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सुख-दुख

घबराइये कि आप उत्तर प्रदेश में हैं…

संक्रामक बीमारियों का मौसम है इसलिए मुस्कराइये नहीं, बल्कि घबराइये…. क्योंकि आप लखनऊ में हैं। मैं खुद भी तब से बहुत ज्यादा घबराने लगा हूँ, जब दो साल पहले मुझे एक रिपोर्ट में स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई थी। यहाँ समूची व्यवस्था चरमराई हुई है। जब तक आपका वास्ता यहाँ के अस्पताल, थाने, कोर्ट जैसी मूलभूत जरूरतों वाली संस्थाओं और उनके तथाकथित रखवालों यानी डॉक्टर, पुलिस या वकील से नहीं पड़ता तब तक आपको भी मेरी ही तरह शायद यही गुमान होगा कि हमारे लिए सरकार और प्रशासन ने बहुत कुछ इंतेजाम कर रखे हैं।

संक्रामक बीमारियों का मौसम है इसलिए मुस्कराइये नहीं, बल्कि घबराइये…. क्योंकि आप लखनऊ में हैं। मैं खुद भी तब से बहुत ज्यादा घबराने लगा हूँ, जब दो साल पहले मुझे एक रिपोर्ट में स्वाइन फ्लू की पुष्टि हुई थी। यहाँ समूची व्यवस्था चरमराई हुई है। जब तक आपका वास्ता यहाँ के अस्पताल, थाने, कोर्ट जैसी मूलभूत जरूरतों वाली संस्थाओं और उनके तथाकथित रखवालों यानी डॉक्टर, पुलिस या वकील से नहीं पड़ता तब तक आपको भी मेरी ही तरह शायद यही गुमान होगा कि हमारे लिए सरकार और प्रशासन ने बहुत कुछ इंतेजाम कर रखे हैं।

मैं और लोगों की तरह बदस्तूर पूरे साल फैलने वाली इन खतरनाक बीमारियों, और हर साल ही सरकार की चाक चौबंद तैयारियों के बारे में पढता रहता था। हालांकि हर साल ही सैकड़ों हजारों लोग इन बीमारियों से मरते भी हैं मगर मुझे ऐसा लगता था कि कुछ खामियां भले ही हों मगर प्रशासन भी मुस्तैद तो हो ही जाता है। इसके उलट, सच तो ये है कि मीडिया में सरकारी तैयारी के जो दावे किये जाते हैं, उनका एक प्रतिशत भी सही नहीं होता है और यही वजह है कि सिर्फ वही मरीज इन बीमारियों के मृत्यु पाश से बच पाते हैं, जिनकी खुद की इम्युनिटी उन्हें बचा लेती है।

हुआ यूँ कि मेरी तबियत दो तीन दिन से ख़राब चल रही थी। शहर में बहुत बुरी तरह से स्वाइन फ्लू फैला हुआ था। रोज ही कई लोगों की मौत हो रही थी।  अखबार में जितनी जगह में स्वाइन फ्लू के कहर और मौतों की ख़बरें छप रही थीं, उतनी ही जगह में प्रदेश सरकार की तरफ से बिलकुल देवदूत वाले अंदाज में सीएमओ यादव जी के हवाले से चाक चौबंद व्यवस्था की ख़बरें भी आ रही थीं। मसलन, स्वाइन फ्लू से न घबराएं। शहर के हर बड़े अस्पताल में इसके इलाज की ख़ास तैयारी है। pgi, मेडिकल कॉलेज समेत कई जगह आधुनिक टेस्ट लैब है, जहाँ कुछ ही घंटों में जांच करके रिपोर्ट मिल जा रही हैं।

स्वाइन फ्लू की एक मात्र दवा पूरे लखनऊ में भारी मात्रा में उपलब्ध है, फ्री मिल रही है। ये भी बताया जा रहा था रोज के रोज कि कैसे किसी एक मरीज में जैसे ही पुष्टि होती है तो यादव जी समेत कैसे पूरा स्वास्थ्य विभाग कैसे चौकन्ना हो जा रहा है। मरीजों से अनुरोध किया जा रहा था कि रिपोर्ट में स्वाइन फ्लू निकलने पर घर पर ही रहें। सरकारी एम्बुलेंस आएगी और मरीज को अस्पताल ले जायेगी। यही नहीं, साथ में स्वास्थ्य विभाग का एक दस्ता भी आएगा, जो कि आपके अड़ोसी पडोसी रिश्तेदार परिवार सभी को स्वाइन फ्लू की दवा मुफ़्त में बांटेगा ताकि वह भी सुरक्षित रहें।

