संजय कुमार सिंह
आज जब मेरे ज्यादातर अखबारों की लीड युद्ध के कारण तेल की कीमत बढ़ने की खबर है तो द हिन्दू की लीड का शीर्षक विदेश मंत्री जयशंकर के हवाले से है, ईरान से वार्ता जारी रहेगी। मुझे लगता है कि एप्सटीन फाइल की चर्चा सार्वजनिक होने के बाद प्रधानमंत्री का पिछला इजराइल दौरा और उनके लौटते ही हमला – साधारण नहीं है। प्रधानमंत्री को इसपर अपना पक्ष उसी दिन रखना चाहिए था। अब विदेश मंत्री की ऐसी बातें लीपा-पोती के अलावा कुछ नहीं है। यह अलग बात है कि इस सरकार और भारतीय जनता पार्टी की राजनीति यही है। पर वह अलग मुद्दा है। अभी तो मैं आपको बताऊं कि द हिन्दू की आज की लीड के अनुसार, सरकार की पहली प्राथमिकता पश्चिम एशिया में भारतीयों को रक्षा के को लेकर प्रतिबद्धता है। लेकिन इसमें खबर क्या है – यह तो सबको पता है और इसके लिए जरूरी था कि सरकार युद्ध के कारण बताती, कुछ नहीं तो उसपर अपना नजरिया ही रखती। देश-दुनिया को समझ में आ जाता कि भारतीयों को या विदेश में रहने वाले भारतीयों को क्या नुकसान किन कारणों से हो रहा है या हो सकता है। लेकिन सरकार ने वह नहीं बताया, जो सवाल पूछे जाते हैं उनका जवाब नहीं मिलता लेकिन ‘मन की बात’ सुनाई जाती है। इसी तर्ज पर खबर के अनुसार, विदेश मंत्री ने स्वतः यह बयान दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार प्रवाह हमेशा सर्वोपरि हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह खबर नहीं है। खबर यह होती कि इसके बावजूद क्या स्थिति है, क्या हो रहा है, क्या आशंका है आदि।
द टेलीग्राफ की लीड बताती है कि इरान के मारे गए नेता अयातुल्लाह खामनेई के एक बेटे मोजतबा खामनेई को उनका उत्तराधिकारी चुना गया है। और यह इजराइल तथा अमेरिका को टक्कर देते रहने का संकेत है। इससे पता चलता कि ईरान उसी रास्ते पर चलता रहेगा। द टेलीग्राफ के पहले पन्ने की खबरें युद्ध से संबंधित अंतरराष्ट्रीय स्थिति को बताती है जबकि दि एशियन एज विदेश मंत्री या सरकार की लाइन का प्रचार कर रहा है, मध्यपूर्व में शांति के लिए भारत वार्ता और कूटनीति चाहता है। मुझे लगता है कि यह भारत की मजबूरी है और यह भी खबर नहीं है। खबर यह होती कि इसके बावजूद इजराइल दौरे से लौटते युद्ध कैसे छिड़ गया। उस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के सहयोग से क्यों छिड़ा जो युद्ध बंद कराने का दावा करते रहे हैं। ऐसा दावा नरेन्द्र मोदी के बारे में भी किया जाता रहा है लेकिन ऑपरेशन सिन्दूर बंद करने का दावा प्रधानमंत्री ने नहीं किया, ट्रम्प ने ऐसा दावा किया और बार-बारी की चुनौती के बावजूद प्रधानमंत्री ने अभी तक शायद यह नहीं कहा है कि ट्रम्प झूठ बोल रहे हैं। आप समझ सकते हैं कि क्या हो रहा है लेकिन एक अखबार पढ़ने वाला आदमी पूरे मामले को नहीं समझ पाएगा। ऐसे में भारत में आम हिन्दी पाठक के लिए जो खबर सबसे महत्वपूर्ण है वह आज कई अखबारों में है। हिन्दी अखबारों में शीर्षक हिन्दी के पाठकों के लिए है तो अंग्रेजी के अखबारों में अंग्रेजी के पाठकों के लिए। अमर उजाला का शीर्षक है, कच्चे तेल में आग, 31 फीसदी तक उछला, देश में एलपीजी के घरेलू उपयोग को वरीयता।

