राम बहादुर राय को वोटिंग का अधिकार देना पड़ा, प्रेस क्लब प्रबंधन झुका, देखें वीडियो

प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में राम बहादुर राय को वोट देने का अधिकार क्लब प्रबंधन को देने के लिए मजबूर होना पड़ा. ड्यूज न जमा करने का हवाला देकर राय साहब की सदस्यता रद्द कर दी गई थी. इसके खिलाफ राय साहब ने प्रेस क्लब चुनाव के दौरान विरोध का ऐलान कर दिया था. वे चुनाव के दिन मौके पर पहुंचे और वोट देने का अधिकार मांगा. इससे हड़बड़ाए क्लब प्रबंधन ने तुरंत उनका ड्यूज जमा कराने के बाद उन्हें वोटिंग का राइट दे दिया.

देखें मौके से तैयार किया गया वीडियो….

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यशवंत जैसे जुझारू और क्रांतिकारी व्यक्तित्व का प्रेस क्लब में जीतकर आना बहुत जरूरी था

Ashwini Kumar Srivastava : अपने एक फेसबुक कमेंट में हमारे प्रिय सखा Satyendra PS जी ने इस बार के दिल्ली प्रेस क्लब के चुनाव को छात्र संघ चुनाव सरीखा करार दिया था। क्योंकि उनकी नजर में इस बार का चुनाव दरअसल, छात्र संघ चुनाव जैसा ही रोमांचक और हंगामाखेज था। इसकी वजह यह थी क्योंकि इस बार मीडिया के दो ऐसे अराजक मगर क्रांतिकारी साथी चुनाव मैदान में उतर गए थे, जिनका लोहा तकरीबन हर पत्रकार मानता है…चाहे वह उनका विरोधी हो या समर्थक। और ये दो अद्भुत खिलाड़ी हैं Abhishek Srivastava और Yashwant Singh.

ऐन नरेंद्र मोदी की तरह इन दोनों को ही नजरंदाज कर पाना किसी के लिए भी नामुमकिन ही है। आप मीडिया में रहकर या तो इन्हें गरियाएँगे या फिर इनके मुरीद होकर इन्हें प्यार करेंगे। इन्हें नजरअंदाज तो आप कतई कर ही नहीं सकते। बहरहाल, इस छात्र संघी टाइप प्रेस क्लब चुनाव के नतीजे आ गए और इन दोनों महारथियों में से एक विजयश्री पा गया तो एक को पराजय हाथ लगी। अभिषेक की जीत से जहां मुझे और उनके मित्रों को अपार खुशी मिली है, वहीं यशवंत जी की हार से गहरा दुख भी हुआ है। अभिषेक की जीत पर तो मैंने काफी कुछ लिख भी दिया लेकिन मुझे लगता है कि यशवंत जी की हार पर भी कुछ लिखा जाना चाहिए।

यशवंत जी ने प्रेस क्लब के चुनाव में उतरने का ऐलान अचानक ही किया था। वह भी उस घटना के कुछ समय बाद ही, जब उन पर प्रेस क्लब के बाहर ही कुछ अराजक पत्रकारों ने हमला कर दिया था। मेरा ऐसा मानना है कि यशवंत जी ने उन हमलावरों की भाषा में उनसे पलटकर मारपीट करने या दबंगई का जवाब दबंगई से देने की बजाय क्रांतिकारी तरीके से प्रेस क्लब में चुनाव लड़कर देने का फैसला किया था। उनका यह तरीका एकदम वैसा ही है, जैसा कभी उन्होंने मीडिया की नौकरी छोड़कर भड़ास के जरिये मीडिया के अंदर की गंदगी को आईना दिखा कर किया था। मैं यह तो नहीं जानता कि यशवंत जी कोई महापुरुष हैं या साधारण इंसान, लेकिन इतना जानता हूँ कि अपने साथ हुए किसी अन्याय/शोषण/भेदभाव आदि के खिलाफ सबको इकट्ठा करके एक सार्वजनिक मंच से लड़ने वाला दरअसल वास्तविक क्रांतिकारी ही होता है।

महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में ट्रेन से मारपीट कर धकिया दिए गए। वह वहां बैरिस्टर थे तो जाहिर है, मारपीट करने वाले उन अंग्रेजों से व्यक्तिगत लड़ाई लड़कर भी वह उन्हें सबक सिखा सकते थे। लेकिन उन्होंने उस घटना को श्वेत बनाम अश्वेत और रंगभेद का एक सार्वजनिक मुद्दा बनाया और ऐसी लड़ाई लड़ी, जिसने दक्षिण अफ्रीका की शक्लो सूरत ही बदल दी। उनकी मृत्यु के बाद भी नेल्सन मंडेला जैसे नेता गांधी के उस प्रतिरोध के तरीके से सीख कर क्रांति करते रहे।

यशंवत जी भी कमोबेश अपने जीवन में यही कर रहे हैं। कम से कम मीडिया के क्षेत्र में अब तक उन्होंने ऐन गांधीवादी तरीके से ही हर पीड़ित, शोषित, दमित और परेशान पत्रकार या मीडियाकर्मी को एक मंच दिया है। और उनका दिया हुआ मंच हर बार खुद यशवंत जी की किसी व्यक्तिगत पीड़ा या संघर्ष से ही तैयार हुआ है। ऐसे जुझारू और क्रांतिकारी व्यक्तित्व का प्रेस क्लब में जीतकर आना बहुत जरूरी था क्योंकि इस जीत से अभिषेक की जीत में भी चार चांद लग जाते। ये दोनों जुझारू व्यक्ति अगर प्रेस क्लब में चुनकर साथ ही जाते तो दोनों की उपस्थिति से प्रेस क्लब और पत्रकारों का काफी भला होता। भले ही यह दोनों विपरीत ध्रुव हों, चुनाव में लड़े पैनल के हिसाब से लेकिन जीतने के बाद किसी टकराव की संभावना के बावजूद टकराव से जो निकल कर आता, वह प्रेस क्लब या पत्रकारों के लिए मंथन में मिले अमृत से कम नहीं होता।

बहरहाल, ‘एक हार से कोई फकीर तो एक जीत से कोई सिकंदर नहीं बनता’ की तर्ज पर दोनों के लिए मेरी बिन मांगे ही एक सलाह है कि इस जीत-हार को भूलकर भविष्य में और बड़े लक्ष्यों के लिए मेहनत करें।

आईआईएमसी से पढ़ाई करने के बाद बिजनेस स्टैंडर्ड समेत कई अखबारों में काम करने वाले अश्विनी कुमार श्रीवास्तव इन दिनों रीयल इस्टेट फील्ड में बतौर उद्यमी सक्रिय हैं. उनके लिखे उपरोक्त स्टेटस पर आए इस कमेंट को पढ़ें….

Yashwant Singh  शुक्रिया अश्विनी भाई. मैंने तो अपना वोट Abhishek Srivastava भाई को भी दिया था. दो में से कोई एक भी जीत गया है तो समझिए हम दोनों ही जीत गए हैं. बाकी जिंदा कौमें पांच साल तो नहीं, पर साल भर इंतजार कर लिया करती हैं. मुझे तो उस दिन का इंतजार रहेगा जब हम सब प्रेस क्लब के सदस्य साथी इतने लोकतांत्रिक हो जाएं कि एक शाम इकट्ठे बैठकर खाते पीते एक ड्रा निकालें और जो जो नाम निकले, उन्हें पदाधिकारी बनाते जाएं साल भर के लिए. अगले साल फिर यही प्रक्रिया. पर कुछ लोग प्रेस क्लब को जबरन राजनीति का अखाड़ा बनाए हुए हैं और हर चीज को वैचारिक चश्मे से देखते हुए भेड़िया आया भेड़िया आया करते रहते हैं. अगले साल हम लोग खुद अपना पैनल उतारेंगे. दिल से आभार, इतने प्यार भरे शब्दों से नवाजने और लिखने के लिए. तव यू अश्विनी भाई.

Abhishek Srivastava गुरु, आपका और मेरा होना बराबर समझें। भेडि़या तो पीछे था और अब भी उसका खतरा बना हुआ है। इसमें कोई शक़ नहीं है हमें।

Yashwant Singh हा हा… तूहूं मरदे… केहूरो भेड़िया ना बा… लोकतंत्र में किसी मसले पर कई किस्म के विचार हो सकते हैं… सबका स्वागत करना चाहिए… सब पत्रकार साथी हैं. सबका कोई न कोई सोचने का तरीका है. कोई लेफ्ट, कोई राइट, कोई न्यूट्रल, कोई एनार्किस्ट, कोई कम्यूनल, कोई डेमोक्रेटिक… तरीके से सोचता जीता है… भेड़िया रोग से मुक्त होना चाहिए. सहज मनुष्य बनना और बनाना चाहिए. कई बार हम किसी खास मनोअवस्था में किसी खास किस्म के जीव को देखने लग जाते हैं… जबकि वो होता नहीं है… 🙂

Abhishek Srivastava आप राजनीतिविज्ञान को मनोविज्ञान बना देंगे महराज

अब अभिषेक श्रीवास्तव के बारे में अश्विनी कुमार श्रीवास्तव ने जो फेसबुक पर लिखा है, उसे पढ़ें :

Ashwini Kumar Srivastava : दिल्ली प्रेस क्लब के चुनाव में Abhishek Srivastava और उसके पैनल ने विजयश्री हासिल कर ली है। हालांकि अभिषेक का जैसा विराट व्यक्तित्व, अद्भुत समझ, समाज से गहरा सरोकार, जबरदस्त संघर्षशीलता और अपार लोकप्रियता रही है, उस हिसाब से यह चुनाव या यह जीत उसके लिए कोई मायने नहीं रखती। मगर मैं जानता हूँ कि प्रेस क्लब और बाकी पत्रकारों के लिए जरूर यह जीत खासी अहम है। जीत की इस खुशी में मुझे एक दुख भी है…और वह है Yashwant Singh के हारने का। यशवंत जी पर भी मैं अपनी किसी अगली पोस्ट में लिखूंगा लेकिन फिलहाल अभी अभिषेक की ही बात करते हैं।

मुझे ठीक से तो याद नहीं लेकिन शायद मैं 2001-02 के उस दौर में अभिषेक से पहली बार मिला था, जब वह आईआईएमसी में मेरे ठीक बाद वाले बैच में पढ़ रहा था। तब उसके बाकी बैचमेट सामान्य आईआईएमसीएन की ही तरह बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों में नौकरी पाने के लिए इस कदर आतुर रहते थे कि किसी भी सीनियर आईआईएमसीएन को पाकर न सिर्फ निहाल हो जाते थे बल्कि तरह तरह के सवाल पूछकर जान भी खा जाते थे।

