साहस हो तो यशवंत जैसा!

एक जमाने में लखनऊ में एक बड़े प्रकाशक थे पंडित दुलारेलाल भार्गव। उन्होंने मशहूर साहित्यकार भगवती चरण वर्मा को एडवांस दिया, इस हिदायत के साथ कि उपन्यास महीने भर में मिल जाना चाहिए। वर्मा जी आलस कर गए और छह महीने तक उधर हिरबे नहीं किए। एक दिन वे हज़रत गंज में पंडित जी को दिख गए। पंडित जी ने उन्हें पकड़ लिया, बोले आज ही से लिखना शुरू कर दो। वे उन्हें एक होटल में बंद कर आए।

अब बेचारे वर्मा जी ने खूब हाथ-पाँव मारे, लेकिन एक न चली। मारे ग़ुस्से के उन्होंने लिखा, कि दुलारेलाल भार्गव एक नम्बर के कंजूस, लेखक का खून चूसने वाला प्रकाशक है। लेखक को पैसा नहीं देते, गुंडई ऊपर से करते हैं, आदि-आदि लिख कर प्रेस को भेज दिया। कंपोज़ीटर ने कम्पोज़ कर दिया। प्रूफ़रीडर ने पढ़ा तो सन्न! भाग कर वह पंडित जी के पास पहुँचा, उन्हें वह कापी दिखाई। पंडित जी ने देखा और बोले जाने दो, भगवती चरण वर्मा की नई किताब के आत्मकथ्य में यह भी छपेगा।

बात वर्मा जी तक पहुँची, तो उन्हें बड़ी लज्जा आई। पंडित जी के पास आए, बोले वह प्रूफ़ फाड़ दीजिए। पंडित जी ने कहा, क्यों? आप इतने बड़े लेखक हो, लिख रहे हो तो सही ही लिख रहे हो। वर्मा जी ने माफ़ी माँगी, और बात आई-गई हो गई। यह क़िस्सा मुझे त्रिलोचन शास्त्री जी ने बताया था, जब वे दिल्ली के यमुना विहार में रहते थे और एक दिन दोपहर में भोजन के वक्त मेरे घर आए थे।
अब आज का क़िस्सा सुनिए। भड़ास के मालिक श्री यशवंत सिंह।

मस्त और बिंदास तथा बेढ़ब आदमी हैं। उन्होंने ‘जी न्यूज़’ के विरुद्ध अपनी वेब साइट में कुछ छाप दिया, तो जी न्यूज़ के कुछ लोगों ने उन्हें ‘एक बोतल दारू में बिक जाने वाला आदमी’ बता दिया। यशवंत ने इसका बिल्कुल बुरा नहीं माना और जस का तस छाप दिया। और इसे वायरल कर दिया। अब यह लिखने वाले सज्जन का क्या हाल हुआ होगा। साहस और ईमानदारी हो तो यशवंत जैसी।

जनसत्ता, अमर उजाला समेत कई अखबारों में संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की एफबी वॉल से.

कुछ टिप्पणियां-

Deepak Chimnani उन्होंने यह भी लिख जोड़ा कि एक बोतल तो दूर मैं तो एक पौव्वा में……. वाक़ई शानदार ईमानदार बेबाक़ व्यक्तित्व है।

Abhi Nov अपने यशवंत दद्दा के इतना कोई हार्डीच नही है😎

Sanjay Sharma सही कह रहे है , इस मामले में यशवंत जी का कोई सानी नहीं !

Sumitra Ganguly मैंने सबसे पहले भड़ास वेबसाइट को ही पढ़ना शुरू किया था। फिर उसमें जिनके फेसबुक लेख होते थे उनका लिखा और पढ़ने का मन किया। लेकिन बिना खुद का फेसबुक अकाउंट बनाये उनके अकाउंट खुल नहीं रहे थे। इसलिए मजबूरी में अपना भी फेसबुक अकाउंट खोलना पड़ा।आज जो मुझे इतने बेहतरीन लेखकों को पढ़ने का सौभाग्य मिला है इसका श्रेय पूरी तरह यशवंत जी को जाता है।

Krishna Kumar Sharma जी हां दुलारे लाल भार्गव जी का बहुत बड़ा योगदान है हिंदी साहित्य की सेवा करने के क्षेत्र में । जहां तक मुझे याद आ रहा है वो तब एक बहुत ही उच्च स्तरीय पत्रिका सुधा का प्रकाशन भी करते थे। मैं उनके उत्तराधिकारियों से लखनऊ में मिला हूं। उन्हीं के दौर में लखनऊ के मुंशी नवल किशोर प्रेस से माधुरी पत्रिका भी छपती थी, जिसके संपादक मुंशी प्रेम चंद थे। बाद में सुधा से आए रूप नारायण पांडेय जी ने भी इसका संपादन किया। मेरे पास आज भी है उस ज़माने की ये लाज़वाब पत्रिका।

