
राज्यपाल, उपराष्ट्रपति के बाद अब राष्ट्रपति भी सरकार का कहा करती दिख रही हैं। संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता को सरकार की सर्वोच्चता से कड़ी टक्कर मिल रही है और पद पर बैठे लोग न सिर्फ समर्पण करते जा रहे हैं, सरकार या संघ परिवार की नीतियों के प्रचारक भी बन गये लगते हैं। सरकार के दबाव में नहीं आने वाले जजों को परेशान करने और घेरे में लेने के लिये किये गये उपाय सर्वविदित हैं, तब भी!
संजय कुमार सिंह
आज के अखबार भी सरकार की प्रशंसा वाली खबरों से भरे हुए हैं। पाकिस्तान को हुए नुकसान की खबर तो है, भारत को हुए नुकसान की चर्चा नहीं है। यह खबर भी नहीं कि सरकार नुकसान की बात नहीं कर रही है। पाकिस्तानी चैनल बंद कर दिये गये हैं सो अलग। निष्पक्ष पत्रकारिता करने वालों को डराने, धमकाने, खरीदने के उदाहरण गिनाने की जरूरत नहीं है। यह सब तब जब युद्ध में जीत- हार होती ही है। नुकसान होता है, स्वीकार किया जा चुका है। यहां युद्ध गैर जरूरी था और अचानक किसी तीसरे ने युद्धविराम का दावा कर दिया और जो स्थितियां हैं उससे साफ है कि युद्ध का मकसद वह नहीं है जो बताया जा रहा है और उसके पूर्ण होने की कोई चर्चा नहीं है। सरकार की प्रशंसा के साथ पाकिस्तान की कमजोर स्थिति बताने वाली खबर भी है। इससे जाहिर है कि सरकार का मकसद चुनाव है। यह गलत न हो पर खबर तो है। खबरें नहीं छप रही हैं जैसा मैंने कल यहां लिखा था। ऐसे में आज के अखबारों की चर्चा से पहले टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड जरूरी है। मुझे लगता है कि यह बड़ी खबर है। इस खबर के अनुसार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल पूछे हैं और अदालत की राय मांगी है। खबर का शीर्षक है, क्या सुप्रीम कोर्ट विधेयकों पर राज्यपाल, राष्ट्रपति की सहमति के लिए समय सीमा तय कर सकता है? मुझे लगता है कि समय सीमा का सवाल ही गैर जरूरी है। कोई भी काम एक निश्चित समय में किया ही जाना चाहिये या कह दिया जाना चाहिये कि करने लायक नहीं है, नहीं किया जायेगा। अकारण अनंत काल तक काम नहीं होना अपने आप में गलत है। कोई व्यवस्था ऐसी नहीं हो सकती है।
राज्यपाल और राष्ट्रपति के पास ही नहीं, अदालतों में सुनवाई की समय सीमा होनी चाहिये और समय सीमा नहीं होने का मतलब यह नहीं हो सकता है कि अनंत काल तक न्याय न हो। सरकार को इस पर ध्यान देने की जरूरत है ताकि लोगों को समय पर न्याय मिले। वैसे भी देर से मिला न्याय, न्याय नहीं होता और तमाम निर्दोष के वर्षों जेल में सड़ने के उदाहरण हैं। ऐसे समय में राष्ट्रपति आम जनता को छोड़कर अपने अधिकार के लिए चिन्ता कर रही हैं तो यह निरर्थक है या राजनीति है। आइये देखें कैसे? सबसे पहले तो सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है वह सलाह है आदेश नहीं। सरकार ने उसपर राजनीति की है। जहां तक राष्ट्रपति की बात है, सुप्रीम कोर्ट की सलाह (या आदेश) को नहीं मानतीं, क्या बिगड़ने वाला था। या समय सीमा के अंदर काम खत्म करने में क्या बुराई है। सुप्रीम कोर्ट से राष्ट्रपति का सवाल सुप्रीम कोर्ट को गैर जरूरी काम में लगाने जैसा है। हम जानते हैं कि फैसले समय पर नहीं होते हैं। महंगे हैं सो अलग समस्या है। इसपर ध्यान देने की बजाय अदालतों में न्याय के नाम पर जो हो रहा है (और सरकार करवा रही है) उसे भी हम जानते हैं, देख रहे हैं। अदालतों की आजादी और व्यवस्था की खामी के दुरुपयोग के भी उदाहरण हैं और लापरवाही या अव्यवस्था में देरी तो स्वाभाविक है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल के मामले में कार्रवाई की और