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सुख-दुख

ज़ुबैर ने भोंपू मीडिया के माइक को दुत्कारा!

प्रकाश के रे-

आज दो तस्वीरें देख कर मन ख़ुश हुआ. एक तस्वीर में पुलिस के साथ जाते हुए ज़ुबैर एक भोंपू मीडिया के माइक को दुत्कार रहा है. दूसरी तस्वीर में उमर पुलिस के साथ जाते हुए अपने एक दोस्त से हाथ मिला रहा है. कमाल! कमाल!

जुर्म मोहम्मदाबादी का लिखा ज़ेहन में आया-
आग से खेलने को पतंगा बढ़ा
हैसियत देखिए हौसला देखिए

माया एंजेलू कहती हैं, साहस सभी गुणों में सबसे अहम है क्योंकि बिना इसके अन्य गुणों को लगातार व्यवहार में नहीं लाया जा सकता है. ‘अ गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ में बच्चा पूछता है- क्या कोई डरा हुआ आदमी बहादुर हो सकता है? उसका पिता जवाब देता है- वही एकमात्र ऐसा समय है, जब आदमी बहादुर हो सकता है.


संजय कुमार सिंह-

मोहम्मद जुबैर के बारे में सबकी राय अलग हो सकती है। कुछ राय उनका काम देखकर बनेगी और कुछ उनके खिलाफ प्रचार से। लेकिन जुबैर पर नियंत्रण मतलब सत्य पर नियंत्रण जैसा मामला तो है। और उसे अभिव्यक्त करने का यह अंदाज बताता है कि आप अपने काम से जो छवि बनाते है उसके लिए प्रचारकों की जरूरत नहीं होती है।

रोहित और जुबैर के मामले में अलग-अलग दलील देने वालों को समझना चाहिए कि एक ने माफी मांग ली है तो दूसरे की गलती वैसी है ही नहीं।

मोहम्मद जुबैर और रोहित रंजन – दोनों का मामला सुप्रीम कोर्ट में लगभग एक समय। लालू यादव और नरेन्द्र मोदी के एक जैसे मामले में अलग फैसले की चर्चा के बाद अब इन दो मामलों पर फैसला देखने लायक होगा।

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