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सुख-दुख

सम्पादक जी, ये तो ना करिए, ये देश आपका ऋणी रहेगा

चिंता मत करिए. -अच्छे दिन- आ गए हैं. क्या यूपी, क्या एमपी और क्या दिल्ली और क्या भारत-क्या इंडिया…ऐसे -अच्छे दिनों- की ख्वाहिश इस देश की जनता ने तो नहीं ही की थी. फिर ये किसके अच्छे दिन हैं?? फैसला आप कीजिए.

चिंता मत करिए. -अच्छे दिन- आ गए हैं. क्या यूपी, क्या एमपी और क्या दिल्ली और क्या भारत-क्या इंडिया…ऐसे -अच्छे दिनों- की ख्वाहिश इस देश की जनता ने तो नहीं ही की थी. फिर ये किसके अच्छे दिन हैं?? फैसला आप कीजिए.

ऩए-नवेले संगठन, नए-नए चेहरे टीवी की बहस में जगह पा रहे हैं. वो जितना जहर उगलेंगे, उतनी ही उनकी दुकान चलेगी. शायद -मालिक- की नजरों में चढ़ने के लिए ऐसा कर रहे हों लेकिन मालिक-मुख्तार भी तो चुप्पी साधे है. टीवी मीडिया ऐसे लोगों को जितना दिखाएगा, उतनी ही इन्हें मुफ्त पब्लिसिटी मिलेगी और मिल रही है. क्या मीडिया जाने-अनजाने इन्हें हीरो नहीं बना रहा.??!!

मेरी मानिए तो ऐसे छुटभैये नेताओं को इग्नोर कीजिए. दिल्ली में बैठे इनके आकाओं से जवाब तलब करिए. दिल्ली में जिम्मेदार पदों पर बैठे इन नेताओं को -सेफ पैसेज- क्यों दे रहे हैं आप लोग??!! और गली-नुक्कड़ में बैठे ऐसे छुटभैये जहर उगलने वाले नेताओं को नैशनल टीवी की डिबेट में बिठाकर लाइन में लगे अगले छुटभैयों को क्यों उकसा रहे हैं कि देखा, उसने ये किया तो -मालिक- और पार्टी की नजर में चढ़ गया. तरक्की हो जाएगी अब उसकी. सो अब मेरी बारी है…मैं भी ऐसे ही जहर उगलूंगा, कुछ ऐसा ही ऊंटपटांग करूंगा और राजनीति में तरक्की करूंगा. आपको पता ही है कि कुछ महानुभाव ऐसी भाषा बोल-बोलकर -आका- की नजरों में ऐसे चढ़े कि मंत्री बन गए.

सो देश का अमन-चैन छीनकर -राजनीतिक कैरियर- बनाने वालों की मदद मत कीजिए. उन्हें टीवी की डिबेट में मत बिठाइए. हो सके तो अपने प्रोग्राम के पैकेज नें उनकी लानत-मलामत कीजिए. देश को उनकी असली चेहरा दिखाइए. वो सच दिखाइए कि आगे से उनके गली-मुहल्ले के लोग ही उन पर थू-थू करें. उन्हें धिक्कारें और उनके -आका- उनका -सम्मान समारोह- करने से पहले सौ बार नहीं, हजार बार सोचें. वे डरें कि पब्लिक परसेप्शन इसके खिलाफ है. अगर इनके साथ मेरे तार जुड़े दिखे, इनके साथ मंच साझा किया तो उनका -राजनीतिक कैरियर- बने ना बने, मेरे राजनीतिक कैरियर पर जनता जरूर ग्रहण लगा सकती है.

आप पर लाख -मालिक- का दबाव हो सकता है. -सरकार- का दबाव हो सकता है. मार्केटिंग डिपार्टमेंट का दबाव हो सकता है लेकिन गुरू ! हैं तो आप पत्रकार ना. सम्पादक बने हैं तो जरा अपने जमीर को टटोलिए. खुद से सच पूछिए और कहिए कि जो आप कर रहे हैं क्या वो जायज है??!! ठीक है कि मरकर कोई जंग नहीं जीती जाती. अगर सम्पादकी ही चली गई और नौकरी ही गंवा दी तो फिर क्या खाक कर पाएंगे लेकिन हुजूर ! इसी में कोई बीच का रास्ता निकालिए ना ! आप तो खांटी पत्रकार हैं. जानते हैं कि Read between the lines जनता को कैसे बतानी है. कि मालिक-सरकार की बात भी रह जाए और अपने पत्रकारीय धर्म का भी निर्वाह हो जाए. कि सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे. ऐसे गुर तो अब तक आपने सीख ही लिए होंगे…