राष्ट्रपति को सलाह दी तो वह आदेश नहीं था। एक स्वाभाविक कार्य था। राजनीतिक कारणों से उसे मुद्दा बनाया गया और अब राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट से पूछकर उसी राजनीति को आगे बढ़ाया है। भातीय संविधान में राष्ट्रपति से ऐसी राजनीत की अपेक्षा नहीं की गई है। संभव है, सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा वह राजनीतिक दबाव से निपटने के लिए कहा हो पर यह नहीं भी हो तो राष्ट्रपति को वास्तविकता नहीं मालूम हो यह संभव नहीं है। ऐसा है, तो और बुरा है। अभी वह मुद्दा नहीं है।
कहने की जरूरत नहीं है कि किसी अध्यादेश को वे अनंत समय तक रोक भी लें तो बात नहीं बनती है। उन्हें गैर जरूरी अध्यादेश को खारिज कर देना चाहिये घोषित रूप से। संविधान संभवतः ऐसा अधिकार नहीं देता है। ऐसे में समय सीमा नहीं है तो कौन तय करेगा या इसकी जरूरत है अथवा नहीं जैसे तकनीकी मामले निपटाना राष्ट्रपति का काम नहीं है। देश जानता है कि राष्ट्रपति का चुनाव कैसे होता है। वैसे भी, राष्ट्रपति सरकार या मंत्रिमंडल की सलाह पर काम करते हैं तो यह माना जायेगा कि यह सवाल राष्ट्रपति का नहीं, सरकार का है। अगर ऐसा है तो मामला राष्ट्रपति को आदेश या सलाह देने का नहीं, सरकार और सुप्रीम कोर्ट की सर्वोच्चता का हो जाता है। संदर्भ से तो यह बिल्कुल स्पष्ट है। इसके अलावा, नरेन्द्र मोदी की सरकार देश की तमाम स्वायत्त संस्थाओं को नियंत्रण में लेने के बाद सुप्रीम कोर्ट पर भी दबाव बनाती रही है। राज्यपाल के जरिये मनमानी की पोल खुली तो उसकी स्वायत्तता को मुद्दा बनाया गया। जजों की नियुक्ति के कॉलेजियम सिस्टम का विरोध सबको पता है। उसमें उपराष्ट्रपति कूद पड़े थे। दिल्ली हाईकोर्ट के जज के यहां नकदी मिलने की खबरों पर भी व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश की गई। हाल में कैमपेन फॉर जूडिसियल अकाउनटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स ने सुप्रीम कोर्ट के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना के निर्णयों का स्वागत किया था। चुनाव के समय अरविन्द केजरीवाल को जमानत लेवल प्लेइंग फील्ड का मुद्दा था, बिना मामला उन्हें जेल में रखकर बदनाम किया गया और उनकी पार्टी की हार में इसकी भूमिका हो सकती है। यह सब चुनाव आयोग को देखना था। नहीं देखने पर सुप्रीम कोर्ट ने देखा तो उसपर भी टिप्पणी की गई जबकि वह राजनीतिक व्यवस्था का भाग नहीं है और स्वायत्त है। सरकार चाहती है कि अदालतों पर नियंत्रण रखकर विरोधियों को परेशान करने का अधिकार भी मिल जाये। इसके लिए पीएमएलए कानून तो है ही उसकी वैधता पर सुनवाई कैसे टली यह खबर है और लोग जानते हैं।
दूसरी ओर, अदालत और जजों की आलोचना, अपेक्षित फैसले की उम्मीद और उसके लिये प्रत्यक्ष-परोक्ष दबाव के मामले दिखते रहते हैं। ऐसे में सरकार चाहती है कि उसकी सर्वोच्चता स्थापित हो जाये। कॉलेजियम सिस्टम का विरोध, जजों की आलोचना इसी सब का भाग है। अखबार यह सब नहीं बताते या वैसे नहीं बताते जैसा मुद्दा है। दूसरी ओर हाल में सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों की संपत्ति की घोषणा, न्यायाधीशों की नियुक्तियों का विवरण और न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के मामले से निपटने के तरीके को सार्वजनिक करके पारदर्शिता लाने की दिशा में बड़ा काम किया है। पर यह खबर वैसे नहीं छपी जैसे सरकार का प्रचार करने वाली खबरें छपती हैं। बहुत साफ है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इको सिस्टम ऐसी व्यवस्था करता जा रहा है जिसमें भाजपा कभी चुनाव हारे