श्रवण गर्ग-
रघु राय को लेकर मन में कई तरह की स्मृतियाँ हैं। शुरुआत अनुपम मिश्र से करते हैं। साल 1971 में इंदौर छोड़कर प्रभाष जोशीजी के साथ काम करने राजघाट स्थित गांधी स्मारक निधि दिल्ली पहुँच गया था और वहीं रहने भी लगा था। अनुपम के साथ वहीं घनिष्ठ मित्रता हुई।
अनुपम पर्यावरणविद बाद में बने, वे उस समय फोटोग्राफी में ज़्यादा रुचि लेते थे। कैमरा उनकी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा बना हुआ था। कंधे पर लटका ही रहता था। हर दूसरे-तीसरे दिन उनके साथ कनॉट प्लेस जाकर फ़िल्म डेवलप करवाकर प्रिंट्स बनवाना पड़ता था।
बहरहाल, अनुपम के साथ काम करते हुए मैं भी फोटोग्राफी करने लगा। एक के बाद एक कैमरा आज़माता रहा। जेनिथ से शुरुआत की, फिर असाई पेंटेक्स खरीदा फिर 1982 में लंदन गया तो ओलंपस-ओएम टू ले लिया। ओबामा के समय साल 2009 में मनमोहन सिंह के दल के साथ अमेरिका जाना हुआ तो फिर एक नया कैमरा खरीद लिया। वह शौक आज भी कायम है।
दिल्ली में काम करते हुए रिपोर्टिंग के सिलसिले में जब भी किसी इवेंट के लिये जाना होता था रघु राय को काम करते हुए देखने का अवसर मिलता था। रघु राय जिस स्थान और एंगल से फोटो लेते थे कोशिश करता था कि मैं भी उसी जगह से वैसे ही एंगल से फोटो लूँ।
अगली सुबह जब रघु राय का फोटो स्टेट्समैन अखबार में देखता और अपने लिए फोटो से तुलना करता तब पता चलता था कि रघु राय इतनी ऊँचाई पर अपनी किस विलक्षण प्रतिभा और दृष्टि के कारण पहुंचे होंगे। बाद में जब 1994 में इंडियन एक्सप्रेस समूह के साथ काम करने का मौक़ा मिला तो वहाँ रघु राय के भाई एस पॉल को काम करते हुए देखा।
पत्रकारिता का वह जमाना फोटोग्राफरों का था। एक बड़ी संख्या में लोग स्टेट्समैन को रघु राय और भवान सिंह जैसे फोटोग्राफरों के लिए ही ख़रीदते थे। रघु राय का काम बाद में इंडिया टुडे में दिखने लगा। आज के समय में फोटोग्राफर सैंकड़ो की संख्या में होंगे पर ऐसा कोई अखबार नहीं दिखता जिसमें रघु राय जैसा कोई फोटोग्राफर हो।
साल 1974 के बिहार आंदोलन के दौरान एक लंबे समय तक पटना में रहना हुआ। पटना में हुई रैली के दौरान जेपी पर पड़ रही लाठी के क्षण को जिस अद्भुत संवेदना के साथ रघु राय ने कैप्चर किया वह चित्र ऐतिहासिक बन गया।
दिसम्बर 1984 में भोपाल के यूनियन कार्बाइड प्लांट में हुई त्रासदी के जो मार्मिक चित्र रघु राय ने लिए और वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हुए दुनिया भर की आत्माओं को हिला दिया। मैं तब इंदौर-भोपाल से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी दैनिक फ्री प्रेस जर्नल से जुड़ा हुआ था और हम पत्रकार रघु राय के चित्रों को देख-देखकर त्रासदी की भयावहता को आंकते थे।
चेहरों, घटनाओं और त्रासदियों को रघु राय अपने कैमरे के लेंस से नहीं कैप्चर नहीं करते थे। उनकी हथेलियों का स्पर्श पाते ही कैमरा स्वतः रघु राय के मन की गहराइयों में उतरकर उनकी आत्मा की आँखों से अविस्मरणीय चित्र खींच लेता था। रघु राय का जाना भारतीय फोटोग्राफी के किसी सत्यजीत रॉय के चले जाने जैसा ही है। विनम्र श्रद्धांजलि..
जाने माने फोटोग्राफर रघु राय की अंतिम विदाई यूं कैद हुई कैमरे में। इसमें भी कैमरा, लाइट सब साथ है …अलविदा -पंकज मुकाती, वरिष्ठ पत्रकार

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