पलाश विश्वास-
अत्यंत दुखद। छंटनी तो ऑटोमेशन के साथ शुरू हो गई थी। करीब बीस साल पहले। इंडियन एक्सप्रेश समूह के अखबारों में बहुत भारी भरकम संपादकीय टीमें हुआ करती थी। स्टाफ रिपोर्टर के अलावा देश के हर कोने में स्ट्रिंगर होते थे। हमारे देखते-देखते इन अखबारों में बिना संपादकीय ऑटोमेशन से काम चलने लगा।
एक मुख्य संस्करण से पेज बनते हैं। स्थानीय पेज और खबरें एडजस्ट करने के लिए नाम मात्र का संपादकीय बच गया। रिपोर्टर और स्ट्रिंगर, लेखक, संपादक की जरूरत नहीं है अब। या तो कंटेंट सत्ता के गलियारे से आ जाता है या नेट से रेडीमेड मिल जाता है।
जनसत्ता में चौथाई सदी बीतने के बाद मई 2016 में रिटायर होकर मैं अपने घर उत्तराखंड आ गया। इन दस सालों में दुनिया बदल गई है। अखबार अब सर के बल खड़े हैं।
अप्रैल 1980 में दैनिक आवाज धनबाद से लेकर 14 मई 2016 तक हर रात मैंने अखबार निकाले। जो आजादी और स्टैंड के साथ आवाज़, प्रभात खबर, दैनिक जागरण, दैनिक अमर उजाला में हमने काम किया, आज उसकी सपने में भी कल्पना नहीं की जा सकती।
हां, मैंने दैनिक जागरण में 1984 से 1990 तक काम किया है। पत्रकारों की भर्ती और उनके प्रशिक्षण का काम भी किया है।
निजी तौर पर यह परिदृश्य मेरे लिए दुखद, भयावह है। अखबारों को आज संपादक पत्रकार की जरूरत नहीं है। दमन सिर्फ स्वतंत्र पत्रकारों का नहीं हो रहा है।
वे तो सड़कों पर जनता की आवाज उठा रहे है। लेकिन बड़े अखबारों और संस्थानों में तो संपादक पत्रकार को जिंदा दफन करने का रिवाज चल रहा है।
ऐसे में तो जो न सत्ता के खिलाफ है और न जनता के साथ, वे भी इसी तरह मारे जाएंगे।
चरण सिंह-
आत्महत्या नहीं दैनिक जागरण ने हत्या की है राजेश अवस्थी की!

इस अंधेरगर्दी की भेंट एक और पत्रकार चढ़ गया। जी हां। मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार राजेश अवस्थी ने आत्महत्या कर ली है। आत्महत्या का कारण दैनिक जागरण के छंटनी करने में राजेश अवस्थी का नाम भी बताया जा रहा है। लम्बे समय तक जागरण में सेवा करने पर यदि राजेश अवस्थी को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा तो फिर यह मामला आत्महत्या की नहीं बल्कि हत्या का है। जागरण प्रबंधन ने उनकी हत्या की है।
मेरठ के माधवपुरम के रहने वाले राजेश अवस्थी का शव संदिग्ध परिस्थितियों में मिला है। उनके पास से सल्फास की सीसी मिली है। बताया जा रहा है कि राजेश अवस्थी लंबे समय तक दैनिक जागरण मेरठ में कार्यरत रहे और प्रबंधन ने छंटनी के तहत उन्हें नौकरी से निकाल दिया। जहां कभी पुराने कर्मचारियों को संस्थाएं विशेष सम्मान देती थी वहीं जागरण ने लम्बे समय तक सेवा देना का राजेश अवस्थी को यह इनाम दिया है।
