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आज के अखबार : हमले की खबरें तो हैं, भारत के रुख या स्टैंड जैसा कुछ पहले पन्ने पर नहीं है और ‘प्रचार’ है ही  

संजय कुमार सिंह

आज भी मेरे सभी अखबारों में ईरान पर अमेरिका-इजराइल के संयुक्त हमले और इसमें ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की मौत की खबर पहले पन्ने पर है। लेकिन इसमें भारत कहां है, उसका रुख क्या है यह सब नहीं है। भारतीयों के फंसे होने या उन्हें राहत पहुंचाने या जरूरत की खबरें भी पहले पन्नों पर नहीं के बराबर है। आप जानते हैं कि एपस्टीन फाइल में नाम होने और इजराइल का चर्चा होने के बावजूद प्रधानमंत्री भारत की किसी खास जरूरत के बिना इजराइल गए थे और उनके लौटते ही ईरान पर हमला हो गया। अखबारों की खबरें इन जिज्ञासाओं को शांत करने वाली नहीं हैं। दूसरी ओर, कंप्रोमाइज्ड होने का आरोप और अमेरिका इजराइल का संयुक्त हमला, वह भी भारत के प्रधानमंत्री की गैर जरूरी यात्रा (या जिसकी जरूरत भी नहीं बताई गई है) के बाद – बहुत सारे सवाल खड़े करता है। इनके जवाब अखबारों में नहीं हैं। 2014 से पहले होता यह था कि जनता को बताया जाता था कि सरकार ने इस पर कुछ नहीं कहा या जो कहा है वह लीपा-पोती है। अब वह सब नहीं है। उदाहरण के लिए, अमर उजाला में पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, सीसीएस की बैठक में मोदी ने लिया सुरक्षा हालात का जायजा। इसके तहत एक खबर है, मोदी और नेतन्याहू ने हालात पर बात की। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया की तरह (पहले पन्ने पर) यह नहीं बताया गया है कि उड़ान बाधित होने के कारण दुनिया भर में भारत और दूसरे देशों के लोग फंसे हुए हैं। सोशल मीडिया पर भाजपाई प्रचारक कांग्रेस के भ्रष्टाचारी होने का नैरेटिव बनाने में लगे हैं। युद्ध की यह खबर चाहे जितनी महत्वपूर्ण हो, भारत में भारतीयों से ज्यादा नहीं हो सकती है। लगातार दूसरे दिन तो बिल्कुल नहीं। पहले पन्ने पर सरकार के प्रचार की खबर का मतलब कोई भी समझ सकता है। द टेलीग्राफ में आधे पन्ने पर भाजपा का चुनावी विज्ञापन है। आधे से कम में खबरें हैं। युद्ध इनमें होना ही था। फिर भी, एसआईआर पर खबर है – 60 लाख मतदाताओं के मामले में फैसला होना है। चुनाव की तारीख जल्दी हुई तो इन भावी मतदाताओं के लिए जोखिम होगा।  