बहरहाल, ऐसे माहौल में मेरे बड़े भैया के एक दोस्त की लखनऊ के सबसे प्रतिष्ठित अस्पताल यानी pgi में स्वाइन फ्लू से मौत की खबर आई। वह विदेश में रहते थे और बरसों बाद चंद रोज पहले ही प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के हाथों अपनी जान गंवाने लखनऊ आये थे। इस खबर से डर कर ही मैंने डॉ लाल पैथोलॉजी वालों को घर पर बुलाया और हजारों रुपये खर्च करके स्वाइन फ्लू की जांच करा ली। उसके बाद मुझे अंदर से कुछ बेहतर लगने लगा तो मैं दूसरे ही दिन अपने ऑफिस चला गया। ऑफिस में पहुंचा ही था तो फ़ोन आया पैथालॉजी से कि आपको स्वाइन फ्लू है आप तुरंत एडमिट हो जाइए। मेरे पाँव तले जमीन खिसकी मगर मीडिया का आदमी होने के नाते अपने पत्रकार बंधुओं पर भरोसा करते हुए पुराने पेपर खंगाल कर उस नंबर पर फ़ोन किया, जिसे यादव जी हर रोज स्वाइन फ्लू की हेल्प लाइन कहके छपवा रहे थे।

यादव जी कह रहे थे कि आप इस नंबर पर फ़ोन करिये और भूल जाइए, बाकी काम हम करेंगे और आपको घर से एम्बुलेंस भेज कर बुलवायेंगे। मैंने फ़ोन किया तो हेल्प लाइन वालों ने कहा कि आप पहले pgi जाइए और जांच कराइये। हमारी यानी सरकारी रिपोर्ट निकलेगी तभी माना जाएगा कि आपको स्वाइन फ्लू है। खैर, मैंने टैक्सी मंगाई और मास्क भी। मेरे साथ मेरा एक पुराना कर्मचारी था तो मगर उसके पसीने छूट रहे थे और वह सोच रहा था कि कैसे इनसे पिंड छुड़ा कर भागूं।

टैक्सी वाला भी मास्क देख कर और pgi का नाम सुनकर डर गया और मना करने लगा तो उससे झूठ बोला कि भैया सिर्फ बचाव के लिए लगाया है कि हम लोगों को न हो जाए। खैर सुबह 11 बजे ही pgi पहुंचे, वहां स्वाइन फ्लू की जांच कहाँ होगी, यही पता करने में दो घंटे निकल गए। जांच केंद्र मिला तो जांच करने वाले डॉक्टर नदारद थे। डेढ़ दो घंटे बाद आये और जांच करके कहा कि कल आईयेगा रिपोर्ट लेने। फिर वहां मैंने स्वाइन फ्लू की दवाई लेने की कोशिश की तो कोई डॉक्टर कर्मचारी दवाई देना या भर्ती करना तो दूर बात ही करने को नहीं तैयार था।

मैंने पढ़ा था कि अगर दो दिन के भीतर दवा लेनी नहीं शुरू की तो फिर खुद बच गए तो ठीक वरना कोई नहीं बचा पायेगा। मुझे तो दो दिन आलरेडी हो चुके थे इसलिए मैं चाहता था कि मुझे कोई भर्ती करे न करे, मगर कम से कम दवा तो दे दे। दवा खुले बाजार में उपलब्ध नहीं थी। केवल pgi और लोहिया जैसे अस्पतालों में ही मिलेगी, ऐसा बताया जा रहा था। इसलिए मैंने वहां बहुत अनुरोध किया। मेरे साथ वहां कई लोग स्वाइन फ्लू की पुष्टि की सरकारी रिपोर्ट लेकर खड़े थे। कुछ ठीक ठाक दिख रहे थे तो कुछ जमीन पर निढाल पड़े थे।

ऐसे ही एक मुस्लिम महिला, जिनके पति सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के छोटे मोटे नेता थे, भी निढाल पड़ीं थीं। उनके पति ने कई दिग्गज लोगों से सोर्स लगाया था और वो बहुत हंगामा मचा रहे थे मगर न तो कोई उन्हें भर्ती करने को तैयार था और न ही कोई दवा ही दे रहा था। यहाँ तक की उन्हें या हमें कोई डॉक्टर देखने तक नहीं आया।  फिर मैंने भी भाजपा के एक कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री से सिफारिश लगवाई। उन्होंने व्यक्तिगत रूचि लेते हुए कई बार फ़ोन किया और कई लोगों को किया। तब कहीँ जाकर शाम को एक डॉक्टर भुनभुनाता हुआ बाहर आया। उसने आते ही कहा कि आप लोहिया जाइए। यहां वार्ड फुल है। गिनती के चार छः बेड हैं। दवा भी नहीं है। आप वहीँ से ले लीजिये। मेंरे बगल में खड़े समाजवादी नेता ने अपना परिचय देते हुए उनके हाथ जोड़कर विनती तो डॉक्टर भड़क गया और बोला सरकार तुम्हारी और दोष हम पर लगा रहे हो। जाओ अखिलेश से कहो कि बेड बढ़ाएं यहाँ या दवा पहुंचवाये। ये कह कर डॉक्टर निकल लिया।