जबकि अभिषेक इन सबसे अलग था। वह तब भी जेनएयू और अन्य सार्वजनिक मंचों या राजनीतिक/सांस्कृतिक संगठनों में जोरदार तरीके से एक्टिव था। मैं नवभारत टाइम्स में नौकरी कर रहा था और मैं भी संयोग से जेनएयू में जन संस्कृति मंच से जुड़ा हुआ था और मित्रों के साथ राजनीतिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया करता था।

आईआईएमसी करने के बाद के बरसों में अभिषेक ने शायद ही देश का कोई ऐसा मीडिया संस्थान हो, जहां पर सिलेक्शन प्रोसेस में टॉप में अपनी जगह न बनाई हो और शायद ही कोई ऐसा संस्थान हो, जहां उसने नौकरी का एक साल भी पूरा किया हो। वह इसलिए क्योंकि मीडिया की नौकरी उसके लिए और वह नौकरी के लिए बने ही नहीं हैं।

टाइम्स ग्रुप में भी वह मेरे साथ कुछ समय रहा। लेकिन उसके अभूतपूर्व क्रांतिकारी स्वभाव ने टाइम्स ग्रुप में संपादकीय विभाग से लेकर मैनेजमेंट तक में जबरदस्त खलबली मचा दी थी। बतौर सीनियर भले ही अभिषेक मुझे हमेशा से सम्मान देता रहा हो लेकिन वहां रहने के दौरान उसने मुझे भी कभी नहीं बख्सा और लगातार मेरी भी गलतियां सार्वजनिक तौर पर अखबार रंग कर बाकी सभी जूनियर-सीनियर्स की तरह खिल्ली उड़ाने के अपने रोजमर्रा के कार्यक्रम में शामिल कर लिया था।

हालांकि उसी दौर में देर रात हम लोग महफिलों में भी साथ ही शरीक भी होते थे। क्योंकि मैंने कभी उसकी इस बात का बुरा ही नहीं माना। वह इसलिए क्योंकि मैं या जो भी शख्स अगर अभिषेक को जानता-पहचानता होगा, तो उसे यह अच्छी तरह से पता होगा ही कि अभिषेक अपने आदर्श, मूल्य और विचारधारा के तराजू पर सबको बराबर तौलता है।
अभिषेक की सबसे खास बात, जिसने मुझे हमेशा ही उसका फैन बनाया है, वह यह है कि अपने 10-12 साल के मीडिया कैरियर में मुझे अभिषेक के अलावा ऐसा एक भी पत्रकार नहीं मिला, जिसे हर मीडिया संस्थान या बड़े पत्रकार ने सर माथे पर बिठाया हो लेकिन उसके बावजूद उसने नौकरी या मीडिया से जुड़े किसी भी अन्य फायदे के लिए कभी अपनी विचारधारा, क्रांतिकारी स्वभाव और व्यक्तित्व में एक रत्ती का भी बदलाव न किया हो। मगर अभिषेक ऐसा ही है। मीडिया में सबसे अनूठा और एकमात्र….सिंगल पीस।

एक से बढ़कर एक नौकरियां उसे लगातार बुलाती भी रहीं, बुलाकर पछताती भी रहीं पर अभिषेक बाबू नहीं बदले।

अंग्रेजों के जमाने के जेलर की तरह इतनी नौकरियां बदलने के बाद भी अगर अभिषेक नहीं बदले तो इस चुनाव की जीत से भी अभिषेक के बदलने की कोई गुंजाइश मुझे नहीं दिखती। जाहिर है, इसका फायदा अब पत्रकारों और प्रेस क्लब को ही होगा….क्योंकि वहां चुनाव जीत कर भी अभिषेक के न बदलने का सीधा मतलब यही है कि अब वहां के हालात और राजनीति जरूर कुछ न कुछ तो बदलने ही लगेगी।

बहरहाल, यही उम्मीद है कि सार्वजनिक/राजनीतिक जीवन में पहला औपचारिक कदम रखकर अभिषेक ने जब सही दिशा पकड़ ही ली है तो कम से कम अब भविष्य में हमें वह इसी क्षेत्र में और बड़ी भूमिकाएं निभाते हुए भी नजर आएंगे। ढेर सारी बधाइयां और शुभकामनाएं…

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प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में यशवंत हारे, देखें नतीजे

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Yashwant Singh : टोटल 1750 वोट पड़े हैं जिनमें 500 वोटों की गिनती हो चुकी है। इस आधार पर कहें तो सत्ताधारी पैनल क्लीन स्वीप की तरफ है। मैनेजिंग कमेटी के लिए जो 16 लोग चुने जाने हैं उनमें 500 वोटों के आधार पर मेरी पोजीशन 23 नम्बर पर है। चमत्कार की कोई गुंजाइश आप पाल सकते हैं। मैंने तो हार कुबूल कर लिया है। प्रेस क्लब के इस चुनाव में शामिल होकर इस क्लब को गहरे से जानने का मौका मिला जो मेरे लिए एक बड़ा निजी अनुभव है। नामांकन करने से लेकर बक्सा सील होने, बैलट वाली मतगणना देखना सुखद रहा। अब साल भर तैयारी। अगले साल फिर लड़ने की बारी। सपोर्ट के लिए आप सभी को बहुत बहुत प्यार। इतना समर्थन देखकर दिल जुड़ा गया। ये अलग बात है कि जो क्लब के टोटल वोटर है, उनमें बड़ी संख्या में मुझसे और मैं उनसे अपरिचित हूं। साल भर में इन सबसे जुड़ने की कोशिश किया जाएगा और अगली साल ज्यादा प्रोफेशनल तरीके से लड़ा जाएगा।

कल मतगणना शुरू होने के ठीक बाद उपरोक्त स्टेटस यशवंत ने फेसबुक पर डाला था.

Abhishek Srivastava : प्रधानजी को नापसंद लुटियन की दिल्ली से खास खबर- प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के पत्रकारों ने एक स्वर में आरएसएस समर्थित चुनावी पैनल को किया खारिज, यथास्थिति कायम। गौतम-विनय-मनोरंजन का पैनल भारी मतों के अंतर से विजयी। सभी दोस्तों और बड़ों का दिल से शुक्रिया जिन्होंने मुझे और मेरे पैनल को वोट दिया।

मैनेजिंग कमेटी सदस्य के लिए विजयी हुए सत्ताधारी पैनल वाले अभिषेक श्रीवास्तव ने उपरोक्त स्टेटस चुनाव नतीजे आने के बाद पोस्ट किया.

Ashwini Kumar Srivastava : दिल्ली प्रेस क्लब के चुनाव में Abhishek Srivastava और उसके पैनल ने विजयश्री हासिल कर ली है। हालांकि अभिषेक का जैसा विराट व्यक्तित्व, अद्भुत समझ, समाज से गहरा सरोकार, जबरदस्त संघर्षशीलता और अपार लोकप्रियता रही है, उस हिसाब से यह चुनाव या यह जीत उसके लिए कोई मायने नहीं रखती। मगर मैं जानता हूँ कि प्रेस क्लब और बाकी पत्रकारों के लिए जरूर यह जीत खासी अहम है। जीत की इस खुशी में मुझे एक दुख भी है…और वह है Yashwant Singh के हारने का। यशवंत जी पर भी मैं अपनी किसी अगली पोस्ट में लिखूंगा लेकिन फिलहाल अभी अभिषेक की ही बात करते हैं।

मुझे ठीक से तो याद नहीं लेकिन शायद मैं 2001-02 के उस दौर में अभिषेक से पहली बार मिला था, जब वह आईआईएमसी में मेरे ठीक बाद वाले बैच में पढ़ रहा था। तब उसके बाकी बैचमेट सामान्य आईआईएमसीएन की ही तरह बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों में नौकरी पाने के लिए इस कदर आतुर रहते थे कि किसी भी सीनियर आईआईएमसीएन को पाकर न सिर्फ निहाल हो जाते थे बल्कि तरह तरह के सवाल पूछकर जान भी खा जाते थे।

जबकि अभिषेक इन सबसे अलग था। वह तब भी जेनएयू और अन्य सार्वजनिक मंचों या राजनीतिक/सांस्कृतिक संगठनों में जोरदार तरीके से एक्टिव था। मैं नवभारत टाइम्स में नौकरी कर रहा था और मैं भी संयोग से जेनएयू में जन संस्कृति मंच से जुड़ा हुआ था और मित्रों के साथ राजनीतिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लिया करता था।

आईआईएमसी करने के बाद के बरसों में अभिषेक ने शायद ही देश का कोई ऐसा मीडिया संस्थान हो, जहां पर सिलेक्शन प्रोसेस में टॉप में अपनी जगह न बनाई हो और शायद ही कोई ऐसा संस्थान हो, जहां उसने नौकरी का एक साल भी पूरा किया हो। मीडिया की नौकरी उसके लिए और वह नौकरी के लिए बने ही नहीं हैं। टाइम्स ग्रुप में भी वह मेरे साथ कुछ समय रहा। लेकिन उसके अभूतपूर्व क्रांतिकारी स्वभाव ने टाइम्स ग्रुप में संपादकीय विभाग से लेकर मैनेजमेंट तक में जबरदस्त खलबली मचा दी थी। बतौर सीनियर भले ही अभिषेक मुझे हमेशा से सम्मान देता रहा हो लेकिन वहां रहने के दौरान उसने मुझे भी कभी नहीं बख्सा और लगातार मेरी भी गलतियां सार्वजनिक तौर पर अखबार रंग कर बाकी सभी जूनियर-सीनियर्स की तरह खिल्ली उड़ाने के अपने रोजमर्रा के कार्यक्रम में शामिल कर लिया था।

हालांकि उसी दौर में देर रात हम लोग महफिलों में भी साथ ही शरीक भी होते थे। क्योंकि मैंने कभी उसकी इस बात का बुरा ही नहीं माना। वह इसलिए क्योंकि मैं या जो भी शख्स अगर अभिषेक को जानता-पहचानता होगा, तो उसे यह अच्छी तरह से पता होगा ही कि अभिषेक अपने आदर्श, मूल्य और विचारधारा के तराजू पर सबको बराबर तौलता है।

अभिषेक की सबसे खास बात, जिसने मुझे हमेशा ही उसका फैन बनाया है, वह यह है कि अपने 10-12 साल के मीडिया कैरियर में मुझे अभिषेक के अलावा ऐसा एक भी पत्रकार नहीं मिला, जिसे हर मीडिया संस्थान या बड़े पत्रकार ने सर माथे पर बिठाया हो लेकिन उसके बावजूद उसने नौकरी या मीडिया से जुड़े किसी भी अन्य फायदे के लिए कभी अपनी विचारधारा, क्रांतिकारी स्वभाव और व्यक्तित्व में एक रत्ती का भी बदलाव न किया हो। मगर अभिषेक ऐसा ही है। मीडिया में सबसे अनूठा और एकमात्र….सिंगल पीस।