ही नहीं। जहां तक निर्णय लेने के लिये दिये जाने वाले समय का सवाल है, प्रधानमंत्री की डिग्री से संबंधित मामलों में कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है। आरटीआई के जवाब नहीं मिलते और चुनाव आयोग को कौन नहीं देख रहा है। सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र सरकार का मामला तो ऐतिहासिक था और उद्धव ठाकरे ने स्तीफा देकर व्यवस्था की पोल खोल दी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह साबित भी हुआ लेकिन राज्यपाल को जगा कर शपथग्रहण कराने वाले लोग उनके अधिकार के लिए चिन्तित नजर आयें तो समझना मुश्किल नहीं है कि क्या हो रहा है। जहां तक राज्यपाल की बात है, अधिकार की बात करें तो राज्यपाल बन पायेंगे? ऐसे में राष्ट्रपति की चिन्ता न जनहित में है ना देशहित में है। इसलिए यह बड़ी खबर है और जनभावना को बदल सकती है इसलिए अखबारों में प्राथमिकता नहीं मिली है यह शर्मनाक है। आज यह खबर दूसरे अखबारों के पहले पन्ने पर नहीं है – यह देश की पत्रकारिता का हाल बताने के लिए काफी है। इमरजेंसी बुरी थी लेकिन तब जो खबर सेंसर हो जाती थी उसकी जगह खाली छोड़ दी जाती थी। आज अगर अखबारों ने पहले पन्ने पर जगह खाली छोड़ी होती तो मैं (और दूसरे बहुत सारे लोग) समझ जाते कि कोई खबर सेंसर हो गई है। अब अखबार ऐसा नहीं करते तो समझिये कि स्थिति इमरजेंसी से बेहतर है या बुरी?
आज की दूसरी बड़ी या महत्वपूर्म खबरों में एक इंडियन एक्सप्रेस में है। इसके अनुसार आईएईए ने कहा है कि पाकिस्तान में किसी भी परमाणु संयंत्र से कोई विकिरण रिसाव या उत्सर्जन नहीं हुआ है। वैश्विक परमाणु निगरानी संस्था, अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने कहा है कि भारत के साथ सैन्य संबंधों में वृद्धि के बाद पाकिस्तान में किसी भी परमाणु सुविधा से “कोई विकिरण रिसाव” नहीं हुआ है। इंडियन एक्सप्रेस के एक प्रश्न के उत्तर में वियना स्थित वैश्विक परमाणु निगरानी संस्था का यह जवाब भारतीय वायु सेना के बयान से मेल खाता है। इसमें कहा गया था कि भारत ने पाकिस्तान के किराना हिल्स में किसी भी लक्ष्य को निशाना नहीं बनाया है, जहाँ कथित तौर पर कुछ परमाणु प्रतिष्ठान हैं। भारत सरकार की वीरता बताने के लिए सरकार समर्थकों ने व्हाट्सऐप्प पर और वैसे भी इस खबर को इतना फैला दिया था कि इंडियन एक्सप्रेस के सवाल के जवाब में आईएईए के प्रवक्ता ने कहा, “आप जिन रपटों का उल्लेख कर रहे हैं, हम उनसे अवगत हैं। आईएईए के पास उपलब्ध जानकारी के आधार पर, पाकिस्तान में किसी भी परमाणु सुविधा से कोई विकिरण रिसाव या उत्सर्जन नहीं हुआ है।” उनसे पूछा गया था कि क्या किसी परमाणु घटना या रिसाव को आईएईए के घटना और आपातकालीन केंद्र के संज्ञान में लाया गया है। जाहिर है, व्हाट्सऐप्प वाले अंकल लोग ऐसे प्रचारक हैं कि उन्हें तथ्यों से तो मतलब नहीं ही होता है यह जानने की चिन्ता भी नहीं थी कि विकिरण का प्रभाव भारत में लोगों तक हो सकता है या नहीं।
गैर जरूरी युद्ध में भारत की जीत और पाकिस्तान के बर्बाद हो जाने की कहानियां सुनाने में व्यस्त भारतीय मीडिया यह भी भूल गया था कि बीएसएफ का एक जवान पाकिस्तान के कब्जे में है। आज अमर उजाला की लीड बता रही है कि उसे 21 दिन बाद रिहा किया गया है। बालाकोट हमले के समय भारतीय पायलट के पाकिस्तान के कब्जे में चले जाने और उसे छोड़ दिये जाने पर मोदी सरकार के प्रभाव और हस्ती का प्रचार याद हो तो कल्पना कीजिये कि अब ये सब कैसे और क्यों हुआ होगा। खबर नहीं छपी क्योंकि 21 दिन एक ही खबर तो नहीं ही छापी जा सकती है। प्रचार दिन भर किया जा सकता