने आरोप लगाया कि वह बराबर सभापति का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास करते रहे, इसके लिए काफ़ी देर तक वे हाथ उठाकर खड़े रहे लेकिन अध्यक्ष ने उनकी तरफ़ देखा तक नहीं।

दोनों सदन के नेता प्रतिपक्ष का यह बयान भारत की संसदीय परंपरा के लिए शुभ संकेत नहीं है। संसद की सामान्य परंपरा यह है कि अगर नेता प्रतिपक्ष कोई बात कहना चाहता है तो ना सिर्फ़ उसे बात कहने का मौक़ा दिया जाता है बल्कि उसकी पूरी बात सुनी जाती है। परंपरा तो यहाँ तक है कि सत्ता पक्ष के सांसद इस दौरान हो हल्ला भी नहीं करते। लेकिन कमाल देखिए कि सत्ता पक्ष की बात तो दूर, स्वयं सदन के सभापतिगण विपक्ष के नेता की तरफ़ जानबूझकर ध्यान नहीं दे रहे हैं और उनका माइक म्यूट कर देते हैं।

जिस किसी व्यक्ति को भी लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों के बारे में थोड़ी सी भी जानकारी है वह इतना जानता है कि लोकतंत्र की बुनियाद संवाद में है। जो व्यक्ति विपक्ष में है वह भी अपने संसदीय क्षेत्र के लाखों नागरिकों द्वारा चुनकर भेजा गया है। इस तरह अगर सत्ता पक्ष एक बड़े बहुमत की चुनी हुई आवाज़ है तो विपक्ष भी उससे थोड़े कम बहुमत की चुनी हुई आवाज़ है। सदन में बैठा कोई व्यक्ति ऐसा नहीं है जो अपने संसदीय क्षेत्र में चुनाव हार कर आया हो।

जब विपक्ष का नेता बोलता है तो वह इन चुने हुए लोगों की तरफ़ से देश की बड़ी आबादी के प्रतिनिधि के हैसियत से बात करता है। इसी तरह जब अध्यक्ष के माध्यम से सदन का नेता विपक्ष के नेता की बात सुनता है तो एक तरह से देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा दूसरे थोड़े छोटे हिस्से की बात सुन रहा होता है।

अगर समाज के चुने हुए प्रतिनिधि एक दूसरे की बात नहीं सुनेंगे तो फिर फ़ैसला संवाद की जगह संघर्ष से होने लगेगा। मानव जाति के 5000 साल के इतिहास में लोकतंत्र का रास्ता इसलिए निकलकर आया कि मानव सभ्यता ने इस बात को भली भाँति समझा कि तलवार के ज़ोर पर या बौद्धिक पाखंड के ज़ोर पर या आर्थिक असमानता के आधार पर जो फ़ैसले लादे जाते हैं वे अंततः मानव कल्याण के लिए अच्छे साबित नहीं होते। इसलिए लंबी प्रक्रिया के बाद अंततः मानव जाति लोकतंत्र की प्रक्रिया पर पहुँची जहाँ बाहुबल, धनबल या हथियार के बल के स्थान पर संवाद और तर्क के आधार पर सच्चाई को खोजने का प्रयास किया गया।

पंडित नेहरू ने पहले संविधानसभा, फिर राष्ट्रीय सरकार और उसके बाद चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार तीनों काल खंड में संवाद की इस परंपरा को क़ायम रखा। अगर आप उस समय की डिबेट ग़ौर से देखें तो मामूली से मामूली प्रस्ताव तक पर लंबी लंबी बहस हुआ करती थी और पंडित नेहरू सदन के नेता की हैसियत से कई कई दिन तक विपक्ष की बात सुना करते थे। अगर संख्या बल के लिहाज़ से देखें तो उस समय की अलग अलग विपक्षी पार्टियों के पास कांग्रेस पार्टी की तुलना में दो पर्सेंट से 10 पर्सेंट तक सीट हुआ करती थी। ज़ाहिर है पंडित नेहरू और कांग्रेस के पास प्रचंड बहुमत था और जो भी प्रस्ताव वह सदन में रख रहे थे उसका पास होना पहले से ही तय था। फिर भी पंडित नेहरू कभी दो सांसदों वाली पार्टी तो कभी पाँच सांसदों वाली पार्टी के नेताओं को कई घंटे तक बोलने का मौक़ा सदन में दिया करते थे। उनके लिए बहुमत सरकार चलाने का मध्यम था विपक्ष की सीमित आवाज़ को बहुमत के आंकड़े से कुचल देने का हथियार नहीं था। हो सकता है कि बहुत कम सीट होने के बाद विपक्ष का नेता कोई सही बात बोल दे या देश हित की बात बोल दे, जो सत्ता पक्ष से अधिक ज़िम्मेदारी वाली हो।

दूसरी बड़ी बात यह होती है कि जब कोई प्रस्ताव आम सहमति की जगह बहुमत के बल पर थोप दिया जाता है तो विपक्ष और उसके माध्यम से जनता के एक वर्ग में ग़ुस्सा पनपता है। यह ग़ुस्सा यह विरोध समाज में अलगाव के बीज बोता है। महात्मा गांधी ने जो आदर्श भारत के सामने रखा है उसमें उन्होंने हमेशा कोशिश की कि कोई भी प्रस्ताव बहुमत के बजाय आम सहमति से पास हो। आप कांग्रेस के अधिवेशन का इतिहास पढ़ें तो पाएंगे कि महात्मा गांधी ने 400 के मुक़ाबले चार का विरोध भी अगर हुआ तो उन चार लोगों से संवाद करने की कोशिश की और चाहा कि वे भी तार्किक रूप से उस प्रस्ताव से सहमत हो जाए। अक्सर विरोध करने वाले गांधी जी से सहमत हो जाया करते थे लेकिन जब कभी वह सहमत नहीं भी होते थे, तब भी उन्हें बात रखने का जो मौक़ा दिया जाता था, उनकी असहमति को तबज्जो दी जाती थी, उससे उनके मन में कटुता पनपने की कम से कम गुंजाइश रह जाती थी।

इसी गुंजाइश के बल पर भारत ने 550 से अधिक रियासतों का भारतीय संघ में विलय कराया था, भाषा, क्षेत्र, संप्रदाय, जाति, आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे हल किए थे।

संसद कोई युद्धक्षेत्र नहीं है, जहाँ बहुमत के बल पर अल्पमत को कुचल दिया जाए। संसद तो भारत की सभी नागरिकों की आम सभा है, जहाँ मिल बैठकर भारत के आगे की तस्वीर बनायी जानी है। इसलिए जो लोग विपक्ष को अनसुना और अनदेखा कर देना चाहते हैं वे कितने ही बड़े संवैधानिक पद पर बैठे हों, इतिहास उन्हें लोकतंत्रहंता के रूप में याद करेगा।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम कमलनाथ के मीडिया सलाहकार हैं।

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