अर्णब गोस्वामी के बारे में इस पत्रकार ने जून महीने में ही कर दी थी भविष्यवाणी

adim S. Akhter : अर्णब गोस्वामी के बारे में इस साल जून में की गई इसे मेरी भविष्यवाणी कहिए या आशंका, पर ये सच साबित हुई। तब मैंने अपने विश्लेषण में कहा था कि पीएम मोदी के सॉफ्ट इंटरव्यू के बाद अर्णब और टाइम्स नाउ की जो छीछालेदर हुई है, उन हालात में अर्णब की जल्द ही टाइम्स नाउ से विदाई हो सकती है। और कल ही अर्णब की टाटा-बाय बाय वाली खबर आ गई। और जो लोग ये चिंता कर रहे हैं कि अर्णब के बिना टाइम्स नाऊ का क्या होगा, उनके टनाटन न्यूज़ ऑवर डिबेट का क्या होगा, टाइम्स नाऊ की टीआरपी का क्या होगा, वो ज़रा धीरज रखें। मैंने लिखा था कि आज के ज़माने में टाइम्स ग्रुप कभी संपादकों को अपने ऊपर हावी नहीं होने देता। उनका फंडा अलग है। जो लोग टाइम्स ग्रुप में काम कर चुके हैं और जिनका थोड़ा बहुत भी मैनेजमेंट से वास्ता रहा है, वो ये बात बखूबी जानते हैं।

सो अर्णब गोस्वामी कितने भी बड़े हो जाएं, संस्थान से बड़े नहीं हो सकते। संस्थान से बड़ा वही एडिटर हो सकता है, जो चौथे स्तंभ का पत्रकार हो और लिखने-पढ़ने वाला हो। अर्णब महज़ एक मैनेजर, न्यूज़ प्रेजेंटर और डिबेटर बन के रह गए। वैसे अर्णब की शोर वाली पत्रकारिता के भी कई फैन हैं, पर व्यक्तिगत रूप से मुझे ये शोर पत्रकारिता कहीं से भी नहीं भाती। ये सच हो सकता है कि अर्णब भारत से प्रसारित होने वाले किसी अंतर्राष्ट्रीय अंग्रेजी न्यूज़ चैनल के प्रोजेक्ट का हिस्सा बन जाएं। ये उनकी दिली चाहत रही है और एक कार्यक्रम में अपने दिल की ये बात उन्होंने कही भी थी, जिसका वीडियो मैंने तब फेसबुक पे शेयर किया था। पर अर्णब अगर अंग्रेजी का भारत से प्रसारित होने वाला सीएनएन टाइप न्यूज़ चैनल लाना चाहते हैं, तो इसके लिए टाइम्स ग्रुप से अच्छा प्लेटफार्म और कोई नहीं हो सकता था।

ज़ी वाले भी ऐसा एक चैनल ले के आये हैं, जिसे कोई गांधी महाशय लीड कर रहे हैं, उनका पूरा नाम अभी याद नहीं आ रहा। उनसे एक बार मुलाक़ात हुई है अपनी। पर टाइम्स ग्रुप की तो बात ही निराली है क्योंकि वो हर काम बड़े ishtyle से करते हैं। टाइम्स नाउ को ही देख लीजिए। अर्णब के बिना भी ये चैनल चलता रहेगा और मार्किट लीडर बना रहेगा। आप देखते रहिये। यही टाइम्स ग्रुप की यूएसपी है। बाकी अर्णब आगे क्या करते हैं, इस पे suspence जल्द ही खत्म हो जायेगा।

ये है जून में की गई भविष्यवाणी वाली पोस्ट…

नदीम एस. अख्तर कई चैनलों-अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. वे मीडिया शिक्षण प्रशिक्षण के कार्य से भी जुड़े रहे.

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कारगिल जीतने वाले रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने तो कभी अपना अभिनंदन नहीं कराया

Arvind K Singh :  पिछले तीन दशक में कारगिल से बड़ी जंग तो कोई और हुई नहीं..उसमें बड़ी संख्या में जवानों की शहादत हुई। मैने भी उसे कवर किया था। लेकिन मुझे याद नहीं आता कि उस दौर के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस ने इस मुद्दे पर अपना अभिनंदन समारोह कराया हो….अगर गलत हूं तो बताइएगा। फिर रक्षामंत्री जी आपने ऐसा क्या कर दिया। न फैसला आपका, न उसे लागू कराने गए आप…जो काम जिसने किया है उसको देश की जनता दिल से शुक्रिया कर रही है। आप तो इसे राजनीतिक रंग देने में लग गए हैं वह भी उत्तर प्रदेश में जहां चुनाव हो रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक के मसलेपर कड़ा फैसला लेने का श्रेय प्रधानमंत्री श्री मोदी को ही मिलेगा किसी और को नहीं।

Om Thanvi : उत्तर प्रदेश के चुनाव माहौल में सर्जिकल कार्रवाई को भुनाने की भाजपा की कोशिश अप्रत्याशित नहीं है, पर अफ़सोसनाक ज़रूर है। भाजपा नेताओं द्वारा लखनऊ, आगरा, मुज़फ़्फ़रनगर आदि शहरों में टाँगे गए बड़े-बड़े होर्डिंग और पोस्टर सर्जिकल कार्रवाई के विशुद्ध राजनीति इस्तेमाल के जीते-जागते प्रमाण हैं। इन पोस्टरों के हीरो सैनिक नहीं हैं, प्रधानमंत्री मोदी केंद्र में हैं जो राम के रूप में चित्रित हैं, नवाज़ शरीफ़ रावण हैं और केजरीवाल विभीषण।

आज लखनऊ और आगरा में रक्षामंत्री पर्रिकर के अभिनंदन में जो समारोह हुए, वहाँ भी हर होर्डिंग पर रक्षामंत्री के साथ गृहमंत्री राजनाथ सिंह (लखनऊ सांसद) और अन्य छोटे-बड़े भाजपा नेताओं के चेहरे और नाम सुशोभित थे। आगरा की गलियों तक में मोदी और पर्रिकर के ‘शौर्य प्रदर्शन’ के लिए “वंदन-अभिनंदन और शत्-शत् नमन” वाले पोस्टर सजे।  इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार मुज़फ़्फ़रनगर में “हम तुम्हें मारेंगे और ज़रूर मारेंगे” वाले होर्डिंग लगे हैं जिनमें मोदी के साथ अमित शाह को भी शामिल किया गया है। स्थानीय भाजपा नेता तो मौजूद हैं ही। बहरहाल, उत्तर प्रदेश में यह सिलसिला दो रोज़ पहले शुरू हुआ है, मुंबई की एक भाजपा नेता ने तो सर्जिकल कार्रवाई की ख़बर के रोज़ ही पंजाब के मतदाताओं से समर्थन की अपील कर दी थी।

बेचारे राहुल गांधी अपनी भाषा में फँस गए, वरना उड़ी में बड़ी संख्या में हमारे सैनिक मारे गए, जवाब में सर्जिकल कार्रवाई हमने की और अब हफ़्ते भर के भीतर उसका चुनावी फ़ायदा उठाने की कार्रवाई भाजपा ने कर डाली। दलाली अच्छा शब्द नहीं, पर बेहतर भाषा में भी इसे आख़िर क्या कहा जाना चाहिए? फ़ौज़ी कार्रवाई की चुनावी ब्रांडिंग और मार्केटिंग! नहीं क्या?  हर राजनीतिक दल को भाजपा की इस मार्केटिंग को मुद्दा बना कर बेनक़ाब करना चाहिए। फ़ौज़ी कार्रवाई का राजनीतिक लाभ इंदिरा गांधी को मिला होगा और अटल बिहारी वाजपेयी को भी – लेकिन चुनाव में सैनिकों के शौर्य को अपना शौर्य बताकर वोट खींचने का काम पहली बार हो रहा है। सरेआम।

Sheetal P Singh : सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान सेना के जिन वीरों ने अपने कंधे पर मोर्टार लादकर तीन किलोमीटर तक पाकिसतान की सीमा में पैदल मार्च किया, शत्रुओं के कैम्पों पर गोले दागकर उनका सफ़ाया किया, देसभगत पारटी ने देस के कोने कोने में उनके पोस्टर चपकाने का काम किया है। पहले चरण में यू पी उततराखंड पंजाब और गोवा में ये पोस्टर लगाये जा रहे हैं! आप भी आइये और वीरों के चित्र पर पुष्पगुच्छ चढ़ाइये।

Nadim S. Akhter : “खेत खाए गदहा, मार खाए जुलाहा वाली कहावत भूल जाइए. अब बोलिए खेत जोते गदहा और माल कूटे धोबी. मतलब जान दे हमारे सैनिक और चुनावी फसल काटे मोदी जी. इसी की तो आशंका थी, यही तो हो रहा है. सैनिकों की जान के साथ भी राजनीति ! धिक्कार है ऐसी ओछी राजनीति पे. क्या मोदी जी के हनुमान इस पोस्टर पर ये नहीं लिख सकते थे कि —देश के लिए जान देने वाले सैनिकों को नमन —- गौर से देखिए. सैनिकों की जगह वे मोदी जी और पर्रिकर जी को शत-शत नमन कर रहे हैं. तभी तो कह रहा हूं-  खेत जोते गदहा और माल कूटे धोबी.”

पत्रकार द्अरविंद कुमार सिंह, ओम थानवी, शीतल पी. सिंह और नदीम एस अख्तर की एफबी वॉल से.

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अर्नब गोस्वामी की working style ने टाइम्स नाऊ और टाइम्स ग्रुप को असहज कर दिया!

Nadim S. Akhter : बरखा ने जो कुछ कहा, वह अर्नब द्वारा कही गई बात का जवाब भर था और मैं व्यक्तिगत रूप से बरखा से सहमत हूं कि कोई शिखर पर बैठा पत्रकार यानी अर्नब ये कैसे कह सकता है कि कश्मीर पर उनसे अलग राय रखने वाले पत्रकारों का ट्रायल हो और उन्हें सजा मिले! यानी टाइम्स ग्रुप से जुड़ा एक बड़ा पत्रकार दूसरे पत्रकारों और मूलरूप से मीडिया की आजादी पर हमला करने की हिमायत और हिमाकत आखिर कर कैसे सकता है? सो चुप्पी तोड़नी जरूरी थी और बरखा ने चुप्पी तोड़कर सही किया. वरना अर्नब और बेलगाम हो जाते.

दूसरी बात. मामला यहां अर्नब या बरखा का नहीं है. ये तो एक क्रिया की प्रतिक्रिया भर थी. मामला इससे भी कहीं ज्यादा बड़ा और खतरनाक है. सवाल ये है कि अर्नब जो बोल-कह रहे हैं, क्या उससे टाइम्स ग्रुप और उसके मालिकान इत्तेफाक रखते हैं ??!! यहां ये बताना जरूरी है कि हर मीडिया संस्थान की एक एडिटोरियल पॉलिसी होती है, अघोषित एडिटोरियल गाइडलाइन होता है, जिसे अखबार-चैनल का मालिक और मैनेजमेंट तय करता है. सम्पादक को उसी गाइडलाइन के मुताबिक काम करना होता है. ये तो सुना था कि अर्नब को टाइम्स ग्रुप ने फ्री-हैंड दिया हुआ है लेकिन वो -फ्री हैंड- ऐसा भी नहीं हो सकता कि अर्नब अपने चर्चित शो न्यूज आवर में कुछ भी कह दें-बोल दें और ग्रुप का मालिक चुपचाप सब देखता-सुनता रहे.

इससे पहले भी अर्नब ने पीएम मोदी का इंटरव्यू जिस सॉफ्ट लहजे में किया था, जिसका सोशल मीडिया पर खूब मजाक उड़ा और उस इंटरव्यू की निष्पक्षता पर सवाल उठाए गए थे, तब मैंने कहा था कि टाइम्स ग्रुप अपने ब्रैंड यानी चैनल की निष्पक्षता या यूं कहें कि उसकी ब्रैंड इमेज से समझौता नहीं करता. सो हो सकता है कि इस मामले में कुछ हो, जिसका असर टाइम्स नाऊ की स्क्रीन पर भी दिखे. पर ऐसा नहीं हुआ. और ये दूसरी बार अर्नब ने ऑन एयर एक ऐसी बात कह दी, जिसने बखेड़ा खड़ा कर दिया और चैनल की साख पर सवाल उठा दिए. अर्नब और टाइम्स नाऊ को -सरकार का चमचा- तक कह दिया गया.

तो क्या अर्नब ने जो कहा, वह महज slip of tongue था या फिर भावावेश में आकर बोली गई ऐसी बात, जो पत्रकारों की एक बड़ी बिरादरी को चुभ गई!!! या यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है??!! मेरे ख्याल में अर्नब जैसा मंजा हुआ एंकर ऐसी गलती नहीं कर सकता कि भावावेश में उनकी जुबान फिसल जाए और वो इतनी बड़ी विवादास्पद बात कह जाएं.

सो असल सवाल यहीं से शुरु होता है. क्या अर्नब टाइम्स नाऊ के सर्वेसर्वा बनकर जो कह रहे हैं, टीवी पर जो दिखा रहे हैं और जिस तरह से बहस (एकतरफा बहस !!) का संचालन कर रहे हैं, क्या उसे टाइम्स ग्रुप के मालिकों यानी विनीत जैन और समीर जैन की सहमति मिली हुई है??!! और अगर नहीं, तो अर्नब पर लगाम क्यों नहीं कसी जा रही. क्यों टाइम्स नाऊ की ब्रैंड इमेज से उन्हें इस कदर खिलवाड़ करने दिया जा रहा है??. ये बात हम सब जानते हैं कि आज के काल में कोई भी पत्रकार अपने मीडिया संस्थान से बड़ा नहीं होता और अगर उसे वहां नौकरी करनी है, तो उसे संस्थान के एडिटोरियल गाइडलाइन्स का पालन करना ही होगा, वरना नौकरी गई समझो. इसलिए अगर अर्नब धड़ाधड़ जिस तरह की लाइन लिए हुए हैं, क्या उसे ये माना जाए कि टाइम्स ग्रुप ने अपनी -निष्पक्ष- वाली एडिटोरियल गाइडलाइन में संशोधन करते हुए कम से कम टाइम्स नाऊ न्यूज चैनल के लिए इसे बदल दिया है?

एक बात और भी मार्के वाली है. वो ये कि अगर टाइम्स ग्रुप के अंग्रेजी अखबार Times of India के ही वरिष्ठ और प्रभावशाली पत्रकारों से पूछा जाए तो उनमें से ज्यादातर अर्नब की बात से इत्तेफाक नहीं रखेंगे और ऐसा मैं दावे के साथ कह रहा हूं. कौन पत्रकार होगा, जो जुदा राय रखने वाले पत्रकारों को प्रताड़ित और सजा देने की बात करेगा? यही कारण है कि टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार की एडिटोरियल पॉलिसी में मुझे अभी तक कोई मेजर शिफ्ट नजर नहीं आया है. बैलेंस करने की वही पुरानी कोशिश आज भी बरकरार है.

तो फिर टाइम्स नाऊ में ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों चैनल को उस तरफ जाने दिया जा रहा है जिससे ये छवि बन रही है कि चैनल और उसके एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी को लोग सरकार का चमचा कहने लगे हैं? टाइम्स ग्रुप के मालिक और मैनेजमेंट इस पर कुछ कर क्यों नहीं रहा? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब मिलने बाकी हैं क्योंकि अर्नब की working style ने टाइम्स नाऊ और टाइम्स ग्रुप को असहज तो किया ही है.

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

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टीआरपी में नौवें स्थान पर रहने वाला एनडीटीवी इंडिया चल कैसे रहा है, पैसा कितना और कहां से आ रहा है?

Nadim S. Akhter : एक गंभीर बात. बार्क की तरफ से 29वें हफ्ते की टीआरपी के जो आंकड़े जारी किए गए हैं, वो इस प्रकार हैं. गौर से देखिए इनको और जरा अंदाजा लगाए कि कौन चैनल -सफलता- के किस पायदान पर खड़ा है. फिर आगे की बात करूंगा.

Aaj Tak 17.7 dn 0.7
India TV 17.3 up 0.4
India News 12.5 dn 0.8
ABP News 12.0 same
News Nation 11.3 dn 0.5
Zee News 8.9 dn 0.1
News 24 8.2 up 1.2
IBN 7 5.5 up 0.1
NDTV India 2.6 up 0.1
Tez 2.6 up 0.1
DD News 1.4 up 0.2

अब देखिए, जिसे भाई लोग सबसे विश्वसनीय चैनल मानते हैं यानी एनडीटीवी इंडिया, वह महज 2.6 की टीआरपी के साथ सबसे नीचे यानी नौवें स्थान पर है. ऐसे में सवाल ये उठता है कि भैया ये चैनल चल कैसे रहा है. पैसा कितना और कहां से आ रहा है क्योंकि जब विज्ञापन से कमाई का पैमाना टीआरपी है और -जितनी हाई टीआरपी उतने महंगे विज्ञापनों के रेट- वाला फॉर्म्युला है, तब एनडीटीवी इंडिया के लिए तो बहुत दिक्कत वाली बात है. माना कि ग्रुप बड़ा है और उनके पास कमाई के और भी जरिए होंगे लेकिन इतनी कम टीआरपी के साथ कौन चैनल मार्केट में लंबे समय तक सर्वाइव कैसे करेगा/कैसे कर सकता है?

सुना है कि एबीपी न्यूज ने भी अब टीआरपी की रेस में कमर कस ली है और इसके लिए जरूरी जतन किए जा रहे हैं/किए गए हैं. चैनल के कंटेंट और उसकी पैकेजिंग में भी मुझे बदलाव दिखा है लेकिन अगर चैनल टीआरपी पर फोकस करेगा तो ये देखना दिलचस्प होगा कि उसके कंटेंट का स्तर गिरता है या नहीं.

दरअसल टीआरपी वो अबूझ पहेली है, जिसे बड़े-बड़े मीडिया सम्पादक और दिग्गज अभी तक बूझ नहीं पाए हैं. पहले TAM था और उसे लेकर जबरदस्त विवाद था, सो थोड़ी पारदर्शिता लाने के लिए BARC को सामने लाया गया. फिर भी टीआरपी एक रहस्य है, एक पहेली है. अच्छे-अच्छे पत्रकार ये नहीं बता पाए-पाते कि अमुक प्रोग्राम को ज्यादा टीआरपी क्यों मिली और फलां की क्यों नहीं मिली ??!! हां, एक रूल टीवी न्यूज रूम (अब न्यूज वेबसाइट डेस्क पर भी) में सर्वमान्य है कि अगर पब्लिक को डराओगे, सनसनी फैलाओगे, रहस्य-रोमांच में बांधोगे और सबसे बढ़कर मनोरंजन परोसोगे, तो जनता आपके चैनल पर टिकेगी और अगर जनता टिकेगी, तो टीआरपी मिलेगी.

सो इसी फंडे को लेकर टीवी न्यूजरूम के ज्यादातर प्रोड्यूसर दौड़ते-भागते रहते हैं. कंटेंट पर बहुत कम बात होती है. बस टीवी न्यूज रूम की भाषा में कह देते हैं- खेल जाओ या तान दो- मतलब कि ये खबर एक आइटम नंबर है, सो इसे जितना भुनाना है, भुना लो. मैंने महसूस किया है कि टीवी न्यूज रूम में इस बात पर बहुत कम जोर दिया जाता है कि खबर के मार्फत जनता को जागरूक करना है, उसे इन्फार्म करना है. बस कहते हैं- ‘शो’ बना दो और जब ‘शो’ बनेगा तो वह सनीमा की तरह ही बनेगा ना !! वैसे कुछ-कुछ गंभीर किस्म के प्रोड्यूसर भी हैं लेकिन उनका आइडिया या तो न्यूज मीटिंग में ड्रॉप कर दिया जाता है या फिर उन्हें क्लर्की वाला कोई काम देकर साइडलाइन कर दिया जाता है.

