शिवानी चौरसिया-
उम्र कम थी, इसलिए आसान था निकालना?
लेऑफ के दौर में युवा कर्मचारियों के करियर और संस्थानों की जिम्मेदारी पर सवाल
भारत के मीडिया जगत में लोकमत एक जाना-पहचाना नाम है। इसकी नींव 1971 में जवाहरलाल दर्डा ने नागपुर से रखी थी। समय के साथ लोकमत समूह ने मराठी के साथ अंग्रेजी और हिंदी में भी अपने प्रकाशन शुरू किए और एक बहुभाषी मीडिया समूह के रूप में अपनी पहचान बनाई। वर्तमान में विजय दर्डा लोकमत मीडिया समूह के चेयरमैन हैं।
इसी प्रतिष्ठित संस्थान के हिंदी अखबार लोकमत समाचार में मैंने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत की। लखनऊ से नागपुर जाकर नौकरी करना मेरे लिए महज रोजगार का फैसला नहीं था। यह घर से दूर जाकर अपने पैरों पर खड़े होने, पत्रकारिता सीखने और अपने करियर की नींव मजबूत करने की कोशिश थी। करीब डेढ़ साल तक काम करने के बाद मुझे अचानक लेऑफ का सामना करना पड़ा।
मुझे बताया गया कि हिंदी अखबार के घटते सर्कुलेशन के कारण संस्थान में छंटनी की जा रही है। किसी भी मीडिया संस्थान के सामने आर्थिक चुनौतियां हो सकती हैं और ऐसे समय में लागत कम करने के फैसले भी लिए जा सकते हैं। लेकिन सवाल केवल छंटनी का नहीं है। सवाल यह है कि छंटनी का फैसला किन मानदंडों पर और किस तरीके से लिया गया।
मुझे मेरे अंतिम कार्यदिवस से महज 13 दिन पहले बताया गया कि इसी महीने का अंत मेरा आखिरी कार्यदिवस होगा। अगर मुझे कम से कम एक महीने पहले इसकी जानकारी दी जाती, तो मेरे पास दूसरी नौकरी तलाशने और आवेदन की प्रक्रिया शुरू करने का पर्याप्त समय होता। नौकरी बदलना कुछ दिनों में पूरा होने वाली प्रक्रिया नहीं है। आवेदन, इंटरव्यू, चयन और जॉइनिंग में कई सप्ताह या उससे भी अधिक समय लग सकता है।
लेकिन इस पूरी स्थिति में सबसे ज्यादा चुभने वाली बात वह वजह थी, जो मुझे नौकरी से बाहर करने के दौरान बताई गई—मेरी उम्र कम है।
यह बात मेरे लिए इसलिए भी हैरान करने वाली थी क्योंकि नौकरी पर रखते समय मेरी उम्र कोई समस्या नहीं थी। करीब डेढ़ साल तक मैंने संस्थान में काम किया, अपनी जिम्मेदारियां निभाईं और पत्रकारिता के क्षेत्र में अनुभव हासिल किया। लेकिन जब मुझे बाहर करने का समय आया, तो मेरी कम उम्र को ही कारण बताया गया।
यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या कम उम्र किसी कर्मचारी की कमजोरी है या उसकी संभावना?
वहीं दूसरी ओर, हिंदी संस्करण में लंबे समय से काम कर चुके कुछ सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पहले भी सेवा विस्तार मिलता रहा था। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि अगर युवा कर्मचारियों को हटाने के पीछे उनकी कम उम्र एक आधार थी, तो नियुक्ति के समय उसी उम्र को ध्यान में क्यों नहीं रखा गया?
अगर किसी कर्मचारी की उम्र उसकी नियुक्ति के समय उसकी क्षमता में बाधा नहीं थी, तो नौकरी से हटाते समय वही उम्र उसके खिलाफ आधार कैसे बन सकती है?
आज जब संस्थान युवा कर्मचारियों की नई सोच, ऊर्जा और तकनीक के साथ काम करने की क्षमता की बात करते हैं, तब आर्थिक दबाव के समय युवा कर्मचारी को सबसे आसान विकल्प मान लेना कितना उचित है?
मेरे लिए यह स्थिति इसलिए भी कठिन थी क्योंकि मैं अपने घर लखनऊ से अलग राज्य और अलग शहर नागपुर में रहकर काम कर रही थी। परिवार की ओर से कोई आर्थिक सहारा भी नहीं था। ऐसे में सिर्फ 13 दिनों के भीतर नई नौकरी तलाशना, रहने की व्यवस्था के बारे में सोचना और आगे की योजना बनाना आसान नहीं था।
लेऑफ ने सिर्फ मेरी वर्तमान नौकरी नहीं छीनी, बल्कि अगले अवसर तक पहुंचने के लिए मिलने वाला जरूरी समय भी मुझसे छीन लिया।
यह सिर्फ करीब 20 हजार रुपये की नौकरी खोने का मामला नहीं था। इसके साथ घर से दूर रहकर बनाई गई जिंदगी, आर्थिक आत्मनिर्भरता, डेढ़ साल में हासिल किया गया अनुभव और करियर की निरंतरता भी प्रभावित हुई। करियर की शुरुआत में किसी युवा के लिए नौकरी सिर्फ वेतन का साधन नहीं होती; वह उसके आगे के अवसरों की सीढ़ी भी होती है।
किसी संस्थान के लिए एक कर्मचारी शायद एक पद, एक संख्या या लागत का हिस्सा हो सकता है। लेकिन कर्मचारी के लिए वही नौकरी उसकी मेहनत, अनुभव और भविष्य की योजनाओं से जुड़ी होती है। इसलिए आर्थिक संकट के समय लिए गए फैसलों में संस्थागत जरूरतों के साथ मानवीय पक्ष को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
संस्थान आर्थिक कठिनाइयों से गुजर सकता है। सर्कुलेशन घट सकता है, लागत बढ़ सकती है और कर्मचारियों की संख्या कम करने की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन ऐसे फैसलों में पारदर्शिता, स्पष्ट मानदंड, पर्याप्त पूर्व सूचना और मानवीय संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी होनी चाहिए।
आखिर सवाल सिर्फ मेरा नहीं है।
आज किसी भी क्षेत्र में करियर शुरू करने वाले हजारों युवा ऐसे ही अनिश्चित दौर से गुजर रहे हैं। वे अनुभव हासिल करने के लिए कम वेतन पर काम करते हैं, घर से दूर जाते हैं, नए शहरों में अपनी जगह बनाते हैं और धीरे-धीरे अपने करियर को आकार देते हैं। ऐसे में अगर मुश्किल वक्त आते ही युवा होना ही उन्हें सबसे आसान लक्ष्य बना दे, तो संस्थानों की उस जिम्मेदारी पर सवाल उठना स्वाभाविक है, जो वे युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने के नाम पर लेते हैं।
आखिर सवाल यही है—अगर किसी युवा को संस्थान का भविष्य कहा जाता है, तो मुश्किल वक्त में उसके भविष्य की कीमत पर ही समाधान क्यों खोजा जाए?
और उससे भी बड़ा सवाल— क्या उम्र कम होना किसी कर्मचारी को सबसे पहले बाहर करने की वजह होनी चाहिए, या फिर उसके काम, क्षमता और योगदान को भी उसी गंभीरता से देखा जाना चाहिए?