एक से बढ़कर एक नौकरियां उसे लगातार बुलाती भी रहीं, बुलाकर पछताती भी रहीं पर अभिषेक बाबू नहीं बदले। अंग्रेजों के जमाने के जेलर की तरह इतनी बदलियों के बाद भी अगर अभिषेक नहीं बदले तो इस चुनाव की जीत से भी अभिषेक के बदलने की कोई गुंजाइश मुझे नहीं दिखती। जाहिर है, इसका फायदा अब पत्रकारों और प्रेस क्लब को ही होगा….क्योंकि वहां चुनाव जीत कर भी अभिषेक के न बदलने का सीधा मतलब यही है कि अब वहां के हालात और राजनीति जरूर कुछ न कुछ तो बदलने ही लगेगी।

बहरहाल, यही उम्मीद है कि सार्वजनिक/राजनीतिक जीवन में पहला औपचारिक कदम रखकर अभिषेक ने जब सही दिशा पकड़ ही ली है तो कम से कम अब भविष्य में हमें वह इसी क्षेत्र में और बड़ी भूमिकाएं निभाते हुए भी नजर आएंगे। ढेर सारी बधाइयां और शुभकामनाएं…

पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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तस्वीरों की जुबानी प्रेस क्लब आफ इंडिया में हुए ‘विकास’ की कहानी…

प्रेस क्लब में सात वर्षों में विकास के नाम पर केवल कुर्सी मेज बदले जाने से लेकर बार-बार बाथरूम तोड़े जाने का काम किया गया. अब भी पूरे प्रेस क्लब कैंपस में यानि किचन से लेकर कामन हाल तक में चूहे क्राकोच दौड़ते रहते हैं. खाने का स्तर बेहद घटिया हो चुका है. क्लब में अराजकता का आलम दिखता है. जिम के सामान और इसके रूम को तो जैसे डस्टबिन में तब्दील कर दिया गया है. इसके बावजूद इस सत्ताधारी पैनल के लोग अपने राज में खूब विकास किए जाने बात कर सदस्यों को बरगलाते हैं. सच तो ये है कि इनके पास क्लब और इसके सदस्यों की बेहतरी को लेकर कोई आइडिया, विजन, प्लान नहीं है.

ये लोग क्लब के सदस्यों में फूट डालकर क्लब को राजनीति का अखाड़ा बनाए रखना चाहते हैं ताकि फूट डालो राज करो वाली अंग्रेजों की नीति के जरिए क्लब की सत्ता हर दम अपने हाथ में रख सकें और दोनों हाथों से क्लब के संसाधन-धन को लूट सकें.  भड़ास के संपादक और प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में मैनेजिंग कमेटी पद के लिए प्रत्याशी यशवंत का कहना है कि बदलाव फ्रेश वाटर की तरह है. यथास्थिति सड़े पानी की तरह. सत्ताधारी पैनल को नमस्ते करें और प्रेस क्लब की बागडोर बादशाह-शाहिद-जतिन के पैनल को सौंपे.  इस पैनल के सभी प्रत्याशियों और इसके मैनेजिंग कमेटी के सदस्य पद के लिए लड़ रहे उम्मीदवारों को भारी वोटों से जिताएं. प्रेस क्लब में हुए विकास की कहानी इन तस्वीरों के जरिए देख-जान सकते हैं….

तो ये हाल है प्रेस क्लब आफ इंडिया यानि पीसीआई में हुए विकास का. कल यानि पच्चीस नवंबर को होने वाले प्रेस क्लब आफ इंडिया के सालाना चुनाव में आठवें बरस भी जीतने के लिए सत्ताधारी पैनल के लोग लगे हुए हैं और इन लोगों ने अब हर किस्म के हथकंडे आजमाना शुरू कर दिया है. सात साल पहले पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए जिस किस्म की बड़ी गोलबंदी हुई थी, वैसी ही गोलबंदी इस दफे दिख रही है.

विवादित और कदाचारी सत्ताधारी पैनल वालों को पत्रकार इस बार विराम देने के मूड में हैं. बादशाह-शाहिद-जतिन पैनल की तरफ चल रही हवा और इस पैनल की जीत पक्की देखकर अब सत्ताधारी पैनल किसिम किसिम के दुष्प्रचार करने में जुट गया है. बाकायदे मैसेज भेजकर प्रेस क्लब सदस्यों को बरगलाया जा रहा है. कभी प्रेस क्लब सदस्यों को उनकी सदस्यता खत्म कर दिए जाने का भय दिखा कर बादशाह-शाहिद-जतिन पैनल को वोट न देने के लिए कहा जा रहा है तो कभी फर्जी कागजातों और झूठे तथ्यों के आधार पर बादशाह-शाहिद-जतिन पैनल के वरिष्ठ सदस्य पर अनर्गल आरोप सोशल मीडिया में दुष्प्रचारित किया जा रहा है.

यह सब दिखाता है कि सत्ताधारी पैनल के पास क्लब के सदस्यों को बताने-दिखाने के लिए कुछ नहीं है. वह भेड़िया आया भेड़िया आया वाली कहावत के जरिए खुद के शरण में रहने का दबाव क्लब के सदस्यों पर डाल रहा है. ऐसी नकारात्मक किस्म की राजनीति को पत्रकार खूब समझते हैं और वे चाहते हैं कि प्रेस क्लब को आधुनिक युवाओं के हाथों में सौंपा जाए जो इसे क्रिएशन और पाजिटिविटी का अड्डा बना सकें. खासकर प्रेस क्लब के सभी सदस्यों को हेल्थ इंश्योरेंस कराने का जो वादा भड़ास के संपादक यशवंत ने किया है, वह क्लब के सदस्यों के बीच चर्चा का विषय है. प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में मैनेजिंग कमेटी सदस्य पद के प्रत्याशी यशवंत का कहना है कि अगर बादशाह-शाहिद-जतिन पैनल जीकर प्रेस क्लब का संचालन अपने हाथ में लेता है तो सबसे पहले क्लब के सभी सदस्यों और उनके परिजनों का मामूली रेट पर हेल्थ बीमा कराया जाएगा ताकि उनके मुश्किल के दिनों में किसी के आगे किसी को हाथ न फैलाना पड़ा.

इसके अलावा प्रेस क्लब में एक हेल्प डेस्क बनाई जाएगी जो आम पत्रकारों की समस्याओं को टैकल करेगी. छंटनी, वेजबोर्ड, लीगल हेल्प समेत ढेरों मसलों पर प्रेस क्लब संपूर्ण समर्थन देगा. प्रेस क्लब आगे से सिर्फ किसी मीडिया मालिक के दुख में ही नहीं दुखी होगा बल्कि आम पत्रकारों की चिंता-दुख को महसूस करते हुए उसके त्वरित निदान के लिए कार्य करेगा. यशवंत ने प्रेस क्लब के सदस्यों से अपील की कि अबकी लेफ्ट राइट के चक्कर में न पड़ें क्योंकि दोनों ही पैनल में लेफ्ट और राइट दोनों किस्म के लोग हैं. इस बार असल लड़ाई ट्रेडीशनल थिंकिंग बनाम सरोकारी सोच की है. जो लोग सात साल से प्रेस क्लब की सत्ता में हैं और उनके मुंह में जो करप्शन का खून लग चुका है, वे किसी हाल में इसे नहीं छोड़ना चाहते.

ये वही लोग हैं जो कभी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के जमाने में लोकतंत्र और पारदर्शिता की बातें करके झंडा उठाया करते थे लेकिन जब खुद सत्ता में आए तो लगातार पतित होते रहे. प्रेस क्लब का सदस्य बनाने में पारदर्शिता बिलकुल नहीं है. लाबिंग और चिरौरी के जरिए ही प्रेस क्लब सदस्यता दी जाती है. यह बेहद फूहड़ और अलोकतांत्रिक परिपाटी है जो बंद नहीं की गई. दिल्ली में हजारों जेनुइन जर्नलिस्ट हैं जिन्हें प्रेस क्लब की सदस्यता नहीं दी गई लेकिन ढेरों प्रापर्टी डीलरों, लाबिस्टों और दलालों को सदस्य बना दिया गया.

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प्रेस क्लब में यशवन्त सिंह पर हमला मुद्दा नहीं बना। प्रबंधन चुप्पी साधे रहा। हमले के सुबूत सीसीटीवी फुटेज गायब कर दिए गए या डील करके डिलीट मार दिए गए। चिदंबरम के साथ मिल कर 2g स्कैम के पैसे को व्हाइट करने वालों के संरक्षण के वास्ते हर दफे प्रेस क्लब बहुत क्रांतिकारी दिखा। उस एक मीडिया घराने के मालिक को आई छींक-पाद पर भी प्रेस क्लब एक पैर पर खड़ा होकर जिंदाबाद-मुर्दाबाद करता रहा लेकिन किसी आम पत्रकार के दुख-सरोकार से उसका नाता कभी न दिखा। छंटनी पर चुप्पी साधे रहे। मजीठिया वेज बोर्ड पर एक शब्द नहीं बोले। आर्थिक भ्रष्टाचार और चरम कदाचार प्रेस क्लब प्रबंधन की नाक नीची नहीं करता।

दुनिया भर की सत्ताओं को दोगला जनविरोधी और भ्रष्ट बताने वाले प्रेस क्लब की सत्ता को जब बेदाग कहते हैं और कम्पनी टाइप चीज बताकर छूट हासिल करने की कोशिश करते हैं तो ये क्रांतिकारी बयान माना जाता है। सात साल से अपने खास चेलों चमचों को मेम्बर बना कर सत्ता बचाते चलाते रहने में गुरेज नहीं लेकिन दूसरी सत्ताएं जब यही करें तो ढेरों मुट्ठियाँ तन जाएं। साथी, क्रांतिकारी होने का मतलब नहीं कि तेरी क्रांति को गलत कहूंगा, अपनी वाली को सही। ये चिपकन बहुत द्विअर्थी संवाद लिख कर खुद को ”सत्ताधारी क्रांतिकारी” बने रहने को मजबूर करती है। इस चुनाव का मुद्दा प्रेस क्लब को ज्यादा पत्रकारीय सरोकारों से चलाने का है। उम्मीद है मजीठिया और मीडिया में छंटनी को भी मुद्दा बनाया जा सकेगा। क्लब के सदस्यों की सेहत की चिंता करते हुए उन्हें हेल्थ इंश्योरेंस से कवर किया जाएगा। बाकी, दारू की खाली बोतलें बेच कर कमीशन खाने वालों से धरती बचाने के लिए धरती पकड़ बने रहने के तर्क गढ़ने सुनने में सबको आनन्द आएगा ही।