टीवी के सम्पादक को नंबर चाहिए क्योंकि उसे अपनी कुर्सी भी बचानी है और आखिर में बात यहीं पर आकर रूकती है कि भइया, नौकरी कर रहे हैं, करने दो. नौकरी गई तो फिर सम्पादकी वाली दूसरी नौकरी मिलना बहुत मुश्किल है. सो भांड में गया Journalism ethics, पत्रकारिता का मिशन-जज्बा और दुनिया भर का ज्ञान. चैनल चलाना है, कुर्सी बचानी है तो मालिक-मैनेजमेंट को टीआरपी लाके देनी होगी. किसी भी कीमत पर और यहीं से शुरू होता है कंटेंट में गिरावट का सिलसिला. न्यूज रूम की भाषा में जो माल बिकेगा यानी जिसे देखकर दर्शक आपके चैनल पर रुकेगा, उसका अंदाजा लगाकर भाई लोग पेलमपेल स्क्रिप्टिंग कर डालते हैं, ड्रामा क्रिएट कर देते हैं और इटरटेनमेंट केे अंदाज वाला एक टीवी न्यूज शो बना डालते हैं. और अगर डिबेट करानी है तो पैनल में वैसे लोगों को बुलाओ जो खूब बोलते हों और अगर जरूरत पड़ी तो जानबूझकर एक-दूसरे से भिड़ जाएं.

माने टीवी का पूरा शो महज एक ड्रामा बनाकर रख दिया जाता है. यही काम टाइम्स नाऊ वाले अर्नब गोस्वामी अरसे से करते आए हैं और इसी का नतीजा रहा कि बाजार में बहुत देर से आया ये चैनल टीआरपी के आंकड़े में अपने सभी अंग्रेजी प्रतिद्वंद्वी चैनलों से काफी आगे निकल गया. कुछ हिंदी वाले एंकरों ने भी अरनब की देखादेखी उनके इसी स्टाइल को कॉपी करना शुरु किया और कुछ इसमें सफल भी रहे.

आप बीबीसी या अलजजीरा ट्यून करें. एंकर सधे अंदाज में आपको खबर बताता है. ड्रामा-शो क्रिएट नहीं करता. और कुछ चैनलों को छोड़कर (NDTV-दूरदर्शन जैसे चैेनल) बाकी के अधिकांश चैनल प्राइम टाइम में टीआरपी रोमांस की ही कोशिश करते हैं और ये सिलसिला लगातार चला जा रहा है. जो नए पत्रकार वहां जाते हैं, माहौल को देखकर वो भी यही सीख लेते हैं और पूरी टीआरपी-बाज टीम तैयार होती रहती है. उस पे तुर्रा ये कि सम्पादक सारा दोष जनता पर मढ़ देता है कि —जी, हम क्या करें, पब्लिक तो यही देखना चाहती है. अरे भाई, जरा बताइएगा कि आपने कौन से प्रोग्राम को चलाने से पहले जनता की रायशुमारी की थी, फिर दोष पब्लिक के मत्थे क्यों?? जब आपका टीआरपी मीटर वाला सिस्टम ठीक नहीं है, तो इसे ठीक करवाइए ना. मासूम जनता के सिर पर ठीकरा क्यों फोड़ रहे हैं?

कुछ थोड़े और सयाने होते हैं, सो वे ये कहकर बच निकलने की कोशिश करते हैं कि भारत में टीवी न्यूज अभी नया माध्यम है और ये संक्रमणकाल से गुजर रहा है. सो धीरे-धीरे इसमें मैच्युरिटी आ जाएगी. अरे भाई !!! टीवी न्यूज को भारत में आए कई साल हो गए और इतने सालों में तो बच्चा जवान होकर उम्रदराज हो जाता है. वैसे मुझे लगता है कि आने वाले कुछ वर्षों तक ये सब यूं ही चलता रहेगा क्योंकि बार्क जैसी संस्थाओं में सुधार लाने की ज्यादा बात नहीं होती और लोग इसके लिए इच्छुक भी नहीं दिखाई देते. लेकिन सोशल मीडिया ने जिस तरह से मेन स्ट्रीम मीडिया संस्थानों की पोलपट्टी खोलनी शुरु की है, वह अभूतपूर्व है. अब जनता खुद पत्रकार बन गई है और सबकी खबर दे रही है व सबकी खबर ले भी रही है. ये एक शुभ संकेत है. मीडिया के भटकाव पर लगाम लगाने में सोशल मीडिया एक अघोषित Moral policing का काम कर रहा है, जो हमारे लोकतंत्र और मीडिया के स्वनियमन के लिए किसी वरदान से कम नहीं!!. अब लिखूंगा तो ज्यादा लम्बा हो जाएगा. सो आगे फिर कभी. जय हो!

पत्रकार, संपादक, शिक्षक और मीडिया विश्लेषक नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

हिंदी न्यूज चैनलों की लैटेस्ट टीआरपी जानने के लिए नीचे के शीर्षक पर क्लिक करें…

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मोदी जी की सरकार बनने के बाद पूरी पत्रकार बिरादरी दो फाड़ हो चुकी है

Nadim S. Akhter : एबीपी न्यूज वाले पत्रकार अभिसार शर्मा ने शानदार-जानदार लिखा है. सच सामने लाना एक खांटी पत्रकार का अंतिम ध्येय होता है और अभिसार ने वही किया है. सारी मुश्किलों और चुनौतियों के बावजूद (Read between the lines- नौकरी पे खतरे के बावजूद !!) क्या आज हमें ये कहने में कोई हिचक होनी चाहिए कि देश में अघोषित आपातकाल लगा हुआ है. जो दक्षिणपंथ और उसके सारे कुकर्मों-बचकाना हरकतों के साथ है (देश को नुकसान पहुंचाने की कीमत पर भी), वह -राष्ट्रप्रेमी- घोषित किए जा रहे हैं और जो मोदी सरकार को एक्सपोज कर रहे हैं, उनकी गलतियों और खामियों की ओर इशारा कर रहे हैं, उन्हें -राष्ट्रद्रोही- होने का तमगा दिया जा रहा है.

तो क्या ऐसे माहौल में एक पत्रकार को अपनी नैतिकता और पेशेवर निष्ठा से समझौता कर लेना चाहिए? क्या उसे समर्पण करके घुटने के बल झुकना नहीं चाहिए, बल्कि लेट जाना चाहिए ताकि सत्ता का हनहनाता रथ उसके सीने पर से गुजर के उसे जमींदोज कर दे! या फिर उसे पूरी ताकत लगाकर देश को सच बताना चाहिए और अपना काम करते रहना चाहिए. सारी मुसीबतों और जान पर खतरे के बावजूद!

अभिसार बता रहे हैं कि उनकी पत्नी ने उन्हें सुबह-सबह टहलने से रोक दिया है क्योंकि उन्हें धमकियां मिल रही हैं. ऐसे और कई पत्रकार होंगे, जो इसी खतरे में जी रहे होंगे लेकिन सार्वजनिक मंच पर कुछ नहीं बोल रहे और चुपचाप अपना काम करते जा रहे हैं.

टाइम्स नाऊ वाले अर्नब गोस्वामी कह रहे हैं कि पाक परस्त पत्रकारों का ट्रायल होना चाहिए. तो ये कैसे साबित होता है कि अर्नब गोस्वामी के लहू में सिर्फ देशभक्ति की आरबीसी यानी रेड ब्लड कॉपरसेल्स हैं. और अर्नब ये कैसे साबित करेंगे कि तथाकथित पाक परस्त पत्रकारों के लहू में ये कॉपरसेल्स नहीं हैं? कश्मीर में युवा अगर सेना पर पत्थर फेंक रहे हैं तो क्या आप पैलेट गन का इस्तेमाल करके उनके बदन को जख्मों और छर्रों से छलनी कर देंगे, उन्हें अंधा कर देंगे? अगर सेना और सीआरपीएफ वहां इस तरह की गलतियां कर रही है तो क्या किसी पत्रकार को इसे देश को नहीं बताना चाहिए कि सरकार इस और ध्यान दे और इस गलती को सुधारा जाए? क्या उन गुस्साए नौजवानों पर पानी की बौछार या रबड़ की गोलियों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, जैसा देश के अन्य हिस्सों में होता है, जिससे भीड़ तितर-बितर हो जाए और किसी को कोई जानलेवा नुकसान भी ना पहुंचे?

बहुत सारी बातें है. क्या-क्या बोलूं. ये भी अभूतपूर्व है कि देश की जानी-मानी पत्रकार बरखा दत्त ने ट्वीट करके अर्नब गोस्वामी की ओर इशारा करते हुए ये कह दिया कि उन्हें शर्म आ रही है, कि जिस पेशे में अर्नब है, वो भी उसी पेशे में हैं. मोदी जी की सरकार बनने के बाद पूरी पत्रकार बिरादरी दो फाड़ हो चुकी है. एक वो पत्रकार हैं जो भक्तों की जमात में शामिल हो के मोदी जी की हर बात पे –मोदी-मोदी-मोदी-मोदी— चिल्ला रहे हैं (Pro Modi ) और एक वो हैं, जो हमेशा की तरह ईमानदारी से अपना पत्रकारीय दायित्वों को निभा रहे हैं (जैसा उन्होंने यूपीए काल में भी निभाया था और तब बीजेपी उनसे बहुत खुश रहा करती थी, Pro Public Journalsits), सारे खतरों को झेलकर.

मेरा मानना है कि सत्ता के दबाव में Pro Modi और Pro Public पत्रकारों के बीच कटुता अभी और बढ़ेगी. एक धड़ा सत्ता के इशारे पे जनता को फिक्स रंग दिखाएगा और दूसरा धड़ा सारे रंग दिखाने की कोशिश करेगा ताकि देश सच्चाई जान सके. और इसका नतीजा आपको अगले लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगा, जब पब्लिक सब जानने-समझने के बाद वोट देने बाहर निकलेगी. वैसे एक बात के लिए मैं आश्वस्त हूं कि प्रोपेगेंडा ज्यादा चल नहीं पाता. आखिर में जीत सच यानी सत्य की ही होती है. सो सत्यमेव जयते. जय हो!

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर की एफबी वॉल से.

अभिसार शर्मा के लिखे मूल लेख को पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें….

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रजत शर्मा ‘आप की अदालत’ में योगी आदित्यनाथ को बिठाकर खुलेआम भारत के संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं!

Nadim S. Akhter : इंडिया टीवी पर रजत शर्मा वाले ‘आप की अदालत’ प्रोग्राम में सांसद योगी आदित्यनाथ खुलेआम मुसलमानों के खिलाफ आग उगल रहे हैं। कह रहे हैं कि तुम एक मारोगे तो हम सौ मारेंगे। मुस्लिमों को हिन्दू धर्म में वापस लाएंगे, ये घर वापसी है। और, स्टूडियो में मौजूद जनता आदित्यनाथ की हर बात पे ताली पीट रही है। इनमें कम उम्र की युवतियां भी शामिल हैं। बड़ा अजब माहौल है। खुलेआम भारत के संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इस तरह के भड़काऊ बयान वाले प्रोग्राम को न्यूज के नाम पर प्रसारित करके Rajat Sharma जी क्या संदेश दे रहे हैं? एडिटोरियल जजमेंट नाम की कोई चीज रह भी गई है कि नहीं इस देश में?

माना कि योगी आदित्यनाथ की जबान पे रजतजी का कंट्रोल नहीं लेकिन ऐसे भड़काऊ जहर उगलने वाले इंटरव्यू को प्रसारित किया जाए या नहीं, ये फैसला तो रजत जी ले ही सकते हैं। और मेरी ये जानने की तीव्र इच्छा है कि आदित्यनाथ के संविधान विरोधी बयानों पर स्टूडियो में ताली पीटने वाली जनता कहां से बुलाई गई थी? किसी हिंदूवादी संगठन से या फिर कहीं और से क्योंकि खून-खराबे की बात करने वाले गैरजिम्मेदार आदित्यनाथ की बातों पर ताली देश का कोई सामान्य नागरिक तो नहीं ही बजा सकता, ये कॉमन सेंस की बात है। या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि सबकुछ प्रायोजित था? हाथी के दांत दिखाने को और व खाने को और। क्यों रजत शर्मा जी?

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर के एफबी वॉल से.

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इंडिया टुडे ग्रुप ने बिहार में जंगलराज-2 घोषित कर दिया!

Nadim S. Akhter : इंडिया टुडे ग्रुप ने बिहार में जंगलराज-2 घोषित कर दिया है। हेडिंग देखिये। ये कहकर कि ये लेखक के निजी विचार हैं। संपादकीय पतन की निर्लज्ज पराकाष्ठा देखिये। यदि ऐसा है तो आरजेडी, बीजेपी, कांग्रेस समेत तमाम दलों को अपने ऑनलाइन भक्तों वाली सेना को ichowk के लिए लगा देना चाहिए ताकि वे पानी पी-पी कर विरोधियों को रावण और अपने नेता को हीरो बनाते रहें और पब्लिक इसे एक बड़े मीडिया संस्थान का निष्पक्ष प्रकाशन मानती रहे।

विचार के पन्ने अख़बारों में भी होते हैं, वहां भी अलग अलग विचारों वाले लेख आमंत्रित और प्रकाशित किये जाते हैं, लेकिन ichowk वालों ने तो खुला खेल फ़र्रुखाबादी कर दिया है। अगर बीजेपी का राष्ट्रीय प्रवक्ता या कोई पदाधिकारी ऐसा लेख लिखेगा तो हम उनकी पार्टी और पद का रिफरेन्स देकर उसे छाप सकते हैं, पब्लिक समझ जाती है। लेकिन यहाँ तो??!! लेखिका को मैं नहीं जानता और ना ही उनकी राजनितिक संलिप्तता और न ही इस वेबसाइट ने उनके बारे में कुछ बताया है, फिर भी घोषित कर दिया है बिहार में जंगलराज पार्ट-2। वैसे इस ichowk के माननीय संपादक कौन हैं, उनका नाम महफिल में बताया जाना चाहिए।

पत्रकार, मीडिया शिक्षक और विश्लेषक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से. इस पोस्ट पर जंगलराज-2 की लेखिका सुनीता मिश्रा का जो कमेंट आया है, वह इस प्रकार है…

Sunita Mishra : जी नदीम जी बताएं, इसे लिखने वाली लेखिका में हूं, जिन्हें शायद आप नहीं जानते। क्या गलत लिखा है, जो हो रहा है केवल उसे ही आम जनता तक पहुंचाया है और आप कह रहे हैं कि इंडिया टुडे ग्रुप ने बिहार में जंगल राज-2 घोषित कर दिया है। आपको एक बात बता दूं, यह हैडिंग उन्होंने नहीं, बल्कि मैंने दी। जो वहां हो रहा है, क्या आप उससे सहमत हैं? मदद की गुहार तो उन निर्दोषों और मासूमों को लगानी चाहिए, जिनके साथ यह सब हो रहा है, आप क्यों लगा रहे हैं। यह संपादकीय पतन की निर्लज्ज पराकाष्ठा नहीं, अपितु आपके विचार हैं। और हां भक्त तो शायद आप मालूम पड़ते हैं, जो आंखों देखी मक्खी निगलने की कोशिश कर रहे हैं। हम पानी पी-पी कर नहीं, बल्कि सोच—विचार कर लिखते हैं। हमारा कोई विरोधी नहीं है और न ही कोई नेता। यह तो शायद आप के विचार है, जो आप उन्हें शब्दों के बाण के रूप छोड़ रहे हैं। अच्छा बताइए आपका कौन सा नेता है? किससे बारे में लिखने से आप संतुष्ट होंगे?

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odd-even : केजरीवाल जैसा मूर्ख मुख्यमंत्री इस देश में दूसरा नहीं देखा…

Nadim S. Akhter :  अरविन्द केजरीवाल जैसा मूर्ख मुख्यमंत्री इस देश में दूसरा ने नहीं देखा, जिसन वाहवाही बटोरने के चक्कर में बिना सोचे-समझे पूरी जनता को odd-even की खाई में धकेल दिया। पहले से ही मरणासन्न दिल्ली का पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम इतनी बड़ी आबादी के सफ़र को कैसे झेलेगी, इस पर एक पल भी नहीं सोचा। ऊपर से ये महामूर्ख मुख्यमंत्री स्कूल में बच्चों के बीच जाकर कह रहे हैं कि बेटे, अपने मम्मी-पाप को इस नियम का पालन करने की सीख देना, उनसे जिद करना। लेकिन ये नहीं बता रहे कि जब टाइम से ऑफिस न पहुचने पे पापा की सैलरी कटेगी और ऑटो लेकर जाने में उनकी जेब से दोगुने नोट ढीले होंगे, घर का बजट बिगड़ेगा, तो पापा घर कैसे चलाएंगे?

केजरीवाल नमक इस मूर्खाधिराज को तो ये भी नहीं मालूम कि दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदूषण सड़को पे उड़ रही धूल से है, गाड़ियों से नहीं। गाड़ियां बैन करने से पहले अगर उन्होंनेे दिल्ली की टूटी-फूटी सड़कें ही बनवा दी होती तो प्रदूषण का लेवल काफी कम हो गया होता। ऊपर से ये अदूरदर्शी आदमी ये कहता है कि मैं तो अपने मंत्रियों के साथ कार पूलिंग कर लूंगा जी, आप भी कर लो। लेकिन ये नहीं बताता कि आम आदमी कार पूल करने के लिए ममुहल्ले में कहां कहाँ भटकेगा, जब एक पडोसी नौकरी-दुकान के लिए नोएडा जाता हो और दूसरा गुड़गांव, और उसे खुद कहीं और जाना हो।

भारत के चीफ जस्टिस तो सुप्रीम कोर्ट तक अपने साथी जजों के साथ कार पूलिंग कर लेंगे, अकर्मण्य मुख्यमंत्री केजरीवाल तो साथी मंत्रियों के साथ एक ही ऑफिस तक चले जायेंगे, आम जनता कहाँ जायेगी!!! आम आदमी के नाम पे सत्ता पाने वाले इस नौटंकीबाज मुख्यमंत्री ने अपने इस फैसले से उस mango people को भी भारी मुसीबत में डाल दिया है, जिसके पास न तो कार है और न स्विमिंग पूल और न ही उसे कार पूलिंग का मतलब ही समझ आता है। वो तो रोज डीटीसी बसों और मेट्रो से कमाने निकलता है। सो जब मेट्रो और बसों में लोग ठसाठस ठूंसे जायेंगे, तो बेचारे उस गरीब का कचूमर निकलना तय है।

शर्त लगा लीजिये कि अगर आज दिल्ली में चुनाव हों तो इस केजरीवाल एंड कंपनी वाली आम आदमी पार्टी को आम जनता जड़ से उखाड़ कर फेंक देगी, जनता में इतना गुस्सा है। ‘ना बंगला लूंगा और न गाड़ी लूंगा जी’ की बात कहने वाला ये मुख्यमंत्री आज सब सुख भोग रहा है। हाँ, जनता की गाड़ी छीनने में इसने कोई कसर नहीं छोड़ी है। प्रदूषण तो बहाना है, असल मकसद केजरीवाल को अपनी राजनीति चमकाना है।

केजरीवाल की पोल तो उसी दिन खुल गई, जब उन्होंने odd-even की आग में आम आदमी को तो झोंक दिया लेकिन vip culture ख़त्म करने की बात कहने वाले इस पूर्व तथाकथित आंदोलनकारी ने दिल्ली के सारे वीआईपीज को इससे छूट दे दी। यानि आम आदमी सड़क पे धक्के खाये और नेता-मंत्री-जज-राज्यपाल मिलकर मौज काटें। मानो उनकी कार से प्रदूषण का धुआं नहीं, ऑक्सीजन गैस निकलती है।

कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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IIMC की जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए प्रो. राघव चारी

Nadim S. Akhter : “आह !!! प्रो Raghav Chari आज IIMC की जिम्मेदारियों से मुक्त हो गए. लेकिन मेरे लिए इसके अलग मायने हैं. मतलब अाज के बाद जब मैं उनके कमरे में जाऊंगा तो गर्मजोशी से भरी उनकी आवाज, उनका इस्तकबाल और उनका मुस्कुराता चेहरा वहां नहीं होगा. अब मुझे ये कहने का मौका नहीं मिलेगा कि सर, ये शर्ट आप पे बहुत जंच रही है. स्मार्ट लग रहे हैं और फिर हंसते हुए वे कहेंगे कि अरे यार !!! मैं तो स्मार्ट ही हूं हमेशा से !!! IIMC का सिर्फ वो कमरा ही खाली नहीं हुआ, हमारे दिलों के कई कोने वीरान हो गए. क्या कहूं उनके बारे में. अगर वे ना होते तो आज, मैं, मैं ना होता. आईआईएमसी तो एक बहाना था.

