
राजशेखर पन्त-
दिन या तारीख़ मायने नहीं रखती। आप किसी भी अख़बार को पलट कर देख लीजिए, विशेषकर हिंदी के उन अखबारों को जिनका प्रसार अत्यधिक होने का दावा किया जाता है, समाचार के नाम पर आपको हत्या, मारपीट, सामप्रदायिक हिंसा, बलात्कार और ऐसी ही न जाने कितनी नकारात्मक सूचनाओं का मसालेदार विवरण बहुतायत में मिलेगा। इंसानी ज़िंदगी शायद इतनी सस्ती हो चुकी है कि उसे बर्बाद करने या फिर खत्म करने के लिए बहुत सोचने समझने की जरूरत नहीं पड़ रही है अब।
क्योँ लगातार सूखती जा रहीं हैं हमारी नम संवेदनाएं? क्योँ हमारे अंदर का इंसान हर रोज मर रहा है? इतने स्वार्थी, इतने आत्मकेंद्रित हो जाने का कुछ तो कारण रहा होगा।
हिंसा निश्चित ही मनुष्य की मूलभूत प्रवृत्ति है, और समाज में इसकी क्रूरतम अभिव्यक्ति के उदाहरण भी प्रारंभ से ही मौजूद रहे हैं। राजा-महाराजा, बादशाहों और सुल्तानों की नीतिगत क्रूरता और प्रायोजित हिंसा के इतर भी समाज में इसकी उपस्थिति रही है- इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता। पर यह भी एक निर्विवादित सत्य है कि यह प्रवृत्ति कमोबेश आपराधिक मानसिकता या पेशेवर अपराधियों तक ही सीमित थी। आज स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा किसी छोटी सी बात पर अपने सहपाठी की हत्या को बाकायदा अपने दोस्तों के साथ योजना बना कर अंजाम देता है। कोई लड़की अपने मंगेतर को पहाड़ी से धक्का दे देती है, या फिर अपने माता-पिता को सिर्फ इसलिए मार देती है कि उसे नौकरी मिल जाए। एक युवा पति अपनी पत्नी की हत्या कर उसके शव के टुकड़े फ्रीज़र में रख देता है, उन्हें सुनियोजित तरीके से ठिकाने लगाने के लिए। पार्किंग या ओवरटेकिंग के मामुली विवाद को ले कर कोई किसी को गोली मार देता है… उदाहरण अंतहीन हैं, स्कूल के बच्चों को ड्रग बेचना, खाने-पीने की चीजों में मिलावट जैसे अपराध भी इसी हिंसक प्रवृत्ति के शुरुवाती विस्तार के उदाहरण हो सकते हैं। कुल मिला कर इस तरह की घटनाएं पुष्ट करते हैं इस धारणा को कि हमारे अंदर का आदमी लगातार मर रहा है।
भ्रष्टाचार की तरह, जिसके लिए प्रायः यह कहा जाता है कि यह ऊपर से नीचे की ओर फैलता है, हिंसा का उद्गम भी संभवतः उसी उच्चतम वर्ग से होता है जिसके हाथों में देश की, समाज की बागडोर होती है; जिनसे अपेक्षित होता है कि वह समाज को एक समयानुकूल दिशा देंगे; जो हमारे नीतिनियन्ता हैं, कानून बनाते हैं हमारे लिए।