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राम बहादुर राय ही नहीं, सैकड़ों पत्रकारों की सदस्यता इस साल सत्ताधारी पैनल ने खत्म कर दी, मीडियाकर्मियों में आक्रोश

Yashwant Singh : कल राम बहादुर राय जी की सदस्यता प्रेस क्लब से खत्म किए जाने की सूचाना थी। आज पता चल रहा है कि सैकड़ों पत्रकारों की सदस्यता खत्म की गई है। प्रिंट और टीवी के पत्रकार महेंद्र श्रीवास्तव की भी सदस्यता खत्म की जा चुकी है। इसी तरह सैकड़ों लोगों की सदस्यता बकाया जमा न करने के नाम पर खत्म कर दी गई। कल होने वाले चुनाव में सैकड़ों पुराने पत्रकारों को वोट नहीं डालने दिया जाएगा, सदस्यता खत्म होने का हवाला देकर। ये सिलसिला नया नहीं है।

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में जो लोग सात साल से सत्ता में हैं, उन्होंने तीन साल पहले इसलिए एक पत्रकार की सदस्यता निलंबित कर दी थी क्योंकि उनकी सदस्यता सात साल पहले वाले पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के कार्यकाल में हुई थी। सदस्यता निलंबित करने के पहले उनसे सक्रिय पत्रकार होने का प्रमाण मांगा गया। उन्होंने सन 86 से 2014 तक की कटिंग्स भेजीं। वे वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनका नाम सम्मानित है। उन्होंने पत्रकारिता और लेखन के फील्ड में काफी काम किया है और उनका अच्छा खासा नाम है। सस्पेंड होने से दुखी होकर वो आज तक प्रेस क्लब की तरफ ही नहीं गए।

एक अन्य पत्रकार साथी Chandan Yadav की क्लब की सदस्यता इसलिए खत्म कर दी गई क्योंकि इन्होंने इन कर्ताधर्ताओं के भ्रष्टाचार पर सवाल खड़ा कर दिया था। बिना कोई नोटिस दिए सीधे एक्सपेल कर दिया। अब राम बहादुर राय की सदस्यता छीन ली गई। इस तरह इन्होंने जता दिया है कि प्रेस क्लब उनकी निजी जागीर है, पत्रकारों के इस क्लब में अब वरिष्ठ पत्रकारों की ही कोई औकात नहीं है। सत्ताधारी पैनल के लोगों ने अपने इसी कार्यकाल में रामबहादुर राय, महेंद्र श्रीवास्तव समेत सैकड़ों लोगों की सदस्यता निगल ली है। यह सरासर बदतमीजी है। वरिष्ठ और आम मीडियाकर्मियों का अपमान है। इसका बदला लेना ही होगा वरना कल आपकी बारी आ जाएगी। मैं अब अपने साथ हुए एक बुरे अनुभव के बारे में बताना चाहूंगा। इससे सत्ताधारी पैनल की मंशा, नीयत, तानाशाही और थानेदारी दिख जाएगी।

प्रेस क्लब में मेरे पर हमला करने वालों की सदस्यता आज तक सुरक्षित है, लिखित शिकायत के बावजूद। जांच तक न की गयी घटना की। cctv फुटेज तक गायब। लंबी डील हो गयी होगी शायद। आजकल के थानेदार ऐसे ही कमाते हैं। मेरे चुनाव लड़ने का कारण भी वही दुख है। इतनी नाइंसाफी! शर्म करो यार। किस मुंह से खुद को वामपंथी / लोकतांत्रिक / प्रगतिशील कहते हो? कलंक हो तुम लोग। वामपंथ लोकतंत्र प्रगतिशीलता का नाम दागदार करते हो। तुम जैसों के दोहरे दोगले शातिर चरित्र के कारण ही देश में वामपंथ थंउस गया है। सही कहा जाए तो तुम लोग प्रतिक्रियावादी ताकतें हो जो वामपंथ का लबादा ओढ़कर नंगा नाच करते हुए अराजकता फैलाए हो और इस तरह वामपंथ का नाम भी बदनाम कर रहे हो।

आगे कहना ये है कि ये जो कथित वामपंथी सत्ताधारी पैनल है वो सिर से पांव तक गन्ध में डूबा हुआ है। वैसे ये पैनल वामपंथी है भी या नहीं, कहा नहीं जा सकता। इसमें गौर से देखेंगे तो कई सीधे सीधे राइटिस्ट दिखेंगे। कई जो कथित वामपंथी हैं, वो कदाचारी हैं, प्रेस क्लब के पापी हैं, आरोपी हैं। इनमें जो भी वामपंथी प्रत्याशी आपको लगे, उनसे पूछिए कि वो लोग प्रेस क्लब की बैलेंस शीट किस डर से और क्यों छुपाए हुए है। प्रेस क्लब मेम्बर्स की सालाना फीस डबल करने का प्रस्ताव क्यों ले आए हैं? आरोप है कि दारू की लाखों खाली बोतलों की बिक्री का पैसा भी ये सब खाए हैं। इन कदाचारियों के पास कहने के लिए कुछ नहीं हैं तो अपने पैनल में नए नवेले शामिल ‘मिस्टर भरोसेमंद क्रांतिकारी’ को भ्रमित कर चरित्र हनन और दुष्प्रचार पर उतारू हो गए हैं। बिना वर्जन लिए कुछ भी छाप रहे हैं और एजेंडा पत्रकारित के दलदल में गोते लगा रहे हैं। आप सबसे गुजारिश है कि प्रेस क्लब में चल रही बदलाव की बयार को और तेज करें। फ़र्ज़ी खबरों और दुष्प्रचारों से भ्रमित न हों। सत्य कभी एक पक्षीय नहीं होता। मैं वादा करता हूं, मेरे पैनल वाले भी अगर गलत निकले तो उनको बख्शून्गा नहीं। दबा कर वोट दीजिए, बदलाव के पक्ष में, बिना लेफ्ट राइट किए। अबसे प्रेस क्लब आम पत्रकारों का होगा। हम बताएंगे कि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के असल मायनें क्या होते हैं।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

मूल खबर…

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पीसीआई चुनाव : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार!

Naved Shikoh : यशवंत को आख़िर क्यों जितायें दिल्ली के पत्रकार! क्योंकि ये ऐसा पत्रकार ने जो ब्रांड अखबारों की नौकरी छोड़कर शोषित पत्रकारों की लड़ाई लड़ रहा है। इस क्रान्तिकारी पत्रकार ने अपने कॅरियर को दांव पर लगाकर, वेतन गंवाया.. तकलीफें उठायीं. मुफलिसी का सामना किया.. जेल गये.. सरकारों से दुश्मनी उठायी… ताकतवर मीडिया समूहों के मालिकों /उनके मैनेजमेंट से टकराये हैं ये। छोटे-बड़े अखबारों, न्यूज चैनलों में पत्रकारों का शोषण /महीनों वेतन ना मिलना/बिना कारण निकाल बाहर कर देना.. इत्यादि के खिलाफ कितने पत्रकार संगठन सामने आते हैं? कितने प्रेस क्लब हैं जहां पत्रकारों की इन वाजिब समस्याओं के समाधान के लिए कोई कदम उठाया जाता है!

यशवंत सिंह जी ने बिना संसाधनों और बिना किसी सपोर्ट के खुद के बूते पर भड़ास फोर मीडिया जैसा देश का पहला और एकमात्र प्लेटफार्म शुरु किया। जहां से पत्रकारों के हक़ की आवाज बुलंद होती है। जहां पत्रकारों का शोषण करने और उनका हक मारने वालों का कच्चा चिट्ठा खोला जाता है। यशवंत के भड़ास ने ना जाने कितने मीडिया समूहों की तानाशाही पर लगाम लगाई। शोषण की दास्तानों को देश-दुनिया तक फैलाकर दबाव बनाया। नतीजतन सैकड़ों मीडिया कर्मियों को यशवंत के भड़ास ने न्याय दिलवाया। मीडिया कर्मियों का वाजिब हक दिलवाया। देश में सैकड़ों बड़े-बड़े पत्रकार संगठन है। इनमें से ज्यादातर को आपने सत्ता और मीडिया समूहों के मालिकों की दलाली करते तो देखा होगा, लेकिन जरा बताइये, कितने संगठन पत्रकारों के शोषण के खिलाफ लड़ते हैं? दिल्ली सहित देशभर के छोटे-बड़े प्रेस क्लबों में क्या हो रहा है आपको बताने की जरुरत नहीं।

मैं 24 बरस से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरन्तर संघर्ष कर रहा हूँ। आधा दर्जन से अधिक छोटे-बड़े मीडिया ग्रुप्स में काम किया है। मैंने देखा है किस तरह सरकारों और अखबार- चैनलों के मालिकों के काले कारनामों की कालक एक ईमानदार पत्रकार को किस तरह अपने चेहरे पर पोतनी पड़ती है। नैतिकता-निष्पक्षता-निर्भीकता और पत्रकारिता के सिद्धांतों-संस्कारों की बात करने वाले ईमानदार पत्रकार के चूतड़ पर चार लातें मार के भगा दिया जाता है। आज के माहौल ने मिशन वाली पत्रकारिता को तेल लेने भेज दिया है। ये तेल शायद मिशन की पत्रकारिता करने की चाहत रखने वाले भूखे पत्रकारों की मज़ार पर चराग के काम आ जाये।

कार्पोरेट और हुकूमतों की मोहताज बन चुकी पत्रकारिता को तवायफ का कोठा बना देने की साजिशों चल रही हैं। पत्रकार का कलम गुलाम हो गया है। अपने विवेक से एक शब्द नहीं लिख सकता। वैश्या जैसा मजबूर हो गया पत्रकार। पैसे देने वाला सबकुछ तय करेगा। पत्रकारिता को कोठे पर बिठाने वालों ने कोठे के दलालों की तरह सत्ता की दलाली करने वालों के चेहरे पर पत्रकार का मुखौटा लगा दिया है। इस माहौल के खिलाफ लड़ रहे हैं यशवंत सिंह और उनका भड़ास। साथ ही यशवंत का व्यक्तित्व और कार्यशैली इस बात का संदेश भी देता है कि कार्पोरेट घराने या हुकूमतें के इशारे पर यदि आपसे पत्रकारिता का बलात्कार करवाया जा रहा है तो ऐसा मत करें। अपना और अपने पेशे का ज़मीर मत बेचो। इसके खिलाफ आवाज उठाओ। नौकरी छोड़ दो। बहुत ही कम खर्च वाले वेब मीडिया के सहारे सच्ची पत्रकारिता के पेशे को बरकरार रख सकते हैं।