मेरे जैसा आदमी अगर इतने दिनों तक यहां टिका तो इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ चारी साब थे. कई दफा मैं उनसे कह भी देता कि अगर आप यहां ना होते, तो मैं सब कुछ छोड़छाड़ कर कब का यहां से चल देता. और फिर वो मुस्कुरा देते. कहते- अरे नहीं, ऐसा भी कभी होता है !!! आप लोग टैलेंटेड लोग हो और जो कुछ भी हो, अपनी काबलियत के बल पर हो. मैं खुशनसीब हूं कि पत्रकारिता में जहां मृणाल पांडे और मधुसूदन आनंद जैसे गुणी सम्पादकों के साथ काम करने का मौका मिला, उनका बेहिसाब प्यार मिला, पग-पग पर मार्गदर्शन मिला वहीं जब एकेडेमिक्स में accidentally आया (वो भी एक करीबी मित्र की सलाह पे) तो IIMC में राघवचारी साहब का साथ मिल गया. पहले में यहां बतौर एक छात्र पढ़ाई करके गया था लेकिन अब उनके मार्गदर्शन में मुझे रेडियो-टीवी डिपार्टमेंट के संचालन में अपना योगदान देना था.

मैं असमंजस में था कि IIMC जॉइन करूं या ना करूं क्योंकि मैं active journalism छोड़कर यहां आने से कतरा रहा था. फिर एक दिन चारी साहब ने बुलावा भेजा कि एक बार आकर उनसे मिलूं. मैं आया, उनसे मिला, उन्होंने कॉफी पिलाई और फिर ढेर सारी बातें हुईं. और उस मुलाकात के बाद मैंने फैसला कर लिया कि Journalism से ब्रेक लेकर मुझे IIMC आना चाहिए. और फिर मैं यहां आ गया. चारी साहब मेरे गुरु हैं. साल 2000-2001 के दौरान IIMC में उन्होंने मुझे पढ़ाया था लेकिन इस दफा वो बिलकुल एक अलग अवतार में दिख रहे थे. एक-एक चीज समझाते कि एकाडेमिक्स में कहां क्या-क्या करने की जरूरत है, किन चीजों को नजरअंदाज करना चाहिए और एक शिक्षक के रूप में आपसे छात्रों की क्या अपेक्षा रहती है. एक पत्रकार के रूप में आप अलग अवतार में रहते हैं और एक टीचर के रूप में बिलकुल अलग रूप में, ये उन्हीं से सीख-जान पाया. बस ये समझिए कि उन्होंने उंगली पकड़कर मुझे सबकुछ सिखाया. और सम्मान-प्यार-दुलार-स्नेह इतना दिया कि पूछिए मत !!! कभी लगा ही नहीं कि वे मेरे टीचर-गुरु-कलीग-बॉस हैं.

हमेशा एक दोस्त की तरह व्यवहार किया, एक अभिभावक की तरह मेरे साथ खड़े रहे. इसी बीच वो दौर भी आया, जब मेरे व्यक्तिगत जीवन में तूफान उठ खड़ा हुआ. लगा सब कुछ बिखर रहा है. चीजें मेरे कंट्रोल के बाहर जा रही थीं. वो ताड़ तो गए थे कि कुछ गड़बड़ है, पूछा भी कि सब ठीक है ना !!! पर मैं असमंजस में था कि उन्हें बताऊं या ना बताऊं. फिर एक दिन उनसे लम्बी बात हुई. सारा हाल कह सुनाया. और पता है, मेरी बातें सुनने के बाद उन्होंने जो बातें मुझे बताईं-समझाईं, वह कोई पिता ही अपनी सगी औलाद को बता सकता है. उन्होंने मुझे उस मानसिक स्थिति से निकलने में मदद की, जिसमें मैं बुरी तरह फंस गया था. हिम्मत तो थी मुझमें, खुद को संभाले हुए भी था, किसी और को पता नहीं चलने दिया लेकिन गुरु की नजर पारखी होती है. चारी साहब समझ गए थे कि मेरे साथ सब कुछ ठीक नहीं है. और ये उनका प्यार ही था कि मैंने अपना दिल खोलकर उनके सामने रख दिया. उन्होंने मुझे जीवन और परिस्थितियों से compromise करने की सलाह दी, बहुत कुछ बताया, अपने निजी जीवन के अनुभव साझा किए पर फैसला मुझ पर छोड़ दिया और कहा कि जो ठीक लगे, आप करो. पर वे चाहते रहे कि मैं समझौता कर लूं और मेरा स्वभाव है कि मैं टूट जाऊंगा पर समझौता नहीं करूंगा और ना मैंने किया. पर उनकी कही एक-एक बात मेरे लिए किसी अमृत से कम ना थी.

और इसी का कमाल था कि मैं दुबारा उठ खड़ा हुआ. लोग कहते हैं कि आप बहुत मैच्योर हैं, समझदार हैं लेकिन चारी साहब के सामने मैंने कभी नहीं चाहा कि मैं मैच्योर बनूं. हमेशा यही चाहता रहा कि उनसे liberty लूं. के ऐसा करूंगा तो क्या होगा, वैसा करूंगा तो क्या होगा. और इसी क्रम में उनसे बहुत कुछ सीखता चला गया. इसे यूं भी कह लें कि उन्होंने अपने जीवन के सारे अनुभवों का निचोड़ मुझे बता दिया-सिखला दिया-समझा दिया. गुणी सम्पादकों (मुृणाल पांडे-मधुसूदन आनंद-बालमुकुंद सिन्हा आदि क्योंकि इनके बाद की पीढ़ी वाले सम्पादक दूसरों को कितना बता-सिखा पाएंगे, मुझे नहीं पता. हां, Qamar Waheed Naqvi साहब के साथ टीवी में काम नहीं कर पाया, इसका मलाल ताउम्र जरूर रहेगा और जब उनसे मिला था तो ये बात मैंने उनसे कही भी थी) की एक पीढ़ी के साथ काम करने का फायदा ये रहा कि जिस तरह पत्रकारिता में अब कोई मेरा हाथ नहीं पकड़ सकता, ठीक उसी तरह राघवचारी साहब के साथ काम करने का असर ये हुआ कि अब Academics में भी कोई मेरा हाथ पकड़ नहीं पाएगा.

उन्होंने मुझे इस काबिल बना दिया कि अब मैं अपने दम पर पत्रकारिता का पूरा कोर्स स्ट्रक्चर बनाकर एक पूरा डिपार्टमेंट सफलतापूर्वक चलाने का हौसला रखता हूं. छोटी से छोटी बारीक बातें, जो आपको कहीं किसी किताब में नहीं मिलेंगी, उन्होंने मुझे बताईं-समझाईं और बहुत कुछ करके दिखाया. लोग समझते हैं कि मैं यहां IIMC में पढ़ा रहा हूं लेकिन सच्चाई तो ये थी कि मैं यहां Prof. Chari का स्टूडेंट था और यहां मेरी ट्रेनिंग चल रही थी. चारी साहब आज भले IIMC से चले गए हों लेकिन मेरी ये ट्रेनिंग ताउम्र जारी रहेगी. वे मुझे जीवनभर पढ़ाते रहेंगे. आज जब उनको छोड़ने कार तक गया तो मैंने उनसे हाथ मिलाया और उनकी मुलायम हथेली को दबाते हुए कहा कि –Thank you so much Sir for everything !!! इसके अलावा मेरे मुंह से कोई और शब्द नहीं निकला और ना ही कुछ बोल पाया. मेरी बात सुनकर चारी साहब मुस्कुरा दिए, थोड़ा इमोशनल हुए, जवाब में Thank you बोला और गाड़ी में बैठ गए. लेकिन मेरे इस Thank you का मतलब वहां खड़ा दूसरा कोई समझ नहीं पाएगा. ये बात सिर्फ और सिर्फ चारी सर समझ रहे थे. और मैं समझ रहा था. Once again Thank you Chari Sir for everything you have done for me. I will miss you but I know you are around.

अभी अलविदा मत कहो दोस्तों, के फिर हमारी मुलाकात होनी है
के फिर वो मंजर बनने हैं, के फिर कई दौर की बात होनी है.

(आज पहली दफा चारी साब के साथ IIMC के मेन गेट पर फोटुक खिंचवाई. और एक शानदार लम्हा कैमरे की इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में कैद हो गया)”

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर ने लांच की रीयल इस्टेट कंपनी

Nadim S. Akhter : आप सभी दोस्तों एवं शुभचिंतकों को सूचित करना चाहता हूं कि मैंने Real Estate की एक कम्पनी बना ली है और इसका नाम रखा है–वास्तोस्पति (VASTOSPATI). यह नाम मैंने ऋग्वेद से लिया है. कुछ वक्त पहले ही मैंने फेसबुक के इस मंच पर कहा था कि अब वक्त आ गया है कि मैं पढ़ने-पढ़ाने और लिखने से जुदा कोई अलग रास्ता बनाऊं. पहले भारतीय नौ सेना की नौकरी छोड़ी, फिर सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनते-बनते IIMC आ गया और पत्रकारिता में रम गया. फिर एक और पड़ाव आया जब मैं पत्रकारिता पढ़ाने IIMC के Radio and Television Department में आ गया. लगभग 15 साल के इस कैरियर में जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव देखे. अपनों को दूर जाते देखा और परायों को अपना बनते देखा. इस छोटी उम्र में ही जीवन के कई रंग देख लिए. सबको आजमा लिया-समझ लिया. फिर मन बनाया कि कुछ अपना करते हैं. कई जगह दिमाग लगाया कि क्या किया जाए. E-commerce से लेकर सब्जी बेचने तक के धंधे को टारगेट में लिया लेकिन finally रीयल इस्टेट का बिजनेस मुझे भाया. वैसे E-commerce का धंधा भी मेरे राडार में है क्योंकि मैंने वर्ष 1998 में पटना में उस वक्त इंटरनेट के माध्यम से लड़का-लड़की ढूंढने का (Shaadi.com टाइप) आइडिया बताया था, जब ऐसी कोई वेबसाइट भारतीय बाजार में उपलब्ध नहीं थी और उस वक्त भारत में इंटरनेट बहुत-बहुत नया था. खैर.

मेरी कम्पनी Vastospati का logo तैयार किया है नई प्रतिभा और मेधा के धनी Amarjeet Tilak ने जो MFA में Gold Medalist हैं. अमरजीत ने मुझे Logo के कई डिजाइन बनाकर दिए, जिसमें थोड़े करेक्शन करवाकर मैंने इस Logo को फाइनल किया. वैसे कई दिग्गज हैं, जिनसे मैं अपनी कम्पनी का Logo तैयार करवा सकता था, लेकिन मैंने जीवन में हमेशा नई प्रतिभा को मौका दिया है, सो इस बार भी यही किया. कम्पनी का logo बहुत सिम्पल है लेकिन इसके रंगों का कॉम्बिनेशन और डिजाइन की हर लकीर के मायने हैं. Logo का यह डिजाइन क्या कहता और बताता है, इस पे ही मैं एक पूरा पोस्ट लिख सकता हूं. वो फिर कभी. लेकिन मेरी कम्पनी के Logo में सूर्य प्रमुखता से हैं , अपने नैचुरल रंग में. जो इस संसार में ऊर्जा-शक्ति और जीवन का प्रतीक है. मेरी कम्पनी पब्लिक को रहने के लिए मकान बनाकर देगी, उनमें खुशियां बांटेगी, जीवन में नए रंग लाएगी और यही इशारा इस Logo में चमकता सूर्य कर रहा है.

फिलहाल हमारी योजना Delhi-NCR में Independent Builder Flats बनाने की है. लेकिन एक विचार ये भी है कि अगर ज्यादा लोग साथ आ जाएं तो हम 50-80 फ्लैट का एक टावर भी बना सकते हैं. उसके लिए उपयुक्त जगह पर जमीन identify करनी पड़ेगी. दरअसल Tower तो मैं पत्रकारिता की नौकरी के दौरान साल 2008 से पहले ही बना देता, जब Times of India group में काम करते हुए मैंने वहां एक Housing Society बनाई थी, ताकि पत्रकारों को सस्ते फ्लैट मिल सकें. इस housing society भाई लोगों ने मुझे General Secretary बना दिया था. तब कई लोग इस सोसायटी के सदस्य बने, जिनमें टाइम्स ग्रुप का सीनियर मैनेजमेंट (विनीत जैन-समीर जैन के पीए भी) और एडिटोरियल के सदस्य, दूरदर्शन, ऑल इंडिया रेडियो, एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान आदि-आदि मीडिया संस्थानों के 60 पत्रकार सदस्य थे. वैसे हमारे पास आवेदन करीब 130 पत्रकारों ने सोसाइटी में शामिल होने के लिए किए थे, लेकिन हम उसमें केवल 60 लोगों को ही शामिल कर पाए थे. कारण यह था कि एक तो वक्त कम था (हम फरीदाबाद में huda की एक स्कीम में जमीन के लिए अप्लाई कर रहे थे) और दूसरे, सोसाइटी फ्लैट्स बनाने के लिए जिस एक एकड़ की जमीन के लिए हम अप्लाई कर रहे थे, उसके अधिकतम सदस्यों की संख्या 60 थी. सो जिन मित्रों-पत्रकारों को तब मैं सोसायटी में शामिल नहीं कर पाया, वे नाराज हो गए. मैंने सबसे माफी मांग ली, पर दुर्भाग्य ये रहा कि HUDA के Draw में हमारी सोसायटी का नाम ही नहीं आया और हमारी सोसाइटी के फ्लैट्स बनते-बनते रह गए यानी एक इतिहास बनते-बनते रह गया
smile emoticon

इसके बाद हम कोई दूसरी planning कर पाते तब तक मैं Times Group छोड़कर Hindustan Times जाने की ओर अग्रसर था. फिर हिन्दुसतान अखबार ज्वाइन कर लिया, दिल्ली छोड़ दी और सोसायटी का काम वहीं रुक गया. जब दिल्ली वापस आया तो इस सम्बंध में फिर कई प्रस्ताव आए लेकिन जीवन की उधेड़बुन में इस ओर कभी ध्यान नहीं दे पाया….बहरहाल,

मेरी कम्पनी का मकसद ऐसे घर बनाना है, जो आम लोगों की पहुंच में हो. यानी वाजिब दाम पर चोखा माल. इसके लिए हम नोएडा, नोएडा एक्सटेंशन, गुड़गांव, सोहना रोड जैसे कई ऑप्शन पर विचार कर रहे हैं. मैंने खुद तीन-चार जगहों पर जाकर जमीन देखी है. इसमें कैलकुलेशन ये है कि अगर आप बहुत पॉश इलाके में जाएंगे या घनी बसी आबादी में कहीं जमीन खरीदकर फ्लैट लेना चाहेंगे तो जमीन महंगी मिलेगी और इसी के अनुसार फ्लैट का दाम बढ़ जाएगा. सो मेरी कोशिश है कि किसी ऐसी जगह पर जमीन तलाशी जाए, जहां बसावट भी हो, इलाका खुला-खुला भी हो और अभी डिवेलपमेंट मोड में हो ताकि जमीन सस्ती मिल जाए. उससे फ्लैट सस्ते पड़ेंगे और जब तक फ्लैट का पजेशन मिलेगा (एक साल के अंदर, independent builder floors के मामले में और दो-तीन साल, टावर वाले फ्लैट के मामले में), तब तक आपके मकान की कीमत भी बढ़ जाए और आपकी जेब पर भी ज्यादा असर ना पड़े. साथ ही उस जगह की दिल्ली व एनसीआर के इलाकों से अच्छी कनेक्टिविटी हो.

तो दोस्तों ! मैेने अपने प्रोजेक्ट के लिए नोएडा, नोएडा एक्सटेंशन, गुड़गांव, सोहना रोड जैसे ऑप्शन बताए हैं. आप क्या कहते हैं?? इनमें से किस जगह पर जमीन लेकर अगर मैं सस्ते फ्लैट बनाऊं तो ठीक रहेगा. पिछली बार (करीब साल-डेढ़ साल पहले) मैंने कोशिश की थी कि एक बिल्डर से समझौता करके थोक में मार्केट रेट से सस्ते फ्लैट ले लिए जाएं लेकिन वह सौदा परवान नहीं चढ़ सका. तब फेसबुक के कई मित्रों ने कहा था कि अगर Delhi-Ncr में प्रोजेक्ट होगा, तो वो उसमें फ्लैट खरीदने को इच्छुक हैं.

तो लीजिए, अब किसी बिल्डर से बात करने या समझौता करने की जरूरत नहीं है. अब कमान मैंने खुद संभाल ली है. अपनी ही कम्पनी बना ली है. हम किस जगह अपना पहला प्रोजेक्ट शुरु करें, इसके लिए आपके सुझाव आमंत्रित हैं. अगर कम लोग हुए तो Independent builder flats (सारी सुविधाओं के साथ, Gated coloy) बनाएंगे. और अगर ज्यादा लोग आए यानी 60 से ऊपर, तब हम टावर वाले फ्लैट बनाने पर विचार करेंगे. जीवन की इस नई पारी में आप सभी मित्रों-सहेलियों और शुभचिंतकों से आशीर्वाद और मंगलकामनाओं की अपेक्षा है.

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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टाइम्स ऑफ इंडिया के पतन की पराकाष्ठा… सलमान खान पर 5 पेज बिछा दिया!

Nadim S. Akhter : TIMES NOW वाले अर्नब गोस्वामी भी कमाल है. हमेशा लाइमलाइट में रहना चाहते हैं. ये देखकर ताज्जुब हुआ कि कल रात के थकाऊ News Hour शो के बाद आज सुबह-सुबह एंकरिंग करने स्टूडियो में बैठ गए हैं. माने के Live हो गए हैं. बॉम्बे हाई कोर्ट में आज सलमान खान मामले की सुनवाई होनी है, सो अर्नब पूरी फौज के साथ तैयार हैं. और एक मैं हूं कि खामोख्वाह इस इवेंट को लाइटली ले रहा था. जब अर्नब ने इतनी बड़ी तैयारी कर रखी है तो दूसरे चैनलों, खासकर हिन्दी के चैनलों ने क्या किया होगा, अंदाजा लगा रहा हूं.