हिन्दी में इसे जैसे कहना चाहिए था या जैसे कहा जा सकता है वह नवभारत टाइम्स की लीड का शीर्षक है, खाड़ी की आंच आपकी रसोई तक। नभाटा में पहले पन्ने पर ही एक और खबर के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच प्रोपेन व ब्यूटेन जैसे एलपीजी घटकों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध के बाद पुणे महानगर पालिका ने गैस आधारित शवदाह गृहों को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। मुंबई के चंदनवाडी श्मशान भूमि में भी पीएनजी की सप्लाई में दिक्कत की खबर है। मुझे लगता है कि आम जनता की आंखें खोलने वाला यह शीर्षक दूसरे अखबारों में भी होता तो लोगों को युद्ध का मतलब समझ में आता और वो लोग भी इसे गंभीर मानते जो समझ रहे हैं कि युद्ध से उनका कोई लेना देना नहीं है या मोदी जी अपनी राजनीति से दुनिया भर में भारत को मजबूत कर रहे हैं। जो भी हो, तथ्य यह है कि इसकी कीमत जनता को चुकानी होगी। यह झोला उठाकर चल दूंगा – कहना और वोट चोरी, चुनाव चोरी तथा मीडिया का गला घोंट कर सत्ता में बने रहने की व्यवस्था जैसा है। आप जानते हैं कि इसके लिए 75 पार के बाद मार्ग दर्शक मंडल के अपने ही नियम को नहीं माना जा रहा हैं और इसलिए कहा जा सकता है कि जो भी कर रहे हैं अपने लिए कर रहे हैं और अगर संघ परिवार यह सब करने दे रहा है तो संभव है उसे भी लाभ हो। वरना विरोधियों को जिस ढंग से कुचला जाता रहा है उसमें पार्टी के विरोधी भी रहे हैं। अगर लाभ लेकर कोई साथ दे तो ठीक वरना उसे कुचलने, खरीदने, खत्म करके रास्ते से हटाने के तमाम उपाय अब दिखाई दे रहे हैं, गिनाए जा सकते हैं। अभी वह मुद्दा नहीं है लेकिन मीडिया इस सरकार और व्यवस्था का जैसा साथ देता रहा है वह शर्मनाक और चिन्ताजनक है।
वरना खबर तो यह भी बहुत बड़ी है कि 60 फुट गहरे बेसमेंट में मिट्टी ढही, 7 श्रमिकों की मौत, चार की हालत गंभीर है। यह नवोदय टाइम्स की लीड न भी हो तो लीड की जगह छपी है। कई जगह बेसमेंट के लिए खुदाई करते समय मैंने देखा है कि आस-पास की मिट्टी को ढहने से रोकने के लिए रेत की बोरी की दीवार बनाई जाती है। फिर बिल्डिंग निर्माण और उसकी सुरक्षा के लिए आवश्यक मजबूत दीवार बनाई जाती है तब जाकर बिल्डिंग बनाने का काम होता है। बेसमेंट के लिए खुदाई से संबंधित यह नियम होगा भले कानून जरूरी नहीं हो। इसलिए कहीं ऐसा किया जाता है कहीं नहीं और जाहिर है यह जरूरत के अनुसार किया जाता होगा तथा हादसा तब होता होगा जब आकलन गलत हो जाए। सरकार का काम है, ऐसे हासदों से सबक लेना और भविष्य के लिए नियम बनाना तथा जो नियम बने हुए हैं उन्हें लागू करना। लेकिन सरकार अगर चुनाव जीतने और नए जीते राज्य में पांच सितारा दफ्तर बनाने में लगी रहेगी तो जनहित कैसे कर पाएगी। इस सरकार में यही हो रहा लगता है लेकिन किसी को कोई दिक्कत नहीं है क्यों आम नागरिकों को इसी में अपना फायदा या भला लगता है और यह भी विवेक का मामला है। आम जनता को उनके ऐसे फैसलों पर छोड़ दिया जाए और मीडिया जो कर रहा है वह चलता रहे तो भाजपा कभी चुनाव नहीं हारेगी। लेकिन इस देश में हालत यह हो गई है कि जो ईवीएम भाजपा के सत्ता में नहीं होने पर बुरी थी वह अब अच्छी है, वोट चोरी औऱ चुनाव चोरी के आरोप लगाकर राहुल गांधी चुनाव आयोग को बदनाम कर रहे हैं और देश के 272 विशिष्ट नागरिक ऐसा खुलकर, लिखकर कह चुके हैं तो इस देश का जो होना होगा वह होकर रहेगा।
