संजय कुमार सिंह
करुर हादसे की खबर आज भी दिल्ली के कई अखबारों में पहले पन्ने पर है। उसकी चर्चा से पहले बता दूं कि, अमर उजाला और नवोदय टाइम्स ने कल इसे पहले पन्ने पर प्रमुखता से प्रकाशित किया था। मुझे यह अटपटा लगा इसी कारण मैंने भाजपा की राजनीति के साथ तमिलनाडु में भाजपा की जरूरतों की चर्चा करते हुए लिखा था, मुझे लगता है कि यह खबर चाहे जितनी दुखद और हृदय विदारक हो दिल्ली के हिन्दी अखबार में पहले पन्ने पर बतौर लीड छपी है तो भाजपा की राजनीति के कारण। यही नहीं, उत्तर प्रदेश के अखबार में उत्तर प्रदेश की हिन्सा छोड़कर तमिलनाडु के हादसे की खबर को महत्व दिया जाये तो कारण सिर्फ मरने वालों की संख्या नहीं हो सकती है। आज यह बताना जरूरी है कि करुर की खबर दूसरे दिन भी जब दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर है तो यह अमर उजाला और नवोदय टाइम्स में नहीं है। आज यह देशबन्धु में लीड है। शीर्षक है, करुर भगदड़ में मरने वालों की संख्या 40 हुई। कल ये खबर यहां नहीं थी। इसीलिए मैंने शीर्षक में लिखा है, ‘खबर’ बना दिया गया। आइये, आज खबर बनाने के भाजपाई खेल को समझते हैं। हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए खबर बनाना जरूरी है और कई बार यह प्रधानमंत्री, मंत्री के भाषणों से भी किया जाता है। आज, कल वाली खबर को ‘दिल्ली के लायक’ बनाया गया है। इसके लिए शीर्षक है, मरने वालों की संख्या 40 हो गई। यहां दिलचस्प है कि कल अमर उजाला में मरने वालों की संख्या 38 और दि एशियन एज में 39 बताई गई थी। ऐसे में आज 40 होने की खबर किसी भी तरह से पहले पन्ने की सूचना नहीं है। इसे पहले पन्ने की खबर बनाया गया। उसपर बाद में। अभी तो इतना ही कि जो खबर कल छप चुकी उसके फॉलोअप में मरने वाले 40 हुए के शीर्षक से यह पहले पन्ने की खबर नहीं हो सकती है। दिल्ली की खबर होती तो दिल्ली के अखबारों के लिए माना जा सकता था। द टेलीग्राफ में यह, फैन क्लब राजनीति के नुकसान के साथ पहले पन्ने पर है। दि एशियन एज में शीर्षक है, तमिलनाडु में भगदड़ की जांच शुरू; मरने वाले 40 हुए, के साथ पहले पन्ने पर है। मुझे लगता है कि यह खबर ‘बनाने’ का नतीजा है। या तो इसे कहकर खबर बनवाया गया है या फिर कहकर छपवाया गया है। इन दो अखबारों के शीर्षक के करण यह पहले पन्ने पर भले अटपटा नहीं लगता है लेकिन इसके राजनीतिक कारण हो सकते हैं या यह सामान्य पत्रकारिता नहीं है।
आज की अन्य उल्लेखनीय खबरें
| 1 | देशबन्धु | लद्दाख संस्कृति पर हमला कर रहे भाजपा-आरएसएस – राहुल गांधी |
| 2 | नवोदय टाइम्स | सोनम वांगचुक की पत्नी ने कहा, पाकिस्तान से संबंध की कहानी झूठी, हिन्सा के लिए सुरक्षाबल जिम्मेदार। |
| 3 | दि एशियन एज | लेह में पांच दिन से कर्फ्यू जारी |
| 4 | द टेलीग्राफ | प्रधानमंत्री ने आरएसएस की दोबारा तारीफ की |
| 5 | टाइम्स ऑफ इंडिया | बिहार चुनाव से पहले सरकार छठ को यूनेस्को सूची में जगह दिलाने की कोशिश कर रही है। यह चुनावी प्रचार के लिए बहुत ही घिनौना हथकंडा है। प्रधानमंत्री के स्तर के हिसाब से बेहद तुच्छ। यह काम बिहार के मुख्यमंत्री पद के दावेदार से करवाया जा सकता था। नहीं है तो बिहार भाजपा के किसी नेता से कहलवाया जा सकता था और तब यह टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर नहीं छपती। |