वैसे एक सवाल मन में उठ रहा है कि क्या सलमान खान इतने महत्वपूर्ण हैं कि उनके एक अपराध पर बन रही स्टोरी पर बड़े मीडिया संस्थान इस तरह की तैयारी करें!!! रिपोर्टरों की फौज तैनात कर दें मैदान में. पल-पल की खबर दें!!! कल मुंबई से एक मित्र का मैसेज आया कि तुम पत्रकार लोग ये कर क्या रहे हो??!! आज मुंबई के The Times of India के शुरुआती पांच पेज सलमान खान के ऊपर हैं. क्या टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे बड़े और प्रतिष्ठित अखबार का इतना पतन हो चुका है कि सलमान खान पर वह 5 पेज बिछा दे!! उसका संदेश पढ़कर मैं भी दंग रहा गया. सोचने लगा कि क्या वाकई Times of India ने ऐसा किया है!!!

समझ नहीं आ रहा है कि मीडिया संस्थानों और उनके धीर-गम्भीर सम्पादकों को हो क्या गया है!!! एक खबर अचानक से नैशनल हेडलाइन्स बनती है, उसे खूब रगड़ा-चलाया जाता है और फिर अचानक से वह सिरे से गायब हो जाती है. ना कोई फॉलोअप, ना कोई याद. और फिर आती है चमचमाती एक नई स्टोरी, रगड़े जाने के लिए. उसे भी दमभर धुना जाता है और फिर एक नई स्टोरी की तलाश शुरु हो जाती है…

ताजा-ताज उदाहरण दे रहा हूं. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की रैली में एक किसान सीएम के सामने खुदकुशी कर लेता है और पूरा का पूरा मीडिया उस खबर पर पिल पड़ता है. पूरे देश में गुस्सा भर दिया जाता है और ऐसा लगने लगता है कि मानो अब किसानों के अच्छे दिन वाकई में आने वाले हैं, उनके दिन बहुरेंगे. संसद तक में सवाल उठने लगते हैं. मीडिया के माइकवीर खेतों में जा-जाकर किसानों का हाल पूछने लगते हैं…टीवी की स्क्रीन पर मैला-कुचैलां गांव दिखने लगता है, लेकिन तभी, लेकिन तभी…

अचनाक खबर आती है कि नेपाल में एक बड़ा भूपकम्प आया है और टीवी कैमरों के तोपनुमा मुंह का रूख किसानों से हटाकर नेपाल भूकम्प पर फोकस कर दिया जाता है. अचानक से किसान, उनकी आत्महत्याएं, उनका मुआवजा, फसल की खरीद जैसे सुलगते सवाल और उन सवालों पर सवाल उठाते एंकरों के तमतमाए चेहरे टीवी स्क्रीन से गायब हो जाते हैं. लड़ाई का मैदान बदल चुका होता है और अब टीवी के माइकवीर नेपाल की धरती पर लैंड कर जाते हैं. कोई हेलिकॉप्टर पर सवार दिखता है, कोई दबे मकानों से अपना बचा-खुचा सामान निकालते लोगों के जख्मों पर नमक लगाकर ये पूछता हुआ कि ये आपका ही मकान था क्या??!! पूरा समान दब गया क्या??? और कोई विध्वंस के बीच झूल रहे शहर के खंडहर मकानों के बीच खड़ा होकर फोटुक खिंचवाता है और फेसबुक-ट्विटर पर अपलोड करके ये घोषणा करता है कि देखों !! हम अब नेपाल में हैं. त्रासदी का तमाशा बनाने को तैयार.

भारतीय मीडिया इस कुदरती हमले पर जिस तरह की कवरेज करता है, उससे नेपाली आवाम और वहां की मीडिया भी आजिज आ जाता है. वो घोषणा कर देते हैं कि भारतीय मीडिया अपने टोटा-टंटा लेकर यहां से उखड़े और घर का रास्ते नापे. कुछ लोग नेपाल की जनता के इस स्वाभिमानी कदम में चीन की साजिश ढूंढते हैं लेकिन ये नहीं देखते कि दूसरे देशों की मीडिया से नेपाल की जनता को कोई शिकायत नहीं. फिर भी हमारा स्वनामधन्य मीडिया उस अतिरेक से कोई सबक नहीं सीखता. कोढ़ में खाज ये कि BEA यानी ब्रॉडकॉस्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव एनके सिंह ये कहते दिखते हैं कि भारतीय मीडिया नें नेपाल में अच्छा काम किया. कोई आत्ममंथन नहीं, कोई विचार नहीं. सब के सब ये मानकर चल रहे हैं कि जो किया, वो बहुत अच्छा किया. खैर !!!

नेपाल से भगाए जाने के बाद भारतीय मीडिया अचानक से उस त्रासदी को भूल जाता है. टीवी पर 24 घंटे आसन जमाए नेपाल की तस्वीरें यकायक गायब हो जाती हैं. अरे भाई, माना कि आपको खदेड़ दिया गया लेकिन क्या इतना बुरा मान गए कि आप अपने पेशे से न्याय करके भूकम्प की खबर ही दिखाना बंद कर दोगे??!! जिस भूकम्प और उससे जुड़े मानवीय संवेदनाओं से अब तक बहुत सारा सरोकार दिखा रहे थे, अचानक से वे सरोकार क्या उड़न-छू हो गए आपके??!! आपके रिपोर्टर वहां ना सही, कम से कम एजेंसी की खबर-विजुअल लेकर ही खबर दिखा देते भाई. लेकिन ये हो ना सका और नेपाल भूकम्प का तमाशा बनाती खबरें भारतीय टीवी स्क्रीन से फुर्र हो गईं…

नए मसाले की तलाश में लगे मीडिया की उस समय चांदी हो गई जब ये खबर आई कि हिंट एंड रन मामले में सलमान खान पर फैसला आना है. फिर क्या था!!! किसान की आत्महत्या और नेपाल भूकम्प को दुह चुका मीडिया सलमान खान पर बरस पड़ा. सलमान कब घर से निकले, वे किससे गले मिले, उन्होंने क्या पहन रखा है, मामले की सुनवाई के दौरान वे खांसे कि नहीं, उन्हें पसीने आए कि नहीं (शुक्र है इन लोगों ने ये नहीं बताया कि वे टॉयलेट गए कि नहीं और गए तो कितनी बार गए !!!) वगैरह-वगैरह जैसी बातें बताकर सभी चैनल-सम्पादक धन्य महसूस करने लगे. और इन सबके बीच वाट लगी बेचारे रिपोर्टरों की. एक चैनल ने तो बाकायदा टीवी स्क्रीन का स्क्रीन शॉट दिखाकर ये ढोल बजाया कि हमने सलमान खान की हर खबर सबसे पहले आप तक पहुंचाई. शायद औरों ने भी किया हो. लेकिन ये बात बताइए भाई लोगों. बतौर एक दर्शक मुझे क्या फर्क प़ड़ता है कि मैंने सलमान को 5 साल जेल की सजा की खबर 11 बजकर 24 मिनट पर सुनी-देखी या 11 बजकर 30 मिनट पर.

टीवी का स्क्रीन ना हुआ कि कोई स्पेस शटल हो गया, जहां एक-एक सेकेंड का हिसाब रखना पड़ता है. आपको बता दें कि मंगल ग्रह पर भेजे गए यान को उसके आखिरी चरण में मंगल की धरती पर लैंड करने के लिए सिर्फ 15 सेकेंड मिले थे और ये 15 सेकेंड ही उस अभियान की सफलता या असफलता तय कर देती है. लेकिन टीवी का स्क्रीन कोई स्पेस शटल है क्या कि आप घड़ी दिखाकर अपनी कामयाबी का ढिंढोरा पीट रहे थे??!!! अरे पत्रकारिता ही करनी थी तो सलमान की स्टोरी से जुड़े गंभीर तथ्यों की विवेचना करते ना आप लोग??!! ये क्या बता रहे थे कि सलमान को पसीना आ रहा था आदि-आदि.

खैर, लिखना तो बहुत कुछ चाहता हूं लेकिन बहुत लम्बा हो जाएगा. सुबह-सुबह अर्नब गोस्वामी को स्टूडियो में बैठकर सलमान की सुनवाई मामले पर एंकरिंग करते देखा तो रहा ना गया. सलमान का मामला अभी कुछ दिनों तक और दुहा जाएगा. और जब गन्ने का रस निचोड़ लिया जाएगा तो सलमान नामक यह -राष्ट्रीय आपदा- फिर अचानक से आपके टीवी स्क्रीन से गायब हो जाएगी. फिर किसी नए मसाले को कूटा जाएगा और उसकी फ्रेश बिरयानी बनाई जाएगी. तब तक आप इस ग्रेट इंडियन मीडिया ड्रामे का मजा लीजिए. जय हो.

लेखक नदीम एस. अख्तर कई न्यूज चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं. इन दिनों आईआईएमसी में अध्यापन के कार्य से जुड़े हैं.

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आज तक छोड़कर Charul Malik इंडिया टीवी गईं, सास-बहू का एक घंटे का शो बनवाएंगी

Nadim S. Akhter : सास बहू और साजिश…फिर आया सास बहू और बेटियां…फिर इसके आगे क्या…सास बहू और? Charul Malik आज तक छोड़कर इंडिया टीवी जा रही है. सास-बहू का कोई एक घंटे का शो बनना है शायद. एक वक्त था, जब दोपहर में स्टार न्यूज (अभी का एबीपी न्यूज) सास बहू और साजिश दिखाता था. फिर आज तक चैनल ने कम्पिटिशन में मिलते-जुलते नाम सास बहू और बेटियां (पता नहीं लोग हटकर नाम भी नहीं सोच सकते) से शो लॉन्च किया.

तब इंडिया टीवी अलग ही मूड में था. उसने तो बाकायदा कई दफा चैनल पर घोषणा की थी (जहां तक मुझे याद है) कि जब दूसरे इंटरटेनमेंट और सास-बहू दिखाते हैं, तब हम न्यूज दिखाते हैं. सो न्यूज देखना है तो इंडिया टीवी पर ट्यून कीजिए. अब वही इंडिया टीवी इंटरटेनमेंट की तरफ बढ़ चुका है. सुन रहा हूं कि टीवी के पर्दे वाली सास-बहू स्टोरी अब चारूल के नेतृत्व में नई गति-नए आयाम प्राप्त करेगी. बढ़िया है. वैसे चारूल से कभी मिला तो नहीं, लेकिन वो हैं टैलेंटेड. सीरियस न्यूज की दुनिया से चुलबुली इंटरटेनमेंट की दुनिया में उनका शिफ्ट जबरदस्त रहा है. इसके लिए Supriya Prasad बधाई के पात्र हैं. उन्होंने ही चारूल को आज तक पर इतना बड़ा ब्रेक दिया (मेरी जानकारी के मुताबिक) और फिर चारूल छा गईं. एबीपी न्यूज की सास-बहू वाली स्टार एंकर अदिति अरोड़ा सावंत के मुकाबले उन्होंने आज तक पर एक अलग छवि गढ़ी.

वैसे टीवी न्यूज चैनलों पर सास-बहु सीरियल्स की खबरें भी दिखाई जा सकती हैं, इसके आइडिएशन का क्रेडिट एबीपी न्यूज के (तब के स्टार न्यूज) सर्वेसर्वा शाजी जमा को जाता है (मेरी जानकारी के मुताबिक). उन्होंने ही सबसे पहले इस तरह के कार्यक्रम की शुरुआत की, जो दर्शकों को काफी पसंद आया. फिर क्या था. दूसरे टीवी न्यूज चैनलों में भी दोपहर को (जो महिलाओं का viewership time माना जाता है) सास-बहू वाले इंटरटेनमेंट प्रोग्राम्स की शुरुआत हो गई. तब IBN7 चैनल ने भी सास-बहू वाला राग छेड़ा और Atika Ahmad Farooqui उसे होस्ट करती थीं. (जहां तक मुझे याद है)

सास-बहु सीरियल-टीवी के कॉमेडी-डांस शोज को काट-छांटकर दिखाने का ये चस्का इतना पॉपुलर हुआ कि सिर्फ नैशनल ही नहीं, रीजनल न्यूज चैनलों ने भी अपनी प्रोग्रामिंग में बदलाव किए और चटपटे नामों वाले ऐसे शोज तैयार किए. और सभी ने इसे दिखाने का वक्त दोपहर में ही रखा.

खैर, भारतीय टीवी दर्शकों को सास-बहू के एक और तड़के का और स्वाद चखाने की कोशिश में लगे इंडिया टीवी को शुभकामनाएं. अब देखना ये है कि इस बार प्रोग्राम का नाम रखने में क्रिएटिविटी का इस्तेमाल होता है या फिर पहले वाला पैटर्न दुहराया जाता है. यानी. हमें -सास बहू और साजिश- तथा -सास बहुू और बेटियां- सीरीज से छुटकारा मिलेगा या फिर एक स्ट्रैटिजी के तहत इंडिया टीवी भी -सास बहू और ??? – के नाम से एक नए प्रोग्राम का आगाज करेगा !!!

वैसे एक बात बताऊं. टीवी न्यूज चैनलों की प्रोग्रामिंग में भेड़चाल बहुत है. कोई शो हिट हुआ नहीं कि उससे मिलते-जुलते या फिर ठीक वैसे ही शोज दूसरे चैनल लॉन्च कर देते हैं. मुझे याद है. तब मैं न्यूज 24 में था और सुप्रिय प्रसाद तथा सुभाष कदम के नेतृत्व में हिंदी टीवी न्यूज इंडस्ट्री का 100 खबरें देने वाला पहला शो यानी -न्यूज शतक- लॉन्च किया गया था. इसके तहत सिर्फ 15 मिनट में 100 खबरें देनी थीं. ये एक चैलेंजिंग काम था क्योंकि 100 खबरों के लिए विजुअल जुटाना भी आसान नहीं था. हिसाब-किताब लगाकर इसे संभव किया गया और ये शो हिट रहा. इसके बाद तो दूसरे चैनल भी भेड़चाल में लग गए.

लगभग सभी अग्रणी चैनलों ने कम समय में ज्यादा खबर देने के इस फॉर्मेट को अपनाया और 100 खबर देने के प्रोग्राम उनकी प्रोगामिंग लिस्ट का हिस्सा बन गए. कुछ चैनल तो अलग कर गुजरने में -मूर्खता- की हद को पार कर गए. वे 200 खबर देने का फॉर्मेट ले आए. फिर इसी फार्मेट को तोड़कर दिखाने की कोशिशें शुरु हुईं. यानी 5 मिनट में 25 खबर देख लो. 10 मिनट में 50 खबर देख लो आदि-आदि. मेरी समझ से 200 खबर दिखाने में लोचा ये रहा कि आप खबरों की इतनी हद से ज्यादा bombardment इतनी जल्दी-जल्दी कर देते हैं कि दर्शक खबर को समझे, उसे आत्मसात करे, इससे पहले ही बुलेट की रफ्तार से वह खबर रफू-चक्कर हो जाती है. लेकिन ठीक है. ऐसे प्रोग्राम भी चले- चल रहे हैं.

तो बात हो रही थी टीवी न्यूज के पर्दे पर आ रहे सास-बहु के नए तड़के की. कुछ नया और अलग देखने का हम सब को इंतजार रहेगा. और मुमकिन है कि इस प्रोग्राम की शुरुआत के बाद सास बहू साजिश और बेटियां वाले भी अपने कंटेंट के फॉर्मेट में कुछ बदलाव करें. फिलहाल तो इंतजार कीजिए.

टीवी पत्रकार रहे और इन दिनों मीडिया शिक्षण से जुड़े नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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Live खुदकुशी फिल्माते मीडियाकर्मी, स्टेज पर खड़ा अहंकारी मुख्यमंत्री, पुलिस से गुहार लगाते शातिर नेता, अविचल मुस्काते पुलिसवाले…

Nadim S. Akhter : फिल्म ‘पीपली लाइव’ Anusha Rizvi ने बनाई थी और आज देश की राजधानी दिल्ली में ‘पीपली लाइव’ साकार हो कर जी उठा. सब कुछ वैसा ही. वही खुदकुशी की सनसनी, गर्म तवे पर रोटी सेंकने को आतुर मीडिया-नेता-प्रशासन की हड़बड़ी और दर्शकों-तमाशाइयों का वैसा ही मेला, वही हुजूम. सब कुछ जैसे एक लिखी स्क्रिप्ट की तरह आंखों के सामने होता रहा. एक पल को तो समझ ही नहीं आया कि मनगढंत फिल्म पीपली लाइव देख रहा हूं या फिर हकीकत में ऐसा कुछ हमारे देश की राजधानी दिल्ली के दिल यानी जंतर-मंतर पर हो रहा है !!!

दिल्ली के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री, गणमान्य नेताओं-सज्जनों, पुलिस, मीडिया, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और जनता के सामने एक निरीह जीवन से मायूस युवा किसान अपना गमछा बांध पेड़ से लटक जाता है, खुदकुशी कर लेता है और सब के सब तमाशबीन बने देखते रहते हैं. मीडियाकर्मी और उनके कैमरे उस वीभत्स नजारे को फिल्माने में व्यस्त रहते हैं, मुख्यमंत्री स्टेज पर खड़े होकर पुलिस से ‘बचा लो-बचा लो’ की गुहार लगाते रहते हैं, वहां मौजूद पुलिस के कुछ अफसर-जवान के चेहरों पर मुस्कान तैरती रहती है, पार्टी के कार्यकर्ता हो-हो करके चिल्लाते रहते हैं और बेचारा पेड़ पर चढ़ा किसान हताश और कातर निगाहों से उन सबको तकता रहता है. एक पल को उसने जरूर सोचा होगा कि कोई तो जल्दी से पेड़ पर चढ़ कर उसे रोकने आएगा, उसे मनाएगा, उसे डांटेगा. चलो कोई ऊपर नहीं आएगा तो नीचे से ही सही, कुछ लोग हाथ जोड़कर कहेंगे कि ऐसा मत करो, रुक जाओ….अभी सबकुछ खत्म नहीं हुआ है…

…लेकिन कोई नहीं आया. नीचे गर्द-गुबार के बीच इंसानों के जिस्म सरीखे रोबोट टहल रहे थे, जो सिर्फ अपने पूर्वनिर्धारित काम को अंजाम देना चाहते थे. ऐसी किसी अप्रत्याशित घटना के लिए वे रोबोट तैयार नहीं थे. पेड़ पर चढ़ा किसान जल्द ही ये बात समझ गया कि नीचे इंसानों की नहीं, रोटी-बोटी नोचकर खाने वाले होमोसेपियन्स की भीड़ लहलहा रही है, जिनके सामने उसके लहु का मोल उसका अनाज उपजाने वाली मिट्टी के बराबर भी नहीं. यही सब देखता और उधेड़बुन में पड़ा वो थका-हारा-मायूस किसान आखिरकार पेड़ से लटक गया. लेकिन इस दफा उसके गमछे और उसकी धरती मां के बीच काम कर रहा गुरुत्वाकर्षण बल ज्यादा मजबूत साबित हुआ. इधर उसने दम तोड़ा और उधर मीडिया से लेकर नेताओं का खुला खेल चालू हो गया.

पहले बात दूध से धुली मीडिया की. मुझे नहीं पता कि जिस पेड़ पर किसान जान देने के लिए चढ़ा था, उससे मीडियाकर्मी कितने दूर थे. लेकिन अगर वह जान देने की धमकी दे रहा था तो मेरा अंदाजा है कि मीडिया के कैमरे उसे कैप्चर करने की कोशिश में नजदीक जरूर गए होंगे. ऐसे में यह सोचकर दुख और पीड़ा होती है कि इतने सारे मीडियाकर्मियों में से कोई भी इंसानियत के नाते ही सही, उसे बचाने, उसे रोकने आगे नहीं आया.

