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महिला पत्रकारों के सामने डिजिटल हिंसा बड़ी चुनौती है!

अमरपाल सिंह वर्मा-

पत्रकारिता का मकसद होता है सच को सामने लाना और पीड़ितों की आवाज को ताकत देना लेकिन जब वही पत्रकार खुद हिंसा और डर का शिकार बनने लगें तो इसे केवल पत्रकारिता के लिए ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी मानी जानी चाहिए। पूरी दुनिया में महिलाओं को डिजिटल हिंसा का शिकार बनाया जा रहा है लेकिन अब वह महिला पत्रकार सबसे ज्यादा निशाने पर हैं, जो सामान्य महिलाओं की आवाज उठाती हैं।

संयुक्त राष्ट्र की संस्था संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की हाल में आई रिपोर्ट में इस खतरे की गंभीरता को उजागर किया गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में तीन-चौथाई महिला पत्रकारों को ऑनलाइन हिंसा का सामना करना पड़ा है। हर चार में से एक महिला पत्रकार को शारीरिक हमले या जान से मारने की धमकी मिली है। अब यह हिंसा केवल ट्रोलिंग या गालियों तक सीमित नहीं रही। एआई के जरिए डीपफेक, डॉक्सिंग और लैंगिक दुष्प्रचार जैसे नए हथियारों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

जाहिर है, इसका उद्देश्य महिला पत्रकारों को डराना, चुप कराना और उनकी साख को खत्म करना है। ऐसे लोग चाहते हैं कि महिला पत्रकारों को इस तरह भयभीत और हतोत्साहित कर दिया जाए जिससे वह अपना काम ठीक से न कर पाएं। वह आम महिलाओं की आवाज को बुलंद न कर पाएं। यूनेस्को ने चेताया है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर शुरू होने वाली यह हिंसा अब वास्तविक दुनिया में भी दिखने लगी है।

हाल के एक अध्ययन में पाया गया है कि 14 प्रतिशत महिला पत्रकारों को ऑनलाइन धमकियों के परिणामस्वरूप असली जीवन में हिंसा झेलनी पड़ी है। बड़ा सवाल है कि आखिर महिला पत्रकार ही क्यों निशाने पर हैं?

दरअसल, महिला पत्रकार ही आम महिलाओं पर होने वाले अन्याय, उनके साथ हो रही घरेलू, सावर्जनिक और डिजिटल हिंसा के मामले उजागर करती हैं। पीड़ित महिलाएं भी पुरुषों के बजाय महिला पत्रकारों के समक्ष अपनी बात को खुलकर कह पाती हैं। महिला पत्रकार लैंगिक हिंसा, सत्ता के दुरुपयोग या असमानता जैसे मुद्दों पर जब स्टोरी करती हैं तो यह न केवल पीड़ित महिलाओं की आवाज को बुलंद करती हैं बल्कि वह उन फासीवादी ताकतों को भी ललकारती हैं जो महिलाओं को सीमाओं में बंधे देखना चाहती हैं। इसी कारण महिला पत्रकारों को डराने और बदनाम करने की कोशिशें की जा रही हैं।

यह केवल ऑनलाइन समस्या नहीं है। ऑनलाइन हिंसा और ऑफलाइन हिंसा के बीच गहरा संबंध है। डिजिटल दुनिया अब वास्तविक हिंसा की तैयारी का मैदान बन चुकी है। एआई तकनीक ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है। डीपफेक के जरिए महिला पत्रकारों की फर्जी वीडियो या तस्वीरें बनाकर सोशल मीडिया पर फैलाना आम हो गया है। डॉक्सिंग के जरिए उनकी निजी जानकारी उजागर की जाती है, जिससे उनका और उनके परिवारों का असुरक्षित महसूस करना स्वाभाविक है।