इंडियन एक्सप्रेस में कोर्ट से क्लीन चिट मिलने के बाद अरविन्द केजरीवाल की पहली रैली की खबर तीन कॉलम में है। केजरीवाल ने आरोप लगाया है, भाजपा ने दिल्ली को बर्बाद कर दिया। मैं समझता हूं, देश को बर्बाद कर रही है। लेकिन खबरें युद्ध की छप रही हैं जो दुनिया की बर्बादी की कहानी है। मुझे लगता है कि देसी खबरों की गंभीरता और जरूरत को देखते हुए इन्हें भी पहले पन्ने पर जगह मिलनी चाहिए। अमर उजाला ने टी-20 विश्वकप में भारत के छठी बार सेमी फाइनल में पहुंचने की खबर छापी है तो नवोदय टाइम्स ने पुंछ में पाकिस्तानी ड्रोन घुसा, सेना ने गोलीबारी कर खदेड़ा और विस्फोटक बनाने के कारखाने में धमाका, 17 की मौत जैसी खबरें हैं। यह महाराष्ट्र के नागपुर जिले की घटना है। दि एशियन एज में पहले पन्ने पर नीचे की दोनों खबरें उल्लेखनीय हैं। एक के अनुसार एसआईआर में मतदाताओं के नाम हटाने के खिलाफ ममता बनर्जी के धरना शुरू करने की खबर है तो दूसरे में केजरीवाल का यह गरजना कि भाजपा सरकार के दिन गिने हुए हैं। देशबन्धु में चौथाई पन्ने के विज्ञापन के साथ छपी तीन खबरों में एक सरकारी प्रचार है, पुडुचेरी में 2700 करोड़ की विकास परियोजनाओं का शुभारंभ। बताना जरूरी है कि पुडुचेरी में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। एसआईआर का काम संपन्न हो चुका है और भाजपा गठबंधन की सरकार है। नागपुर की विस्फोटक फैक्ट्री में विस्फोट और इसमें 18 लोगों की मौत द हिन्दू में पहले पन्ने पर बॉटम स्प्रेड है और फोटो के साथ चार कॉलम में है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी पहले पन्ने पर सरकारी प्रचार है, ज्यादा खपत होने से फरवरी में जीएसटी राजस्व 8.1 प्रतिशत बढ़ा। कहने की जरूरत नहीं है कि खपत मुफ्त राशन पर जीने वालों से नहीं बढ़ेगी और खाए-कमाए-अघाए लोगों से बढ़ रही है तो बहुत मायने नहीं रखती है। सरकार को टैक्स चाहिए, कमाने वाले दे रहे हैं। दुखद यह है कि जरूरी चीजें खरीदने वाले गरीब भी जीएसटी देते हैं और इस वृद्धि में उनका योगदान भी है।

हालत ऐसी हो गई है कि भारतीय युवक कांग्रेस ने आज तक का एक पुराना वीडियो पोस्ट करते हुए लिखा है, पहले मोदी जी सीना ठोक ठोककर ईरान के चाबहार पोर्ट का क्रेडिट लेते थे, उसे अपनी उपलब्धि बताते थे। …. अब चाबहार को भी सरेंडर कर दिया है, और दोस्त ईरान को भी। क्या कारण रहा होगा? साफ दिख रहा है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी की पूरी राजनीति नैरेटिव सेट करने पर चल रही है और इसकी शुरुआत कांग्रेस को भ्रष्ट और तुष्टीकरण करने वाला साबित करने से हुई थी। इसमें हिन्दुत्व का झंडा बुलंद करना असंवैधानिक होते हुए भी किया गया। कांग्रेस ने करने दिया या रोक नहीं पाई। भाजपा सत्ता में रहते हुए जो कर रही है वह पहले सत्ता में रहे लोगों और दलों ने किया होता तो भाजपा कहां होती पता नहीं है। अब सत्ता में रहते हुए उसने तमाम ऐसे उपाय किए हैं जिससे भविष्य में चुनाव हारे ही नहीं। इसके लिए आम आदमी पार्टी को फर्जी मुकदमे में फंसाना, बदनाम करना शामिल है। ऊंची अदालत में सरकार की ओर से अपील व्यावहारिक तौर पर सरकारी दबाव है जो एसआईआर और दूसरे मामलों में सुप्रीम कोर्ट में भी दिखता रहा है और जजों के तबादले, ईनाम से लेकर लोया होने तक के किस्से न्यायापालिका को स्वतंत्र कैसे रहने देंगे। पर वह अलग मुद्दा है। अब जब कोर्ट ने कहा है कि (केजरीवाल का) मामला फंसाने के लिए बनाया गया था और मामला बनाने वाले की भी जांच होनी चाहिए तो मुद्दा यह है कि ऐसे मामले में मुख्यमंत्री को और निर्वाचित प्रतिनिधियों को जमानत क्यूं नहीं मिली। इनका मामला तो बनाया और गढ़ा हुआ था लेकिन सरकारी काम से संबंधित था। इसलिए हो सकता है कि पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार को गंभीरता दी गई हो लेकिन उसी समय हेमंत सोरेन का मामला था जो बिल्कुल अलग और फंसाने के लिए बनाया गया लगता है लेकिन निर्वाचित जन प्रतिनिधि को जमानत उसमें भी नहीं मिली। कहने के लिए तो कानून की नजर में हर व्यक्ति बराबर है लेकिन ऐसा होता तो भाजपा को वाशिंग मशीन पार्टी क्यों कहा जाता?

