धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव-
यशस्वी समाजसेवी योगी आदित्यनाथ केवल मुख्यमंत्री नहीं हैं। उत्तर प्रदेश के ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिनकी ओर दिल्ली भी नजर झुकाकर देखती है। समाजसेवा से पहले भी उनका काम आशीर्वाद देना था—जो आज भी है और कल भी रहेगा।
इतना सब कुछ एक साथ होने पर कोई भी व्यक्ति अहंकार में डूब सकता है, परंतु योगी जी में आज भी वह अहंकार दिखाई नहीं देता। इसे देखने के लिए आप यह चित्र देख सकते हैं।
योगी जी से अब तक कुल तीन बार मुलाकात हो चुकी है—दो बार “राष्ट्रपुरुष चंद्रशेखर: संसद में दो टूक (भाग एक और दो)” के लोकार्पण समारोह में। इस कार्यक्रम के आयोजक थे योगी जी के लिए विधान परिषद की अपनी सीट छोड़ने वाले भाई, पूर्व मंत्री श्री यशवंत सिंह।
एक बार लोकतंत्र सेनानी कल्याण समिति के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में मुलाकात हुई, जब हम सेनानी सम्मान राशि में 5,000 रुपये की वृद्धि पर आभार प्रकट करने गए थे।
और चौथी बार—25 जून को। इस अवसर पर यशस्वी मुख्यमंत्री के हाथों उन लोगों को सम्मानित किया जाना था, जो आपातकाल का विरोध करते हुए जेल गए थे। यह कार्यक्रम भारतीय जनता पार्टी द्वारा आयोजित था। इसके संयोजक थे भाजपा के समर्पित सिपाही, विधान परिषद सदस्य माननीय विजय बहादुर पाठक।
अखबारों की मजदूरी छोड़ने के बाद अब मेरा संपूर्ण समय चिकोटी, दो टूक, मेरी राय और पुस्तकों तक सीमित है। प्रयास करता हूँ कि किसी पर व्यक्तिगत टिप्पणी न करूँ, लेकिन कभी-कभी हो जाती है।
सामाजिक जीवन में लोकबंधु राजनारायण ज़िंदाबाद बोलते हुए आया। राष्ट्रपुरुष चंद्रशेखर ने उस उम्र में मुझे मूल पार्टी की ज़िलाध्यक्ष की वह कुर्सी सौंप दी, जिसके लिए यूथ विंग में भी मारा-मारी रहती है।
दो शब्द अपने लिए: सामान्य परिवार में जन्मा। जाति भी कम संख्या वाली थी। बल भी नहीं था। इसलिए सामाजिक जीवन छोड़कर हिंदी अखबारों में मजदूरी करने लगा। ईश्वर की कृपा से कब बड़ा मजदूर बन गया, पता ही नहीं चला। यह बड़प्पन जीने के लिए पैतृक घर तक बेचना पड़ा।
इसी सफर में विजय बहादुर पाठक से भेंट हो गई। वे प्रदेश भाजपा में चुनावी आंकड़ों के अकेले विशेषज्ञ माने जाते थे। इन आंकड़ों को किताब की तरह सहेजकर मेरे जैसे पत्रकारों को भी उपलब्ध कराते थे।
केवल आंकड़े ही नहीं, वे मुझे बड़े भाई जैसा सम्मान भी देते थे… और अब भी देते हैं। आदमी हूँ, इसलिए मैं भी उन्हें छोटे भाई जैसा दुलार देता रहा हूँ।
तीन दिन पहले उनका फोन आया—”कहाँ हैं?”
मैंने कहा—”लखनऊ में।”
उन्होंने कहा—”भारतीय जनता पार्टी 25 जून को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में स्मरण कर रही है। लखनऊ में एक कार्यक्रम है। यशस्वी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी मुख्य अतिथि होंगे। आपको वहाँ रहना है।” मैंने कहा—”रहूँगा।”
लोकतंत्र सेनानी सम्मान को लेकर मैं समाजवादी पार्टी के संस्थापक माननीय मुलायम सिंह यादव का जबरदस्त प्रशंसक रहा हूँ। इसके लिए पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, पूर्व पेंशन मंत्री श्री राजेंद्र चौधरी और पूर्व मंत्री रामगोविंद चौधरी की भी सराहना करता हूँ। यही कारण है कि मुझे ‘प्रो-समाजवादी’ भी माना जाता है।
इसलिए मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि मुझे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी का भी स्नेह मिलेगा।
लोकभवन या विधानभवन मेरे लिए कोई नई जगह नहीं थी। मैं वरिष्ठ पत्रकार अनिल त्रिपाठी को ढूंढ रहा था कि तभी एक आवाज आई—”धीरेन्द्र भैया!”
सामने थे विजय बहादुर पाठक।
मैं जानता हूँ कि विजय बहादुर पाठक अब माननीय विजय बहादुर पाठक हैं, और मैं वही धीरेन्द्र नाथ श्रीवास्तव, जिसे हजरतगंज से बिजनौर लौटने का साधन भी चंद्रशेखर चबूतरा ही देता है।
मुज़फ्फरपुर (बिहार) भाजपा के दो बार ज़िलाध्यक्ष रहे रंजन कुमार अक्सर कहते हैं—”संपादक जी, यह भाजपा है… यहाँ विनम्रता और आत्मीयता हर मोड़ पर हाजिर मिलती है।”
लोकतंत्र सेनानी सम्मान का वह दृश्य देखिए। कहाँ मैं… और कहाँ मंच पर विराजमान प्रदेश के खजाना मंत्री सुरेश खन्ना, विधान परिषद अध्यक्ष मानवेन्द्र सिंह और स्वयं मुख्य अतिथि—मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी।
यह जोड़ी हुई तस्वीर देखिए, यह मुस्कान देखिए… और कहिए— “इस सादगी पर कौन न मर जाए, ए खुदा!”
मैं आभारी हूँ माननीय मुख्यमंत्री जी का, जिन्होंने लोकतंत्र सेनानियों और उनके परिवारों के लिए कैशलेस इलाज की जो सुविधा घोषित की है, वह मेरे जैसे के लिए आज सबसे बड़ी ज़रूरत है।
लेखक लोकतंत्र सेनानी, पत्रकार एवं कवि हैं।