है। नवोदय टाइम्स ने टॉप पर आठ कॉलम में बताया है कि पाकिस्तान की वायुसेना को कितना नुकसान हुआ है, अब सामने आ रहा है। इसके लिये फोटो भी है। पहले घूम चुकी फोटो के साथ बताया गया था, ब्रह्मोस (मिसाइल) के प्रभाव के बाद नूर खान वायु सेना अड्डे पर 40 फीट से अधिक गहरा गड्ढा हो गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि निकटवर्ती परमाणु ईंधन भंडार हिल गया होगा। क्योंकि रेडियो सक्रिय तत्वों का रिसाव हुआ होगा। इस भाषा के बावजूद भक्तगण कहते रहे कि गड्ढा तो पक्का हुआ है। रिसाव की बात नहीं माननी है तो मत मानो। द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, पाकिस्तान ने बंगाल के बीएसएफ जवान को रिहा किया। अखबार ने बताया है कि भारत ने भी पाकिस्तानी रेंजर को छोड़ा है। अमर उजाला में यह सूचना नहीं दिखी, प्रमुखता से तो नहीं ही है। वहां यह बताया गया है, पत्नी बोली पीएम मोदी मेरा सुहाग वापस ले आये।
हिन्दुस्तान टाइम्स की सेकेंड लीड 31 बागियों (नक्सलियों) के मारे जाने की खबर है। यहां बरामद की गई दो चीजें दिलचस्प हैं – 12000 किलो खाद्य पदार्थ और राशन, प्रचार सामग्री तैयार करने के लिए प्रिंटर। जो आपत्तिजनक हो सकता है वह 818 बैरल ग्रेनेड लांचर शेल्स है। खबर के अनुसार कमांड मुख्यालय ध्वस्त किया गया है नक्सलियों के कब्जे से पहाड़ी छुड़ाई गई है। लेकिन बरामद सामानों से तो नहीं लगता है कि इनके दम पर कब्जा रहा होगा। जाहिर है, या तो कब्जे का आरोप गलत है या फिर बरामदगी उड़ा दी गई है। कोई देखने वाला नहीं है, कोई सुनने या जवाब देने वाला नहीं है। आम आदमी, खास कर गरीबों का हाल कोई पूछने वाला नहीं है ना किसी की जवाबदेही है ना जान की कोई कीमत। कुल मिलाकर 31 निहत्थों को मार दिया गया है। यह तीन हफ्ते का अभियान था। पूरी खबर सरकारी विज्ञप्ति से लिखी गई है। कोई सवाल-जवाब नहीं है और लंबी सी खबर में यह नहीं बताया गया है कि मरने वाले में कितने स्त्री पुरुष थे या किन पर क्या आरोप था। खबर में लिखा है कि वर्दी सिलने की ‘मशीन’, हथियार बनाने की तकनीकी इकाई और दवाइयां भी बरामद हुई हैं। पता नहीं वास्तविकता क्या है पर खबर जितना बताती है उससे ज्यादा सवाल खड़े होते हैं। आखिर 31 लोगों को मार दिये जाने का कारण तो होना ही चाहिये।
दि एशियन एज ने मध्य प्रदेश के मंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की खबर को पांच कॉलम में छापा है। आप जानते हैं कि भाजपाई मंत्री ने कर्नल सोफिया कुरैशी के लिए क्या कहा था। अब उसके लिए माफी मांग रहे हैं लेकिन नीतिगत रूप से पार्टी का स्टैंड क्या है यह उजागर नहीं किया गया है और तो और हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद ना तो मंत्री के खिलाफ कार्रवाई की खबर है ना पार्टी ने निन्दा की है या कोई कार्रवाई की है। दूसरी ओर, सुरक्षा की व्यवस्था हो गई – यह तो आप जानते ही हैं। खबर यह भी है कि कांग्रेस ने संबंधित मंत्री को बर्खास्त करने की मांग की है। कायदे से इसकी जरूरत ही नहीं पड़नी चाहिये थी और बयान के बाद ही यह सब हो जाना चाहिये था पर हाईकोर्ट के स्वतः संज्ञान लेने पर भी एफआईआर दर्ज होना न्यूनतम कार्रवाई है और अखबारों ने उसका विवरण देने या कोई कार्रवाई नहीं हुई जैसी खबर नहीं दी है। द हिन्दू की लीड भी भारतीय जवान को रिहा किये जाने की खबर है। सेकेंड लीड का शीर्षक है, भारत दस्तावेजों के बिना पकड़े गये संदिग्ध बांग्लादेशियों को वापस कर रहा है। एक तरफ शेख हसीना को शरण और दूसरी ओर दस्तावेज नहीं होने पर वापस भेजना दोनों तरह की अति है लेकिन कोई पूछने वाला नहीं है।


