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उत्तर प्रदेश

शिकायतकर्ताओं पर अंकुश लगाकर एलडीए ने अवैध बिल्डर्स को दी राहत?

लखनऊ, 5 जून: आज सुबह से लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) की 28 शिकायतकर्ताओं की एक कथित सूची सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है, लेकिन एलडीए के मीडिया सेल ने इस सूची की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। यह सूची कहां से आई, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है, फिर भी यह बिना पुष्टि के सोशल मीडिया पर धड़ल्ले से शेयर की जा रही है।

अगर यह सूची असली है, तो कई सवाल खड़े होते हैं—क्या किसी शिकायतकर्ता का नाम सार्वजनिक करना उचित है? क्या एलडीए किसी व्यक्ति को आईजीआरएस (जन शिकायत प्रणाली) या सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के अंतर्गत सूचना मांगने से रोक सकता है?

पड़ताल में सामने आया है कि सूची में कई ऐसे नाम शामिल नहीं हैं जिन्होंने सैकड़ों शिकायतें की हैं, जबकि कुछ पत्रकारों और एलडीए बीट कवर करने वाले मीडियाकर्मियों के नाम इसमें दर्ज हैं। इससे यह आशंका उत्पन्न होती है कि कहीं यह सूची चुनिंदा लोगों को टारगेट करने के उद्देश्य से तो नहीं बनाई गई?

सूत्रों के अनुसार, कुछ अधिशासी अभियंता और अवर अभियंता, शिकायतकर्ताओं की पहचान अवैध निर्माण में लिप्त बिल्डरों को बता देते हैं, जिससे शिकायतकर्ताओं की गोपनीयता भंग होती है। यह भी संदेह है कि यह सूची एलडीए के कुछ भ्रष्ट कर्मियों और बिल्डरों की मिलीभगत से तैयार की गई है।

सूची में उन पत्रकारों के नाम भी शामिल हैं जिनकी रिपोर्टिंग के कारण एलडीए के कुछ अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई हुई थी। ऐसे में यह घटना प्रेस की स्वतंत्रता पर सीधा हमला प्रतीत होती है।

सबसे गंभीर बात यह है कि अब तक एलडीए की ओर से न तो इस सूची की पुष्टि की गई है और न ही इसे लेकर कोई आधिकारिक बयान जारी हुआ है। अगर यह सूची गलत है तो उसकी सच्चाई सामने आनी चाहिए, और अगर सही है, तो इसके पीछे की प्रक्रिया और उद्देश्य को लेकर स्पष्टता जरूरी है।

ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है—क्या यह किसी रणनीति का हिस्सा है? क्या शिकायतकर्ताओं को दबाने की कोशिश की जा रही है? और यदि किसी पर धन उगाही या ब्लैकमेल का आरोप है, तो यह जांच का विषय है, न कि सार्वजनिक तौर पर नाम उजागर करने का।

इस मामले में लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष सहित पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब देखना यह होगा कि एलडीए इस पर कब और कैसे जवाब देता है।

मूल खबर…

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