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पत्रकारों के सामने मौजूदा चुनातियों पर यशवंत लड़ते हैं, प्रेस क्लब पदाधिकारी दुम दबाए रहते हैं…

इन बातों से आप सहमत हों तो पीसीआई इलेक्शन में बैलट नंबर 33 पर मुहर मार कर यशवंत को सबसे ज्यादा वोटों से विजयी बनाइए…

अपनी प्रासंगिकता खो रहे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के चुनाव में इस बार नई बयार देखी जा रही है. मैनेजिंग कमेटी मेंबर के लिए 33 नंबर पर चुनाव लड़ रहे यशवंत सिंह उन पत्रकारों के लिए आशा की नई किरण हैं, जो अपनी नौकरी के चक्कर में मीडिया मालिकों और कुछ कारपोरेट संपादकों की मनमानी सहने पर मजबूर रहते हैं. उनसे बातचीत के आधार पर यह लेख लिख रहा हूं…

इन बातों से आप सहमत हों तो पीसीआई इलेक्शन में बैलट नंबर 33 पर मुहर मार कर यशवंत को सबसे ज्यादा वोटों से विजयी बनाइए…

अपनी प्रासंगिकता खो रहे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के चुनाव में इस बार नई बयार देखी जा रही है. मैनेजिंग कमेटी मेंबर के लिए 33 नंबर पर चुनाव लड़ रहे यशवंत सिंह उन पत्रकारों के लिए आशा की नई किरण हैं, जो अपनी नौकरी के चक्कर में मीडिया मालिकों और कुछ कारपोरेट संपादकों की मनमानी सहने पर मजबूर रहते हैं. उनसे बातचीत के आधार पर यह लेख लिख रहा हूं…

देश के बड़े मीडिया हाउस जिसमें आनंद बाजार पत्रिका से लेकर हिंदुस्तान और टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे नामी बैंड शामिल हैं, मंदी का हवाला देकर अक्सर छंटनी शुरू कर देते हैं. एक तुगलकी फैसले से सैकड़ों/हजारों पत्रकार सड़क पर आ जाते हैं. लेकिन पत्रकारों के हितों के लिए बनी प्रेस क्लब ऑफ इंडिया कभी अपनी जुबान नहीं खोलती. मीडिया संस्थानों के अत्याचार का शिकार कई बार प्रेस क्लब के मौजूदा सदस्य भी हो जाते हैं. लेकिन इस संस्था के कर्णधारों ने तो मानो पत्रकारों की ओर से आंख ही मूंद लिया है.

इंसाफ के लिए आवाज उठाने का दंभ भरने वाले प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के मौजूदा पदाधिकारियों का एकमात्र एजेंडा है होटल मैनेजर की तरह क्लब को चलाना ताकि पीने-खाने वालों को कोई दिक्कत नहीं हो. वैचारिक विमर्श के लिए कभी कभी प्रोग्राम रखा जाता है. लेकिन पत्रकारों के सामने मौजूदा चुनातियों पर कोई भी पदाधिकारी जुबान नहीं खोलता. क्योंकि इसके लिए आंदोलन और संघर्ष की लंबी राह पकड़नी होगी.

मैं (यशवंत सिंह की जुबानी) मांग करता हूं कि प्रेस क्लब का चुनाव लड़ने वाले सभी पैनल के लोग घोषणा करें कि…

1. जीतने पर हम उन मीडिया हाउस का विरोध करेंगे जो बिना ऑफर/ज्वाइनिंग लेटर दिये पत्रकारों को बेगारी मजदूर की तरह रखते हैं. ऐसे मीडिया संस्थानों की भरमार हैं.
2. छंटनी के लिए उसी तरह के नियम बने जैसे भारत सरकार के केंद्रीय कर्मचारियों के लिए हैं.
3. दूरदर्शन, लोकसभा टीवी और राजसभा टीवी में रखे गए सभी मीडिया कर्मियों को नियमित किया जाये और उन्हें एक ग्रेड की सैलरी दी जाये.
4. संपादकों की नियुक्ति और उनसे लिए जाने वाले काम के संबंध में मीडिया संस्थान अपनी नीति घोषित करें ताकि बैकडोर से संपादकों पर अनुचित कार्यों के लिए दबाव हटाया जा सके.
5. प्रेस क्लब में आने वाले सभी मेंबर को तुरंत और बेहतरीन सुख-सुविधायें देंगे.
6. किसी भी पत्रकार की नौकरी में रहते हुए मृत्यु होने पर सरकार की तरफ से आश्रित बीबी-बच्चों को वो सभी सुविधायें मिलें, जिससे उनका दैनिक जीवन सुगमता से चलता रहे.

इन मांगों को कोई पैनल माने या नहीं माने, यशवंत जीतते हैं तो इसके लिए एक लंबी लड़ाई जरूर लड़ेंगे, भले ही इसके लिए यशवंत सिंह भड़ास को सड़क पर उतरना पड़े.

लेखक ए राम पांडेय पत्रकार हैं और फिलहाल एक निजी विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाते हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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