टीवी पर जो तस्वीरें देख रहा था, उनमें राममनोहर लोहिया अस्पताल के बाहर एबीपी न्यूज का कोई पराशर नामक नया-नवेला संवाददाता लोगों से बात कर रहा था कि गजेंद्र नामक उस किसान की हालत अभी कैसी है. वहां मौजूद लोगों में से शायद एक किसान का जानने वाला था. उसने रुआंसा होकर कहना शुरु किया कि साहब, वो मर गया है. इसके लिए दिल्ली की मीडिया, दिल्ली के नेता और दिल्ली की पुलिस को हम जिम्मेदार मानते हैं. कोई उसे बचाने नहीं आया…..इससे आगे वह कुछ बोल पाता लेकिन तेजतर्रार और मोटी चमड़ी का वह रिपोर्टर तुरंत वहां से अपनी गनमाइक हटा लेता है, उसे दूर कर देता है, माइक अपने थोेबड़े के अपने नथुने के सामने ले आता है और फिर ज्ञान देते लगता है…देखिए, यहां किसान को भर्ती कराया गया है, उसकी हालत नाजुक है. वह बड़ी सफाई से ये छुपाने की कोशिश करता है कि वहां मौजूद लोग नेता और पुलिस के साथ-साथ मीडिया को भी गाली दे रहे हैं. उसको लानत भेज रहे हैं. कैमरे पर सब दिख जाता है लेकिन चालाक रिपोर्टर बड़ी धूर्तता से कहानी का एंगल चेंज करता हैं. वह और उसका चैनल सिर्फ यही सवाल पूछता रहता है कि खुदकुशी के बाद भी केजरीवाल ने रैली क्यों जारी रखी. इस बात का जवाब वे नहीं देना चाहते कि मीडिया वालों में से कोई उस गरीब किसान को बचाने आगे क्यों नहीं आया??!!!

अब बात जरा राजनेताओं की. किसान की खुदकुशी के बाद करीब डेढ़ घंटे तक अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी की रैली चलती रही. अरविंद, मनीष, विश्वास, सबने भाषण दिया. मोदी पर जुबानी हमले हुए. और जब -गुप्तचरों- ने ये बताया कि किसान मर चुका है (ऐसा मेरा अंदाजा है) तभी केजरीवाल एंड कम्पनी उसे देखने की रस्मअदायगी करने अस्पताल पहुंचे.
लेकिन यह क्या!! कांग्रेस नेता और राहुल गांधी के हनुमान, अजय माकन तो केजरीवाल से भी पहले किसान को देखने अस्पताल पहुंच चुके हैं. कह रहे हैं कि राजनीति नहीं करनी मुझे, बहुत दुखी हूं लेकिन कर वही सब रहे हैं, जो राजनीति को शोभा देता है. कुछ ही देर में आकाधिराज राहुल गांधी भी अप्रताशित रूप से किसान को देखने अस्पताल पहुंच जाते हैं. मीडिया से बात करते हैं, बोलने को उनके पास कुछ नहीं है, लड़खड़ाते हैं और फिर संभलकर बहुत ही बचकानी बात कह जाते हैं. किसान की लाश पर राजनीति करने की कोशिश करते राहुल गांधी कहते हैं कि कांग्रेस और इसका कार्यकर्ता हरसंभव मदद करेगा मृतक की. जरूरत पड़ी तो हम लाश को पहुंचाने का भी बंदोबस्त कर देंगे.

जरा सोचिए. देश का भावी सरताज इसी बात से गदगद हुआ जा रहा है कि लाश को उसके घरवालों तक पहुंचवा देंगे. कितना महान और धार्मिक कार्य किया आपने राहुल गांधी जी. मुझे इंतजार रहेगा कि आप देश के प्रधानमंत्री कब बनते हैं !! लगता है कि इस देश की अभी और दुर्दशा होनी बाकी है !!! उधर सचिन पायलट भी कैमरे के सामने किसान की मौत पर दुख जताने लगते हैं. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह मामले की जांच के आदेश दे देते हैं. अभी और नेताओं के बयान आने हैं, आ रहे होंगे. और सब के सब वही करेंगे. किसान की लाश पर राजनीति.

तीसरी और आखिरी बात दिल्ली पुलिस की. उसके बारे में क्या कहना. मुशी प्रेमचंद ने तो बरसों पहले लिख दिया था—नमक का दारोगा- . यानी ये जो खाकी वर्दी है, वह आपको इस संप्रभु गणराज्य में शरीर पर सितारे लगाकर बिना जवाबदेही के बहुत कुछ करने की आजादी देता है. कानून के रखवालों के सामने कानून का बलात्कार हुआ और वे मूकदर्शक बने देखते रहे. अब मंत्री जी जांच कराएंगे तो पता चलेगा कि कहां और किसने गलती की!! मतलब विभाग के कबाड़खाने की शोभा बढ़ाने एक और फाइल जाएगी. जांच चलती रहेगी, तब तक मामला ठंडा हो जाएगा. फिर कौन पूछता है कि कब-क्या हुआ??!! चलने दीजिए, ये देश ऐसे ही चलता है.

फिलहाल तो पीपली लाइव के इस असली खूनी खेल में मीडिया के दोनों हाथ में लड़डू हैं और सिर कड़ाही में. आज रात देखिएगा, कैसे-कैसे शो बनेंगे. मोदी भक्त टीवी चैनल किसान की खुदकुशी के बहाने अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी पर सवाल उठाएंगे कि बताइए, वहां किसान मर रहा था और ये हैं कि रैली चला रहे थे.!!! उन्हें किसी के जान की परवाह नहीं थी…वगैरह-वगैरह.

ऐसे कूढ़मगजों, हड़़ी चाटने वालों और अक्ल के दुश्मन मीडिया वालों से मेरा भी एक सवाल रहेगा. याद कीजिए लोकसभा चुनाव से पहले बिहार के गांधी मैदान में बीजेपी की एक विशाल रैली थी. तभी वहां बम धमाके होते हैं. रैली में भगदड़ मच जाती है. टीवी पर बम धमाके के दृश्य दिखाए जा रहे हैं. किसी को नहीं मालूम कि किस पल और कहां अगला धमाका हो सकता है. हजारों-लाखों लोगों की जान को खतरा है लेकिन अलग चाल-चरित्र और चेहरे का दावा करने वाली पार्टी बीजेपी और इसके नेता रैली में आए लोगों की जान की परवाह किए बिना रैली को जारी रखते हैं. अरविंद केजरीवाल की ही तरह वे भी रैली खत्म करके, भाषणबाजी पूरी करके ही दम लेते हैं. उस रैली को बीजेपी के नरेंद्र मोदी सम्बोधित करते हैं और संवेदनहीनता की हद तो ये हो जाती है कि बम धमाकों के बाद अपने भाषण में वे इन धमाकों के जिक्र भी नहीं करते !! बाद में पूछने पर बीजेपी के नेता ये कुतर्क देते हैं कि बम धमाके हों या कुछ भी हो जाए, हम आतंकवाद के सामने नहीं झुकेंगे. अरे भैया, आतंकवाद के सामने मत झुकिए लेकिन अपनी रैली को सफल बनाने के लिए हजारों मासूमों की जान को बम धमाकों के हवाले तो मत कीजिए.

मुझे याद है. तब किसी मीडिया चैनल ने बीजेपी और उसके नेताओं पर ये सवाल नहीं उठाया कि बम धमाकों के बीच उन्होंने अपनी रैली क्यो जारी रखी??!! आज जो सवाल उठा रहे हैं कि किसान की जान से बढ़कर रैली थी, वो उस वक्त क्यों चुप थे??!! इसका कोई जवाब है उनके पास???

मित्तरों-दोस्तों !!! मतलब साफ है. किसान की खुदकुशी और मौत तो बस बहाना है. मीडिया हो, राजनेता हो या फिर प्रशासन. सबके अपने-अपने एजेंडे हैं, अपने-अपने स्वार्थ हैं और अपना-अपना खेमा है. सो सब के सब उसी के मुताबिक बर्ताव कर रहे हैं. और करते रहेंगे. किसानों की फिक्र किसे हैं.?? ईमानदारी से कहूं तो किसी को नहीं.

लेकिन एक बात जान लीजिएगा शासकों !!! जिस भी दिन जनता के सब्र का बांध टूटा तो वह सबको सड़क पर लाकर अपना हिसाब बराबर कर लेगी. इतिहास उठाकर देखने की जरूरत नहीं है, नजर घुमाकर देख लीजिए कि दुनिया के किन-किन देशों में सताई जनता ने क्या-क्या किया.

खबर का ये लिंक प्रधानसेवक, बीजेपी के अंधभक्तों और मीडिया के उस धड़े के लिए जो selective होकर सवाल उठाते हैं. देखिए, पढ़िए और जानिए कि जब पटना के गांधी मैदान में तत्कालीन गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी की रैली थी, वहां धमाके हुए तब बीजेपी और नरेंद्र भाई मोदी ने क्या किया. किस तरह सबकुछ ताक पर रखके उन्होंने रैली जारी रखी. http://www.theguardian.com/world/2013/oct/27/india-bomb-blasts-bjp-rally-patna

लेखक नदीम एस. अख्तर युवा और तेज-तर्रार पत्रकार हैं. इन दिनों आईआईएमसी में अध्यापन कार्य से जुड़े हैं.


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‘आप’ की प्री-प्लांड स्क्रिप्ट थी गजेंद्र का पेड़ पर चढ़ना और फंदे से लटकना!

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हिंदी टीवी न्यूज के मसखरेपन के लिए क्या वाकई उदय शंकर, रजत शर्मा और कमर वहीद नकवी जिम्मेदार हैं?

Nadim S. Akhter : दो बातें कहनी हैं. एक तो दिलीप मंडल जी ने हिंदी टीवी न्यूज के -मसखरेपन- के लिए उदयशंकरजी, रजत शर्मा जी और कमर वहीद नकवी जी को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर जिम्मेदार ठहराया है. उनके मन की बात पढ़कर उसका लम्बा-चौड़ा जवाब लिख मारा, लेकिन फिर पुरानी गलती दोहरा गया. सब कुछ ऑनलाइन फेसबुक वॉल पे ही लिख रहा था. अचानक से मेरा कम्प्यूटर बंद हुआ और सब गायब. फिर दुबारा लिखने का मूड सुबह से अब तक नहीं बना. सो हिंदी टीवी न्यूज की गंभीरता को खत्म करने वाली दिलीप जी की बात पर मेरा जवाब फिर कभी.

 

दूसरी बात. टाइम्स नाऊ के न्यूज आवर डिबेट में अर्नब गोस्वामी ने बहस के लिए जिस विषय को चुना, उस पर कुछ बोलना चाहता था, सुबह-सुबह. काम में उलझ गया और फिर लिख नहीं पाया. अभी देखता हूं कि कुछ वेबसाइट्स पर इससे सम्बंधी टिप्पणी प्रकाशित हुई है. मेरे एक मित्र ने तो ये तक कहा है (जाहिर है नीचे मेरी वॉल पे) कि मैं अर्नब का फैन हूं. तो मित्रों ! बात यहां अर्नब के फैन या एसी होने का नहीं है. अगर वे गलत करेंगे (मेरी-आपकी समझ के अनुसार) तो निंदा के भी पात्र होंगे. जैसे कल अर्नब ने अपने डिबेट में भारत की हार का जो विषय चुना, वह पूरी तरह हास्यास्पद था. पहली बार मैंने देखा कि अर्नब के पास बोलने के लिए कुछ नहीं था. वो गालथेथरी कर रहे थे और स्टूडियो में बैठे पैनालिस्ट, अरबाज खान व अतुल वासन, जमकर अर्नब का विरोध कर रहे थे. अर्नब कह रहे थे कि फलां बॉलर को पहले क्यों नहीं लाया, टीम के पास कोई स्ट्रैटेजी नहीं थी, यह शर्मनाक हार थी,..वगैरह-वगैरह.

लेकिन अर्नब क्या बताएंगे कि धोनी के पास कोई स्ट्रैटेजी थी या नहीं थी, ये उन्हें मुंबई के स्टूडियो मैं बैठकर कैसे पता?? और फील्ड में जब कप्तान कोई डिसीजन लेता है, किसी बैॉलर-फील्डर को लगाता है तो उस वक्त उसके दिमाग में एक स्ट्रैटेजी चल रही होती है, उसी के तहत ये सब होता है ना. तो अगर इसी स्ट्रैटेजी के तहत अगर कल टीम इंडिया जीत जाती तब तो अर्नब गोस्वामी और पूरा मीडिया धोनी की तारीफों के पुल बांध देते. और जब हार गए तो पचास इल्जाम. कुल मिलाकर कहूं तो टाइम्स नाऊ के इतिहास में कल पहली बार मुझे अर्नब गोस्वामी और बहस के लिए उनके चुने गए विषय पर तरस आया. कई बार तो अर्नब बगलें झांकते भी नजर आए और एक बार तो वो अपनी बगल में बैठे बहस करते अरबाज खान का हाथ तक पकड़ने लगे. कल तो अर्नब ने हद ही कर दी. ज्यादातर मौकों पर गंभीर विषय चुनने वाले अर्नब गोस्वामी को ये सब करते देख कल अच्छा नहीं लगा.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर ने उपरोक्त पोस्ट दिलीप मंडल के इस स्टेटस के जवाब में लिखा है….

Dilip C Mandal : अरनब गोस्वामी ने अगर इंग्लिश TV न्यूज की हत्या की, जैसा कि Outlook वाले कहते हैं, तो हिंदी TV न्यूज चैनलों की उससे भी बुरी मौत के लिए कौन जिम्मेदार है? या फिर यह आत्महत्या का मामला है, जिसके लिए कोई दोषी नहीं है. आखिर किन की लीडरशिप में हिंदी TV न्यूज चैनलों ने मसखरा-युग में प्रवेश किया? जोकर क्यों बन गए पत्रकार… नागिन ने नाग की हत्या का बदला क्यों लिया… TV न्यूज को पीपली लाइव किसने बनाया? हिंदी NEWS चैनलों का डायन-तांत्रिक-मसखरा युग और उसके नायक या खलनायक…  न्यूज का एंटरटेनमेंट हो जाना ग्लोबल मामला है, लेकिन हिंदी न्यूज चैनलों में यह कुछ ज्यादा ही भोंडे तरीके से हुआ. न्यूज बुलेटिन में नागिन ने नाग की हत्या का बदला लिया, स्वर्ग को सीढ़ी तन गई, सबसे महंगी वैश्या की ऑन स्क्रीन खोज हुआ, बिना ड्राइवर के कार चली. मत पूछिए कि क्या क्या न हुआ. और जब ढलान पर चल ही पड़े तो फिर कितना गिरे और किस गटर में गिरे, इसकी किसे परवाह रही.

हिंदी न्यूज चैनलों को पीपली लाइव और हिदी के टीवी पत्रकारों को जोकर बनाने वाले दौर के तीन लीडर हैं. ये तीन नाम हैं – उदय शंकर, क़मर वहीद नकवी और रजत शर्मा. इस दौर पर मैं कभी डिटेल पेपर लिखूंगा. बाकी लोगों को भी लिखना चाहिए क्योंकि बात बिगड़ गई और बिगाड़ने वाला कोई नहीं हो, ऐसा कैसे हो सकता है. इनसे मेरा कोई निजी पंगा नहीं है. इनमें से दो लोग तो किसी दौर में मेरे बॉस रहे हैं. मुझे नौकरी दी है. उनके क्राफ्ट और कौशल पर भी किसी को शक नहीं होना चाहिए. मामला नीयत का भी नहीं है.

और जो एंकर-रिपोर्टर टाइप लोग स्क्रीन पर तमाशा करते नजर आते हैं, और इस वजह से अक्सर आलोचना के निशाने पर होते हैं, उनकी इतनी हैसियत नहीं थी कि मैं उन्हें दोषी ठहराऊं. लेकिन इसमें क्या शक है कि इनके समय से चैनल जिस तरह से चलने लगे, उसकी वजह से आज की तारीख में हिंदी के टीवी पत्रकारों और चैनलों के नाम पर पान दुकानों और हेयर कटिंग सलून में चुटकुले चलते हैं. पत्रकारों का नाम आते ही बच्चे हंसने लगते हैं. इन चैनलों ने मसखरेपन की दर्शकों को ऐसी लत लगा दी कि आखिर में न्यूज चैनलों पर आधे-आधे घंटे के लाफ्टर चैलेंज शो चलने लगे.

होने को तो ये न भी होते और कोई और होता, तो भी शायद यही हो रहा होता, लेकिन जिस कालखंड में हिंदी टीवी चैनलों का “मसखरा युग” शुरू हुआ तब 3 सबसे महत्वपूर्ण प्लेफॉर्म की लीडरशिप इनके ही हाथ में थी. कहना मुश्किल है कि इसमें इनका निजी दोष कितना है, लेकिन अच्छा होता है तो नेता श्रेय ले जाता है, तो बुरा होने का ठीकरा किसके सिर फूटे? इन्होंने अगर नहीं भी किया, तो अपने नेतृत्व में होने जरूर दिया.

एस पी सिंह ने गणेश को दूध पिलाने की खबर का मजाक उड़ाकर और जूता रिपेयर करने वाले तिपाए को दूध पिलाकर भारतीय टीवी न्यूज इतिहास के सबसे यादगार क्षण को जीने का जज्बा दिखाया था. सिखाया कि अंधविश्वास के खंडन की भी TRP हो सकती है. लेकिन मसखरा युग में अंधविश्वास फैलाकर TRP लेने की कोई भी कोशिश छोड़ी नहीं गई. टीवी पर इंग्लिश न्यूज में भी तमाशा कम नहीं है. लेकिन वह तमाशा आम तौर पर समाचारों के इर्द गिर्द है. हिंदी न्यूज में तमाशा महत्वपूर्ण है. खबर की जरूरत नहीं है. न्यूज चैनल कई बार लंबे समय न्यूज के बगैर चले और चलाए गए. किसी ने तो यह सब किया है.

उदय शंकर, क़मर वहीद नकवी और रजत शर्मा ही क्यों? हिंदी न्यूज चैनलों के मसखरा युग में प्रवेश के तीन नायकों की मेरी इस शिनाख्त से कुछ लोग खफा है, तो कुछ पूछ रहे हैं कि यही तीन क्यों? दीपक चौरसिया, आशुतोष, विनोद कापड़ी जैसे लोग भी क्यों नहीं. जिनकी भावनाएं आहत हुई हैं मेरा स्टेटस पढ़कर, उनके लिए मुझे कुछ नहीं कहना. उनसे निवेदन है कि कमेंट बॉक्स में जाकर मेरा स्टेटस फिर से पढ़ लें. और जो जानना चाहते हैं कि “उदय शंकर, कमर वहीद नकवी और रजत शर्मा ही क्यों” उन्हें शायद मालूम नहीं कि हिंदी के न्यूज चेनलों ने जब “नागिन का बदला युग” या “महंगी वेश्या की खोज युग” में प्रवेश किया तो ये तीन लोग देश के सबसे लोकप्रिय तीन चैनलों के लीडर थे. TRP लाने की मजबूरी थी. सही बात है. लोग न देखें, तो चैनल क्यों चलाना.

लेकिन TRP लाने के लिए उन्होंने जो रास्ता चुना, उसकी वजह से आज एक बच्चा भी टीवी पत्रकारों को जोकर और मदारी के रूप में देख कर हंसता है. दीपक चौरसिया, आशुतोष, विनोद कापड़ी जैसे लोग इसलिए नहीं क्योंकि वे स्क्रीन पर जरूर रहे लेकिन उस दौर में इनकी इतनी हैसियत नहीं थी कि कटेंट को निर्णायक रूप से प्रभावित करें.