नवोदय टाइम्स ने आज कई खबरों को बराबर महत्व देने की कोशिश की है। यह खबरों या पत्रकारिता के साथ न्याय हो सकता है लेकिन अभी (वैसे तो हमेशा रहती है) देश के प्रति जो जिम्मेदारी है वह नवभारत टाइम्स ने ही पूरी की है। भले यह इरादतन न हो और इसका कारण यह हो सकता है कि सरकार की ओर से हेडलाइन मैनेजमेंट करने वाले प्रधानमंत्री कार्यालय के अधिकारी के पंख कतरने की खबर थी। इसलिए यह सब व्यवस्थित ढंग से नहीं हो पा रहा हो लेकिन नवभारत टाइम्स ने जो किया है उसपर वरिष्ठ पत्रकार शकील अख्तर ने लिखा है, एक शीर्षक सारा नशा उतार सकता है! चर्चा शुरू हो गई। नुकसान हमारा भी हो रहा है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी यही कह रहे हैं। मीडिया जैसे 2014 से पहले विपक्ष का साथ देती थी वैसा देने की जरूरत नहीं है। बस एक हफ्ते के लिए सत्ता पक्ष की झूठी कहानी चलाना बंद कर दे। सरकार का विरोध भी ना करे। केवल जनता की निगाह से चीजों को पेश कर दे। आप कल्पना कर सकते हैं क्या होगा? भारी राजनीतिक उथल-पुथल!सत्ता पक्ष से आवाजें उठने लगेंगी। संघ से।और मीडिया को सबसे बड़ा फायदा कि उसकी विश्वसनीयता फिर से कायम होने लगेगी। कहने की जरूरत नहीं है कि नवभारत टाइम्स में तथ्य सारे हैं और प्रमुखता उन्हें दी गई है जो भारत और भारतीय पाठकों के लिए महत्वपूर्ण हैं। वरना सरकार ने जब कहा है कि पेट्रोल डीजल के रेट नहीं बढ़ेंगे और भक्तगण कहते रहे हैं कि वे 500 रुपए लीटर होने पर भी समर्थन देते रहेंगे तो कच्चे तेल की कीमत बढ़ना कैसी खबर? महत्वपूर्ण तो नहीं ही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो तो हो।
इसके बावजूद आज टाइम्स ऑफ इंडिया, हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस की लीड तेल की कीमत बढ़ने की खबर है। सबने इसे अलग तरीके से छापा है लेकिन मूल बात वही है। आइए, अब उन खबरों को भी देख लें जो युद्ध की इन खबरों के कारण नीचे रह गई हैं। हिन्दुस्तान टाइम्स में पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने की खबर के अनुसार, हाईकोर्ट ने कहा है कि दिल्ली सरकार के खिलाफ आबकारी मामले में सीबीआई पर अपनी टिप्पणी में अदालत ने गलती की है। सबको पता है कि मामला क्या है। फिर भी हाईकोर्ट की यह टिप्पणी और ‘गलती’ करने वालों के खिलाफ कार्रवाई न होने की व्यवस्था से देश में न्यायपालिका की क्या हालत है उसे समझा जा सकता है। आम लोग अगर ऊपरी अदालत में अपील न कर पाएं तो क्या उन्हें गलत न्याय मिलता है। अभी यह मुद्दा नहीं है लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए आम आदमी को समय पर न्याय मिले लेकिन इस सरकार ने अजमल कसाब (या उसके पीड़ितों) को न्याय दिलाने का काम करने वाले सरकारी वकील रहे उज्जवल निकम को पुरस्कृत किया है। इसलिए, मुझे इस सरकार से कोई उम्मीद नहीं है। समर्थक अपना जानें। वह इसलिए भी कि, द हिन्दू की खबर के