यह पहला मौका नहीं है, जब इस तरह की रिपोर्ट सामने आई है। इससे पहले विश्व प्रेस स्वतंत्रता सम्मेलन 2020 के दौरान प्रकाशित एक स्नैपशॉट रिपोर्ट में भी यह सब उजागर हुआ था। स्नैपशॉट रिपोर्ट के अनुसार एक सर्वेक्षण में उत्तर देने वाली 73 प्रतिशत महिला पत्रकारों ने अपने कार्य के दौरान ऑनलाइन हिंसा का अनुभव किया। 25 प्रतिशत को शारीरिक हिंसा की धमकियां मिलीं। 18 प्रतिशत को यौन हिंसा की धमकी दी गई जबकि 20 प्रतिशत महिला पत्रकारों के साथ ऑनलाइन हिंसा के संबंध में ऑफलाइन हमला किया गया।

इसी प्रकार यूक्रेन में किए गए सर्वे के मुताबिक 81 प्रतिशत महिला पत्रकारों ने ऑनलाइन हिंसा का सामना किया जबकि जिम्बाब्वे में यह संख्या 63 प्रतिशत रही। हाल में दिल्ली में रात को घर लौट रही एक टीवी चैनल की महिला पत्रकार का कुछ लोगों ने पीछा किया। महिला पत्रकारों को सोशल मीडिया पर लगातार अपमानजनक टिप्पणियों, धमकियों और चरित्रहनन का सामना करना पड़ता है। इससे कई पत्रकार मानसिक दबाव में आकर संवेदनशील विषयों पर बोलना या लिखना छोड़ देती हैं। यह पत्रकारिता और लोकतंत्र दोनों के लिए चिंता का विषय है।

यहां सवाल उठता है कि आखिर इस समस्या का समाधान क्या है? इसके लिए कई कदम उठाने होंगे। सबसे पहले तो डिजिटल या ऑनलाइन हिंसा को संज्ञेय अपराध की श्रेणी में लेकर त्वरित और सख्त कार्रवाई की जरूरत है। सरकारों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए। मीडिया संस्थानों को अपने यहां काम कर रही महिला पत्रकारों की सुरक्षा के लिए ठोस नीतियां बना कर उन्हें कानूनी मदद, मनोवैज्ञानिक परामर्श और सुरक्षा संबंधी प्रशिक्षण देने की पहल करनी चाहिए।

टेक्नोलॉजी कंपनियों को चाहिए कि वह एआई टूल्स को नैतिक सुरक्षा कवच के साथ विकसित करें जिससे डीपफेक जैसे दुरुपयोग को रोका जा सके। समाज में महिला पत्रकारों के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना पैदा करने की जरूरत है क्योंकि उन पर हमला केवल किसी एक व्यक्ति या पेशे पर नहीं हैं बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।

हमें यह सोचना चाहिए कि महिला पत्रकार केवल अपनी सुरक्षा के लिए नहीं लड़ रही हैं बल्कि वे उन करोड़ों महिलाओं की आवाज बनकर खड़ी हैं जिन्हें हर मोड़ पर खामोश कर दिया जाता है। गरीब, ग्रामीण, पीड़ित और शोषित महिलाएं तो पहले से ही चुप हैं और अब अगर महिला पत्रकारों को भी डराकर या चुप कर दिया जाएगा तो यह केवल पत्रकारिता की नहीं बल्कि लोकतंत्र की पराजय होगी। जैसा कि यूनेस्को ने कहा है, मीडिया में महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना, सभी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अनिवार्य है।

यह इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि महिला पत्रकार ही सामान्य महिलाओं की आवाज को उठाने, उन्हें न्याय दिलाने के लिए आगे आती हैं। अगर महिला पत्रकारों को ही हतोत्साहित कर दिया जाएगा तो आम महिलाओं का क्या होगा, समझना कठिन नहीं है। डिजिटल हमलावर बहादुर नहीं हैं। उनका डटकर सामना किया जाना चाहिए। डिजिटल हमलावर सवालों से डरते हैं, इसीलिए तो महिला पत्रकारों को चुप कराने की साजिश कर रहे हैं।

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