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सुख-दुख

दो कैमरे गर्दन पर, दो कंधों के सहारे टाँगे और दो कमर पर बंधे, मुझे रघु राय प्राचीन मध्ययुगीन इतिहास में दर्ज किसी अरब सौदागर से दिखे!

राजीव नयन बहुगुणा-

हौले पाँव धरो रघु राई
विकट पंथ पग रपट न जाई
प्रबल वेग सुरसरि कल्याणी
अविगत गति कछु क़हत न जाई

यही कोई बाईस साल पहले मुझे मेरे मोबाइल फ़ोन पर शाम को एक काल मिली – नमस्कार राजीव नयन जी. मेरा नाम रघु राय है, और मैं एक फ्री लांस फोटोग्राफर हूँ.

यह सुनते ही मैं जेएनयू हॉस्टल स्थित मित्र के कमरे में खाट से कूद कर सीधा खड़ा हो गया, मानो रघु राय मेरे सामने ही खड़े हों. उनकी यशः काया से भला कौन पढ़ा लिखा भारतीय, और वह भी पत्रकार, अपरिचित रहा होगा.

वह अगली ही सुबह मेरे पिता पर एक फ़ीचर करने टिहरी जा रहे थे. इससे काफ़ी पहले टिहरी बांध विरोधी आंदोलन को कवर करते मैं उन्हें देख चुका था. लेकिन हम दोनों में तब कोई बात नहीं हुई. वह अपरिचितों से बात करने में कम ही रुचि लेते थे.

इस बार वह मुझे अपने साथ टिहरी ले चलने की संभावना पूछ रहे थे. उन्होंने कहीं से, संभवतः किसी हिंदी पत्रकार से मेरा मोबाइल नंबर हासिल किया. उनका निमंत्रण मेरे लिए मौत के बुलावे की तरह अपरिहार्य था , जिसे टाला नहीं जा सकता.

मैंने सूचित किया, सर मैं मित्र के हॉस्टल रूम में कई दिन से अवैध रूप से रुका हूँ. आप जब, जहाँ बुलायें, चला आऊँगा. तय हुआ कि वह सुबह ठीक आठ बजे गाड़ी लेकर जेएनयू गेट पर आ जाएँगे.

रात प्रेस क्लब जाकर मैंने अनेकों को रघु राय के ऑफर की सूचना दी, तथा सबूत के तौर पर लॉग में उनका नंबर भी दिखाया, लेकिन किसी को नंबर नोट न करने दिया.

मैं भोर की भोर उठ कर पैदल पाँव ही 7 बजे जेएनयू गेट पर पहुँच कर टहलने लगा. पौने नौ बजे तक भी जब रघु राय का कोई निशान तक न मिला, तो मैंने उनके मोबाइल पर निकट के पीसीओ से फ़ोन किया. अपरिचित नंबर होने के कारण फ़ोन न उठा.

तब संभवतः मेरे फ़ोन पर बैलेंस न रहा होगा, मैंने उन्हें मिस काल मारी. पलट कर ही मेरे मोबाइल पर उनका जवाब मिला – मैं तो आईआईटी गेट पर तय समय से ही आपकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ.

लेकिन सर, बात तो जेएनयू गेट की हुई थी?

ओह, सॉरी मुझसे ग़फ़लत हो गई… उन्होंने कहा…

दस मिनट बीतते न बीतते ठीक मेरे पहलू में उनकी आलीशान कार के ब्रेक लगे, और वह लापरवाही से उतर कर तपाक से मुझे मिले. उनके उतरने में जितनी लापरवाही थी, मिलने में उतनी ही त्वरा.

दो कैमरे गर्दन पर आगे लटकाए, दो कंधों के सहारे पीछे टाँगे और दो कमर पर बंधे. मुझे वह प्राचीन मध्य युगीन इतिहास में वर्णित किसी अरब सौदागर से दिखे.

अथवा ऐसे ही बमों और असलहों से लैस एक आतंकवादी से अपनी रिपोर्टिंग के दौरान मेरा पाला पड़ा था. पल भर में मैं समझ गया कि वह अपनी धुन में रहने वाले अलमस्त दरवेश हैं.

कल शाम जेएनयू को आईआईटी समझने की गफ़लत उनसे इसी लिए हुई. इस यात्रा में मैं रघु राय के साथ लगभग हफ़्ते भर रहा.

शुरुआत में उल्लिखित पंक्तियाँ मैंने, राम चरित मानस की तर्ज़ पर हँसी में तब लिखी, जब वह गंगोत्री की ख़तरनाक ढलानों पर लौंडे लबारों की तरह दमादम कूद रहे थे, और मुझे उनके रपटने का भय था.

आगे की कुछ और पंक्तियाँ इस तरह याद आ रही हैं:-

“आपन बेग संभारो आपहिं
जान बची तो लाखों पाई
कुसल ख़ेम डेरा पर चलिहों
लवण मत्स्य संग बोदका खाई“

प्रस्तुत चित्र रघु राय के संग्रह का है. सम्भवतः चालीस साल पुराना. पाँच वर्ष पूर्व जब मेरे पिता की पहली बरसी पर स्मारक ग्रन्थ छपने लगा, तो मैंने रघु राय के चित्र का प्रस्ताव दिया.

अनेक मित्रों ने कहा, वह इस मामले में ठेठ प्रोफेशनल हैं. एक एक फोटो का लाखों माँगते हैं.

