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हिन्दी पत्रकारिता दिवस : 198 साल की यात्रा में पत्रकारिता को पूरी तरह नाकामयाब नहीं कहा जा सकता!

प्रमोद जोशी-

30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस है। 198 साल हो गए। पहली नजर में मुझे लगता है कि हिंदी पत्रकार के मन में अपने कर्म के प्रति जोश कम है। पर यह मैं अपने नजरिए से सोचता हूँ। गहराई से विचार करने पर यह भी समझ में आता है कि युवा पत्रकार के जोश में कमी नहीं है, उसके हालात फर्क हैं। जोश परिस्थितिजन्य होता है।

व्यावसायिक-दृष्टि से उसके सामने अस्थिरता और असुरक्षा है। उसे न तो बौद्धिक-संरक्षण प्राप्त है और न आर्थिक-सुरक्षा। समय और तकनीक के साथ चीजें बदल रहीं हैं। पर जिस वजह से पत्रकारिता का कर्म विकसित हुआ वे खत्म नहीं हुईं हैं। पाठक को जानकारी देने और विचार-विनिमय को बढ़ाने की जरूरत आज, पहले की तुलना में कहीं ज्यादा है। पत्रकारिता और लोकतंत्र का विकास, साथ-साथ हुआ है।

‘उदंत मार्तंड’ इसलिए बंद हुआ कि उसे चलाने लायक संसाधन पं जुगल किशोर शुक्ल के पास नहीं थे। आज बहुत से लोग पैसा लगा रहे हैं। यह बड़ा कारोबार बन गया है। सूचनाओं का भंडार भी काफी बड़ा हो गया है। एक दौर था जब सूचनाएं नहीं थीं। आज इतनी हैं कि वे शोर की शक्ल ले रही हैं। फिर भी अफवाहें हैं।

इसका मतलब है कि पत्रकारिता अपनी जिम्मेदारी पूरी करने में पूरी तरह कामयाब नहीं है। मैं उसे नाकामयाब भी नहीं कहूँगा, क्योंकि जो जानकारी और विचार उपलब्ध हैं वे इसी मीडिया से निकले हैं। आज शोर के बीच संयत और वस्तुनिष्ठ सूचना-विचार की जरूरत है। यह ज्यादा बड़ी चुनौती है। जीवन में चुनौतियाँ हमेशा बनी रहेंगी। हमें चुनौतियों की तरफ भी ध्यान देना चाहिए।

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