इतना ही नहीं, भाजपा सरकार ने एक ऐसा कानून बनाने की कोशिश की जिसमें विपक्षी सरकारों को इस तरह फंसाया और बदनाम किया जा सके। निर्वाचित प्रतिनिधि एक महीने बिना जमानत जेल में रह जाए तो उसका पद अपने आप चला जाएगा। अभी यह कानून पास नहीं हुआ है लेकिन उद्देश्य और लक्ष्य को समझने से इनकी राजनीति भी समझ में आएगी। और राजनीति समझने के लिए यह बताना जरूरी है कि लोक सेवकों के खिलाफ मामले (सीबीआई या पुलिस के) तभी चल सकते हैं जब सरकार इसकी अनुमति दे। अब जब केजरीवाल के मामले में सरकार की किरकिरी हुई तो खबर छपी है कि पी चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई करने की अनुमति मिल गई है। सवाल उठता है कि, इसमें इतना समय क्यों लगा और अनुमति तभी क्यों मिली जब तमिलनाडु में चुनाव करीब हैं। केजरीवाल के मामले में दुनिया जानती है कि उनका मजबूत होना गुजरात में भाजपा को फायदा देगा और गुजरात में भी चुनाव करीब है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पहले भाजपा ने यह सब किया हो तो संभव है कि लोगों को समझ नहीं आया हो या किसी ने ध्यान नहीं दिया हो या इसी को चाणक्य नीति मान लिया हो ऐसे ही शॉट मास्टर शॉट कहे जाते थे। लेकिन तीन बार चुनाव जीतने के बाद भी भाजपा वही सब कर रही है जबकि पहली बार जीतने पर ही नरेन्द्र मोदी ने कहा था, झोला उठाकर चल दूंगा। कथनी और करनी का यह अंतर भी अखबारों के लिए मुद्दा नहीं है। अंतरराष्ट्रीय संबंध और युद्ध जैसे मामले में भी नहीं।

दूसरी ओर, सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए भाजपा के तमाम प्रचारक ऊल-जलूल कुछ भी लिख रहे हैं। कांग्रेस भाजपा के आरोपों का जवाब नहीं देती है या नहीं दे पाती है। अब देने की कोशिश कर रही है।  लेकिन अखबारों में छपते नहीं हैं और सोशल मीडिया से हटवा दिए जाते हैं। इसमें सत्ता का दुरुपयोग साफ दिख रहा है लेकिन वह भी मुद्दा नहीं है। पता नहीं आपको मालूम है या नहीं, भाजपा सरकार ने ऐसे कानून बनाए हैं जिससे भाजपा के पक्ष में ऐसे प्रचार तो चलते रह सकते हैं लेकिन भाजपा के खिलाफ सच्चे प्रचार और तथ्य हों तो भी उन्हें सरकारी बाबू हटवा सकता है। कानून है कि आदेश का पालन 36 घंटे में नहीं हुआ तो….  अब थोड़ी बात नियम कानून की। आईटी अधिनियम, 2000 की धारा 79 (सेफ हार्बर) के तहत इंटरमीडियरी (जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म) को सरकार या अदालत के वैध आदेश मिलने पर आपत्तिजनक/अवैध सामग्री को तय समय पर हटाना होता था। 2021 में यह सीमा घटा कर 36 घंटे कर दी गई। 2021 में जारी केंद्र सरकार के सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत : किसी सक्षम प्राधिकरण या अदालत के आदेश पर इंटरमीडियरी को 36 घंटे के भीतर सामग्री हटानी होती है। व्यावहारिक तौर पर सक्षम प्राधिकारी को कारण बताने की जरूरत नहीं है वह किसी के आदेश पर भी आदेश जारी कर सकता है या अपनी सक्षमता का दुरुपयोग कर सकता है, आदेश मानना होगा उसे चुनौती दी जा सकती हो तो वह बाद में दी जाएगी और अलग बात है। हालांकि यह अधिकार आपदा, राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी आपात स्थिति के लिए है। अनिल मसीह, ज्ञानेश गुप्ता या कई बार एक्सटेंशन पा चुके ईडी के निदेशक रहे संजय कुमार मिश्रा जैसे अधिकारी इसका बार-बार दुरुपयोग करें तो कोई क्या कर पाया। पर वह भी अलग मुद्दा है। अभी मुद्दा यह है कि हटाई गई सामग्री और संबंधित रिकॉर्ड को 180 दिन तक (ही) सुरक्षित रखना होता है। खेल यहां भी है। सोशल मीडिया पर मेरी पोस्ट जमाने से पड़ी है। अगर सरकार ने किसी पोस्ट को हटवाया और मुझे शिकायत है तो जो हालत है उसमें 180 दिन में सुनवाई की कितनी संभावना है, आप जानते हैं। 180 दिन बाद न रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी – सब ज्ञानेश बन जाएंगे।