वे खुद अंधविश्वासी नहीं हैं, लेकिन आपको या आपमें से ज्यादातर को अंधविश्वासी मानते हैं!! उदय शंकर, क़मर वहीद नकवी और रजत शर्मा ने एक खास कालखंड में हिंदी टेलीविजन समाचार उद्योग को अंधविश्वास और मसखरा युग में पहुंचा दिया, लेकिन ये तीनों खुद आधुनिक विचारों के मॉडर्न लोग हैं. इसलिए समस्या इनकी निजी विचारधारा को लेकर नहीं है. बल्कि TRP पाने के लिए बनी उनकी इस सोच को लेकर है कि हिंदी चैनलों का दर्शक मूर्ख और अंधविश्वासी होता है.

इसे मनोरंजन उद्योग की भाषा में “Lowest common denominator” कहते हैं. इसकी परिभाषा यह है- the large number of people in society who will accept low-quality products and entertainment या appealing to as many people at once as possible. लेकिन इसका नतीजा यह भी हुआ कि आज एक बच्चा भी टीवी पत्रकारों को जोकर और मदारी के रूप में देख कर हंसता है.

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आउटलुक वालों ने टाइम्स नाऊ वाले अर्नब गोस्वामी को विलेन बना दिया…

Arnab Goswami होने का मतलब… आउटलुक वालों ने टाइम्स नाऊ वाले अर्नब गोस्वामी को विलेन बना दिया. घोषणा कर दी कि अर्णब ने भारत में टीवी न्यूज की -हत्या- कर दी. ठीक है, मान लेते हैं कि आउटलुक वाले बहुत समझदार हो गए हैं (विनोद मेहता के जाने के बाद) और मैगजीन निकालते-निकालते अब उन्हें टीवी न्यूज की भी अच्छी खासी समझ हो गई है. हो सकता है कि इसके एडिटर साब ने टीवी न्यूज इंडस्ट्री में खबरों की महत्ता-गुणवत्ता पर कोई पीएचडी भी लिख डाली हो और कोई बड़ा सर्वे भी कराया हो (शायद सपने में).

लेकिन एक झटके में ये घोषणा कर देना और फैसला दे देना कि अर्णब ने टीवी न्यूज को मार दिया है, आउटलुक वालों की नासमझी और अल्पज्ञान को ही दर्शाता है. जाकर जनता से पूछिए ना कि अर्णब होने का मतलब क्या है. क्यों कम अंग्रेजी समझने वाले या खांटी हिंदी के लोग भी हर रात Times Now पर अर्नब का शो News Hour Debate देखते हैं? क्यों अंग्रेजी के सारे बड़े चैनल अर्नब के शो के आगे पिट रहे हैं. ऐसी क्या बात है अर्नब में जो औरों में नहीं!!! अंग्रेजी के दूसरे एंकर भी तो बहस करते-कराते हैं, फिर उन्हें अर्नब जैसे दर्शक क्यों नहीं मिल रहे???!!

मतलब साफ है. आप अर्नब को बहस करते देखिए, मुद्दे उठाते देखिए. वे दिल से बोलते हैं, दिल से बहस करते-कराते हैं. उनका और उनकी टीम का होमवर्क गजब का होता है और उनके शो में शामिल कोई भी पैनलिस्ट झूठे आंकड़े बताकर बच नहीं सकता. अर्नब की खासियत है कि वे बहस के विषय पर पूरी तैयारी करके बैठते हैं और किसी को भी अपने शो में -अनर्गल प्रलाप- नहीं करने देते. आप उन पर इल्जाम लगा सकते हैं कि वे Rude हैं, जज की तरह व्यवहार करते हैं, अपने आगे किसी को बोलने नहीं देते आदि-आदि. मैंने भी ऐसा करते कई दफा अर्नब को देखा है कि वो पैनलिस्ट्स पर हावी हो जाते हैं लेकिन इसमें एक पेंच है. ज्यादातर मामलों में मेरा observation ये रहा है कि जब पैनलिस्ट मुद्दे को भटका रहा होता है या फिर गलतबयानी कर रहा होता है तो अर्नब उनको सार्वजनिक रूप से खूब जलील करते हैं. अपनी और अपने टीम की जबरदस्त रिसर्च की बदौलत उसी वक्त उनको आइना दिखा देते हैं और फिर उसकी पूरी खबर लेते हैं. ऐसे वक्त और माहौल में पैनलिस्ट बार-बार यही कहता दिखता है कि Mr. Arnab Goswami, You are not allowing me to speak. Can you please calm down and give me two minutes to prove my point…आदि-आदि.

देखिए, टीवी विजुअल मीडियम है और यहां स्क्रीन पर दिख रहे एंकर-गेस्ट पैनलिस्ट्स के हाव-भाव भी दर्शकों से जबरदस्त संवाद करते हैं. अगर एंकर चुटीले अंदाज में मुस्कुराकर कोई सवाल पूछता है तो उसका मतलब भी फौरन दर्शक समझ जाते हैं. और अगर पैनलिस्ट जवाब देते-देते पानी का ग्लास उठा लेता है, हाथ बांध लेता है या उसके चेहरे पर गुस्से के भाव आते हैं, तो इसका संदेश भी स्क्रीन के जरिए दर्शकों तक फौरन पहुंचता है.

कुछ ऐसे चेहरे हैं, जिन्हें मैं व्यक्तिगत तौर पर टीवी के स्क्रीन पर पसंद करता हूं, उनके खास शो के लिए. मसलन आज तक चैनल पर जब प्रभु चावला -सीधी बात- कार्यक्रम लेकर आते थे, तो हंसते-मुस्कुराते प्रभु के सवाल और उनका अंदाज गेस्ट को कई दफा असहज कर जाता था. प्रभु के जाने के बाद राहुल कंवल ने जिस तरह इस प्रोग्राम को संभाला, मेरी नजर में वो भी काबिलेतारीफ है. राहुल का बेबाक और बेखौफ अंदाज अलग समा बांधता है और गेस्ट को जल्दी संभलने का मौका नहीं देता. इसी तरह इंडिया टीवी के बहुचर्चित शो -आप की अदालत- में रजत शर्मा का भी कोई जवाब नहीं. रजत शर्मा का अंदाज, उनकी Body language, कभी उनके सवालों की गंभीरता, कभी चुटीला स्वरूप मुझे खूब भाता है. रजत शर्मा का अपना स्टाइल है और उनकी मौजूदगी ही पूरे शो को वजनी बना देता है, बेहद वजनी.

ये कुछ नाम हैं, जो अभी मेरे दिमाग में आ रहे हैं, सो उनका जिक्र किया. कल अगर आप ये कहने लगें कि रजत शर्मा या राहुल कंवल या प्रभु चावला बेकार एंकर हैं, इन्हें कुछ नहीं आता, ये टीवी पर शोशेबाजी करते हैं, बहस-सवाल के नाम पर हल्ला करते हैं तो आप की इस व्यक्तिगत राय को कौन मानेगा?? भाई, अपना ज्ञान अपने पास रखिए ना. उसे क्यों अपने अखबार या मैगजीन या फिर अपने मीडिया-संचार माध्यम के कंधे पर टांगकर पब्लिक के बीच एक ठूंसा हुआ ओपिनियन पेश कर रहे हैं??!! क्यों अपनी खिल्ली उड़वाने पर तुले हुए हैं. आप भी पत्रकार और वे भी पत्रकार. हो सकता है कि आप, उनसे ज्यादा बड़े और महान पत्रकार हों लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सामने वाले पत्रकार पर आप खबरों की हत्या का सीधा आरोप लगा दें. कमी हर इंसान-पत्रकार मे होती है, सामने वाले में भी हो सकती है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप सामने वाले के खोखला और विचारशून्य होने का फैसला सुना दें.

अर्नब गोस्वामी ने भारत की टीवी इंडस्ट्री में जो किया है और जो कर रहे हैं, उसकी मैं इज्जत करता हूं. कमियां उनमें भी हो सकती हैं लेकिन आप उन्हें -खबरों का हत्यारा- बोलकर खारिज नहीं कर सकते. अगर ऐसा कर रहे हैं तो कमी अर्नब में नहीं, आप में है. जरा आत्मावलोकन कर लीजिए. कहीं आप राग-द्वेष-ईर्ष्या-दुनियादारी से प्रेरित होकर काम तो नहीं कर रहे??!! अगर हां, तो खुद को ठीक कर लीजिए. अगर नहीं तो अपने आंकलन को व्यक्तिगत रखिए, उसे खबर-स्टोरी की शक्ल मत दीजिए. For God sake, you know !!!

फिलहाल तो आप अर्नब के ये वीडियो देखिए जिसमें उन्होंने पत्रकार से नेता बने आशुतोष गुप्ता के बारे में सार्वजनिक रूप से अपनी राय व्यक्त की है. एक छात्र के सवाल के जवाब में अर्नब ने जिस बेबाकी से जवाब दिया है, वो देखने वाली चीज है.

https://www.youtube.com/watch?v=TlzkGrvqNv0

युवा और तेज-तर्रार पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से. नदीम कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.


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JFA decries Outlook terming it bias

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तो इसीलिए शशि थरूर ने मोदी का झाड़ू उठा लिया और बीजेपी को सपोर्ट करना शुरू कर दिया था!

Nadim S. Akhter ; बेहद अफसोसनाक, दुखद… शब्द नहीं हैं मेरे पास. दिल्ली पुलिस के अनुसार, कांग्रेस नेता शशि थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर का मर्डर किया गया था. शक की पूरी की पूरी सुई किसकी तरफ है, ये बताने की जरूरत नहीं. खासकर तब, जब नलिनी सिंह जैसी वरिष्ठ पत्रकार और सुनंदा की करीबी दोस्त ये कह चुकी हैं कि मौत से एक रात पहले सुनंदा बहुत परेशान थीं. वह बहुत रो रही थीं. शायद मेहर तराड़ से शशि थरूर की नजदीकियों को लेकर बेहद भावुक और अपसेट थीं.

एक-दो दिन पहले ही मैं शशि थरूर के ट्वीट पर लिखना चाह रहा था लेकिन फिर रूक गया. कारण ये था कि साइंस कांग्रेस में कही गई बेतुकी और बेसिरपैर की बातों का शशि थरूर ट्वीट करके समर्थन कर रहे थे. शायद ऐसा कर वे बीजेपी से अपनी नजदीकी दिखाना चाह रहे थे. इससे पहले वे झाड़ू उठाकर (कांग्रेसी होने के बावजूद) नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान का परचम भी लहरा चुके थे. गाहे-बगाहे पीएम नरेंद्र मोदी की तारीफ भी करते रहते थे, जो नॉर्मल नहीं था. तब ये लग रहा था कि क्या वाकई थरूर किसी मुसीबत में हैं, जो केंद्र से कांग्रेस की सरकार की विदाई के बाद बीजेपी से नजदीकियां बढ़ाने की जुगत में हैं??!!

थरूर काफी पढ़े-लिखे और समझदार नेता हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव पद का चुनाव लड़ चुके हैं और ऐसे में अचानक से कांग्रेस अालाकमान को नाराज कर बीजेपी की तरफ उनके झुकाव से मैं खुद हैरान था. लग रहा था कि कुछ तो है, जो थरूर पासे फेंक रहे हैं. और आज दिल्ली पुलिस की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने ये बता दिया कि दाल में बहुत कुछ काला है. थरूर की पत्नी सुनंदा पुष्कर को जहर देकर मारा गया था. उनकी मौत ना तो नेचुरल थी और ना ही उन्होंने कोई आत्महत्या की थी.

अब ये तो पुलिस पता लगाएगी कि हत्या किसने और क्यों करवाई लेकिन शक की पहली सुई किसकी तरफ घूम रही है, आप अंदाजा लगा सकते हैं. सुनंदा पुष्कर के लिए मन दुखी है. बहुत दुखी. आखिर दुनिया में प्यार का बदला प्यार से क्यों नहीं मिलता ??!!!

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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50 से ज्यादा मासूमों-गरीबों के हत्यारे ये बोडो वाले ‘आतंकवादी’ ना होकर ‘उग्रवादी’ बने रहते हैं!

Nadim S. Akhter : सिर्फ पाकिस्तान, कश्मीर, अमेरिका और मुंबई जैसी जगहों पर लोगों के मरने पर इस देश के लोगों का खून खौलता है. बाकी टाइम देश में शांति छाई रहती है. अमन-चैन कायम रहता है. मीडिया-सरकार-सोशल मीडिया, हर जगह. कोई शर्मिंदिगी नहीं जताता, कोई अफसोस नहीं करता, कोई कविता नहीं लिखता, कोई मोमबत्ती की फोटुक नहीं लगाता, कोई अपनी जातीय-मजहबी पहचान को लेकर पश्चाताप-संताप नहीं करता.

कोई बदला लेने की बात नहीं बोलता, कोई किसी को नीचा दिखाने का भाषा का इजाद नहीं करता, कोई एंकर या रिपोर्टर सुपर-चार्ज नहीं होता, किसी सम्पादक का खून नहीं खौलता, किसी की आंख का पानी नहीं मरता, कोई मातम नहीं मनाता, कोई 2 मिनट का मौन नहीं रखता, कोई अतिउत्साही फेसबुकीय-ट्विटरीय प्राणी अपना मौन व्रत नहीं तोड़ता और कोई अपनी मर चुकी भावनाओं-एहसास को अल्फाज नहीं देता….. सब के सब मौन हैं. घुप सन्नाटा…गहरा सन्नाटा…कुछ भारत रत्न के अलंकरण के प्रकाशोत्सव में नहाए हुए और कुछ अपने डेली रूटीन में बिजी. रगों में दौड़ते रहने के ना थे जी तुम कायल, अब असम को देख तुम्हारी आंख से जो ना टपका, फिर वो लहु क्या है…?

नवभारत टाइम्स के वेब संस्करण की हेडलाइन है- ”बोडो उग्रवादियों ने असम में 50 लोगों की हत्या की.” अब 50 से ज्यादा मासूमों-गरीबों को अंधाधुंध गोलियों से छलनी करने के बाद भी अगर ये बोडो वाले –आतंकवादी— ना होकर —उग्रवादी— बने रहते हैं तो भारत के लोगों और भारत की मीडिया, आपकी मर्जी.

वक्त आ गया है कि -उग्रवादी- -चरमपंथी- जैसे शब्दों का त्याग करके आप सीधे -आतंकवादी- शब्द का इस्तेमाल शुरु करें. और हे भारत के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जी, इस बार तो दुश्मन-कातिल सरहद पार से नहीं आए हैं. आपके अपने ही देश में छिपे-घुसे बैठे हैं. ढूंढकर क्यों नहीं निकालते उनको? अब कौन सा बहाना है आपके पास??!!!

आप अमेरिका और इस्राइल की तारीफ करते नहीं थकते. अगर वहां देश में रह रहे ऐसे आतंकवादियों ने 50 मासूमों की जान ले ली होती तो क्या अमेरिका या इस्राइल जैसा देश खामोश रहता. ओसामा बिन लादेन को उन्होंने हजारों किमी दूर दूसरे देश पाकिस्तान में ढूंढकर और घुसकर मारा. और आप लोग क्या कर रहे हैं??!!!

शोले के वीरू की भाषा में कहूं तो एक-एक को चुन-चुनकर मारता. जरूर मारता. लेकिन आप तो अपने घर में बैठे इन आतंकवादियों को ना तो मार सकते हैं और ना पकड़ सकते हैं. और रही मीडिया की बात. तो अभी वह अपने शैशवकाल में है. बेचारे -अक्ल के धनी- अभी यही फैसला नहीं कर पा रहे हैं कि ये चरमपंथी हैं, उग्रवादी हैं या फिर आतंकवादी ??!!! हम भारत के लोग इस मानवीय त्रासदी को जब सही-सही लिख भी नहीं पा रहें हैं तो बोलेंगे क्या और करेंगे क्या ???!!!

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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आपके एक और भारत रत्न हैं, जिनके पास संसद के लिए नहीं, लेकिन फेरारी कार की रेस के लिए वक्त होता है!

Nadim S. Akhter : कांग्रेस बीजेपी लेफ्ट राइट समाजवाद जनतावाद आमवाद और सारे वाद वाली पार्टियों ! जिस तरह भगवान, इंसान के चढ़ावे का मोहताज नहीं, आपके शिरनी-लड्डू-सोने के आभूषण-हलवे और फलों के प्रसाद का इच्छुक नहीं, उन्हें इसकी चाह नहीं-परवाह नहीं, ठीक उसी तरह… हमारे देश की महान विभूतियां तुम्हारे यानी राजसत्ता (जब तुम लोग इस पर काबिज होते हो) द्वारा प्रदत्त सम्मानों-पुरस्कारों-अलंकरणों की भूखी नहीं, उन्हें इसकी दरकार नहीं, जरूरत नहीं. वे जनता के दिल में हैं. वे देश के इतिहास में हैं. इतिहास लिखा जाएगा, फिर मिटा दिया जाएगा. फिर लिखा जाएगा और फिर बदल दिया जाएगा. फिर लिखा जाएगा और फिर ऐसी ही कोई कोशिश होगी…

लेकिन… वक्त इतिहास के कुछ पन्ने अपनी कांख में दबाकर छुपा लेता है. उसे कोई नहीं बदल पाता. आने वाली नस्ल फिर पीछे नजर डालती है. कुछ पुराने पन्ने खंगालती है, कुछ टुकड़ों को समेटती है और फिर पूरा अध्याय लिख देती है. दूध का दूध और पानी का पानी, कर देती है. वह अपने नायकों और खलनायकों को पहचान जाती है. सबका बराबर आंकलन करती है और फिर खुद से पूछती है कि आज हम जहां खड़े हैं, वहां तक हमें लाने में इनमें से कौन-कौन साधुवाद के लायक हैं और कौन-कौन ऐसे हैं, जिनसे हमारी वर्तमान पीढ़ी आज भी सबक लेकर भविष्य में ऐसी गलती नहीं दोहराने की कसम खा सकती है.

सो आतुर ना हों भारत भाग्य विधाता के राजनीतिक कर्णधारों ! सड़क-शहर-संस्थान वहीं हैं, सिर्फ उनके नाम बदल जाते हैं, जब आप में से हर एक बारी-बारी से सत्ता में आते हैं. हां, कुछ अलंकरणों-सम्मानों-पुरस्कारों के नाम आप नहीं बदल पा रहे….ठंड रखिए. वो भी जल्द ही आप कर लेंगे. अपनी पार्टी के -भीष्म पितामहों- के नाम पर जल्द ही उनका भी नामकरण करने का रास्ता तो आप लोग जरूर ही तलाश रहे होंगे. एक खबर पढ़ी थी कि सेना के जिस बहादुर सैनिक को देश ने परमवीर चक्र दिया था, अपनी गुरबत और गरीबी से परेशान होकर उसी मेडल को बेचकर वह अपने परिवार का पेट भरना चाहता था.

जिस शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को आपने भारत रत्न से नवाजा था, वह अपनी जिंदगी में एक-एक रुपये को तरसता रहा और चिंता करता रहा कि उनके परिवार का पेट कैसे भरेगा ??!! सरकार ने पद्म सम्मानों से लेकर भारत रत्न तक, सब कुछ उनको दे दिया लेकिन वो इज्जत नहीं दे पाई, जिसका भारत का एक आम नागरिक अधिकारी होता है. उस भारत रत्न ने एक दफा कहा था कि मुझे सरकार ने इंडिया गेट पर शहनाई बजाने का मौका आज तक नहीं दिया, इसका उन्हें बहुत दुख है. मुझे पता नहीं कि बाद में उन्हें ये मौका मिला या नहीं, लेकिन ये क्या है !! जिस व्यक्ति को आप देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज रहे हो, उसकी भावनाओं का आदर करते हुए क्या आप एक बार इंडिया गेट पर उनके लिए शहनाई वादन का प्रोग्राम आयोजित नहीं कर सकते हैं ??!! कैसा देश है ये …??!!