| 6 | इंडियन एक्सप्रेस | प्रधानमंत्री ने इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी की किताब का प्राक्कथन लिखा है। उन्होंने इसे उनके ‘मन की बात’ कहा है। हिन्दी में यह खबर और शायद किताब भी खूब पढ़ी जाएगी। |
| 7 | हिन्दुस्तान टाइम्स | एशिया कप में भारत ने पाकिस्तान को हराया तो शीर्षक है, फिर से ऑपरेशन सिन्दूर (यह शीर्षक प्रचारकों की पत्रकारिता है)। |
करुर की आज की खबर पर आने से पहले बता दूं कि आज की कौन सी खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है, रिपोर्टर्स कलेक्टिव का कल का यह खुलासा कि बिहार में एसआईआर के दौरान भाजपा की ओर से या उसके नाम पर करीब 80 हजार वोट कटवाने की कोशिश एक से ज्यादा बार की गई है। सभी मुस्लिम वोटर हैं। एक बीएलए ने रोज अधिकतम 10 के हिसाब से अंतिम 13 दिन में 130 मुसलमानों के नाम कटवाने के लिए आवेदन किया। इसका असर एक अक्तूबर को पता चलेगा जब मतदाता सूची सार्वजनिक होगी। वोट चोरी के आरोप और पिछले खुलासों को जब प्रचारक और सरकार समर्थक फुस्स बम कह रहे हैं तब यह निश्चित रूप से पहले पन्ने की खबर है लेकिन आज मुझे अपने नौ अखबारों में से किसी में भी यह पहले पन्ने पर नहीं दिखी। ठीक है कि दूसरे की कल की खबर आज पहले पन्ने पर क्यों छपे। लेकिन 2014 से पहले ऐसा खूब होता था। तब की सरकार के खिलाफ इंडियन एक्सप्रेस की खबरों को महत्व ही इसलिये मिलता था कि वे खूब छपती थीं और अरुण शौरी ने खुद स्वीकार किया था कि वे अपने खुलासे संसद सत्र के दौरान करते हैं ताकि उसका प्रभाव हो। अब ससंद के सत्र के दौरान किये गये खुलासों पर भाजपा की प्रतिक्रिया देखकर हंस सकते हैं पर अभी वह मुद्दा नहीं है। करुर की खबर आज इंडियन एक्सप्रेस में भी पहले पन्ने पर है। कल लीड थी और शीर्षक में 38 लोगों के मरने की सूचना थी। आज शीर्षक है, भगदड़ के अगले दिन : मरने वाले 40 हुए, टीवीके नेताओं के खिलाफ मामला, विजय एफआईआर में नहीं। इसके साथ एक और खबर है, मरने वालों में दूधमुंहे की मां, दो प्रशंसक जिनकी शादी होनी थी :’सिर्फ उन्हें देखना चाहते थे’। कहने की जरूरत नहीं है कि हर हादसे में मरने वाले ऐसे ही होते हैं और किसी के लिए यह नहीं कहा जा सकता है कि अकेला दुनिया में बचा हुआ था वह भी चला गया। हालांकि, ऐस हो तो भी खबर होगी ही। मेरे कहने का मतलब है कि हादसे पर ध्यान खींचने के लिए इसे महत्व देने-दिलाने के लिए ऐसे शीर्षक लगाये जा सकते हैं। इसमें मरने वाले 40 हुए बिल्कुल फॉलो अप का शीर्षक है और कल लीड के बाद आज सेकेंड लीड होना असामान्य है। यह भाजपा की राजनीति का प्रभाव हो सकता है।
आज यह खबर टाइम्स ऑफ इंडिया में भी पहले पन्ने पर है। इसके साथ हादसे की भयावहता दिखाने वाली दो कॉलम की फोटो है। कायदे से इसके साथ यह सीख होनी चाहिये थी कि नेताओं को भीड़ की जरूरत होती है, उन्हें आपको भीड़ के रूप में दिखाना होता है। भीड़ का हिस्सा न बनें, जान की जोखिम न लें। किसी नेता ने कहा होता कि वह अब ऐसी रैली नहीं करेगा और इतना बड़ा जोखिम लेकर रैली या राजनीति नहीं करेगा तो इस फोटो को पहले पन्ने पर छापने का मकसद पूरा होता लेकिन ऐसा कुछ होने वाला नहीं है। लाशें या भयावहता खबर नहीं