युद्ध पर भारत की प्रतिक्रिया जानना-बताना जरूरी है। सरकार अगर अपना स्टैंड नहीं बताए तो मीडिया वालों का काम है कि सरकार से पूछ कर बताए। लेकिन वह सब अखबारों में नहीं है क्योंकि अखबार पैसे कमाने की मशीन बन गए हैं या औपचारिकता निभा रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के सोशल मीडिया और डिजिटल प्लैटफॉर्म की प्रमुख सुप्रिया श्रीनेत ने इस मामले में केंद्र सरकार के बयान पर कहा है, इस नीरस सरकारी बयान से बेहतर तो सरकार की चुप्पी थी। यह बयान भारत की नैतिकता पर कलंक है। एक स्वतंत्र संप्रभु गणराज्य के नेता की हत्या पर भारत की प्रतिक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए थी। “हाल की घटनाएँ” लिख कर खानापूर्ति करने के बजाय हमें बिना लागलपेट के अयातुल्ला खामेनेई की हत्या की निंदा करनी चाहिए थी। भारत वो प्राचीन सभ्यता है जो सदा सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ी रही है। हमने अन्याय और उत्पीड़न के विरुद्ध लड़कर दुनिया में मिसाल क़ायम की है। भारत कभी भी बल और अराजकता के सामने मूक दर्शक नहीं बना। आज दुनिया कि अपेक्षा है कि हम हमेशा की तरह सत्य और साहस का परिचय दें –  ग़लत को ग़लत बोलें और शांति बहाल करने में अपनी भूमिका निभायें। यही नैतिकता है, यही निडरता है, यही भारत की पहचान है। अखबार सरकार या कांग्रेस के रुख-राजनीति से सहमत, असहमत उसके समर्थक या विरोधी हो सकते हैं। लेकिन मामला अपनी पसंद का नहीं, रिपोर्ट करने का है और उसे तो रिपोर्ट कीजिए जिससे जानना जनता का हक है और जनता जानना चाहेगी। इसलिए सरकारी बयान पेश है – मुझे लगता है कि आज दोनों में से एक अखबारों में पहले पन्ने पर होना चाहिए था। दोनों मिलाकर भी एक खबर हो सकती है। इंडियन एक्सप्रेस में ऐसी एक खबर पहले पन्ने पर है भी। एक दूसरी खबर से इंडियन एक्सप्रेस ने बताया है कि दुनिया भर में फैले एक करोड़ लोग इस युद्ध का सामना कर रहे हैं। अगर युद्ध से मतलब नहीं है और होली खेलना ही है तो द हिन्दू ने कोलकाता की एक फोटो छापकर बताया है कि होली करीब है लेकिन दूसरे अखबारों में वह भी नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स ने एक्स पर प्रधानमंत्री की पोस्ट का हवाला दिया है। युद्ध की खबरों के कारण जगह की कमी के कारण पांच कॉलम का बॉटम अंदर की खबरों का विवरण देता है। लेकिन कई अखबार युद्ध से बेपरवाह है और उसमें कुछ खास नहीं हो तो चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं जो जरूर खास है।   

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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