Vimal Kumar माधुरी के मालिक थे जिसमें प्रेमचंद शिवपूजन सहाय आदि काम करते हैं।गंगा पुस्तक माला से ही रंगभूमि छपी थी।

Krishna Kumar Sharma जहां तक मुझे याद आ रहा माधुरी के मालिक थे मुंशी नवल किशोर जी के पुत्र विष्णु नारायण भार्गव! दुलारे लाल भार्गव जी इनके भतीजे थे और शुरू में माधुरी का संपादन भी इन्होंने ने है किया। बाद में इसके सहायक संपादक मुंशी प्रेमचंद संपादक बने।

Vimal Kumar सम्पादक केरूप में उनका नाम था पर वे मालिक भी थे या प्रबंध सम्पादक

Krishna Kumar Sharma माधुरी से हटकर दुलारे लाल भार्गव जी ने सुधा का प्रकाशन किया । और बाद में अपनी पत्नी गंगा देवी के नाम से गंगा पुस्तक माला का भी शुभारम्भ किया जिसमें उन्होंने निराला जी, रामकुमार वर्मा, अयोध्या प्रसाद “हरि ओध”, भगवती चरण वर्मा, श्री नारायण चतुर्वेदी और अमृतलाल नगर जी आदि को जोड़ा और अनेक महत्वपूर्ण पुस्तकों का प्रकाशन किया। गंगा पुस्तक माला का स्वामित्व दुलारे लाल भार्गव जी के ही पास था । माधुरी या इसकी प्रकाशन संस्था मुंशी नवल किशोर प्रेस से गंगा पुस्तक माला का कोई लेना देना नहीं था। 1858 में स्थापित लखनऊ के मुंशी नवल किशोर प्रेस को उस ज़माने में पेरिस के एलपाइन प्रेस के बाद दुनिया का सबसे बड़ा छापाखाना होने का रुतबा हासिल था।

Krishna Kumar Sharma जी नहीं मुंशी प्रेम चंद जी नौकर थे। बतौर संपादक उन्हें 30रुपए महीने की तनख्वाह मिलती थी उस वक़्त। यहां तक कि मैंने एक पावती रसीद में मुंशी प्रेम चंद के दस्तखत भी देखे हैं 1985 में जो इस प्रेस के उत्तराधिकारी रंजीत भार्गव जी ने दिखाए थे।

Vimal Kumar नवल किशोर प्रेस पर अंग्रेजी में किताब आई है मैंने पढा नही पर प्रेमचंद को नियुक्त दुलारेला भर्गव ने किया था

Vimal Kumar कॄष्ण बिहारी मिश्र भी थे माधुरी में?आपको अधिक पता होगा

Krishna Kumar Sharma जी हां थे।

Krishna Kumar Sharma जी प्रेम चंद जी दुलारे लाल भार्गव जी के सहायक हुआ करते थे माधुरी में।

Vir Vinod Chhabra यशवंत सिंह जी को सैल्यूट।

Rajesh Shivpuri यशवंत जी को सलाम

Vikas Rajan Jabaradast dileri…. Salam hai

Virendra Yadav दुलारे लाल भार्गव जी को मैंने देखा सुना है. सन् 70 के शुरुआती दशक में वे कभी कभी साइकिल से अमीनाबाद के कंचना चायघर में आते थे. साथ के झोले में वे बिहारी की तर्ज पर दुलारे सतसई रखते थे, जिसमें बहुत सी रंगीन कलाकृतियां भी छपी थीं. लोग उसकी खूब तारीफ करते थे और उनके पैसे की चाय पीते थे. लेकिन थे वे इतिहास पुरुष प्रेमचंद, निराला सरीखी विभूतियाँ उनके प्रेस में नौकरी कर चुकी थीं. उनके बहुत से किस्से उन दिनों चर्चा में रहते थे.

Kush Chaubey salute bhaiya Yashwant Singh

Sanjay Sharma यही होना चाहिये । हमारे एक चुनाव थे हम खडे़ थे विपक्ष ने कुछ आरोप लगाया परचा बांटा सब उम्मीदवारों के बीच हम अपनी स्पीच देने पहूँचे और वो पर्चा पढ़ दिया और लोगों से ही निर्णय देने को कहा । लोगों ने हमारे पक्ष में हाथ उठा दिये । आप सच्चे हैं तो डरना नहीं चाहिये ।

Umesh Ashu संस्मरण लेखन में आपका कोई जोड नहीं। सादर प्रणाम।


मूल खबर-

‘एक बोतल दारू पर बिकने वाला आदमी है यशवंत!’

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