हो सकती हैं। मेरे मित्र संजय सिन्हा का कहना है कि अमेरिका में ट्विन टावर हादसे के बाद ऐसी कोई फोटो सार्वजनिक तौर पर नजर नहीं आई जिसमें कोई लाश हो लेकिन यहां तो हद है। मुझे याद है तब अमेरिका से संजय की खबर थी और मैंने शीर्षक लगाया था, लोग डरे हुए हैं कि बच्चे न डर जाएं। यहां बच्चों की किसे परवाह है। मुस्लिम युवाओं को जिस तरह सताया जा रहा है वह शर्मनाक है और इसमें पांच साल जमानत नहीं मिला तो अति है। पर जनता सब देख रही है। नरेन्द्र मोदी को भगवान मानने वालों की संख्या कम नहीं हो रही है। द हिन्दू के पहले पन्ने पर आधा विज्ञापन है। चार कॉलम में करुर की खबर का फॉलोअप उसी सरकारी शीर्षक के साथ लीड है जो दूसरे अखबारों में है। सभी अखबारों में एक ही शीर्षक से पत्रकार साथियों की इन सूचनाओं को दम मिलता है कि प्रधानमंत्री कार्यालय से सभी संपादकों को निर्देश जाता है कि किस खबर का क्या कैसे करना है। मुझे इसपर यकीन नहीं है लेकिन खबरों से शक जरूर मजबूत हो रहा है कि कई अखबारों में ऐसा किसी एख हस्ती के आदेश पर किया गया हो सकता है।
दि हिन्दू में लीड के साथ तीन कॉलम में एक क्रिकेटर की तस्वीर है और यह कल के एक महत्वपूर्ण मैच से जुड़ा है जो आज अमर उजाला में लीड है। खेल की खबर पहले पन्ने पर क्यों है – इसका जवाब शीर्षक से ही मिल जाता है। शीर्षक है, विजयी तिलक। मुझे इसका मतलब नहीं समझ में आया लेकिन उपशीर्षक से बात साफ हो जाती है। इसके अनुसार, भारत को नौवीं बार एशिया कप का ताज। चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को एक ही टूर्नामेंट में तीसरी मात। द हिन्दू में आज पहले पन्ने पर गिनती की ही खबरें हैं। इसका कारण मैं समझ सकता हूं। संकेत पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर है, चैतन्यानंद गिरफ्तार, पुलिस हिरासत में भेजा गया। यह एक स्वामी जी की खबर है जिनका नाम स्वामी चैतन्यानंद सरस्वती है और आप एक मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर के रूप में काम करते हुए 17 छात्राओं के यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार किये गये हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि संस्कारी व्यवस्था में यह गिरफ्तारी ही खबर नहीं है। हो कैसे गई पता नहीं। जो भी हो, यह खबर पहले पन्ने पर ढूंढ़नी पड़ रही है। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर फोटो के साथ प्रमुखता से जरूर है लेकिन शीर्षक में इन्हें भगोड़ा ‘स्वामी’ लिखा गया है। ‘स्वामी’ लिखने का मतलब है कि वे गलत दावा कर रहे थे। पर तथ्य यह है कि ऐसे ही एक स्वामी भाजपा राज में भारत के गृह राज्यमंत्री रह चुके हैं। वे भी छात्राओं का यौन शोषण करते थे। नंगे होकर तेल मालिश कराने का वीडियो सार्वजनिक हुआ था पर व्यवस्था ने उन्हें बचा लिया। दलील यह कि वीडियो उन्हें फंसाने और संभवतः वसूली के लिए बनाया गया था। पीड़िता जेल में हो तो कह नहीं सकता। अमृतकाल में ऐसी पीड़िताओं का अकेले हिसाब रखना लगभग असंभव है। देसी चंदे से हो नहीं सकता और विदेशी चंदा लेकर तो सोनम वांगचुक नहीं बचे।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।
संजय कुमार सिंह से [email protected] के ज़रिए संपर्क किया जा सकता है।


