नई दिल्ली। दिल्ली की रेखा गुप्ता सरकार के स्वास्थ्य विभाग (DGHS) से जुड़े करीब 650 करोड़ रुपये के कथित खरीद घोटाले में दिल्ली की एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) की एफआईआर ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। एफआईआर के अनुसार सरकारी अस्पतालों के लिए मेडिकल उपकरणों और दवाओं की खरीद में 200 से 500 प्रतिशत तक कीमतें बढ़ाकर भुगतान किया गया। जांच एजेंसी ने इस मामले में तत्कालीन सेंट्रल प्रोक्योरमेंट एजेंसी (CPA) के हेड डॉ. विनोद रंगा, सप्लायर एवं कथित बिचौलिये राजीव रंगीला समेत कई अधिकारियों को आरोपी बनाया है। डॉ. विनोद रंगा को ACB ने 26 जून को गिरफ्तार भी कर लिया।
फर्जी कंपनियां बनाकर सरकारी टेंडरों में खेल
एफआईआर के मुताबिक, राजीव रंगीला ने फर्जी मालिकों के नाम पर F Med Devices, Technocrats, Raj Shree, Ashi Surgical & Pharmaceuticals तथा M Sahib & Sons Pvt. Ltd. जैसी कई कंपनियां बनाई थीं। इन कंपनियों को पहले से तय निर्माता कंपनियों का अधिकृत वितरक घोषित कराया गया।
आरोप है कि रंगीला ने निर्माता कंपनियों के साथ मिलकर टेंडर की शर्तें और तकनीकी विनिर्देश (स्पेसिफिकेशन) इस तरह तैयार किए कि केवल उसकी कंपनियां ही पात्र साबित हों। इन दस्तावेजों को तत्कालीन CPA प्रमुख डॉ. विनोद रंगा के माध्यम से टेंडर समिति के सामने रखा जाता था और विरोध करने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की धमकी देकर मंजूरी दिलाई जाती थी।
ई-टेंडरिंग प्रक्रिया में भी धांधली
एफआईआर के अनुसार, टेंडर पोर्टल पर प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद कई टेंडरों को “एक्टिव” या “अंडर प्रोसेस” दिखाया जाता रहा, ताकि जनता को वास्तविक खरीद, दरों और भुगतान की जानकारी न मिल सके। कई मामलों में मैन्युअल तरीके से वर्क ऑर्डर जारी किए गए और रंगीला से जुड़ी कंपनियों को उसी दिन या अगले दिन भुगतान कर दिया गया, जबकि अन्य दवा आपूर्तिकर्ताओं के भुगतान दो-दो साल तक लंबित रहे।
किस सामान में कितनी महंगी खरीद हुई-
पोर्टेबल एक्स-रे मशीन
एफआईआर में दावा किया गया है कि शुरुआत में केवल दो मशीनों का टेंडर निकालकर प्रतिस्पर्धा खत्म की गई। बाद में 448 पोर्टेबल एक्स-रे मशीनों का ऑर्डर F Med Devices को दे दिया गया।
जिन मशीनों की वास्तविक कीमत लगभग 10 लाख रुपये प्रति मशीन थी, उन्हें 33 लाख रुपये प्रति मशीन की दर से खरीदा गया। इस खरीद पर करीब 148 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जबकि वास्तविक कीमत लगभग 45 करोड़ रुपये बताई गई है।
बेडशीट और लिनेन
सरकारी अस्पतालों के लिए बेडशीट 450 रुपये प्रति पीस खरीदी गईं, जबकि वही निर्माता इन्हें एम्स और अन्य सरकारी संस्थानों को करीब 150 रुपये प्रति पीस में उपलब्ध करा रहा था।
एफआईआर में आरोप है कि केवल तीन संबंधित कंपनियों को पात्र घोषित किया गया, बाकी सभी बोलीदाताओं को बाहर कर दिया गया। बाद में अस्पतालों से फर्जी मांग दिखाकर खरीद और भुगतान तेजी से कर दिया गया। लगभग 25 करोड़ रुपये की सामग्री के लिए 75 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।