मुझे पता है, मैंने उत्तर दिया, पर इस मामले में ऐसा नहीं होगा. कुछ ही क्षणों में रघु राय की यह कृति मेरे मोबाइल पर पहुँच गई.

(एक खेप और) क्रमश:


वन विचरत निर्भय रघुराजू
सिद्ध करत ऋषि मुनि के काजू

बग़ैर वक़्त गँवाये आगे बढ़ने के मंशा से रघु राय ने मुझसे पूछा कि मैं गाड़ी में आगे या पीछे , कहाँ बैठना पसंद करूँगा?

मैंने आगे ड्राइवर के बग़ल वाली सीट चुनी, क्योंकि इंदिरा गांधी, हमारे प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री भुवन चंद्र खंडूरी तथा मैं हमेशा, हर तरह की कार में अगली सीट पर ही बैठना पसंद करते रहे हैं.

दूसरा मुझे यह भी विदित था कि बड़े लोग आराम तथा ड्राइवर से दूरी बनाये रखने के मक़सद से पिछली सीट पर ही बैठना पसंद करते हैं।

रघु राय ने पिछली सीट पर बैठते ही भीषण ट्रैफ़िक की परवाह किए बगैर खिड़की से अपनी गर्दन तथा दोनों हाथ मय कैमरा बाहर निकाल लिए, तथा ताबड़ तोड़ जो सामने आये, उसे शूट करने लगे, जैसे कोई उन्मादी बगैर अपना पराया बूझे सब पर तड़तड़ गोलियाँ बरसाता चलता है
इस प्रक्रिया में उन्होंने अनेक टैक्सी तथा ट्रक वालों से डपट भी खाई, क्योंकि वह बेपरवाह हो गर्दन बाहर निकाले थे, तथा अपनी हिफ़ाज़त का जिम्मा आतियों जातियों पर छोड़ दिया था।

उन्हें रगड़ से बचाने के लिए ओवर टेक करते अनेक वाहन चालकों को अप्रिय कट मारने पड़ रहे थे, लेकिन रघु राय को न इसकी परवाह थी, न ख़ुद पर पड़ रही गालियों की।

ग़ाज़ियाबाद क्रॉस करते ही ड्राइवर ने अपना फ़ोन रिचार्ज करने की सूचना देकर गाड़ी रोकी, तो मैं भी इसी काम से उतरने लगा। इस पर रघु राय ने कहा, आप बैठे रहिए. ये करा लायेगा।

उन्होंने ड्राइवर को दोनों फ़ोन रिचार्ज के पैसे दिए. कितने? यह मुझे याद नहीं, पर इससे बड़ा रिचार्ज मैंने पहले कभी नहीं कराया था।

इसी बीच अवसर पाकर उन्होंने आगे बैठने की इच्छा व्यक्त की. मैं इस बीच समझ ही गया था कि उनकी स्वाभाविक जगह कार की अगली सीट ही है. मैंने ध्यान दिया कि मुझे पिक करते वक्त वह कार की अगली सीट से ही उतरे थे. मेरा मन रखने को वह मन मार कर ही पीछे बैठ गए थे.

इसी दौरान उनके किसी संपादक अथवा प्रायोजक का फोन आया, या उन्होंने ही किया। उन्होंने अमुक को फोन पर सूचना दी – मैं दिल्ली क्रास कर चुका हूँ. बहुगुणा जी के पत्रकार बेटे मेरे साथ ही हैं. मैं इस बार ऐसे फोटो क्लिक करने जा रहा हूँ कि तेरी लाइफ़ बन जाएगी. लेकिन यह नहीं होना चाहिए कि मेरे साथ तय आठ लाख रुपये देने में तू आठ महीने लगा दे. मेरी कोई फैक्ट्रियाँ थोड़े चल रही हैं.

यह सब सुन मेरे रोंगटे खड़े हो गए.

रघु राय अपने साथ दिल्ली नंबर की एक ठंडी और चौड़ी चकली टैक्सी लाए थे. उसका मज़बूत एसी मई अथवा जून के प्रचण्ड आतप को तनिक भी सटने नहीं दे रहा था. वह कौन सी कार थी, मुझे याद नहीं, लेकिन उस समय प्रचलित शानदार गाड़ियों में कोई एक रही होगी।

उसका ड्राइवर जिस तरह उनके इशारे पर नाच रहा था, और ज़रूरत पड़ने पर असिस्टेंट कैमरा मैन की भूमिका निभा रहा था, उससे मुझ पर खुल गया कि वह बार बार उनके साथ चलने का अभ्यस्त है.

फोटो खींचते वक्त वह कुछ बोलने की बजाय बुदबुदाते थे, और कभी कभी वह भी नहीं।

वह बग़ैर गर्दन मोड़े पहली, दूसरी, तीसरी उंगली का इशारा करते, और ड्राइवर वांछित कैमरा अथवा लैंस बैग से निकाल उनके हाथ में धर देता।

उनकी एक आँख तथा एक हाथ कैमरे पर रहता, और वह बगैर देखे कैमरा जाँघ पर रख दूसरे हाथ से उस पर लेंस फिट कर देते।

पंडित रविशंकर को भी मैंने एक बार देखा कि उन्होंने बगैर देखे एक ही घिसे में सहयोगी का उतर चुका तानपुरा सुर में ला दिया, और दूसरे हाथ से सितार टेरते रहे।

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