World Power Center बदल गया : रूस हुआ नम्बर वन, अमेरिका दूसरे नम्बर पर खिसका

ध्रुव गुप्ता-

पुतिन ही सर्वशक्तिमान ! यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद कुछ ही घंटों में यह साबित हो गया है कि दुनिया में ब्लादिमीर पुतिन ही सर्वशक्तिमान हैं। यूक्रेन असहाय और उसकी संप्रभुता और आज़ादी की रक्षा के बड़े-बड़े दावे करने वाले अमरीकी राष्ट्रपति बाइडेन और नाटो के उनके चेले-चपाटी जोकर जैसे नज़र आने लगे हैं। उनकी विश्वसनीयता अबतक के शायद सबसे निचले स्तर तक पहुंच चुकी है। अफगानिस्तान के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों की एक बार फिर ऐसी भद्द पिटने वाली है जिसके बाद दुनिया का कोई भी देश उनपर भरोसा करने के पहले सौ बार सोचेगा।

इस युद्ध के नतीजे का अनुमान लगाना कठिन नहीं है।इस युद्ध के बाद जो होगा वह यह कि हमारी दुनिया आगे भी एकध्रुवीय ही रहने वाली है, लेकिन उसका नेतृत्व अब शायद अमेरिका के पास नहीं, रूस के पास होगा।

लक्ष्मी प्रताप सिंह-

यूक्रेन पर रशिया का हमला कोई विश्वयुद्ध नहीं है. ये महज विश्व के ताकत केंद्र (World Power Center) का अमेरिका से खिसकना मात्र है. नंबर दो हमेशा ही नंबर एक की जगह लेने को तैयार रहते हैं. चीन और रूस कोरोना के बाद अमेरिका से बेहतर स्थिति में आ चुके हैं.

फ़र्क़ बस इतना है की चीन के पास उसके पडोसी देशों का समर्थन नहीं है इस लिए सीधे आक्रमण नहीं कर रहा. ध्यान दीजिये चीन ने भी कोरोना के दौरान अपनी डिस्प्यूटिड टेरिटरी HongKong को कब्जे में ले लिया, वहां के कानून बलपूर्वक निरस्त कर दिए , जापान के साथ झगड़े वाले येल्लो समुद्र आईलैंड पर कब्ज़ा कर लिया और भारत से सटे गल्वान क्षेत्र पर सेना भेज कर कब्ज़ा कर लिया. भारत के प्रधानमंत्री ने कह दिया कि कोई आया गया नहीं तो युद्ध टल गया.

बड़ी शक्तियां खुद की ताकत बटोर रही हैं. रूस भी वही कर रहा है. शीत युद्ध के दौरान रशिया टूटा है. उसके टुकड़े अमेरिका ने किये हैं. अमेरिका का साथ देने के लिए ब्रिटेन इटली फ़्रांस जैसे विकसित देश हमेशा तैयार रहते हैं. ये दरअसल अमेरिका के पिट्ठू हैं. रूस यूरेशिया उप-महाद्वीप में अपने पिट्ठू बना रहा है. ये कदम रूस की कूटनीति का हिस्सा है. क्रीमिया को अलग किया वहां पुतिन की समर्थक सरकार है वैसी ही सरकारें उन देशों में होंगी जो अभी यूक्रेन से टूट कर बनेगी. भविष्य में वो सरे देश हमेशा रूस का साथ देंगे , हर वैश्विक पटल पर रूस के पक्ष में वोटिंग करेंगे.

अमेरिका इसको रोक ही नहीं सकता क्योंकि उसने भी इराक और अफगानिस्तान पर यूँ ही दादागिरी करते हुए हमला किया था. रूस में लम्बे समय से एक ही शासक पुतिन है जो दुनियां का सबसे ताकतवर नेता है. लम्बे समय तक एक ही सरकार रहने पर विदेश नीति नहीं बदलती और स्टेप बाई स्टेप ज्यादा असरकार हो जाती है. वैसे भी रूस भारत का मित्र देश है और हमारे प्रधानमंत्री जब गलवान पर खुलकर नहीं बोले तो यूक्रेन पर कैसे बोलेंगे. भारत इस दशा में मात्र एक मूक दर्शक है क्योंकि हाथियों की लड़ाई में बाकी जानवर नहीं पढ़ते. हम बस वहां पास पड़ोस के देशों से कोर्डिनेट करके अपने नागरिकों को निकाल लें वही बहुत है. #कालचक्र



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One comment on “World Power Center बदल गया : रूस हुआ नम्बर वन, अमेरिका दूसरे नम्बर पर खिसका”

  • मिस्टर गुप्ता विदेश नीति का ज्ञान ना हो तो मत पेला करो, मोदी और विदेश मंत्रालय है और यूक्रेन का समर्थन कैसे करदे भारत क्या आप जानते है यूक्रेन के बारे में नहीं तो देखिये और जानिए –
    ) यूक्रेन ने कश्मीर मुद्दे पर UNO में भारत के खिलाफ वोट दिया था।
    2) यूक्रेन ने परमाणु परीक्षण मुद्दे पर UNO में भारत के खिलाफ वोट दिया था।
    3) यूक्रेन ने UNO की सिक्योरिटी कौंसिल में भारत की स्थायी सदस्यता के खिलाफ वोट किया था।
    4) यूक्रेन पाकिस्तान को हथियार सप्लाई करता है।
    5) यूक्रेन अल कायदा को समर्थन देता है।
    युक्रेन से भारतीय होने के नाते मुझे कोई भी सहानुभूति नही है। और उसका कारण भी है।
    युक्रेन ने भारत का कभी भी साथ नही दिया। जब हमारे उपर प्रतिबन्ध लगा तो UNO मे उसने प्रतिबन्ध के पक्ष मे वोट किया।
    इसके पास यूरेनियम का भंडार था फिर भी बार बार मांगे जाने पर भी इसने कभी भी देना तो दूर हमारे तत्कालीन PM को टरका दिया। सीधे मुँह बात तक नही किया, जबकि भारत अपनी ऊर्जा के लिए यूरेनियम खोज रहा था।
    अब उसका क्या होता है इसपर मेरा कोई भी मत नही है। हां उसके नागरिको के साथ सहानुभूति अवश्य है। कमज़ोर युक्रेन(जो की अपने आप बना) के साथ वही हो रहा है तो नेहरू जी के समय 1947 से पहले और उसके बाद हुआ। अर्थात विभाजन और देश के सीमा पर अतिक्रमण।
    इसलिए जो लोग यूक्रेन के समर्थन में दुबले हो रहे है उनको समझना चाहिए कि यूक्रेन हमारा एक दुश्मन है जिसने कभी भारत का साथ नही दिया। इसके अतिरिक्त यूक्रेन का वर्तमान राष्ट्रपति एक कामेडियन एक्टर हैं,जिसे कूटनीति और देश चलाने का बिल्कुल भी अनुभव नहीं है। जो अमरीका और नाटो के देश अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उसे नचाता है। जब देश का नेतृत्व ऐसे हाथों में हो तो देश की जनता का यही हश्र होगा। वैसे हमारे यहां भी कामेडियन, एक्टर, मसखरे, कठपुतली, जैसे राजनेता नेतृत्व में होते हैं तो उन का यही होता है चाहे वह राज्य का मुख्यमंत्री हो या देश का प्रधानमंत्री

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