अनुसार, सीबीआई की याचिका पर हाईकोर्ट ने अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया से जवाब मांगा है। अखबारों की खबरों के अनुसार, मोटे तौर पर अदालत ने सीबीआई की जांच पर उंगली उठाई है और इन लोगों को (जो निर्वाचित प्रतिनिधि हैं और संवैधानिक पद पर थे) फंसाने की बात कही है। अब अपने जवाब में इनका कहना क्या हो सकता है या वही होगा जो वे कहते रहे हैं। जो भी हो, उसे अदालत को तय करना है लेकिन तथ्य है कि इन लोगों के खिलाफ कार्रवाई केंद्र सरकार की अनुसंशा या अनुमति के बाद ही हुई होगी और इसलिए जवाब अगर मांगा ही जाना है तो केंद्र सरकार के संबंधित मंत्रालय से (भी) मांगा जाना चाहिए। पर शीर्षक में ऐसी कोई सूचना तो नहीं ही है। यह भी बताया गया है कि केंद्र सरकार के वरिष्ठतम अधिवक्ता सॉलीसीटर जनरल इस मामले में बहस कर रहे हैं। साफ है कि सरकार चाहती है कि मुकदमा चले और निचली अदालत की प्रतिकूल टिप्पणी के बावजूद सीबीआई की अपील पर सॉलीसीटर जनरल बचाव कर रहे हैं तो यह अदालत पर दबाव भी है। खासकर तब जब सरकार दबाव डालती रही है, यह सार्वजनिक हो चुका है। मुझे लगता है खबर इस लिहाज से लिखी जानी चाहिए था और इन जिज्ञासाओं को शांत या उजागर करने वाली सूचनाएं होनी चाहिए थीं जो नहीं हैं।
इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने वनों की कटाई पर राज्यों को दी जाने वाली अपनी पाक्षिक एआई आधारित अलर्ट सेवा बंद कर दी है। इसके नफा-नुकसान के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। यह एआई के उपयोग का मामला है और बंद कर दिया गया है। खबर के अनुसार, अधिकारी ने कहा कि यह एक पायलट परियोजना थी और सरकार इसकी उपयोगिता का आकलन कर रही है। आज मेरे इतने सारे अखबारों (कुल 10) में सिर्फ देशबन्धु की लीड के शीर्षक से पता चल रहा है कि कल यानी सोमवार को संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू हो गया। मुख्य शीर्षक है, ईरान जंग पर चर्चा की मांग, हंगामा। आप समझ सकते हैं कि विदेश मंत्री का स्वतः स्फूर्त बयान और इतनी सब बातों के बीच मुद्दा यह है कि सरकार संसद में चर्चा करवाने को तैयार नहीं है। बेशक इसके लिए उसके पास अपने कारण होंगे पर खबर के अनुसार, सरकार लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव पर बहस के लिए तैयार है। आप समझ सकते हैं कि इससे हेडलाइन मैनेजमेंट भी हो सकता है और ईरान जंग पर चर्चा हुई होती तो आज के शीर्षक कुछ और हो सकते थे। वह नहीं है यह सरकार की उपलब्धि हो सकती है लेकिन पकड़ कमजोर पड़ने के संकेत भी हैं। देखना है, आगे क्या-क्या होता है। आज ही, दि एशियन एज में खबर भी है, विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव को ठंडे बस्ते में डाला, युद्ध पर चर्चा चाहता है। इसी खबर के उपशीर्षक में लिखा है, सरकार मानेगी इसकी उम्मीद कम है। विपक्ष के पास संख्या बल नहीं है इसलिए रणनीति बदलने की कोशिश कर रही है। मुझे लगता है कि खबरें पेश करने का यही अंतर रेखांकित करने लायक है जो नवभारत टाइम्स की खबर से अच्छी तरह स्पष्ट होता है।

फोटो मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