मेरा मानना है कि कोई भी पत्रकार-सम्पादक चाहे तो अपने कौशल से -सबकी बात- मानकर भी अपने पेशे से न्याय कर सकता है. उम्मीद की लौ जगाए और जलाए रह सकता है. उस दिन के बारे में सोचिए जब बुढ़ापे में अपने नाती-पोतों के साथ बैठे होंगे तो उन्हें क्या बताएंगे कि मैंने कैसी पत्रकारिता की थी??!! क्या Gen next आप पर नाज कर पाएगी??!! क्या कोई नया पत्रकार उसी सम्मान से आपका नाम लेगा जैसा लोग राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी का लेता है ??!! अगर हां, तो आप सही रास्ते पर हैं. नौकरी बचाए रखिए और उसी में अपने कर्तव्य का पालन करते रहिए. एक पतली लकीर आपको जरूर दिख जाएगी, जिसके बल पर आप अपने संस्थान के -हित- और पाठकदर्शक के हित, दोनों साध सकेंगे. मतलब कि यहां गुरू द्रोण को मारने के लिए आपको -अश्वत्थामा मारा गया- वाला प्रलाप नहीं करना पड़ेगा.

और अगर आपको लगता है कि भावी पीढ़ी क्या, आपके समकालीन भी आपके कर्म-वचन-चाल-ढाल को शक की नजर से देख रहे हैं, आप पत्रकार ना होकर किसी खेमे के प्राणी बनते जा रहे हैं, नौकरी बचाने की जुगत या फिर दुनियादारी के चलते आपको ये सब करना पड़ रहा है तो तनिक रुकिए. थोड़ा सोचिए और चीजों को LARGE PICTURE में देखने की कोशिश कीजिए. कहते हैं देश का हित सबसे बड़ा है, उसके बाद हमारे-आपके निजी हित हैं. अगर इतना भी -त्याग- नहीं कर पा रहे हैं तो छोटा सा ही एहसान इस देश पर कर दीजिए. -चौथे स्तम्भ- पर मिट्टी लगाने की बजाय थोड़ी देर के लिए उससे दूर खड़े हो जाइए. अपनी लेखनी और अपने प्रोग्राम में पक्षकार मत बनिए. हां नौकरी जरूर बजाइए लेकिन इतनी गुंजाइश छोड़ दीजिए कि आपकी पत्रकारिता से इस देश की गंगा-जमुनी तहजीब की धारा गंदी ना हो. और मुझे पता है कि इतना विवेकाधिकार हर सम्पादक के पास होता है. मालिक-सरकार किसी सम्पादक की कनपटी पर बंदूक रखकर काम नहीं कराता. उन्हें इतनी फ्रीडम तो होती ही है कि वो बीच का रास्ता निकाल सकते हैं, तमाम दबावों के बावजूद. मैंने अपने छोटे से कैरियर और छोटी सी उम्र में ये सब किया है. आप लोग तो वरिष्ठ और अनुभवी हैं. मुझे पता है कि आप भी ये कर सकते हैं. वो कहते हैं ना कि -उन्हें झुकने के लिए कहा गया तो वे रेंगने लगे-….प्लीज रेंगिए मत, हां थोड़ा झुकने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि जो वृक्ष आंधी में नहीं झुकता वो तूफान में उखड़ जाता है. सो प्रकृति की इस परम्परा से सीखते हुए आप भी लचीले बन जाइए. इस तूफान को गुजर जाने दीजिए. फिर सब सामान्य हो जाएगा. लेकिन प्लीज, प्लीज, प्लीज, बेगुनाह लाशों के धुएं से काली हुई कोठरी को अपनी आंखों का काजल मत बनाइए. ये देश आपका ऋणी रहेगा……

http://navbharattimes.indiatimes.com/state/madhya-pradesh/bhopal/indore/communal-riot-singes-bhopal-75-critically-hurt/articleshow/45494545.cms

कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके आईआईएमसी के शिक्षक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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2 Comments

2 Comments

  1. pankaj

    December 13, 2014 at 5:49 am

    bilkoll thick kaha aapne nadeemji,lekin lagtta nahi aap ki baat suni jaygi

  2. rajkumar

    December 16, 2014 at 12:49 pm

    nadim ji aap ne bahut pravachan diye, jab tv chenlo par bukhari, ovesi v ajam khan jahar ugal rahethe v kasmir me lakho pandit apne des me hi sarnarthi ban gaye the tab nadim bhai ka patrkarita ka jamir nahi jaga, puri duniya me islam ke nam par khoon ki holi kheli jati h tab secular jamato ka jamir kyon thanda rahta h, hindu to bechara gay h us par koi bhi kalam ghis deta h jara apni mardani dikhani h to pakistan me nirih bachho ke koon ke pyaso par bhi aapni kalam ghis dijiye to islam ka hi bhala hoga

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