कितना लिखूं , बहुत सारे अहसान हैं। जब हमअपने मालिकों/मैनेजमेंट की प्रताड़ना का शिकार होते हैं। अपने हक की तनख्वाह के लिए सटपटा रहे होते हैं। बिना कारण के निकाल दिये जाते हैं। तो हम लेबर कोर्ट नहीं जाते। पत्रकारों की यूनियन के पास भी फरियाद के लिए नहीं जाते। मालुम है लेबर कोर्ट जाने से कुछ हासिल नहीं होता। पत्रकार संगठनों के पत्रकार नेताओं से दुखड़ा रोने से कोई नतीजा नहीं निकलता। प्रेस क्लबों में दारू – बिरयानी और राजनीति के सिवा कुछ नहीं होता। पीड़ित का एक ही आसरा होता है- यशवंत का भड़ास। इस प्लेटफार्म से मालिक भी डरता है- मैनेजमेंट भी और सरकारें भी। पत्रकारिता के जीवन की छठी से लेकर तेहरवीं का सहारा बने भड़ास में नौकरी जाने की भड़ास ही नहीं निकलती, नौकरी ढूंढने की संभावना भी पत्रकारों के लिए मददगार साबित होती हैं।

वेबमीडिया की शैशव अवस्था में ही पत्रकारों का मददगार भड़ास पोर्टल शुरु करके नायाब कॉन्सेप्ट लाने वाला क्या दिल्ली प्रेस क्लब की सूरत नहीं बदल सकता है। आगामी 25 नवंबर को प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव के लिए लखनऊ के एक पत्रकार की गुज़ारिश पर ग़ौर फरमाएं :- दिल्ली प्रेस क्लब के चुनाव में मैंनेजिंग कमेटी के सदस्य के लिए क्रान्तिकारी पत्रकार यशवंत सिंह को अपना बहुमूल्य वोट ज़रूर दीजिएगा। यशवंत सिंह का बैलेट नंबर 33 है।

नवेद शिकोह
पत्रकार ‘लखनऊ
वरिष्ठ सदस्य
उ. प्र. मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति
8090180256 9918223245
Navedshikoh@rediffmail.com

प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव से संबंधित अन्य खबरें…

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Jatin Gandhi बता रहे, वो पीसीआई में क्यों लड़ रहे हैं वाइस प्रेसीडेंट पद पर चुनाव


A PERSONAL MANIFESTO

(Or, why I am contesting for the post of vice-president in the Press Club of India on Saturday, November 25)

Friends,

The IWPC, that enviously cosy and clean club for women journalists down the road from us, will over the next weekend host a film appreciation course of the FTII, Pune, for its members. A few days ago, it had collaborated with the Indian Council for Cultural Relations to celebrate its annual day in one of the best auditoriums in Lutyens’ Delhi.

The Chandigarh Press Club — arguably one of the best run press clubs in the country — recently went to court against the Haryana government seeking compensation for media personnel and organisations who were hit by the violence that followed rapist Gurmeet Ram Rahim’s arrest in Panchkula. The government had promised compensation but did not keep its word and the CPC did not waste time.

That, my friends, is the kind of role a modern press club should play.

A press club is not just a building with a bar and a kitchen. It is a space where journalists can unwind at the end of a busy day. During the course of a working day, we should be able to utilise the space to connect with others, read newspapers and magazines, browse the internet, drop in for a quick bite or a beer.

In short, the club building should be an extension of your home that you can access on a working day.

But, idea of a press club is also much bigger. It should serve as an umbrella for the press corps. It is an organisation that journalists’ unions can collaborate with, working to make things better for us and journalism.

But the Press Club of India is none of this. Why?

THE BACKROOM CAUCUS
No doubt, it has a much bigger footfall than any other press club and managing it is a mammoth task. But at the core of the problem is the fact that the club managing committee’s focus is on the elections for most part of the year.

And worse, there is an un-elected caucus active in running the club, imposing itself on the elected representatives. The faces in the committee change but the backroom manipulators remain the same.

Why do those office bearers from the current team managing the club who did not even attend the meetings want to get elected again? Why did the team not choose new faces? Why do they want to cling on? Please ask them when they come to seek your votes.

STINKING KITCHEN, SPANKING NEW TOILETS
The kitchen stinks and is in urgent need of pest control but the committee is busy face-lifting the toilets. Why? Because most members do not go near the kitchen area and never get to see the state it is in. All we access is the rooms and the toilets. So closer to the election, the committee goes ahead and rebuilds the toilets yet again.

THE GYM SCAM AND MISUSE OF MPLADS FUNDS
Rs 32 lakhs of MPLADS funds were used for putting together a gym, just three years ago. That equipment has now been dumped in what used to be a place to rest for the staff. The erstwhile gym is a lounge that you have to book and pay for before you can use it. If MPLAD funds were misultilised in a scam by any other organisation, would it not have made news?

TIME FOR CHANGE
There is a lot that needs to change. We can usher in that change using the power of our vote. We are going to start with the basics. And here are a few things that the Badshah Sen-Shahid Faridi-Jatin Gandhi panel is going to focus on:

1. A modern kitchen, regular pest control and proper waste and scrap disposal. Reducing prices.

2. Transparency: A right to information mechanism for members.

3. An excellence in journalism award in the name of the PCI. (Isn’t it sad that there is none so far?)

4. A complaint/suggestion box.

5. Involving ordinary members in running the press club by constituting committees for different verticals like bar, kitchen, reading room, events etc.

6. A broad-based membership screening committee including prominent journalists.

If having a decent club sounds Utopian, remember the two clubs mentioned above have done it. Away from the din of the SMS-wars, these are serious issues that need our attention, as members. Please see the accompanying pictures. These are not wild allegations.
Do come and vote tomorrow. See you there.

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अनिकेंद्र-शाहिद पैनल से लड़ रहे जतिन गांधी, प्रवीण जैन और निर्मिमेष कुमार के बारे में जानिए

Vice President
Jatin Gandhi

Published author and journalist with 21 years in the profession across different media. At present Associate Editor with Hindustan Times. Before that Jatin worked with The Hindu, The Indian Express, India Today magazine, Open, Star News (now ABP), Times Now, NDTV convergence and wahindia.com.

Joint Secretary
Praveen Jain

Associate Editor(Photo) at the Indian Express. Formerly worked as the National Photo Editor for the Indian Express and also worked for the Pioneer, Sunday Mail and several other companies. Praveen has covered almost all the big events in India in the 80’s and 90’s – from the riots in Bhagalpur and Hashimpura to the Delhi pogrom in 1984 ; from the demolition of the Babri Masjid and it’s rehearsal to the plague in Surat. Praveen has twice served as senior vice president of the Press Club and has been on the managing committee several times as well. He has taken the initiative to get several amenities installed at the Press Club including the air conditioning and media center.

Treasurer
Nirnimesh Kumar

In journalism for the past three decades. I started my career with stingership in Hindi daily Navbharat Times at Patna, and then He joined Hindi daily Prabhat Khabar at Ranchi. He rejoined Navbharat Times at Jaipur as a regular employee. At present He is working with English daily The Hindu and has been working there for more than two decades.

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प्रेस क्लब चुनाव : बैलट पेपर में सबसे आखिरी पायदान पर है यशवंत का नाम

प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव कल यानि पच्चीस नवंबर को होने वाले हैं. भड़ास के संपादक यशवंत भी मैनेजिंग कमेटी पद के लिए अनिकेंद्र सेन उर्फ बादशाह, शाहिद फरीदी और जतिन गांधी पैनल से चुनाव लड़ रहे हैं. यशवंत का बैलट नंबर 33 है. नाम अल्फाबेटिकली लिखा जाता है बैलट पेपर पर इसलिए यशवंत का नाम सबसे आखिर में है. मतदाताओं से अपील है कि वे बैलट पेपर के सबसे आखिरी नाम से मुहर मारना शुरू करें ताकि इस चुनाव में यशवंत और उनके पैनल को विजयी बनाकर प्रेस क्लब आफ इंडिया में बदलाव की मुहिम को अंजाम तक पहुंचाया जा सके.

Yashwant Singh (Ballot No. 33)

(For Managing Committee member)

Yashwant completed two decade in media. He has held positions like chief sub-editor and Chief Reporter in Amar Ujala and Dainik Jagran. He was Editor of tabloid newspaper ‘inext’ published by Jagran group at the time of launching. Yashwant is founder editor of bhadas4media.com, a portal dedicated news related to media. As media activist he struggle for benifit of media professional and also taken lead in court cases related wage board.

मैनेजिंग कमेटी के लिए अनिकेंद्र सेन-शाहिद फरीदी-जतिन गांधी पैनल के अन्य सदस्यों का विवरण इस प्रकार है :

Anita Choudhary (Ballot No. 5)
(For Managing Committee member)
At present Anita is working with National Voice news Channel as Political Editor. She has completed more than one decade in Journalism. Before her present assignment she has worked with News24, News Nation
Past: News24, News Nation, Sahara. She is a member in present Managing Committee of the club. She has raised many important issue in the managing committee for the betterment of the club. Anita always stood for non- politicization of the Press Club against the will of present Managing Committee.

Anjali Bhatia (Ballot No. 6)
(For Managing Committee member)
Anjali has completed more than a decade in Journalism. At present she is working with
“The political and business daily” as Bureau chief. Before her present assignment Anjali worked with Hindustan hindi, Punjab Kesari, Rajasthan Patrika,mahamedha, Express magazine, TV 100, total tv.

Atul Krishan (Ballot No.7)
(For Managing Committee member)
Atul has completed a decade in journalism. He has worked for The Statesman, Mid-Day.At Present he is  working with The Asian Age/Deccan Chronicle group of newspapers.

JOGENDER SOLANKI (B.No. 9)
(For Managing Committee member)
29 year successful journey of Journalism Print and Visual Media
With Dainik jagran, Veer Arjun, Navbharat Times, Jansatta, Dainik Hindustan, punjab kesari, Ankho Dekhi, India News, India tv and Currently Working As Special Correspondent in Dainik Deshbandhu.

Pramod Kumar-I (Ballot No.17)
(For Managing Committee member)
Editor “Sunday Indian” for more than a decade. More than Thirty years in Active Journalism had worked  with Aaj,Rashtriya Sahara Amar Ujala Daink Jagran. Got elected several times in PCI elections in past.

