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सुख-दुख

मस्त मलंग थे अजित राय : कॅरियर में साहित्य की पत्रकारिता से होते हुए अंतरराष्ट्रीय फिल्म समीक्षक का ताज पहन अपनी माटी को रोशन किया!

दिलीप चौबे-

अजित सबके मीत। अजित जी की असामयिक निधन की खबर से रात भर बेचैन रहा। जागता रहा। नींद नहीं आई। वह हमारे जनपद(बक्सर) के थे। मुझे अपना अग्रज मानते थे और उसी नजरिये से सम्मान भी करते थे।

अजित हर दिल अजीज थे। फेसबुक पर उनके मित्रों और शुभचिन्तकों द्वारा लिखे गए संस्मरण बता रहे हैं। अदब उनके यहाँ आकर अदब सीखा करता था। कॅरियर में साहित्य की पत्रकारिता से होकर अंतरराष्ट्रीय फिल्म समीक्षक का ताज पहनकर अपनी माटी का नाम रोशन किया।

हम जैसे मित्रों के लिए यह गौरव का क्षण था। हर वर्ष लंदन जाने के पहले मेरे पास उनका फोन आता था ‘दिलीप भइया जा रहा हूँ यूरोप दो महीने के लिए’। रात भर सोचता रह गया अब यह फोन नहीं आएगा।

पिछले 5 जुलाई को लंदन से उनका फोन आया था। वह पूरी तरह स्वस्थ और प्रसन्नचित थे। दिल्ली में अपने कॅरियर के शुरुआती दिनों में उन्होंने राष्ट्रीय सहारा अखबार में फ्रीलांस पत्रकार के रूप में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मेरे अनुरोध पर उन्होंने उस समय के प्रायः सभी दिग्गज साहित्यकारों का साक्षात्कार राष्ट्रीय सहारा के लिए किया। संस्थान में कुछ लोग उनके विरोधी भी थे लेकिन मैंने इसकी परवाह नहीं की और उनके काम को प्रमुखता दी।

अजित जी की खासियत यह भी थी कि उन्होंने अपने विरोधियों की बातों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। कह सकते हैं कि वह नाट्य और फिल्म समीक्षा की दुनिया के मस्त मलंग थे। देश और विदेश में उन्होंने अपनी एक मस्त मौला की छवि बनायी थी।

कहीं भी जाते थे गले में बिहारी गमछा उनकी पहचान हुआ करती थी। अजित जी आप हमेशा दोस्तों मित्रों और शुभचिन्तकों के दिलों में रहोगे। आपकी स्मृतियों को सादर नमन। ॐ शांति।

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