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इंडियन एक्सप्रेस जैसे मीडिया घरानों की चले तो हर जगह से ‘वाम’ का नाम मिटा दें!

Group of protesters atop a vehicle during a demonstration, with others raising hands and signs visible; police vehicle underneath. (Overall collage titled 'Faces of the Protest')

संजीव कुमार-

इस तस्वीर से वह लड़की ग़ायब है जिसके 23 दिनों के अनशन और मुद्दों को समेटने की स्पष्टता और वाग्मिता ने आंदोलन को चलाये/जिलाये रखने में असाधारण योगदान किया। नेहा।

यह इंडियन एक्सप्रेस है। ये और इनके जैसे बड़े मीडिया घरानों की चले तो हर जगह से वाम का नाम मिटा दें। आज के इसके कवरेज में शायद ही कहीँ AISA, SFI, Disha जैसे संगठनों, उनके चेहरों, और बृंदा करात, दीपंकर भट्टाचार्य, एम ए बेबी जैसे वाम नेताओं का नाम आया है। कॉंग्रेस है, सपा है, लेकिन जो पहले दिन से थे, वे ख़बरों और विश्लेषणों में नदारद हैं।


सिद्धार्थ अरोड़ा-

बीते 20 साल में आपने पब्लिक द्वारा किसी न्यूज़ रिपोर्टर को चूमते कभी देखा था?

Two men embrace and laugh at a celebration, with a cheering crowd in the background.

ठीक-ठीक याद नहीं, पर शायद 2004-05 का समय था जब एक कमिशनर या जॉइन्ट कमिशनर के बेटे द्वारा प्रियदर्शनी मट्टू नामक बेहद खूबसूरत, दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट की हतया के केस पर, एक 16-17 साल के लड़के ने तब की सीमित सोशल मीडिया पर ऐसा हँगामा काटा था कि उस बड़े बाप के बेटे को सज़ा पड़ी थी।

हालाँकि वो लड़का तबतक सर्टिफाइड जर्नलिस्ट नहीं था, पर आगे चलकर वो बहुत बड़ा जर्नलिस्ट बना। तब उसको हज़ारों कश्मीरी पंडितों के बहुत प्यार, बहुत सम्मान दिया था। उस लड़के का नाम था, आदित्य राज कौल। आज वह एनडीटीवी के प्रमुख एडिटर हैं।

तबसे अबतक मैंने मीडिया पर्सन्स को गाली खाते, हुज्जत कराते और फिर नेताओं की गोदी में बैठने का ताना खाते ही देखा है। अगर रविश एक पक्ष को बहुत अच्छे लग रहे हैं तो दूसरा उन्हें भर-भर के गाली दे रहा है। वहीं अंकल लोग अर्नब के दीवाने हैं, उसे देखे बिना डिनर नहीं करते तो मुझसे उसे म्यूट करके भी देखना मुश्किल होता है।

पर ये सौरभ त्रिपाठी हैं, न्यूज़ पिन्च का दूसरा चेहरा, को-फाउन्डर।

इस पूरे प्रोटेस्ट में चाहें 100 निगेटिव हालात दिखे हों पर जो चंद पाज़िटिव साइन्स हैं, उसमें सबसे ऊपर न्यूज़ पिन्च है।

जब अंजना संग कई जाने-माने करोड़ों के पैकेज वाले ऐंगकर्स को अभिनव पांडे के गाली बककर कहा था कि इनका टाइम गया अब, अब हमारा टाइम आया है। तो शायद यही प्रदर्शन उन्हें स्वप्न में दिख गया था।

अगर ये सिर्फ स्टूडेंट्स और उनकी लल्लो-चप्पों ही दिखाते, तो भले लाख तारीफ़ें होती इनकी पर मैं इनके बारे में न लिखत। पर मैंने खुद 2 वीडियोज़ देखी हैं

जिसमें अभिनव पांडे और सौरभ त्रिपाठी उनकी बात कर रहे हैं जो उपद्रवी थे, इन्होंने बाकायदा बैरिकेड गिराने वालों को कवर किया है और छात्रों के बीच डंके की चोट पर कहा है कि उनके चेहरे हमारे कैमरा में ज़ब्त हैं दोस्त, हम प्रशासन को देंगे।

और लड़कों ने फिर भी इन्हें गले लगा लिया। एक लड़की ने इन्हें गुलाल लगा दिया। एक आया वो फूल और पानी की बोतल दे गया। ये जो तस्वीर में दिख रहा है उसने तो गले लगकर चुम्मा ही ले लिया।

सोचिए क्या स्तर हो गया है टीवी-मीडिया का कि लोगों को सही न्यूज़ कोई दिखा दे तो वो हीरो लगने लगता है। ठीक वैसे ही जैसे अब कोई सही से पेपर्स करवा दे, कोई पेपर लीक न हो तो शिक्षा मंतरी की चुम्मियाँ ले ली जाएँ। नई सड़क बनने लगे तो हम लड्डू बाँटने लगते हैं। ठीक वैसे ही…

नए किस्म की पत्रकारिकता की ज़रूरत थी हमें… सौरभ और अभिनव ने ऐसा काम किया कि इनके 0 हेटर हैं। कोई इनके काम की कमी निकालना अबतक मुझे नहीं मिला।

स्टूडेंट्स के साथ-साथ ये न्यू मीडिया की भी जीत है। अब बहुत से लोग इनसे प्रेरणा लेकर पत्रकारिता की कोशिश कर रहे हैं। सुखद है यह।

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