C-Arm रेडियोलॉजी मशीन
एफआईआर के मुताबिक, टेंडर की शर्तें विशेष रूप से Vision Medicaid Equipment Pvt. Ltd. और Kiran Medical Systems के पक्ष में तैयार की गईं।
सात मशीनें 1.10 करोड़ रुपये प्रति मशीन की दर से खरीदी गईं, जबकि वही मॉडल अन्य सरकारी विभागों को लगभग 25 लाख रुपये में बेचा गया था। करीब 1.75 करोड़ रुपये कीमत वाले उपकरणों पर 7.75 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
एनेस्थीसिया वर्कस्टेशन
एफआईआर में आरोप है कि टेंडर को विशेष रूप से Draeger Atlan A350 मॉडल के पक्ष में तैयार किया गया। M Sahib & Sons Pvt. Ltd. को एकमात्र तकनीकी रूप से योग्य बोलीदाता घोषित किया गया। जबकि GeM पोर्टल पर टेंडर वित्तीय मूल्यांकन में दिखता रहा, मैन्युअल तरीके से ऑर्डर जारी कर भुगतान भी कर दिया गया।
ORS में 500 प्रतिशत तक कीमत बढ़ाई गई
एफआईआर के अनुसार, 50 लाख ORS के सैशे, जो सामान्य तौर पर 2.50 रुपये प्रति सैशे खरीदे जाते थे, उन्हें 15 रुपये प्रति सैशे की दर से खरीदा गया।
इस खरीद की वास्तविक लागत लगभग 1.25 करोड़ रुपये होनी चाहिए थी, लेकिन इसके लिए 7.50 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया। आरोप है कि अतिरिक्त 6.25 करोड़ रुपये रंगीला और संबंधित अधिकारियों के बीच बांटे गए।
सर्जिकल सामान में भी भारी घोटाला
एफआईआर के मुताबिक, ड्रेसिंग सामग्री, सर्जिकल धागे, कैनुला, ग्लव्स समेत कई सर्जिकल सामान, जिनकी वास्तविक कीमत 20 से 25 करोड़ रुपये थी, उन्हें 100 करोड़ रुपये से अधिक में खरीदा गया। जांच एजेंसी का आरोप है कि इसमें 75 से 80 करोड़ रुपये की हेराफेरी की गई।
दवा खरीद में भी नियमों की अनदेखी
एफआईआर में कहा गया है कि CPA को राज्य स्तर पर खुली ई-टेंडर प्रक्रिया के माध्यम से सीधे निर्माता कंपनियों से दवाएं खरीदनी चाहिए थीं, जिससे 70 से 80 प्रतिशत तक कम कीमत मिल सकती थी।
लेकिन आरोप है कि राज्य स्तरीय टेंडर जानबूझकर लंबित रखे गए और करीब 400 करोड़ रुपये की दवाओं व सर्जिकल सामान की खरीद “लोकल केमिस्ट” टेंडरों के जरिए कराई गई। ये टेंडर केवल आपातकालीन जरूरतों के लिए होते हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल बड़े पैमाने पर खरीद के लिए किया गया, जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा।
650 करोड़ रुपये की हेराफेरी का आरोप
दिल्ली के सतर्कता विभाग की शिकायत के आधार पर दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि अधिकारियों, सप्लायरों और निर्माता कंपनियों के गठजोड़ ने टेंडर प्रक्रिया में कार्टेल बनाकर सरकारी खरीद व्यवस्था से करीब 650 करोड़ रुपये का घोटाला किया। एसीबी मामले की विस्तृत जांच कर रही है और आने वाले दिनों में कई अन्य अधिकारियों व संबंधित कंपनियों पर भी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।



