
दयानंद पांडेय-
नई धारा रेजीडेंसी के इस निर्णायक मंडल में जो यह एक जी एन देवी हैं, बहुत पुराने घाघ हैं। भ्रष्ट और अराजक गुजराती हैं। पूरा नाम गणेश देवी है। पर इस नाम से जब कुख्यात हो गए तो जी एन देवी बन गए।
इन का परिचय तो इस फोल्डर में भी है। पर अधूरा सा है। पुराने धंधेबाज हैं। एक समय इनके एनजीओ को अकेले फोर्ड फाउंडेशन बारह करोड़ रुपए प्रति वर्ष देता था। सामाजिक कार्य के लिए। सामाजिक कार्य के नाम पर गुजराती समाज में विष – वमन और तोड़फोड़ ही इनका मुख्य कार्य था। कांग्रेस से ख़ूब उपकृत।
केंद्र में जब मोदी सरकार बनी तो पहली खेप में इनके एनजीओ की फंडिंग पर ब्रेक लगा। सो यह तिलमिला गए। और ज़्यादा आग उगलने लगे। साहित्य अकादमी अवार्ड वापसी के अगुवा बन कर भी उपस्थित हुए। क्यों कि साहित्य अकादमी से यह भी अलंकृत हैं। आज भी। तमाम ऐलान के बाद भी वापस कहां किया किसी ने भी। यह भी क्यों करते भला। अब नई धारा रेजीडेंसी के निर्णायक बने तो विवाद और विष – वमन का साथ फिर भी नहीं छूटा।
बाक़ी गणेश देवी के सामने ममता कालिया और प्रियदर्शन के पास कुछ कहने-सुनने को क्या ही शेष रहा होगा, सिवाय सहमति जताने के। सवाल लेकिन महत्वपूर्ण यह भी है कि गुजराती के लेखक गणेश देवी, मोदी विरोध में कृष्ण कल्पित से भले परिचित रहे होंगे पर गोरखपुर की अनाम कवयित्री शिवांगी गोयल जो प्रयाग में पी एच डी के लिए गई बताई जाती है, कैसे अचानक परिचित हो गए? क्योंकि हिंदी में भी 99 प्रतिशत से अधिक लोग शिवांगी गोयल से परिचित नहीं रहे थे।

विवाद के कारण दो दिन से होने लगे हैं। सवाल बहुत से अनुत्तरित हैं अभी। नई धारा के लोगों की तरफ से कोई अधिकृत वक्तव्य अभी तक सार्वजनिक नहीं हुआ है। जाने कब होगा। बाक़ी हिप्पोक्रेट लेखकों से मुझे कभी कोई शिकायत नहीं रही। अब भी क्यों होगी भला।
बात – बेबात लंबी-लंबी टिप्पणियां लिखने वाले प्रियदर्शन भी ख़ामोश हैं। देवेंद्र कुमार की कविता पंक्ति याद आती है : अब तो अपना सूरज भी आंगन देख कर धूप देने लगा है। तो प्रियदर्शन भी सूर्य भले नहीं हैं, पर आंगन देख कर ही बोलने के अभ्यस्त हैं। बहुत सेलेक्टिव हैं। चुनी हुई चुप्पियों और चुने हुए विरोध के हामीदार।
अंजुम रहबर का एक शेर है :
जिन के आंगन में अमीरी का सजर लगता है
उन का हर ऐब भी ज़माने को हुनर लगता है।
आदरणीया ममता कालिया जी पर कुछ नहीं कहने की अनुमति चाहता हूं।
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