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सुपारी पत्रकारिता के लखनवी ‘नायक’ जगदीश नारायण शुक्ला!

रिटायर आईएएस आलोक रंजन के ‘मोहरे’ हैं लखनऊ के एक संपादक जगदीश नारायण शुक्ला? लखनऊ में एक चर्चा आजकल बहुत आम है. निष्पक्ष प्रतिदिन नामक अखबार के बुजुर्ग मालिक और संपादक जगदीश नारायण शुक्ला क्या पूर्व मुख्य सचिव और अभी प्रदेश सरकार के सलाहकार बनकर लाल बत्ती की सुविधा ले रहे आलोक रंजन के मोहरे हैं? वजह ये कि जब दीपक सिंघल मुख्य सचिव बनाए गए तो जगदीश नारायण शुक्ला ने दो दो पीआईएल फाइल किया कि हे कोर्ट साहब, दीपक सिंघल तो जूनियर हैं और दो चार सीनियर आईएएस को दरकिनार कर उन्हें इतना बड़ा पद दे दिया गया है. ये अलग बात है कि शुक्ला जी को कोर्ट ने न सिर्फ झिड़का बल्कि पच्चीस हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया.

रिटायर आईएएस आलोक रंजन के ‘मोहरे’ हैं लखनऊ के एक संपादक जगदीश नारायण शुक्ला? लखनऊ में एक चर्चा आजकल बहुत आम है. निष्पक्ष प्रतिदिन नामक अखबार के बुजुर्ग मालिक और संपादक जगदीश नारायण शुक्ला क्या पूर्व मुख्य सचिव और अभी प्रदेश सरकार के सलाहकार बनकर लाल बत्ती की सुविधा ले रहे आलोक रंजन के मोहरे हैं? वजह ये कि जब दीपक सिंघल मुख्य सचिव बनाए गए तो जगदीश नारायण शुक्ला ने दो दो पीआईएल फाइल किया कि हे कोर्ट साहब, दीपक सिंघल तो जूनियर हैं और दो चार सीनियर आईएएस को दरकिनार कर उन्हें इतना बड़ा पद दे दिया गया है. ये अलग बात है कि शुक्ला जी को कोर्ट ने न सिर्फ झिड़का बल्कि पच्चीस हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया.

चर्चा है कि इस पीआईएल के पीछे आलोक रंजन का दिमाग था. आलोक रंजन ने अपने मुख्य सचिव वाले कार्यकाल के दौरान जगदीश नारायण शुक्ला के अखबार को दो ढाई करोड़ का विज्ञापन सैंक्शन किया था. दीपक सिंघल के हटने के बाद जिन्हें प्रमुख सचिव बनाया गया है तो वह तो करीब 17 से ज्यादा आईएएस अफसरों से जूनियर हैं. शुक्ला जी अब इनके खिलाफ कोई पीआईएल नहीं कर रहे. यही नहीं, शुक्ला जी के अखबार का रजिस्ट्रेशन कैंसल हो चुका है, फिर वह किस आधार पर अखबार छाप रहे और कैसे विज्ञापन ले रहे, यह भी एक बड़ा सवाल है.

हां, शुक्ला जी लगातार दीपक सिंघल के खिलाफ अनाप शनाप तथ्यहीन खबरें छापकर उसे प्रसारित करने का काम जारी रखे हुए हैं. इससे साबित होते है कि शुक्ला जी के कंधे पर कोई दूसरा बंदूक रखकर फायरिंग कर रहा है. क्या इतने बुजुर्ग संपादक और पत्रकार को ऐसी हरकत करनी चाहिए? क्या सुपारी पत्रकारिता के ऐसे चलन को जारी रखने वालों को एक्सपोज नहीं किया जाना चाहिए? शुक्ला जी नौकरशाही के बीच ब्लैकमेलिंग के पर्याय हैं.

शुक्ला जी के दहशत का आलम ये है कि कोई भी नौकरशाह नहीं चाहता कि उनके राडार पर आए क्योंकि शुक्ला जी जिसे राडार पर लेते हैं उसे कोर्ट से लेकर अपने अखबार तक में फुटबाल बना डालते हैं. शांत न्योछावर मिलने पर ही होते हैं. ऐसा पहली बार हुआ कि कोई नौकरशाह उनसे कोर्ट में जमकर लड़ा. वे हैं दीपक सिंघल. कोर्ट में पिट जाने के बाद शुक्ला जी अब दीपक सिंघल के पीछे पड़कर भड़ास निकाल रहे हैं. दीपक सिंघल ने उन्हें घास नहीं डाला तो वे अनाप शनाप खबरें छापने पर मजबूर हो रहे हैं. सबको पता है कि इसके पीछे मकसद क्या है. फिलहाल मैं शुक्ला जी यह सारी बातें मीडिया के लोगों के बीच छोड़े जा रहा हूं. उम्मीद करता हूं कि भड़ास इसे प्रकाशित करेगा ताकि सुपारी पत्रकारिता के ब्लैकमेलिंग पत्रकारिता वाले चेहरों का खुलासा हो सके.

लखनऊ से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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