- नाल्को से बर्खास्तशुदा सीएमडी रहे हैं बजरंग लाल बांगड़ा
- 122 करोड़ रुपयों के घोटाले में कड़ी कार्रवाई के घेरे में थे
- देश की आडिट सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रह चुके हैं बजरंगलाल
कुमार सौवीर-
अयोध्या राममंदिर पर एक फिर तगड़ा विवाद खड़ा हो गया है।
यहां श्रद्धालुओं द्वारा राम भगवान को अर्पित किये गये कोष का करोड़ों की लूटपाट के मामले में विदा किये गये चंपत राय बंसल की जगह पर एक ऐसे शख्स को यह कुर्सी थमा दी गयी है, जिस पर करीब 122 करोड़ रूपयों का घोटाला का आरोप लग चुका है और इसी मसले पर वह आज से 15 साल पहले ही सरकारी उपक्रम नाल्को के अध्यक्ष और एमडी के पद से बर्खास्त हो चुका है।

कहा जा रहा है कि राममंदिर पर सांपनाथ की जगह अब नागनाथ को कमान थमायी जाएगी। नाम है बजरंग लाल बांगड़ा।
चंपत राय की विदाई के बाद श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने महासचिव की जिम्मेदारी बजरंग लाल बागड़ा को सौंप दी है।
यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब ट्रस्ट दान में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच और एसआईटी की पड़ताल के कारण पहले से ही सवालों के घेरे में है।
बागड़ा फिलहाल विश्व हिंदू परिषद वीएचपी के अंतरराष्ट्रीय महामंत्री हैं। मगर बागड़ा का अतीत विवादित रहा है।
भले ही कोई नया “घोटाला” साबित नहीं।
राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, इसलिए वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही सबसे जरूरी।
ट्रस्ट को पूर्ण ऑडिट और एसआईटी रिपोर्ट सार्वजनिक करने पर जोर देना चाहिए।
यहीं से वह राजनीतिक और नैतिक प्रश्न खड़ा होता है, जिसे विपक्ष और आलोचक इस वाक्य में समेट रहे हैं, “सांपनाथ की जगह अब नागनाथ।”
इस नियुक्ति को लेकर विपक्ष और आलोचकों ने सवाल उठाए हैं।
तर्क नैतिक सवाल है कि जब ट्रस्ट स्वयं दान में वित्तीय अनियमितताओं को लेकर सवालों के घेरे में है, तो ऐसे में नए महासचिव की छवि भी बेदाग होनी चाहिए।
“सांपनाथ की जगह नागनाथ”:
यह राजनीतिक मुहावरा इस बात को उजागर करता है कि जिस व्यक्ति पर पुराने वित्तीय विवादों के आरोप हैं, उसे ट्रस्ट की कमान सौंपना उचित नहीं है।
जब कि ट्रस्ट का तर्क है कि बागड़ा का कॉर्पोरेट और वीएचपी संबंधी संगठनात्मक अनुभव ट्रस्ट की पारदर्शिता और प्रबंधन के लिए उपयोगी।
आलोचक कह रहे हैं कि जब दान की जांच चल रही हो तो “निर्विवाद” छवि वाला व्यक्ति बेहतर होता।
विश्वास और पारदर्शिता को लेकर आलोचकों का कहना है कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और हजारों करोड़ के दान का प्रबंधन ऐसे व्यक्ति को सौंपना, जिसका नाम पहले सतर्कता जांच में आ चुका है, गलत संदेश देता है
इस टिप्पणी का आधार यह है कि चंपत राय पर ट्रस्ट के मौजूदा विवादों की नैतिक जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठ रहे थे,
जबकि उनके उत्तराधिकारी बजरंग लाल बागड़ा का अतीत भी पूरी तरह विवाद-मुक्त नहीं रहा है।
राष्ट्रीय अल्म्यूनिमय कारपोरेशन यानी नालको में कार्यवाहक सीएमडी रहने के दौरान उनके खिलाफ लाइम खरीद और अन्य वित्तीय अनियमितताओं को लेकर
केंद्रीय सतर्कता आयोग सीवीसी की जांच तथा प्रशासनिक कार्रवाई भी हुई थी।
अदालत में इस मामले पर हुए फैसले का नतीजा अब तक सामने नहीं आ सका है। लेकिन यह भी सच है कि उनकी नियुक्ति ने पुराने विवादों को फिर चर्चा में ला दिया है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और हजारों करोड़ रुपये के दान का प्रबंधन ऐसे व्यक्ति को सौंपा जाना चाहिए था, जिसका नाम पहले भी सतर्कता जांचों में आ चुका है?
ट्रस्ट का पक्ष हो सकता है कि बागड़ा एक अनुभवी वित्त विशेषज्ञ हैं,
लेकिन आलोचकों का कहना है कि जब संस्था स्वयं वित्तीय विवादों से घिरी हो, तब नेतृत्व के लिए केवल सक्षम नहीं बल्कि निर्विवाद छवि वाला व्यक्ति चुना जाना चाहिए।
यही कारण है कि यह नियुक्ति केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और जवाबदेही की नई बहस का केंद्र बन गई है।
“सांपनाथ की जगह नागनाथ” एक राजनीतिक मुहावरा हो सकता है, पर उसका निष्कर्ष पाठक पर छोड़ना ही पत्रकारिता की निष्पक्षता के अधिक अनुकूल होगा।
लखनऊ के अधिवक्ता शांतनु शुक्ला इस विषय पर कई जिज्ञासाएं फैला रहे हैं।
उनका कहना है कि यह नियुक्ति पर तो बाद में बात होती ही रहेंगी। लेकिन बजरंगलाल बांगड़ा को अपनी प्लानिंग और स्ट्रेटजी साफ क्लियर कर देना चाहिए
कि वह किसी तरह चंपत राय बंसल से आगे बढ़ कर कैसे उससे ज्यादा धांधली वाला धंधा कैसे मूर्तरूप से साकार कर सकेंगे और उनका लक्ष्य कितनी धांधली तक होगी।
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