Rahil Chopra (Ballot No19)
(For Managing Committee member)
Rahil is a media professional with 18 years of experience. He has worked  with Jain TV,  Sahara TV, Aajtak, NDTV, P7 News and is currently working with Rajya Sabha TV and writing political columns for Indian Press Agency  (IPA).

Sanjay Dwivedi( Ballot No.21)
(For Managing Committee member)
Sanjay Dwivedi has completed 35 years in media. His initially worked in print media for 9 years and remaining years in news television industry. At present he is associated with around dozen tv channels in various capacity. Presently working as Director- media for an upcoming niche tv news channel for rural India.

Sushil Vakil (Ballot No 26)
(For Managing Committee member)
Sushil is Editor of Samachar Post. He has vast experience of 25 year experience in journalism. He has been writing exclusive articles on Kashmir terrorism and role of Pakistan in fomenting terror activities in India.

Ujjwal Kumar (Ballot No.27)
(For Managing Committee member)
Having experience of more than 15 years in journalism, Ujjwal has worked will almost all form of news media Newspaper, News channel and wire agency. At present He is Senior Finance Correspondent with NewsRise which feed to Reuters and Japanese news agency Nikkei. Before that Ujjwal worked with Zee Business, TotalTv, Dainik Jagran newspaper. He has been elected twice for Managing committee in past. Being a committee member was never ornamental to him. He always raised important issue in interest of Journalist and club in managing committee in his past tenures.

Vikash Mishra (ballot No. 31)
(For Managing Committee member)
Vikash has completed 22 years in Journalism. He has vast experience in print and electronic media. He worked work reputed Hindi daily Amar Ujala and Dainik Jagran. After quitting print he worked with News24, Channel 7 and Mahua News. From last 6 years Vikash is working with Aajtak. He is an alumni of IIMC.

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प्रेस क्लब आफ इंडिया को निजी जागीर बनने से रोकें, बदलाव के लिए वोट करें

अब तो बदल ही जाना चाहिए PRESS CLUB of INDIA, DELHI की सत्ता और सूरत। पूरे सात साल हो गए लेकिन अभी तक पत्रकारों की हितैषी ये संस्था उन्ही के चंगुल में फँसी है जो इसको अपनी जागीर समझ कर चला रहे है. यहाँ की सदयस्ता के नियम भी ताक पर रख दिए गए है। जिन्होंने कभी एक पेज का लेख नहीं लिखा वो यहाँ के पदाधिकारियों की बदौलत सदस्य हैं और राम बहादुर राय जैसे पत्रकार बाहर.

लाखों रुपये का स्क्रैप हर साल बिकता है उसका कोई हिसाब नहीं। माहौल तो ऐसा बना दिया गया है कि यहाँ New Year Celebration तो होगा लेकिन स्वतंत्रता दिवस के दिन तिरंगा नहीं फहरेगा। इसी प्रेस क्लब के बाहर भड़ास फॉर मीडिया के संस्थापक संपादक यशवंत सिंह के ऊपर हमला हुआ और ये प्रेस क्लब के पदाधिकारी आज तक मौन साधे हुए हैं। अब तो बदल ही डालेंगे प्रेस क्लब की इस सत्ता को। नयी सोच और सकारात्मक बदलाव के लिए मैं आगे बढूंगा और मेरा समर्थन, मेरे पत्रकार साथियों का वोट मेरे सर्वाधिक पसंदीदा व्यक्तितव विकास मिश्रा जी, एग्जीक्यूटिव प्रोडूसर, आज तक ( Ballot No. 31), यशवंत सिंह, संस्थापक संपादक, भड़ास ४ मीडिया (Ballot No. 33) के साथ इस पूरे पैनेल को जायेगा। यही मेरी अपील आप से भी है।

शील शुक्ल
संपादक
विजडम इंडिया, (दैनिक समाचार पत्र)

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प्रेस क्लब आफ इंडिया प्रबंधन ने वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की सदस्यता सस्पेंड की

प्रेस क्लब आफ इंडिया का चुनाव बस दो दिन बाद है यानि पच्चीस नवंबर को. उसके ठीक पहले एक बड़ी खबर आ रही है. प्रेस क्लब आफ इंडिया के पदाधिकारियों ने वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय की सदस्यता सस्पेंड कर दी है. साथ ही उन्हें वोट न डालने देने का भी फैसला ले लिया है. इससे आहत जाने-माने पत्रकार और अपनी बेबाक बयानी के लिए मशहूर राम बहादुर राय ने घोषणा की है कि वह चुनाव के दिन प्रेस क्लब आफ इंडिया जाएंगे और अपना ड्यूज क्लीयर करने के बाद वोट देने की कोशिश करेंगे. अगर वोट देने से रोका गया तो वो विरोध स्वरूप वहीं पर खड़े रहेंगे.

मालूम हो कि प्रेस क्लब आफ इंडिया के उन्हीं सदस्यों को वोट डालने दिया जाता है तो अपना सालाना फीस जमा कर देते हैं. पिछले तीन वर्षों से ऐसा संयोग रहा कि राम बहादुर राय को चुनाव के दिन दिल्ली से बाहर रहना पड़ा. इस बार वह चुनाव के दिन दिल्ली में हैं. उन्होंने अपने एक करीबी को प्रेस क्लब आफ इंडिया भेजकर ड्यूज वगैरह के बारे में पता करवाया ताकि वोट डालने के दिन कोई दिक्कत न आए. तब पता चला कि राम बहादुर राय समेत सैकड़ों पत्रकारों की सदस्यता निलंबित कर दी गई है.

अपनी सादगी और ईमानदारी के लिए चर्चित वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय का आरोप है कि प्रेस क्लब प्रबंधन की तरफ से उनसे कहा जा रहा है कि वो वोट डालने न आएं क्योंकि उनका ड्यूज तीन साल तक जमा न होने और उस पर पेनाल्टी लगे होने के कारण सदस्यता निलंबित कर वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया है. राम बहादुर राय का कहना है कि प्रेस क्लब प्रबंधन तीन साल का सदस्यता शुल्क ले ले और पेनाल्टी माफ कर दे. इसके बाद स्वत: वोट देने का रास्ता खुल जाएगा लेकिन प्रेस क्लब प्रबंधन इस पर राजी नहीं है. ऐसे में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने दुखी और आहत मन से विरोध करने का फैसला कर लिया है. श्री राय चुनाव के दिन वोट देने जाएंगे और ड्यूज चुकाने के बाद भी वोट न डालने देने पर विरोध स्वरूप वहीं खड़े रहकर लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करेंगे.

भड़ास के संपादक यशवंत सिंह, जो प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में सेन-फरीदी-गांधी पैनल की तरफ से मैनेजिंग कमेटी मेंबर के लिए प्रत्याशी हैं, इस प्रकरण पर कहते हैं :

अगर हमारा प्रेस क्लब आफ इंडिया का प्रबंधन अपने बुजुर्ग पत्रकारों, अपने अग्रजों, अपने वरिष्ठों, अपने माननीयों का सम्मान नहीं कर सकता, इनके प्रति संवेदनशील नहीं हो सकता तो इस प्रेस क्लब के क्या मायने हैं. राम बहादुर राय जैसे जाने-माने और वरिष्ठ पत्रकार को हर हाल में वोट का अधिकार न सिर्फ दिया जाना चाहिए बल्कि सदस्यता निलंबन जैसी हरकत के लिए प्रेस क्लब आफ इंडिया के वर्तमान प्रबंधकों को माफी मांगनी चाहिए. वरिष्ठों से जुड़े मामलों में प्रेस क्लब को संवेदनशील होना चाहिए और स्वयं पहल करके किसी भी तकनीकी दिक्कत को दूर कर चीजों को आसान बनाए रखना चाहिए. नौकरशाही और तानाशाही वाली मानसिकता से काम करने वाला प्रबंधन अक्सर अहंकार से भरा होता है और वह अपने सामने किसी को कुछ नहीं समझता. यही अहंकार एक दिन विनाश का कारण बनता है. राय साहब जैसे बड़े पत्रकार के साथ प्रेस क्लब प्रबंधन के इस अपमान जनक हरकत को कोई भी पत्रकार उचित नहीं मानेगा और इसका बदला जरूर वोटिंग के दिन बैलट पेपर के जरिए वर्तमान प्रबंधकों / पदाधिकारियों को सबक सिखा कर लेगा.

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पत्रकारों के सामने मौजूदा चुनातियों पर यशवंत लड़ते हैं, प्रेस क्लब पदाधिकारी दुम दबाए रहते हैं…

इन बातों से आप सहमत हों तो पीसीआई इलेक्शन में बैलट नंबर 33 पर मुहर मार कर यशवंत को सबसे ज्यादा वोटों से विजयी बनाइए…

अपनी प्रासंगिकता खो रहे प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के चुनाव में इस बार नई बयार देखी जा रही है. मैनेजिंग कमेटी मेंबर के लिए 33 नंबर पर चुनाव लड़ रहे यशवंत सिंह उन पत्रकारों के लिए आशा की नई किरण हैं, जो अपनी नौकरी के चक्कर में मीडिया मालिकों और कुछ कारपोरेट संपादकों की मनमानी सहने पर मजबूर रहते हैं. उनसे बातचीत के आधार पर यह लेख लिख रहा हूं…

देश के बड़े मीडिया हाउस जिसमें आनंद बाजार पत्रिका से लेकर हिंदुस्तान और टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे नामी बैंड शामिल हैं, मंदी का हवाला देकर अक्सर छंटनी शुरू कर देते हैं. एक तुगलकी फैसले से सैकड़ों/हजारों पत्रकार सड़क पर आ जाते हैं. लेकिन पत्रकारों के हितों के लिए बनी प्रेस क्लब ऑफ इंडिया कभी अपनी जुबान नहीं खोलती. मीडिया संस्थानों के अत्याचार का शिकार कई बार प्रेस क्लब के मौजूदा सदस्य भी हो जाते हैं. लेकिन इस संस्था के कर्णधारों ने तो मानो पत्रकारों की ओर से आंख ही मूंद लिया है.

इंसाफ के लिए आवाज उठाने का दंभ भरने वाले प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के मौजूदा पदाधिकारियों का एकमात्र एजेंडा है होटल मैनेजर की तरह क्लब को चलाना ताकि पीने-खाने वालों को कोई दिक्कत नहीं हो. वैचारिक विमर्श के लिए कभी कभी प्रोग्राम रखा जाता है. लेकिन पत्रकारों के सामने मौजूदा चुनातियों पर कोई भी पदाधिकारी जुबान नहीं खोलता. क्योंकि इसके लिए आंदोलन और संघर्ष की लंबी राह पकड़नी होगी.