दस-बारह वर्ष पूर्व लखनऊ में हिंदी के एक वरिष्ठ संपादक ने बातों ही बातों में जिक्र किया था कि चुनावों से पूर्व कई उम्मीदवार उनसे समाचारों में अपने नाम के साथ बाहुबली या दबंग नेता जैसे विशेषणों के प्रयोग का अनुरोध व्यक्तिगत रूप से करते हैं। ग्राम या नगर पंचायत से लेकर विधान सभाओं और संसद तक आपराधिक इतिहास वाले कथित नेताओं का बाहुल्य प्रमाण है इस बात का कि ऐसे नेताओं की स्वीकार्यता बहुमत में है। वह समाज जो इन्हें स्वीकारता है, चुनता है, स्वयं हिंसा से कितना अभिभूत होगा- इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। हिंसा जब स्वीकार्यता का, सफल होने का आधार बन जाए तब कानून, नियम, सभ्य समाज की नैतिकता, उसकी वर्जनाओं इत्यादि का मज़ाक बन जाना तो स्वाभाविक ही है। हिंसा का सबसे पहले होने वाला शिकार समाज की नैतिकता होती है। एक उदाहरण से इस संदर्भ को समझना रोचक हो सकता है। आज से पांच-छह दशक पूर्व तक समाज का मद्यमवर्ग ऐसे परिवारों से वैवाहिक रिश्ते बनाने से परहेज करता था जो उन सरकारी विभागों में काम किया करते थे जहां रिश्वत आम हुआ करती थी। आज स्थितियां बिल्कुल उलट हैं।
सोचिए जरा, एक खासी आदर्शवादी शपथ लेने के पश्चात एक युवा आइपीएस जब विधानसभा या संसद में माननीय का मुखौटा लगाए बैठे बलात्कार, हत्या, दंगे भड़काने, फिरौती लेने जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त रहे व्यक्ति को सैल्यूट करता है, सुरक्षा देता है तो उसकी मानसिक स्थिति कैसी रहती होगी? अपराध के लिए एक नितांत स्वाभाविक असहजता और वितृष्णा तथा प्रशिक्षण के दौरान मिले नैतिक मूल्यों को संजोए रखना यदि असंभव नहीं तो कितना मुश्किल होता होगा उसके लिए! जाहिर है, पुलिस विभाग में कार्यरत अधिकांश व्यक्तियों का विवेक या ज़मीर उन्हें तब नहीं धिक्कारता जब वह ट्रक वालों से वसूली करते हैं, आम आदमी को सरेआम बेइज़्ज़त करते है, रिश्वत लेकर हत्या या बलात्कार की रिपोर्ट को आरोपी के मनोकूल बना देते हैं या फिर कथित थर्ड डिगरी ट्रीटमेंट के दौरान किसी की जान लेने जैसे अपराध स्वयं कर देते हैं।
हिंसा के मूल में अक्सर स्वयं को विशिष्ठ, औरों से अलग और बेहतर, श्रेष्ठ तथा सुरक्षित समझने और मानने की भावना है। जब यह मुग़ालता विश्वास में बदलने लगता है तब ऐसे व्यक्तियों या संस्थाओं द्वारा सारे नियम, नैतिकता, आचरण की शालीनता इत्यादि को उठा कर कूड़ेदान में डाल दिया जाता है। न्यूज़ क्लिप्स, सोशल मीडिया, या फिर सार्वजनिक कार्यक्रमों में इस तरह के मनोवैज्ञानिक विकारों से ग्रस्त माननीय या नौकरशाह प्रायः दीख ही जाते हैं, इनके लिए सामान्य आदमी, उसकी इज़्ज़त या भावनाएं इत्यादि कोई मायने नहीं रखतीं। ये बात दीगर है कि इन महामानवों की श्रेष्ठता के बोझ को अपने अचेतन मस्तिष्क में ढोने वाला आम आदमी पांच-दस रुपये के लिए किसी फेरी वाले, रिक्शा वाले या मजदूर का कालर पकड़ कर अपने अहं को संतुष्ट कर लेता है। अपने पड़ौसी या सहयात्री से उलझ कर उसे लगता है कि उसने अपना कद थोड़ा बढ़ा लिया है और सब कुछ सामान्य होने की स्थिति में गली के कुत्ते को बस यूं ही एक जोरदार लात मार देना उसे आत्मसंतुष्टि से भर सकता है।