अरे, यहां तो प्राइवेट टीवी न्यूज चैनल वाले अपने दफ्तर के राजाना खर्चों में से पैसे निकालकर सड़े-गले मुद्दों पर पॉलिटिकल बहस, इंडिया गेट पर आयोजित करवा लेते हैं. फिर आप तो सरकार हो ना !! भारत की राजसत्ता के मालिक. तो क्या आप अपने देश के भारत रत्न का इतना भी सम्मान नहीं कर सकते थे. क्या उन्हें इतना भी पैसा नहीं दे सकते थे कि वो इज्जत से अपना और अपने परिवार का पेट भर सके !! तो फिर आज अटल बिहारी वाजपेयी और पंडित मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न दिए जाने का हर्ष-उल्लास क्यों मना रहे हैं आप लोग??!!! फिर इस भारत रत्न का मतलब क्या हुआ ??!!

एक और भारत रत्न हैं आपके. सचिन तेंडुलकर, जो कहने को तो सांसद हैं लेकिन देश की संसद में बैठने का वक्त नहीं है उनके पास. हां, फेरारी कार की कोई रेस हो, तो उसे देखने का वक्त जरूर होता है उनके पास. ये कैसी नजीर बना रहे हैं आप लोग??!! ये कैसी नजीर बनाई है भूत में. और कैसी नजीर बनाएंगे भविष्य में..??!! सो हे भारत की राजनीतिक पार्टियों ! सत्ता के सरमायेदारों. राजसत्ता के प्रतीकों !

आपके अलंकरण अब दिलों की शोभा नहीं बढ़ाते. वे रस्मअदायगी भर बनकर रह गए हैं. आप अलंकृत कर देंगे, फोटो छप जाएगी, चर्चा होगी, खबर बनेगी, फिर सब भूल जाएंगे. हां, इतिहास भारत रत्न की विभूतियों में कुछ और नए नाम शामिल कर लेगा और ये भी दर्ज कर लेगा कि जब फलां की सरकार थी, तो इनको-इनको मिला था. और जब ढिमका की सरकार थी, तो इन्हें दिया गया. पूरे हिसाब-किताब के साथ. आप सब की कारगुजारियों समय की रेत पर नन्हे पदचिह्न बना रही हैं. आप बढ़ते जाइए. आप लोग राजा है. साथ में घिसटते हुए हम देश की प्रजा भी बढ़ चलेंगे…एक सुनहरे और अच्छे भविष्य की कामना के साथ. हमारी शुभकामनाएं आप सब के साथ हैं. जय हे !

पत्रकार और शिक्षक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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एक न्यूज एंकर की टिप्पणी के बहाने

टीवी देखता नहीं लेकिन इंटरनेट पर लाइव टीवी अभी-अभी देखा. नजर पड़ गई तो पलभर के लिए ठहर गया. एक बड़े न्यूज चैनल की महिला एंकर की टिप्पणी सुनिए— “नीतीश बाबू को भी क्या हो गया है. कहते रहते हैं ऐसा होता तो वैसा होता… और मोदी नाम की तकलीफ तो उनकी पेशानी पर परमानेंट जगह पा चुकी है.”

चलिए, न्यूज के साथ व्यूज का कॉकटेल रंग जमा रहा है. और एंकरिंग करते वक्त लोग ये भूल जाते हैं कि ये जो लालू हैं, नीतीश हैं, नरेंद्र मोदी हैं, वो स्टूडियो में बैठकर और अखबार-मैगजीन पढ़कर ज्ञान नहीं बांचते. सब के सब जमीन से उठे हैं, जमीन पर घूमे हैं, तभी आज हेलिकॉप्टर पर उड़ रहे हैं.

और आप..??!!! गूगल सर्च और अखबारों-पत्रकाओं के आर्टिकल्स का ज्ञान और संबंधित राज्य के ब्यूरो चीफ से मिली टिप्स के बल पर चले हैं नीतीश की पेशानी पर पड़े बल का कारण बताने. अजी, जरा नीतीश की पॉलिटिक्स तो समझ लीजिए, जरा लालू की राजनीति तो बूझ जाइए. जरा जनता के बदले मिजाज को तो परख लीजिए. एंकरिंग का मतलब ये नहीं है कि दनादन बोले जाना. स्टूडियो में गेस्ट के रूप में बैठे अनुभवी पत्रकारों की बातों को काटकर आप दनादन स्विच करते रहिएगा और बोलते रहिएगा तो धारदार एंकरिंग नहीं हो जाएगी. चुनाव परिणाम का दिन है, एक एंकर की हैसियत से आप के लिए बड़ा दिन होगा, सब लोग आपको देख रहे होंगे (अगर ये गुमान हो तो) लेकिन कम से कम बड़े नेताओं पर, जिन्होंने खून-पसीना बहाकर राजनीति में अपनी जगह बनाई है, यूं ही कामचलाऊ टिप्पणी तो ना करिए. और भी क्या-क्या बोला होगा आपने, मुझे पता नहीं. मैं तो आपके श्रीमुख से निकले बस इसी एक वाक्य को सुनकर स्तब्ध रह गया !! इसके बाद आगे सुनने का मन नहीं हुआ.

एक और बड़े पत्रकार को सुना. झारखंड में बाबूलाल मरांडी दोनों सीटों से हार गए, ये खबर आ रही है. इस पर उन बड़े पत्रकार महोदय को जवाब नहीं सूझ रहा. गोलमोल बोल रहे हैं. मरांडी क्यों हारे, जबकि उनकी छवि अच्छी थी, बोलते नहीं बन रहा. भाई, आपलोग भी जरा होमवर्क करके पैनल में बैठिए. आंय-बांय-सांय तो अपना चीकू चायवाला और रीकू रिक्शावाला आपसे ज्यादा अच्छे तरीके से बोल सकता है. कम से कम वहां की पॉलिटिक्स को समझकर बोलिए.

चैनल वालों को भी चाहिए कि जिस राज्य के चुनाव परिणामों पर चर्चा कराई जा रही है, वहां के लोकल बड़े पत्रकारों का पैनल बनाकर उस पर डिबेट कराएं. जो वहां की मिट्टी की खुशबू जानते हों और जो सालभर वहां की लोकल पॉलिटिक्स देखते हैं. ये क्या बात हुई कि चुनाव किसी भी राज्य में हों, वही घिसे-पिटे दिल्ली के -बड़े पत्रकारों- का पैनल बना दिया, जो ना तो वहां की खबरों से ज्यादा वाकिफ रह पाते हैं और ना ही जमीन पर जाकर वहां की राजनीति और जनता के मिजाज को समझते हैं. उनको स्टूडियो में बिठाइएगा तो वही गोलमोल जवाब मिलेगा. हां, अगर आपको लगता है कि बढ़िया ग्राफिक्स, लार्ज स्क्रीन, नई तकनीक, -फास्ट- इलेक्शन रिजल्ट्स (सभी चैनल यही दावा करते हैं), वही पका-पकाया हुआ विशेषज्ञों का पैनल और बोरिंग डिबेट कराकर आप जनता को अपने चैनल की स्क्रीन पर चिपके रहने के लिए विवश कर देंगे, तो आपकी मर्जी. ये जान लीजिए कि जिस दिन हवा का नया झोंका आया, आपके फूल की खुशबू उड़ जाएगी. वैसे भी बसंत और पतझड़ प्रकृति के चक्र हैं. अगर सालोंभर बसंत चाहिए तो अपने गमले में खाद-पानी की उचित व्यवस्था करके रखिए.

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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पाकिस्तान में भी चिरकुट और दोयम दर्जे के टीवी चैनल व पत्रकार हैं

आज सुबह-सुबह इंटरनेट पर एक लिंक मिला जिस पर लिखा था “Horrific Footage of Inside Army Public School“…यानी कि पाकिस्तान में बच्चों के कत्ल के बाद स्कूल के अंदर की तस्वीरें, उसका वीडियो. यह पढ़कर ही दिल दहल गया कि मीडिया को मिली उसकी अभिव्यक्ति की आजादी का दुरुपयोग सिर्फ अपने यहां नहीं, वहां भी हो रहा है. पाकिस्तान में भी ऐसे चिरकुट और दोयम दर्जे के टीवी चैनल और पत्रकार हैं, जो खून के सौदागर हैं. मासूम बच्चों का लहू बेचने से उन्हें भी गुरेज नहीं. चूंकि अब मैं टीवी नहीं देखता, ना न्यूज चैनल और ना एंटरटेनमेंट चैनल, सो पता नहीं कि हमारे यहां मीडिया में इसकी कैसी कवरेज की गई..पाकिस्तानी चैनलों ने जब -मौत के इस तमाशे- को बेचना शुरू किया होगा, तो कितने हिन्दुस्तानी चैनलों ने -साभार- दिखाते हुए unedited footage जस के तस भारतीय दर्शकों को भी परोसे होंगे…

मुझे पता नहीं, ऐसा कितने बड़े लेवल पर भारतीय टीवी न्यूज चैनलों ने किया है लेकिन एक विश्वास पक्का है. वो ये कि हमारे टीवी न्यूज चैनल, खासकर हिन्दी के न्यूज चैनल -तिल का ताड़- बनाने में माहिर हैं. यहां टीआरपी की जंग इतनी तेज है कि कत्ल और खून-खराबे की ऐसी हृदय विदारक घटनाएं भी न्यूज रूम में जश्न का माहौल पैदा कर देती हैं. कुछ अतिउत्साही प्रोड्यूसर-एंकर-असाइमेंट और आउटपुट के लोग तो यहां तक कह बैठते हैं कि चलो, आज बढ़िया माल मिला है. आज तो इन विजुअल्स पर खूब खेलेंगे. फिर शुरु होता है इंसानों की मौत को बेचने का युद्धाभ्यास. फटाफट डिसिजन हो जाता है कि इस पर कौन-कौन और क्या-क्या स्पेशल बनेगा?? और फिर उसमें ऐसे प्रोड्यूसर-पत्रकार लगाए जाते हैं जो अपनी कलम से लफ्फाजी करके, शब्दों का मायाजाल बुनकर दर्शकों को इमोशनल करने, उन्हें देर तक उनके चैनल से चिपके रहने और अगर अति हो जाए तो दर्शकों को -रुलाने- का माद्दा रखता हो. यानी कि जिसकी कलम में तथाकथित जादू हो. जो जानता हो कि मौत को कैसे बेचना है. और फिर अतिउत्साही एंकर भी उस दिन खूब उछलते-मचलते हैं. उस दिन अपने वार्डरोब से सबसे झकास एंकरिंग वाला सेट निकालते हैं. मेकअप भी टंच होना चाहिए. और हां, दिखाने के लिए थोड़े गुस्से और थोड़े गम की छींटे स्क्रीन पर डालते रहना है. लेकिन उस दिन उसकी एंकरिंग ऐसी होनी चाहिए कि लोग सिर्फ उसे ही देखें, उसे ही सुनें और उसी के बताए-बनाए-बुने शब्दों से पूरी घटना को देखें.

लाशों और खून के धब्बों के विजुअल्स स्ट्रॉन्ग तभी बनेंगे जब एंकर अपनी दमदार आवाज में खनक-खनक कर लोगों को बताएगा-बताएगी कि देखिए, आतंक-दहशतगर्दी का ये खेल. आज इंसानियत शर्मशार हो गई, मासूम बच्चों की रूह कब्ज करने आए फरिश्तों का भी दिल दहल गया होगा, कांप गया होगा, जब आसामान से उतरकर उन्होंने धरती पर ये मंजर देखा होगा. देखिए, इस लाल खून को, देखिए इन दीवारों को, इन किताबों को, कुर्सी-टेबल-मेज-कुर्सी-बगीचे सबको ध्यान से देखिए. ये सब उस खौफनाक मंजर के मूक गवाह हैं. देखिए इन सबको और सोचिए. देखिए क्योंकि ये सब हम दिखा रहे हैं. क्योंकि मैं बोल रहा हूं-रही हूं, सो देखिए. और अकेल मत देखिए. अपने पूरे परिवार को दिखाइए. पूरा परिवार टीवी के सेट से चिपककर सिर्फ हमारा चैनल देखिए क्योंकि घटना की पहली और EXCLUSIVE तस्वीरें सिर्फ और सिर्फ हमारे पास हैं. अभी कहीं मत जाइए. अभी मौत के तमाशे की कुछ और EXCLUSIVE PICTURES हमारे पास आ रही हैं. हम आपको पल-पल की खबर दे रहे हैं, देते रहेंगे. अरे दर्शकों, हमारा वश चलता और उन कमबख्त आतंकवादियों ने हमें पहले ही मेल-वेल कर दिया होता, जैसा वो आतंकवादी घटना के बाद हमें मेल करके हमले की जिम्मेदारी लेते हैं, तो हमलोगों ने चुपचाप अपने ओबी वैन वहां फिट कर दिए होते. हम तो मासूम बच्चों को गोली मारने, उन्हें तड़पकर जमीन पर गिरने, उनके लहुलुहान होने और छटपटाने-मरने, सबके लाइव विजुअल्स आपको दिखा देते. हां एडिटर साहब कहते तो विजुअल को BLUR यानी धुंधला जरूर कर देते लेकिन इतना ही धुंधला करते कि आपको सब दिख जाए. हत्या के लाइव विजुअल्स देखकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएं. आपका बच्चा अपनी मम्मी की गोद में दुबक जाए, वो इतना डर जाए कि अगले दिन स्कूल जाने से मना कर दे और कह दे कि मम्मी, मैं स्कूल नहीं जाऊंगा, वहां आतंकवादी आते हैं, हमें भी गोली मार देंगे. मैं मरना नहीं चाहता मम्मी. मैं स्कूल नहीं जाऊंगा.

अगर ये दहशत, ये डर, ये खौफ और ऐसा थ्रिल हम आपके, अपने दर्शकों के दिलोदिमाग पर पैदा ना कर पाए तो थू है हम पर. हमारी सारी पत्रकारिता पर. हमारी कलम पर. मौके का फायदा उठाने और साप्ताहिक टीआरपी बटोरने की हमारी लत पर. आखिर टीआरपी आएगी तभी तो मालिक खुश रहेगा. हमसब की नौकरी बची रहेगी. सब को तनख्वाह मिलती रहेगी. तो हम तैयार हैं. इस -दुखदायी- घटना की, इस मानवीय त्रासदी की, इतिहास के इस फफोले की, इंसानियत का कलेजा चीर कर उसे लहुलुहान करने वाली इस घटना की महाकवरेज के लिए, महा-महा कवरेज के लिए. बस आप कहीं जाइएगा नहीं. हम पल-पल और सेकेंड की खबर आप तक पहुंचा रहे हैं और पहुंचाते रहेंगे. बस प्लीज, आप चैनल चेंज मत करिएगा. अरे प्रोड्यूसर, असाइनमेंट डेस्क, ये क्या कर रहे हो यार, इतने बच्चे मर गए, किसी के मां-बाप के रोने-बिलखने के शॉट्स नहीं आए क्या ??!! अरे अपना आदमी वहां नहीं है तो क्या हुआ, सारे पाकिस्तानी चैनलों को मॉनिटरिंग पर डाल दो. सबकी लाइव रिकॉर्डिंग करो और इनजेस्ट करवाते रहो. पीसीआर वालों, ये क्या कर रहे हो बॉस. दूसरे चैनल इतने STRONG LIVE VISUALS चला रहे हैं. ये फीड हमारे पास भी तो है. लाइव काटो यार. देखा जाएगा. वैसे भी साले पाकिस्तानी चैनल एडिट करके ही तो शॉट चला रहे होंगे. कहीं कुछ उल्टा-पुल्टा दिखे तो स्विच कर जाना…लेकिन देखो, विजुअल्स हर हाल में चलाओ. मां-बाप के
रोने-गाने-चीख-पुकार-मातम-फायरिंग-आर्मी का कॉम्बैट ऑपरेशन, सब कुछ. कुछ छूटना नहीं चाहिए. हमे हर हाल में इस हफ्ते की टीआरपी सबसे ज्यादा चाहिए. COMPETITOR CHANNELS से हमारी टीआरपी बहुत आगे होनी चाहिए. सब लग जाओं यारों. आज काम करने का दिन है. जान लड़ा दो. जनता को अपने चैनल से चिपका दो. अरे यार, कुछ रिटायर्ड कर्नल-ब्रिगेडियर को स्टूडियो बुलाओ ना. कुछ वीएचपी-बजरंग दल वालों को भी. हो सके तो कुछ इस्लाम के जानकारों को भी, और भारत-पाक रिश्तों पर बोलने वाले तथाकथित एक्सपर्ट्स को भी. हॉट डिबेट करवाओ यार. विजुअल साथ में चलाते रहो. और बीच-बीच में एंकर का थोबड़ा-चेहरा भी दिखाते रहो. देखो, आज बहुत मेहनत कर रहा है-रही है वो…और पीसीआर, तुम एंकर को हर नई जानकारी से अपडेट करते रहो…कुछ छूटना नहीं चाहिए…आज इतने दिनों बाद तो खबर से खेलने का मौका आया है…भिड़ जाओ बॉस…नाक मत कटवाना मेरी…ओए, ग्राफिक्स डिपार्टमेंट, तुम लोग क्या कर रहे हो, एडिटोरियल को कोऑपरेट करो…अरे यार, आउटपुट, इसमें क्या एनिमेशन बनवा सकते हैं हमलोग??!!! ये दिखा सकते हैं क्या कि आतंकवादी कहां से आए और कैसे-कैसे हमला किया??? क्या पूरी जानकारी है…कन्फर्म करो, इनपुट से बात करो बॉस. ये साले इनपुट वाले, हमेशा से कामचोर हैं..ना ढंग से दूसरे चैनल वॉच कर सकते हैं, ना कोई काम की खबर कन्फर्म करा पाते हैं…कोई बोलो यार. मुझेे घटना की पूरी डिटेल चाहिए. एनिमेशन बनवाना है. ग्राफिक्स वालों को कहो, क्या कर रहे हो सब. सब के सब कामचोर हैं. बस इन्क्रीमेंट और प्रोमोशन चाहिए. देख लो भाई लोगों, अगर कवरेज अच्छी नहीं रही, टीआरपी लुढ़की तो सबको समेट दूंगा. कहे देता हूं. साला, सब काम मैं ही करूं. मै ही सोचूं, मैं ही विचारूं और मैं ही चलाऊं. तुम लोग पॉकेट में हाथ धर के न्यूज रूम में बॉसगीरी करते रहो. टहलते रहो. देख क्या रहे हो यार. जाओ, काम पर लग जाओ. और देखो..हमें सबसे आगे रहना है…बात करो, दो-तीन रिपोर्टर-एंकर को पाकिस्तान रवाना करना है. बात करो. जितनी जल्दी हम वहां पहुंचेंगे, उतना शानदार. मैं भी बात करता हूं….और हां, एक बार फिर बोल रहा हूं, विजुअल्स से कोई समझौता नहीं…सब चलाओ और दिखाओ…मैं यहीं हूं…लोग कम पड़ रहे हों तो छुट्टी कैंसल करके सबको बुला लो…

