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दिल्ली

जंतर मंतर का प्रतिरोध (भाग -२): राहुल गांधी अब बेसब्र हो रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि इस मुद्दे पर उन्हें लीड नहीं मिल रही है!

विदेशों में बसे भारतियों का एक तबका भी आंदोलन के पक्ष में प्रदर्शन करने लगा है।

Smiling man with gray hair and glasses, wearing a patterned shirt, outdoors among green trees.

रमाशंकर सिंह-

यह जेन जी आंदोलन शुरु किया काकरोच पार्टी ने, संस्थापक अभिजीत नाम के व्यक्ति ने लेकिन वास्तव में तो इस विचार का बीजारोपण कर दिया था हमारे स्वनाम धन्य मुख्य न्यायाधीश जी ने! बाद में विश्वसनीयता दी सोनम वांगचुक ने।

सही समय, सही कारण और अराजनीतिक नेतृत्व के कारण युवा जुड़े और निर्भीक होकर सक्रियता से जुड़ते गये। सरकार, राजनीतिक दलों और हमारे जैसों ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया कि वास्तविक रूप से ये सब जेन जी के मानस से अपरिचित हैं। पेशेवर आंदोलनकारी तो मौका ढूंढते ही रहते हैं यूट्यूब पर आने का, तो वे सब भी शुरु में भी जुड़ गये थे।

राजनीतिक दलों को पहले दस दिन कुछ समझ में नहीं आया कि आंदोलन कितनी दूर तक जायेगा और कितनी भागीदारी होगी। माले के दीपांकर भट्टाचार्य, एसएफआई और आइसा की नेहा व दिल्ली कमेटी पहले दिन से शामिल हो गईं थीं। अभाविप (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) का सवाल ही नहीं उठता था लेकिन अन्य दलीय छात्र संगठन जैसे कांग्रेस की एनएसयूआई युवक कांग्रेस और सपा की समाजवादी युवजन सभा भी अपनी पार्टियों के नेताओं का मुँह जोहने वाले संगठन हैं लिहाज़ा नहीं आये। आप पार्टी का युवा संगठन कभी बना ही नहीं।

आंदोलन लोकप्रिय हो गया, भीड़ आनी शुरु हो गई तो पार्टियां भी सक्रिय हुईं और फिर होड़ लगी श्रेय और नेतृत्व लेने की। राहुल विदेश थे जो कि कांग्रेस के एकमात्र नीतिनियंता हैं (खडगे आदि नहीं)। राहुल के लौटने तक आंदोलन बढ़ चुका था तो चुनौती थी कि कैसे खुद को संगत सार्थक दिखाया जाये इसलिये एग्रेसिव पोस्चरिंग की गई। भाजपा व सरकार की प्रशासनिक चुनौती तभी बनी जब बड़े स्तर पर जेन जी शामिल हुआ और जंतर-मंतर की भीड़ बढ़कर व बेकाबू होकर संसद के दरवाजे तक पहुंच गयी।

भीड़ नियंत्रित करने का हर बार का पुलिसिया फ़ॉर्मूला इस बार सफल नहीं हुआ और उसकी उल्टी प्रतिक्रिया हो गई। इसका कारण था कि प्रशासनिक लोग इसे मैनेज करते हैं जिनके पास कोई भी नया आइडिया नहीं होता। मान लीजिये कि यही काम यदि नये नवाचारी लोगों को दिया जाता तो नये ढंग से निबटते और आंदोलन को बढ़ने नहीं देते पर इन सबमें राजनीतिक निर्णय भी तो होता है जो वर्तमान में एक व्यक्ति में केंद्रित है।

सरकार को अब चिंता इसलिये भी हो रही है कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग से आगे निकलकर तेजी से प्रधानमंत्री के इस्तीफे तक पहुंचना शुरु हो चुकी है।

खैर, सरकार ने देर से ही सही पर बात शुरु की लेकिन भयानक गलती के बाद कि बर्बर लाठीचार्ज हुआ। अब आंदोलन को सम्भालने के रास्ते शुरु हुये हैं। पूरी भा ज पार्टी और मंत्रीगण साथ में उनके संगठन व कार्यकर्ताओं के द्वारा अभियान बदस्तूर चालू है कि यह आंदोलन देशद्रोही है, विदेशों से धन मदद आ रहा है। इतनी मजबूत सरकार, एफसीआरए के जरिये सारी फंडिंग बंद हुये कितने साल हो चुके और फिर भी फंडिंग का आरोप लगाना अब टिकता नहीं है।

मैं पहले ही बता चुका हूँ कि आंदोलन के दमन की राह भविष्य में बड़े असंतोष का बम बनायेगी इसलिये विश्वसनीय सम्वाद के जरिये ही इसका समाधान होना चाहिये। अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिये जब क्षेत्रीय विरोधी दल ही नष्ट किये जा चुके हैं तो बात करने के लिये भी कोई बचा नहीं है सिवाय कांग्रेस और सपा के जो संसद में अपनी उपस्थिति बनाये हुये हैं।

Group of people gathered on outdoor steps holding protest signs and an Indian flag, facing forward during a daylight demonstration at a public square.

बिजली, पानी, इंटरनेट, शौचालय सुविधा, भोजन बंद करने की खबर किसी को नरम नहीं करेगी बल्कि और भड़कायेगी। दूसरी ओर अंतर्राष्ट्रीय साख तेजी से घट रही है। हर देश की मीडिया में हमारे यहां के वीडियो चल रहे हैं और यह भी सरकार की चिंता का एक कारण है। विदेशों में बसे भारतियों का एक तबका भी आंदोलन के पक्ष में प्रदर्शन करने लगा है।

सोनम वांगचुक और अभिजीत ने वार्ता शुरु कर ठीक कदम उठाया है! सोनम के अनशन खत्म करते ही कांग्रेस पक्ष और समर्थकों द्वारा निंदा अभियान शुरु कर दिया है जबकि कि अभी वार्ता पूरी भी नहीं हुई है! यह सब संगठित अभियान है जिसका उद्देश्य विद्यार्थियों का हित नहीं है। हो सकता है कि वार्ता असफल हो जाये पर पहले परिणाम तो आने दिया जाये। राहुल गांधी अब बेसब्र हो रहे हैं, उन्हें लग रहा है कि इस मुद्दे पर उन्हें लीड नहीं मिल रही है। नेता प्रतिपक्ष के नाते वे जरूर अपना काम कर रहे हैं।

कुछ समय दीजिये दो चार दिन की बात है सब सामने आ जायेगा। फिलहाल प्रधान ने इस्तीफा दे दिया, लेकिन देर बड़ी कर दी।

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