इन दिनों दिल्ली में हूं। दो दिन पूर्व किसी आवश्यक कार्य से बाहर जाने के दौरान मुझे कनाट प्लेस से ही वापस लौटना पड़ा क्योंकि जंतर-मंतर के आसपास स्थिति तनावपूर्ण थी। इस दौरान मैंने आंदोलनकारियों के हाथ में पकड़े हुए पोस्टर देखे, उनकी बातचीत और अलग-अलग समूहों में हो रहे उनके भाषण और नारों को सुना, वर्दीधारियों के व्यवहार और प्रतिक्रियाओं को देखा-सुना, और फिर घर वापस आने के बाद टीवी पर एक वरिष्ठ माननीय को यह कहते सुना कि दो चार आंदोलनकारियों को सरेआम लटका देना चाहिए। …मैं एक निहायत ही गैरराजनैतिक व्यक्ति हूं, किसी भी राजनैतिक दल से मेरा कोई विशेष लगाव नहीं है। यह जानते हुए भी कि यह शायद गलत है, कोशिश करता हूं कि वोट देने भी न जाऊं, क्योंकि किसे और क्योँ वोट देना चाहिए यह मैं कभी समझ नहीं पाता। पर निश्चित ही उल्लेखित घटनाक्रम को स्वयं देखने-सुनने के बाद यह विचार बार-बार मुझे मथ रहा है कि हर स्तर पर व्याप्त यह शाब्दिक, वैचारिक और शारीरिक हिंसा समाज को आखिर कहां ले जा रही है?
तीव्रता से हो रहे सामाजिक संक्रमण की इस पृष्ठभूमि में बाज़ार ने हिंसा को आकर्षक पैकेजिंग में बेचना शुरू कर दिया है। कम्प्यूटर गेम्स से लेकर कॉर्टून, खिलौने, फ़िल्म, सेरिअल्स, टीवी डिबेट्स- किसी भी विशुअल या कंटेंट को ले लीजिए -उग्रता, गति, अग्रेशन, निर्लज्जता की प्रचुरता आज ग्राहक बटोरने के लिए यूएसपी का काम कर रही हैं। संभव है यह मेरा पूर्वाग्रह हो, पर जब भी में सड़क पर दौड़ते नए मॉडल के दुपहिया-चौपहिया वाहनों को देखता हूं तो कमान की तरह खिंची उनकी हेडलाइट्स, पीछे की ओर झुकी हुई विंडस्क्रीन और मसल्स जैसे उनके साइड पैनल्स के पीछे मुझे एक खूंखार सोच दिखायी देती है जो सड़क पर चलते हुए हर आदमी की निगल लेना चाहती है। ये तो बस चंद उदाहरण हैं, यदि आप तटस्थ होकर अपने चारों ओर देखें तो शीघ्र ही स्पष्ट हो जाएगा कि कैसे बाज़ार द्वारा परोसी गयी हिंसा हमें कंडिशन कर रही है।
जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे का मानना था कि आधुनिक विज्ञान, तर्कवाद और प्रबुद्धता के चलते ईश्वर और धर्म महत्वहीन हो जाएंगे और समाज स्वयं ही ईश्वर की हत्या कर देगा। इस स्थिति में जीवन के समस्त नैतिक मूल्य, नियम और समाज के सभी अर्थ स्वतः ही समाप्त हो जाएंगे, सही और ग़लत का कोई सार्वभौमिक आधार शेष नहीं रह जाएगा और समाज पूर्ण निरर्थकता की दिशा में अग्रसर होने लगेगा। यह स्थिति कमोबेश आ चुकी है। नीत्शे के सुपरमैन या ओवरमैन (Ubermensch) भी- जिन्हें हिंसा और कठोरता (Philosophizing with a hammer) से दुनिया को एक नई दिशा देनी है -हर गली, मुहल्ले, शहर और देशों में पैदा हो चुके हैं। कुछों के पैदा होने की भविष्यवाणियां लगातार जारी हैं। लग रहा है कि दुनिया के बदलने का वक्त बंद दरवाजों पर बहुत जोरों से दस्तक दे रहा है।