समाजवादी पार्टी वाले सज्जन फिर कहाँ गए, मुझे पता नहीं मगर मेरी आँखों के सामने तो मौत ही नाच रही थी इसलिये वहां से मैं भागा शहर के दूसरे कोने में स्थित लोहिया अस्पताल में। मेरे हितैषी नेता ने अब लोहिया में फ़ोन करना शुरू किया। लंबे रास्ते में ही मैंने शहर के सबसे महंगे से लेकर हर अच्छे निजी अस्पताल में भी पता किया पर सबने मना कर दिया कि न तो उनके पास इसकी दवा है और न ही वे स्वाइन फ्लू का कोई मरीज भर्ती करते हैं। यानी कुल मिलाकर मेरी जिंदगी या तो सीएमओ यादव जी और अखिलेश यादव जी के हाथ में थी या फिर खुद मेरी रोग प्रतिरोधक क्षमता के हाथ में।

लिहाजा मैंने सीएमओ यादव जी तक तगड़ी सिफारिश लगवाई। सिफारिश वाकई तगड़ी थी इसलिए मेरे लोहिया पहुँचने से पहले खुद यादव जी का मेंरे पास फ़ोन आया। उन्होंने बिलकुल उसी अंदाज में मुझे न घबराने को कहा, जैसे कि वह न्यूज़ पेपर के जरिये लखनऊ भर को कह रहे थे। उन्होंने कहा कि लोहिया में आप फलाने से मिलिए आपको दवा मिल जायेगी। मैंने बहुत अनुरोध किया कि डॉक्टर साहब मुझे भर्ती कर लीजिये पर वह नहीं माने। उन्होंने कहा कि अभी कहीं जगह नहीं है आप घर जाइए। मैंने याद दिलाया कि वह एम्बुलेंस, वह पूरे मोहल्ले, परिवार को दवाई तो वह भड़क गए। बोले ऐसा क्या हो गया है, जो आप लोग बात का बतंगड़ बना देते हैं। आप अपने पर फोकस कीजिये, शहर की चिंता मुझे करने दीजिये। मैं कर तो रहा हूँ आपकी मदद।

मैं किसी तरह रात 8 बजे पहुंचा लोहिया तो जिस फलाने से मिलने को यादव जी ने कहा था, उन्होंने छूटते ही कहा कि दवा ख़त्म हो गयी है, कल आइये। फिर घंटों चिरौरी करने, सिफारिश के फ़ोन करने, यादव जी से कई राउंड फ़ोन पर अनुरोध कहा सुनी करने के बाद मुझे केवल एक दिन की खुराक दी गयी यानी दो कैप्सूल। बाकी दो दिन की दवा के बारे में कहा गया कि pgi से लीजिएगा। अब यहाँ कुछ नहीं मिलेगा। पर मेरे लिए देवदूत बन कर उतरे उन भाजपा नेता ने मुझे आश्वस्त किया कि कल तक कहीं से भी वह मुझे बाकी की दवा भी दिलवा देंगे। और वाकई उन्होंने दिलवा भी दी। खैर, कुछ दिन के कष्ट के बाद मैं ठीक हो गया और वापस अपनी जिंदगी में रम गया।

मगर आज दो साल बाद फिर अख़बारों में यादव जी की चाक चौबंद व्यवस्था वाले बयान, डेंगू से मरते लोग, अस्पतालों में हंगामा करते लोगों की ख़बरें देख कर मन में फिर वही दहशत ताजा हो गयी। मुझे याद है कि मेरा स्वाइन फ्लू ठीक होने के चंद दिनों बाद ही मुलायम सिंह यादव के भी बीमार होने की खबर आई थी। पहले तो एक दो दिन सबसे कद्दावर यादव जी pgi में रहे मगर जैसे ही यहाँ के डॉक्टरों ने उन्हें डराया कि स्वाइन फ्लू हो सकता है, वैसे ही वह उड़न खटोले से दिल्ली के मेदांता अस्पताल में पहुंच गए। और क्यों न जाते भला, जो सच्चाई मुझे मौत के मुहं में जाकर पता चली, वह सच्चाई तो वह तब से जानते हैं, जब 1989 में उन्होंने पहली बार बड़े बड़े वादे करके सत्ता हथियाई थी।

आज उनके लड़के के हाथ में सत्ता है। इतने बरस तक खुद और अब उनकी औलाद के हाथ में उत्तर प्रदेश होने के बावजूद जब वह खुद अपनी ही सरकार के दावों पर यकीं नहीं कर पा रहे हैं और अपनी जान बचाने के लिए अपने ही प्रदेश से पलायन कर जा रहे हैं तो भला हम आप क्यों न घबराएं? लेकिन किया क्या जाए? कल मुलायम थे, आज अखिलेश हैं, कल उनके नाती पोते इस प्रदेश के राजा बनेंगे…. और हमारे आपके जैसे लोग यूँ ही अखबार की ख़बरों को सच मानकर सरकारी इंतजामों की देहलीज पर सर पटकते रहेंगे।

लेखक अश्विनी कुमार श्रीवास्तव आईआईएमसी से पत्रकारिता की शिक्षा लेने के बाद नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान और बिज़नस स्टैण्डर्ड जैसे अखबारों में दिल्ली में 12 साल तक पत्रकारिता किया. फिलहाल अपने गृह नगर लखनऊ में अपना व्यवसाय कर रहे हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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