मैं (यशवंत सिंह की जुबानी) मांग करता हूं कि प्रेस क्लब का चुनाव लड़ने वाले सभी पैनल के लोग घोषणा करें कि…

1. जीतने पर हम उन मीडिया हाउस का विरोध करेंगे जो बिना ऑफर/ज्वाइनिंग लेटर दिये पत्रकारों को बेगारी मजदूर की तरह रखते हैं. ऐसे मीडिया संस्थानों की भरमार हैं.
2. छंटनी के लिए उसी तरह के नियम बने जैसे भारत सरकार के केंद्रीय कर्मचारियों के लिए हैं.
3. दूरदर्शन, लोकसभा टीवी और राजसभा टीवी में रखे गए सभी मीडिया कर्मियों को नियमित किया जाये और उन्हें एक ग्रेड की सैलरी दी जाये.
4. संपादकों की नियुक्ति और उनसे लिए जाने वाले काम के संबंध में मीडिया संस्थान अपनी नीति घोषित करें ताकि बैकडोर से संपादकों पर अनुचित कार्यों के लिए दबाव हटाया जा सके.
5. प्रेस क्लब में आने वाले सभी मेंबर को तुरंत और बेहतरीन सुख-सुविधायें देंगे.
6. किसी भी पत्रकार की नौकरी में रहते हुए मृत्यु होने पर सरकार की तरफ से आश्रित बीबी-बच्चों को वो सभी सुविधायें मिलें, जिससे उनका दैनिक जीवन सुगमता से चलता रहे.

इन मांगों को कोई पैनल माने या नहीं माने, यशवंत जीतते हैं तो इसके लिए एक लंबी लड़ाई जरूर लड़ेंगे, भले ही इसके लिए यशवंत सिंह भड़ास को सड़क पर उतरना पड़े.

लेखक ए राम पांडेय पत्रकार हैं और फिलहाल एक निजी विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाते हैं. उनसे संपर्क arampandey@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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अखिल भारतीय पत्रकार मोर्चा ने पीसीआई चुनाव में सेन-फरीदी-गांधी पैनल को जिताने की अपील की

Pradeep Mahajan :  प्रेस क्लब चुनाव में इस बार मिट्टी के माधवों को नहीं बल्कि जुझारू यशवंत सिंह और विकास मिश्रा को जितायें…  पीसीआई का चुनाव 25 नवंबर को है.. इस चुनाव में पीसीआई के सदस्य सेन-फरीदी-गांधी पैनल को वोट दें. इस बार चुनाव में इस पैनल से दो युवा फ्रेश जुझारू और पत्रकारों के लिए कुछ कर गुजरने वाले यशवंत सिंह और विकास मिश्रा भी चुनाव में खड़े हैं. ये पत्रकारिता के लिए और पत्रकारों के लिए नए नाम नहीं हैं.

यशवंत सिंह पत्रकारों की लड़ाई कई बरसों से लड़ते आ रहे हैं जिसमें कई बड़े संस्थानों ने उन्हें हर तरह से समझाने की कोशिश की कि वह पत्रकारों के हित के लिए ना लड़ें और ना ही अड़ें. परन्तु यशवंत सिंह किसी भी भय, लालच, दबाव में नहीं आये.. उनकी लड़ाई आज भी जारी है.. वहीं विकास मिश्रा ने भी कई बार पीसीआई को प्रॉपर्टी डीलरों, दलालों का अड्डा ना बनाने की अपील की… लेकिन उनकी बात को नहीं माना गया… यशवंत सिंह और विकास मिश्रा ने सड़कों पर भी संघर्ष किया है.. प्रेस सेंसरशिप हटाने और पत्रकारों की सुरक्षा समेत कई मुद्दों पर ये लोग सड़कों पर उतरे..  सेन-फरीदी-गांधी पैनल में और इस टीम में पत्रकारों के हित की आवाज़ उठाने वाले पत्रकार हैं… अखिल भारतीय पत्रकार मोर्चा सेन-फरीदी-गांधी पैनल को जिताने की अपील करता है.

अखिल भारतीय पत्रकार मोर्चा के वरिष्ठ पदाधिकारी प्रदीप महाजन की एफबी वॉल से.

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प्रेस क्लब का विवादित सत्ताधारी पैनल जीतने के लिए हर किस्म के हथकंडे आजमाने को मजबूर

प्रेस क्लब आफ इंडिया में पच्चीस नवंबर को होने वाले चुनाव में आठवें बरस भी जीतने के लिए सत्ताधारी पैनल के लोग लगे हुए हैं और इन लोगों ने अब हर किस्म के हथकंडे आजमाना शुरू कर दिया है. सात साल पहले पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के साम्राज्य को उखाड़ फेंकने के लिए जिस किस्म की बड़ी गोलबंदी हुई थी, वैसी ही गोलबंदी इस दफे दिख रही है. विवादित और कदाचारी सत्ताधारी पैनल वालों को पत्रकार इस बार विराम देने के मूड में हैं.

बादशाह-शाहिद-जतिन पैनल की तरफ चल रही हवा और इस पैनल की जीत पक्की देखकर अब सत्ताधारी पैनल किसिम किसिम के दुष्प्रचार करने में जुट गया है. बाकायदे मैसेज भेजकर प्रेस क्लब सदस्यों को बरगलाया जा रहा है. कभी प्रेस क्लब सदस्यों को उनकी सदस्यता खत्म कर दिए जाने का भय दिखा कर बादशाह-शाहिद-जतिन पैनल को वोट न देने के लिए कहा जा रहा है तो कभी फर्जी कागजातों और झूठे तथ्यों के आधार पर बादशाह-शाहिद-जतिन पैनल के वरिष्ठ सदस्य पर अनर्गल आरोप सोशल मीडिया में दुष्प्रचारित किया जा रहा है.

यह सब दिखाता है कि सत्ताधारी पैनल के पास क्लब के सदस्यों को बताने-दिखाने के लिए कुछ नहीं है. वह भेड़िया आया भेड़िया आया वाली कहावत के जरिए खुद के शरण में रहने का दबाव क्लब के सदस्यों पर डाल रहा है. ऐसी नकारात्मक किस्म की राजनीति को पत्रकार खूब समझते हैं और वे चाहते हैं कि प्रेस क्लब को आधुनिक युवाओं के हाथों में सौंपा जाए जो इसे क्रिएशन और पाजिटिविटी का अड्डा बना सकें. खासकर प्रेस क्लब के सभी सदस्यों को हेल्थ इंश्योरेंस कराने का जो वादा भड़ास के संपादक यशवंत ने किया है, वह क्लब के सदस्यों के बीच चर्चा का विषय है. प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में मैनेजिंग कमेटी सदस्य पद के प्रत्याशी यशवंत का कहना है कि अगर बादशाह-शाहिद-जतिन पैनल जीकर प्रेस क्लब का संचालन अपने हाथ में लेता है तो सबसे पहले क्लब के सभी सदस्यों और उनके परिजनों का मामूली रेट पर हेल्थ बीमा कराया जाएगा ताकि उनके मुश्किल के दिनों में किसी के आगे किसी को हाथ न फैलाना पड़ा.

इसके अलावा प्रेस क्लब में एक हेल्प डेस्क बनाई जाएगी जो आम पत्रकारों की समस्याओं को टैकल करेगी. छंटनी, वेजबोर्ड, लीगल हेल्प समेत ढेरों मसलों पर प्रेस क्लब संपूर्ण समर्थन देगा. प्रेस क्लब आगे से सिर्फ किसी मीडिया मालिक के दुख में ही नहीं दुखी होगा बल्कि आम पत्रकारों की चिंता-दुख को महसूस करते हुए उसके त्वरित निदान के लिए कार्य करेगा. यशवंत ने प्रेस क्लब के सदस्यों से अपील की कि अबकी लेफ्ट राइट के चक्कर में न पड़ें क्योंकि दोनों ही पैनल में लेफ्ट और राइट दोनों किस्म के लोग हैं. इस बार असल लड़ाई ट्रेडीशनल थिंकिंग बनाम सरोकारी सोच की है. जो लोग सात साल से प्रेस क्लब की सत्ता में हैं और उनके मुंह में जो करप्शन का खून लग चुका है, वे किसी हाल में इसे नहीं छोड़ना चाहते.

ये वही लोग हैं जो कभी पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के जमाने में लोकतंत्र और पारदर्शिता की बातें करके झंडा उठाया करते थे लेकिन जब खुद सत्ता में आए तो लगातार पतित होते रहे. प्रेस क्लब का सदस्य बनाने में पारदर्शिता बिलकुल नहीं है. लाबिंग और चिरौरी के जरिए ही प्रेस क्लब सदस्यता दी जाती है. यह बेहद फूहड़ और अलोकतांत्रिक परिपाटी है जो बंद नहीं की गई. दिल्ली में हजारों जेनुइन जर्नलिस्ट हैं जिन्हें प्रेस क्लब की सदस्यता नहीं दी गई लेकिन ढेरों प्रापर्टी डीलरों, लाबिस्टों और दलालों को सदस्य बना दिया गया. प्रेस क्लब में विकास के नाम पर केवल कुर्सी मेज बदले जाने से लेकर बार-बार बाथरूम तोड़े जाने का काम किया गया.

अब भी पूरे प्रेस क्लब कैंपस में यानि किचन से लेकर कामन हाल तक में चूहे क्राकोच दौड़ते रहते हैं. खाने का स्तर बेहद घटिया हो चुका है. क्लब में अराजकता का आलम दिखता है. जिम के सामान और इसके रूम को तो जैसे डस्टबिन में तब्दील कर दिया गया है. इसके बावजूद इस सत्ताधारी पैनल के लोग अपने राज में खूब विकास किए जाने बात कर सदस्यों को बरगलाते हैं. सच तो ये है कि इनके पास क्लब और इसके सदस्यों की बेहतरी को लेकर कोई आइडिया, विजन, प्लान नहीं है. ये लोग क्लब के सदस्यों में फूट डालकर क्लब को राजनीति का अखाड़ा बनाए रखना चाहते हैं ताकि फूट डालो राज करो वाली अंग्रेजों की नीति के जरिए क्लब की सत्ता हर दम अपने हाथ में रख सकें और दोनों हाथों से क्लब के संसाधन-धन को लूट सकें.   