दरअसल मीडिया को लोकतंत्र का चौथा खम्भा बताया जाता है। मीडिया ने लम्बे समय तक चौथे खम्भे की जिम्मेदारी निभाई है। किसी समय मीडिया सरकार को आईना दिखाने का काम करता था। भ्रष्टाचारियों पर लगाम लगाने का काम करता था। किसी समय मीडिया के क्षेत्र में अच्छा वेतन और सम्मान के साथ ही विशेष सुविधाएं भी हुआ करती थीं। पत्रकारों का सम्मान विशेष रूप से हुआ करता था। आज की तारीख में मीडिया सत्ता और प्रभावशाली लोगों के लिए काम करने लगा है। आज के व्यावसायिक और चाटुकारिता के दौर में सबसे अधिक दुर्गति मीडिया क्षेत्र में काम कर रहे स्वाभिमानी और ईमानदार लोगों की हो रही है। स्थिति यह है कि दूसरों की आवाज उठाने का दावा करने वाला मीडिया खुद मीडियाकर्मियों की आवाज नहीं उठा पा रहा है।
मीडिया की दुर्गति के लिए सरकारें और मालिक तो जिम्मेदार हैं ही। साथ ही मीडिया में जिम्मेदारी के पद पर बैठे लोग भी जिम्मेदार है। अब जेब के संपादक हो गए हैं। जिनका एकमात्र उद्देश्य मुनाफा और मालिकों को खुश करने के लिए सत्ता को साधना होता है। भले ही उन्हें कितना मीडियाकर्मियों का शोषण करना पड़े। उन्हें जलील करना पड़े।
पीड़ित मीडियाकर्मियों को न तो शासन प्रशासन से कोई मदद मिल पाती है और न ही न्यायपालिका से न्याय मिल पा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने बेरोजगारों की तुलना कॉकरोच से करते हुए यह तो कह दिया कि बेरोजगारों में कुछ लोग मीडिया में शामिल हो जाते हैं और कुछ आरटीआई एक्टिविस्ट बन जाते हैं। ये लोग सिस्टम से लड़ने लगते हैं। मुख्य न्यायाधीश यह भी तो बताएं कि इन पीड़ितों को न्यायपालिका से कितना न्याय मिला?
सुप्रीम कोर्ट ने खुद प्रिंट मीडिया के लिए मजीठिया वेज बोर्ड की घोषणा की और जब मीडिया मालिकों के मजीठिया वेज बोर्ड न देने पर अवमानना का केस चला तो सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर उन्हें राहत दे दी कि इन लोगों को सही से जानकारी नहीं थी। जिन मीडियाकर्मियों ने मजीठिया वेज बोर्ड मांगा, उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? नौकरी से निकाले गए मीडियाकर्मियों का केस लेबर कोर्ट भेज दिया। 10-12 साल से न्याय मांग रहे मीडियाकर्मियों को आज तक न्याय नहीं मिला है।
कितने मीडियाकर्मियों ने आत्महत्या कर ली है। दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा, हिंदुस्तान, नवभारत टाइम्स, अमर उजाला समेत कितने अख़बारों मैग्जीनों के मीडियाकर्मी दर दर की ठोंकरे खा रहे हैं पर किसी कोई सुध नहीं। प्रेस क्लब तो बस दारू पीने के अड्डे तक सिमट कर रहा गए हैं और प्रेस से जुड़े दूसरे संगठन दलाली में लगे हैं। धीरे धीरे पुराने मीडियाकर्मी ठिकाने लगा दिए जा रहे हैं।
मीडियाकर्मियों की दुर्दशा और बेबसी के जिम्मेदार काफी हद तक खुद मीडियाकर्मी भी हैं। यदि कोई मीडिया कर्मी हक़ की बात करता है तो अधिकतर मीडियाकर्मी प्रबंधन के पक्ष में हो जाते हैं। लगभग हर मीडिया हॉउस में मजीठिया वेजबोर्ड को लेकर आंदोलन हुआ पर आंदोलन की अगुआई करने वाले मीडियाकर्मियों को नौकरी से निकालने पर दूसरे मीडियाकर्मी उनसे बात करना भी बंद कर देते हैं। हर मीडिया हाउस में छंटनी का दौर शुरू हुआ और वे ही मीडियाकर्मी मीडिया हाउस में बचे हैं जो प्रबंधन की जेब के बनकर काम कर रहे हैं।
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