भड़ास के संपादक और प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में मैनेजिंग कमेटी पद के लिए प्रत्याशी यशवंत का कहना है कि बदलाव फ्रेश वाटर की तरह है. यथास्थिति सड़े पानी की तरह. सत्ताधारी पैनल को नमस्ते करें और प्रेस क्लब की बागडोर बादशाह-शाहिद-जतिन के पैनल को सौंपे.  इस पैनल के सभी प्रत्याशियों और इसके मैनेजिंग कमेटी के सदस्य पद के लिए लड़ रहे उम्मीदवारों को भारी वोटों से जिताएं.

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कौन हैं शाहिद फरीदी, क्यों लड़ रहे प्रेस क्लब चुनाव, देखें ये वीडियो

प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव में शाहिद फरीदी सेक्रेट्री जनरल के पद पर चुनाव लड़ रहे हैं. उनके जीवन और करियर से लेकर प्रेस क्लब के तमाम मसलों पर विस्तार से बात की भड़ास के संपादक यशवंत ने. यशवंत भी इस चुनाव में मैनेजिंग कमेटी मेंबर के लिए मैदान में हैं. देखें वीडियो… नीचे क्लिक करें:

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प्रेस क्लब आफ इंडिया इलेक्शन में मैनेजिंग कमेटी मेंबर के लिए भड़ास वाले यशवंत ने भरा पर्चा

इसी नवंबर महीने की पच्चीस तारीख को होने वाले प्रेस क्लब आफ इंडिया के सालाना चुनाव की गहमागहमी तेज हो गई है.  भड़ास फॉर मीडिया के संस्थापक और संपादक यशवंत सिंह ने शनिवार को अपना नामांकन दाखिल किया. यशवंत मैनेजिंग कमेटी के सदस्य पद हेतु चुनाव लड़ेंगे. दैनिक जागरण, अमर उजाला और आई-नेक्स्ट जैसे अखबारों में सब एडिटर से लेकर चीफ रिपोर्टर और संपादक पद पर आसीन रह चुके यशवंत फिलहाल कई न्यूज चैनलों और अखबारों के सलाहकार के रूप में भी कार्यरत हैं. साथ ही साथ वह दशक भर से भड़ास फार मीडिया के जरिए मीडिया इंडस्ट्री की अच्छी-बुरी हलचलों को जनता के सामने लाने का काम कर रहे हैं.

इस बाबत यशवंत का कहना है-

”प्रेस क्लब आफ इंडिया में बहुत कुछ किया जाना बाकी है. इस क्लब में रचनात्मक गतिविधियां शून्य के बराबर हैं. मीडियाकर्मियों को टेक्नालजी और कंटेंट के बदलते दौर के बारे में अपडेट रखने के लिए वर्कशाप किए जाने की जरूरत है. वेबसाइट्स, ब्लाग, यूट्यूब आदि के जरिए पैसे कमाने के बारे में मीडियाकर्मियों को ट्रेंड किए जाने की जरूरत है ताकि वह नौकरी जाने की स्थिति में खुद के दम पर परिवार का खर्च चला सकें तथा मिशनरी एप्रोच से सच्चाई को सामने रखने वाली पत्रकारिता को बिना दबाव जारी रख सकें. प्रिंट मीडिया के सिकुड़ते परिदृश्य और न्यू मीडिया के बढ़ते जोर के इस दौर में प्रेस क्लब आफ इंडिया में नए किस्म के समझदार पत्रकारों को भेजे जाने की जरूरत है जो समय के साथ प्रेस क्लब की कदमताल करा सकें.  प्रेस क्लब आफ इंडिया के सदस्यों के जन्मदिन पर एक सकारात्मक पहल करते हुए ‘जन्मदिन मुबारक’ नामक एक छोटा-सा कार्यक्रम कराए जाने की जरूरत है ताकि आपसी इंटरैक्शन पढ़ सके.  मुझे उम्मीद है कि प्रेस क्लब आफ इंडिया के सभी सम्मानित सदस्य मेरी दावेदारी को अपने वोट के जरिए संस्तुत करेंगे ताकि प्रेस क्लब आफ इंडिया को देश का मॉडल प्रेस क्लब बनाया जा सके.”

 

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प्रेस क्लब आफ इंडिया के चुनाव घोषित, 13 तक नामांकन, 25 को पड़ेंगे वोट

प्रेस क्लब आफ इंडिया का चुनाव घोषित कर दिया गया है. 13 नवंबर तक नामांकन कर सकते हैं. 25 नवंबर को वोट पड़ेंगे और 26 नवंबर को नतीजे आएंगे. इस बारे में जो नोटिस पीसीआई के सूचना पट पर चिपकाया गया है, वह इस प्रकार है-

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प्रेस क्लब आफ इंडिया के नाकारा प्रबंधन से नाराज भड़ास संपादक यशवंत ने चुनाव लड़ने का दिया संकेत

Yashwant Singh : गजब है प्रेस क्लब आफ इंडिया. दूर के ढोल सुहावने वाला मामला इस पर पूरी तरह फिट बैठता है. दिल्ली के रायसीना रोड पर स्थित प्रेस क्लब आफ इंडिया का नाम सुनने पर वैसे तो दिमाग में एक अच्छी-खासी छवि बनती-उभरती है लेकिन अगर आप इसके मेंबर बन गए और साल भर आना-जाना यहां कर दिया तो आपको यह किसी मछली बाजार से कम न लगेगा. हर साल चुनाव होते हैं. प्रेस क्लब को अच्छे से संचालित करने के वास्ते पदाधिकारी चुने जाते हैं लेकिन लगता ही नहीं कि यहां कोई संचालक मंडल भी है या कोई पदाधिकारी भी हैं. दो उदाहरण देते हैं. प्रेस क्लब आफ इंडिया का चुनाव डिक्लेयर हो गया है. इस बाबत कुछ रोज पहले प्रेस क्लब के सूचना पट पर नोटिस चिपका दिया गया. लेकिन यह सूचना मेल पर नहीं भेजी गई. मुझे तो नहीं मिली. अब तक नहीं मिली है.

हर रविवार खाने में नया क्या है, इसकी जानकारी तो भाई लोग भेज देते हैं लेकिन साल भर में एक बार होने वाले चुनाव और इसकी प्रक्रिया को लेकर कोई मेल नहीं जारी किया. क्यों भाई? क्या सारे मेंबर जान जाएंगे तो चुनाव लड़ने वाले ज्यादा हो जाएंगे?

दूसरा प्रकरण आप लोगों को पता ही होगा. प्रेस क्लब आफ इंडिया के मेन गेट पर  मुझ पर हमला हुआ. यह जगह गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे के दायरे में आता है. लेकिन फुटेज गायब है. क्या तो उस दिन सीसीटीवी कैमरा खराब था. क्यों खराब था भाई? और, खराब होने की जानकारी मुझे दसियों दिन बाद तब मौखिक रूप से दी जाती है जब मैं प्रेस क्लब के कार्यालय सचिव जितेंद्र से पूछता हूं. मैंने घटना के फौरन बाद लिखित शिकायत कार्यालय सचिव जितेंद्र को दिया था. उन्होंने तब कहा था कि फुटेज मिल जाएगा. कल देख लेंगे. पर बाद में पता चला कि फुटेज ही गायब है. मैंने जो लिखित कंप्लेन दी, उस पर क्या फैसला हुआ, इसकी कोई जानकारी अब तक नहीं दी गई. बताया गया कि पदाधिकारी लोग बहुत व्यस्त हैं. किसी के पास टाइम नहीं है इस अप्लीकेशन पर विचार करने के लिए. मुझे लगता है कि प्रेस क्लब के गेट पर दिल्ली पुलिस के दो जवान हमेशा तैनात रखे जाने चाहिए और सीसीटीवी कैमरे हर हाल में आन होने चाहिए. ऐसे ही कई और बड़े कदम उठाने की जरूरत है ताकि यह क्लब अराजकता का अड्डा न बनकर एक वाकई देश भर के प्रेस क्लबों का मॉडल प्रेस क्लब बन सके.  

प्रेस क्लब के टेबल्स पर काक्रोच चलते हैं. इससे संबंधित एक वीडियो भी मैंने एक बार पोस्ट किया था. उसका लिंक फिर से नीचे कमेंट बाक्स में डाल रहा हूं. खाने की क्वालिटी दिन ब दिन खराब होती जा रही है. वेटर आधे-आधे घंटे तक अटेंड नहीं करेंगे. वह शक्ल देखते हैं मेंबर की. नया हुआ और अपरिचित सा लगा तो उसे टेकेन एज ग्रांटेड लेते हैं.

मतलब सब कुछ भगवान भरोसे. फिर फायदा क्या है चुनाव कराने का और नए पदाधिकारी बनाए जाने का.

ऐसा लगता है कि यह संस्था भी देश के दूसरे भ्रष्ट संस्थाओं की तरह होने की राह पर है. जो जीत गया, वह गदगद होकर सो गया.. चाहें आग लगे या बिजली गिरे. उनकी तो बल्ले-बल्ले है. अब जो कुछ बात बहस होगी, वह अगले चुनाव के दौरान होगी. चुनाव आ गया है. फिर से लेफ्ट राइट वाली दुंदुभी बजेगी. ध्रुवीकरण होगा. पैनल बनेंगे. क्रांतिकारी और अति-क्रांतिकारी बातें होंगी. मुख्य मुद्दे हवा हो जाएंगे. फर्जी और पाखंडी वैचारिक लबादों को ओढ़े नक्काल फिर चुन लिए जाएंग. इस तरह एक और नाकारा प्रबंध तंत्र को झेलने के लिए प्रेस क्लब के सदस्य अभिशप्त होंगे.

प्रेस क्लब आफ इंडिया की हालत देख और इसके नाकारा प्रबंधन से खुद पीड़ित होने के कारण सोच रहा हूं इस बार मैं भी चुनाव लड़ जाऊं. जीत गया तो इतना हल्ला मचेगा कि चीजें ठीक होंगी या फिर मुझे ही ठीक कर दिया जाएगा, क्लब से निष्कासित कर के. और, अगर हार गया तो सबसे अच्छा. तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे जो मेरा है… टाइप सोचते हुए अपना रास्ता धर लूंगा और गुनगुनाउंगा- ”गुन तो न था कोई भी, अवगुन मेरे भुला देना…”  वैसे, ये डायलाग भी बीच वाला मार सकता हूं, कि कौन कहता है साला मैं जीतने के लिए लड़ा था. मैं तो बहरों नक्कालों के बीच अपनी बात धमाके से कहने के वास्ता परचा दाखिल किया था, आंय….

वैसे आप लोगों की क्या राय है? अंधों की दुनिया में हरियाली के बारे में बतियाने का कोई लाभ है या नहीं? चुनाव लड़ जाएं या रहने दें…?

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से. संपर्क : yashwant@bhadas4media.com

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