तो दोस्तों, ऊपर मैंने जो कुछ लिखा, ये है न्यूज चैनलों के अंदर होने वाली चहलपहल का एक नजारा. लेकिन ये सब काल्पनिक है. इनका वास्तविकता से कोई लेनादेना नहीं. वास्तविकता देखनी है तो एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल के इस अधकचरे पत्रकार को देखिए. कैसे ये स्कूल के अंदर जाकर बच्चों के खून से सनी चीजों की नुमाइश कर रहा है. खून से सनी उनकी टोपियां, कॉपियां, जूते सब उठा कर दिखा रहा है. फिर जब उसके हाथ में खून गया तो उसे पोंछ भी रहा है…और हद तो तब हो गई जब ये कमअक्ल कमबख्त (ऐसे लोग पत्रकारिता के नाम पर कलंक ही है) एक बच्चे की स्कूल की कॉपी में लिखे अंग्रेजी के शब्द “THE END” पर कैमरा ZOOM IN करवा के ये कहता है कि देखिए. शायद उस बच्चे को भी मालूम था कि आज उसकी जिंदगी का The End होने वाला है…क्या उसकी किताबों को देखकर उसके मा-बाप रोएंगे??? अरे कमबख्त. उसके मां-बाप आंसू नहीं बहाएंगे तो क्या करेंगे. वो तो रोएंगे ही लेकिन तुम कब पत्रकारिता छोड़कर मिट्टी खोदने का काम शुरू करोगे?? क्या इतनी भी इंसानियत तुम्हारे अंदर नहीं बची कि बच्चों के खून से सनी टोपियां उठाकर, वो भी ऐसे कि जैसे कोई गंदी चीज हो, कैमरे पर दिखाते हो, फिर उस टोपी को फेंककर अपने हाथ को देखते हो कि उस पर खून लग गया है और उसे पोंछते हो, कैमरे से छुपाकर. ये बताते हो कि यहां खून की गंध आ रही है, मासूमों के खून की गंध. ये दिखाते हो कि ये देखिए, छोटे-छोटे बच्चों के खून से सने पैरों के निशान…देखिए यहां से भागने की कोशिश कर रहे थे बच्चे…और ये निशान उसी के हैं…और ये सब बताते हुए तुम्हारी आंखें चमक उठती हैं…आप लोग देख सकते हैं कि इस नामुराद तथाकथित पाकिस्तानी रिपोर्टर की आंखें कैसे चमक रही हैं..जैसे कि ये दुनिया की कोई आठवीं अनोखी चीज लोगों को दिखा रहा है…किसी शैतान की तरह इसकी आंखें घूम रही हैं, आवाज और चेहरे के हाव-भाव. सब संवेदनाशून्य…बस ऊलजलूल कुछ भी बोले जा रहा है ये…और मौत की, मासूमों के खून की तस्वीरें बड़ी बेशर्मी से दिखा रहा है….मैंने आंखें बंद-बंद कर बहुत मुश्किल से इस वीडियो को देखा है…आपमें हिम्मत है तो कोशिश कीजिएगा इसे देखने की और ये समझने की कि इंसानियत की दरोदीवार क्या आज इतनी जर्जर हो गई है कि सबकुछ महज एक नाटक में सिमटकर रह गया है???!! हर चीज के दाम बढ़ रहे हैं लेकिन इंसानियत क्यों इतनी सस्ती होती जा रही है??!! और पत्रकारिता ??!! खासकर टीवी पत्रकारिता, क्या खबरों को रिपोर्ट करने और उसे दिखाने में अब रिपोर्टर-डेस्क और सम्पादक क्या कोई फिल्टर नहीं लगाते…क्या महज बाजार, कम्पिटिशन, बिजनेस, टीआरपी और नौकरी, क्या चौथा खंभा कुछ इन्हीं शब्दों के बीच सिमटकर रह गया है??!! क्या सोशल मीडिया चौथे खंभे पर नकेल कसने के लिए पांचवें खंभे के रूप में विकसित हो रहा है या फिर चौथा खंभा वक्त रहते संभल जाएगा और इस विकसित हो रहे पांचवें खंभे को अपने में मिलाकर  वाकई में जनता की आवाज बनने का मैकेनिज्म डिवेलप कर पाएगा??!! सवाल बहुत हैं और जवाब बहुत थोड़े. फिलहाल पाकिस्तान के उस महान न्यूज चैनल के महान संवाददाता की ये घटिया कवरेज का वीडियो लिक यहां डाल रहा हूं. हिम्मत हो तो देखिएगा, वरना मैंने सबकुछ लिखकर तो बयां कर ही दिया है.

कई चैनलों और अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके और इन दिनों आईआईएमसी दिल्ली में अध्यापन कर रहे पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से. नदीम का लिखा ये भी पढ़ सकते हैं…

अर्नब गोस्वामी पत्रकारिता छोड़ने का फैसला कर चुके थे, मुंबई ने उन्हें रोक लिया!

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संघियों की बेहूदगी और नग्नता का विरोध करने पर राजदीप ने कीमत चुकाई!

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ट्रेन में सीट न मिले तो खड़े होकर सफर करते हैं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री

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सम्पादक जी, ये तो ना करिए, ये देश आपका ऋणी रहेगा

चिंता मत करिए. -अच्छे दिन- आ गए हैं. क्या यूपी, क्या एमपी और क्या दिल्ली और क्या भारत-क्या इंडिया…ऐसे -अच्छे दिनों- की ख्वाहिश इस देश की जनता ने तो नहीं ही की थी. फिर ये किसके अच्छे दिन हैं?? फैसला आप कीजिए.

ऩए-नवेले संगठन, नए-नए चेहरे टीवी की बहस में जगह पा रहे हैं. वो जितना जहर उगलेंगे, उतनी ही उनकी दुकान चलेगी. शायद -मालिक- की नजरों में चढ़ने के लिए ऐसा कर रहे हों लेकिन मालिक-मुख्तार भी तो चुप्पी साधे है. टीवी मीडिया ऐसे लोगों को जितना दिखाएगा, उतनी ही इन्हें मुफ्त पब्लिसिटी मिलेगी और मिल रही है. क्या मीडिया जाने-अनजाने इन्हें हीरो नहीं बना रहा.??!!

मेरी मानिए तो ऐसे छुटभैये नेताओं को इग्नोर कीजिए. दिल्ली में बैठे इनके आकाओं से जवाब तलब करिए. दिल्ली में जिम्मेदार पदों पर बैठे इन नेताओं को -सेफ पैसेज- क्यों दे रहे हैं आप लोग??!! और गली-नुक्कड़ में बैठे ऐसे छुटभैये जहर उगलने वाले नेताओं को नैशनल टीवी की डिबेट में बिठाकर लाइन में लगे अगले छुटभैयों को क्यों उकसा रहे हैं कि देखा, उसने ये किया तो -मालिक- और पार्टी की नजर में चढ़ गया. तरक्की हो जाएगी अब उसकी. सो अब मेरी बारी है…मैं भी ऐसे ही जहर उगलूंगा, कुछ ऐसा ही ऊंटपटांग करूंगा और राजनीति में तरक्की करूंगा. आपको पता ही है कि कुछ महानुभाव ऐसी भाषा बोल-बोलकर -आका- की नजरों में ऐसे चढ़े कि मंत्री बन गए.

सो देश का अमन-चैन छीनकर -राजनीतिक कैरियर- बनाने वालों की मदद मत कीजिए. उन्हें टीवी की डिबेट में मत बिठाइए. हो सके तो अपने प्रोग्राम के पैकेज नें उनकी लानत-मलामत कीजिए. देश को उनकी असली चेहरा दिखाइए. वो सच दिखाइए कि आगे से उनके गली-मुहल्ले के लोग ही उन पर थू-थू करें. उन्हें धिक्कारें और उनके -आका- उनका -सम्मान समारोह- करने से पहले सौ बार नहीं, हजार बार सोचें. वे डरें कि पब्लिक परसेप्शन इसके खिलाफ है. अगर इनके साथ मेरे तार जुड़े दिखे, इनके साथ मंच साझा किया तो उनका -राजनीतिक कैरियर- बने ना बने, मेरे राजनीतिक कैरियर पर जनता जरूर ग्रहण लगा सकती है.

आप पर लाख -मालिक- का दबाव हो सकता है. -सरकार- का दबाव हो सकता है. मार्केटिंग डिपार्टमेंट का दबाव हो सकता है लेकिन गुरू ! हैं तो आप पत्रकार ना. सम्पादक बने हैं तो जरा अपने जमीर को टटोलिए. खुद से सच पूछिए और कहिए कि जो आप कर रहे हैं क्या वो जायज है??!! ठीक है कि मरकर कोई जंग नहीं जीती जाती. अगर सम्पादकी ही चली गई और नौकरी ही गंवा दी तो फिर क्या खाक कर पाएंगे लेकिन हुजूर ! इसी में कोई बीच का रास्ता निकालिए ना ! आप तो खांटी पत्रकार हैं. जानते हैं कि Read between the lines जनता को कैसे बतानी है. कि मालिक-सरकार की बात भी रह जाए और अपने पत्रकारीय धर्म का भी निर्वाह हो जाए. कि सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे. ऐसे गुर तो अब तक आपने सीख ही लिए होंगे…

मेरा मानना है कि कोई भी पत्रकार-सम्पादक चाहे तो अपने कौशल से -सबकी बात- मानकर भी अपने पेशे से न्याय कर सकता है. उम्मीद की लौ जगाए और जलाए रह सकता है. उस दिन के बारे में सोचिए जब बुढ़ापे में अपने नाती-पोतों के साथ बैठे होंगे तो उन्हें क्या बताएंगे कि मैंने कैसी पत्रकारिता की थी??!! क्या Gen next आप पर नाज कर पाएगी??!! क्या कोई नया पत्रकार उसी सम्मान से आपका नाम लेगा जैसा लोग राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी का लेता है ??!! अगर हां, तो आप सही रास्ते पर हैं. नौकरी बचाए रखिए और उसी में अपने कर्तव्य का पालन करते रहिए. एक पतली लकीर आपको जरूर दिख जाएगी, जिसके बल पर आप अपने संस्थान के -हित- और पाठकदर्शक के हित, दोनों साध सकेंगे. मतलब कि यहां गुरू द्रोण को मारने के लिए आपको -अश्वत्थामा मारा गया- वाला प्रलाप नहीं करना पड़ेगा.

और अगर आपको लगता है कि भावी पीढ़ी क्या, आपके समकालीन भी आपके कर्म-वचन-चाल-ढाल को शक की नजर से देख रहे हैं, आप पत्रकार ना होकर किसी खेमे के प्राणी बनते जा रहे हैं, नौकरी बचाने की जुगत या फिर दुनियादारी के चलते आपको ये सब करना पड़ रहा है तो तनिक रुकिए. थोड़ा सोचिए और चीजों को LARGE PICTURE में देखने की कोशिश कीजिए. कहते हैं देश का हित सबसे बड़ा है, उसके बाद हमारे-आपके निजी हित हैं. अगर इतना भी -त्याग- नहीं कर पा रहे हैं तो छोटा सा ही एहसान इस देश पर कर दीजिए. -चौथे स्तम्भ- पर मिट्टी लगाने की बजाय थोड़ी देर के लिए उससे दूर खड़े हो जाइए. अपनी लेखनी और अपने प्रोग्राम में पक्षकार मत बनिए. हां नौकरी जरूर बजाइए लेकिन इतनी गुंजाइश छोड़ दीजिए कि आपकी पत्रकारिता से इस देश की गंगा-जमुनी तहजीब की धारा गंदी ना हो. और मुझे पता है कि इतना विवेकाधिकार हर सम्पादक के पास होता है. मालिक-सरकार किसी सम्पादक की कनपटी पर बंदूक रखकर काम नहीं कराता. उन्हें इतनी फ्रीडम तो होती ही है कि वो बीच का रास्ता निकाल सकते हैं, तमाम दबावों के बावजूद. मैंने अपने छोटे से कैरियर और छोटी सी उम्र में ये सब किया है. आप लोग तो वरिष्ठ और अनुभवी हैं. मुझे पता है कि आप भी ये कर सकते हैं. वो कहते हैं ना कि -उन्हें झुकने के लिए कहा गया तो वे रेंगने लगे-….प्लीज रेंगिए मत, हां थोड़ा झुकने में कोई बुराई नहीं है क्योंकि जो वृक्ष आंधी में नहीं झुकता वो तूफान में उखड़ जाता है. सो प्रकृति की इस परम्परा से सीखते हुए आप भी लचीले बन जाइए. इस तूफान को गुजर जाने दीजिए. फिर सब सामान्य हो जाएगा. लेकिन प्लीज, प्लीज, प्लीज, बेगुनाह लाशों के धुएं से काली हुई कोठरी को अपनी आंखों का काजल मत बनाइए. ये देश आपका ऋणी रहेगा……

http://navbharattimes.indiatimes.com/state/madhya-pradesh/bhopal/indore/communal-riot-singes-bhopal-75-critically-hurt/articleshow/45494545.cms

कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके आईआईएमसी के शिक्षक नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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यादव सिंह ने समाजवादी नेता मुलायम और दलित नेता मायावती दोनों का साध लिया था

Nadim S. Akhter : असली शेर तो -यादव सिंह- निकले. एक साथ बहन मायावती और समाजवादी नेताजी मुलायम सिंह यादव, दोनों को साध लिया. अनेकता में एकता का -सूत्र- यादव सिंह जी से सीखिए. उनसे जानिए कि सरकार -दलितों- की हो, या -समाजवादियों- की या फिर किसी भी -वाद- वाले की, सबकी आंखों का तारा कैसे बना जाता है. आपके पास क्वालिफेकेशन हो ना हो, डिग्री हो ना हो, वैधानिक योग्यता हो ना हो, लेकिन अगर -जुगाड़ योग्यता- और -लक्ष्मी योग्यता- है तो इस सठिया चुके लोकतंत्र में और Media bombardment के युग में भी आप सबकी नाक के नीचे आराम से मलाई काट सकते हैं.

जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार कैसे जनता के पैसों को हड़पने के लिए -रंगे सियार- तैनात करती है, इसका मुलाहिजा फरमाइए. वो तो -भला- हो आईटी वालों का कि उसने देख लिया यादव सिंह करप्ट हैं. वैसे आईटी यानी इनकम टैक्स वालों अर्थात आयकर विभाग वालों की नजर विरले ही टेढ़ी होती है. वे इतनी देर से जगे, इसकी भी पड़ताल होनी चाहिए और बहनजी-नेताजी के -सुशासन- मैं तैनात -ईमानदार ब्यूरोक्रेसी- ने कैसे यादव सिंह को अर्श से फर्श पर चढ़ाया, इसकी भी जांच हो जाए.

वैसे पड़ताल और जांच में कुछ रखा नहीं है. investigation तो होता ही इसलिए है कि ये चलता रहना चाहिए. कई लोगों को अपनी सरकारी सैलरी justify करने का मौका मिलता रहता है. सुनंदा पुष्कर मामले से लेकर भोपाल गैस त्रासदी और फिर गोधरा तक, सब जांच की जद में आते रहते हैं और देश चलता रहता है. आगे भी चलता रहेगा. Tension not. आप ये देखिए कि इस महीने की सैलरी एकाउंट में आई है या नहीं. बच्चे की फीस, दाल-चावल, ईएमआई और अस्पताल का बिल भरने के लिए पैसे बचे हैं या नहीं. अगर हां, तो जाके किसी थिएटर में कोई मैटिनी शो देखिए और मटन खाकर आराम से सो जाइए.

और अगर नहीं, तो खर्चे पूरे करने के लिए और ज्यादा पैसे कमाने की जुगत लगाइए. यादव सिंह अकेले थोड़े हैं. हम सब उसके साथ हैं. यही तो है अघोषित एकता. जो पकड़ा गया वो चोर, बाकी सब राजा हरिश्चंद्र. ऐसे ही तो बढ़ेगा भारत. अच्छे दिन तो 1947 में ही आ गए थे, आप लोग खामोख्वाह बात का बतंगड़ बनाए रहते हैं. जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे !!!

…..”His stars shone bright after that. Singh, a Jatav, had found a staunch backer in Mayawati. He subsequently became chief maintenance engineer in 2002, and then in 2011, was made engineer-in-chief of Noida Authority. When the SP government came to office in 2012, he was suspended for his alleged involvement in a Rs 954-crore scam, but was reinstated in 2013. In November this year, he was made the chief engineer of all three authorities: Noida, Greater Noida and Yamuna Expressway.”……(TOI)

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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अर्नब गोस्वामी पत्रकारिता छोड़ने का फैसला कर चुके थे, मुंबई ने उन्हें रोक लिया!

Nadim S. Akhter :  Times Now वाले अर्नब गोस्वामी को मैं पसंद करता हूं. आप उन्हें अच्छा कहें या बुरा कहें या जो कहें, मुझे लगता है कि तमाम सीमाओं के बावजूद (एक बार फिर दोहरा रहा हूं, बाजार और सियासत की तमाम सीमाओं के बावजूद) वो अपना काम शिद्दत से कर रहे हैं. हां, अफसोस तब होता है जब रवीश कुमार के अलावा हिंदी चैनलों में मुझे अर्नब जैसा passionate एक भी पत्रकार नहीं दिखता.

अर्नब मुझे पसंद हैं क्योंकि मुझे उनमें FIRE दिखता है जो कि पत्रकारिता के लिए बहुत जरूरी है. हालांकि मुझे भी मेरे कई बॉसेज कह चुके हैं कि तुममें बहुत FIRE है, संभल कर, कहीं अपना हाथ ही ना जला बैठो लेकिन मुझ जैसे “FIRE PERSONALITY” (अपने मुंह मियां मिट्ठू भी समझ सकते हैं) को भी जब अर्नब में आग दिखती है तो या तो ये मेरी समझ बहुत कम है या फिर ये एक सच्चाई है. खैर, अभी अर्नब का एक लंबा भाषण सुना, जिसमें उन्होंने अपने पत्रकारीय जीवन के कुछ -राज- खोले और पत्रकारिता पर अपने विजन की चर्चा की. सोचा कि आप लोगों से भी शेयर करूं. तो पहली बात ये कि

1. अर्नब गोस्वामी ने वर्ष 2003 में पत्रकारिता छोड़ने का फैसला कर लिया था लेकिन Times Group के मालिकों ने जब उन्हें चैनल लॉन्च करने के लिए मुंबई में समुद्र किनारे टहलते हुए उन्होंने अपना फैसला बदल दिया.

2. अर्नब मुंबई को देश का मीडिया हब बनाना चाहते हैं यानि नोएडा की फिल्म सिटी को खाली करके सारा तामझाम मुंबई में शिफ्ट कराना चाहते हैं.

3. उनके अनुसार मुंबई से पत्रकारिता ईमानदारी से की जा सकती है क्योंकि तब आप दिल्ली के नेताओं को टाल सकते हैं और फालतू की चमचागीरी-सोशल सर्कल को avoid कर अपना पूरा फोकस खबर के कंटेंट और उसकी निष्पक्षता पर लगा सकते हैं.

4. अर्नब आज जो कुछ भी हैं, सिर्फ और सिर्फ मुंबई शहर की वजह से हैं. अगर ये शहर ना होता तो आज अर्नब गोस्वामी भी ना होते….

5. एक सबसे महत्वपूर्ण बात, जो मुझे खटक रही है, वो ये कि अर्नब पत्रकारिता के बेसिक उसूल यानी basic principle को बदलना चाहते हैं. संभव हो तो उसे जमीन में दफ्न करना चाहते हैं. और ये मूलभूत सिद्धांत है खबरों में Objectivity यानी निष्पक्षता बनाए रखने का यानी खबर में views, opinions या विचार मिक्स नहीं करने का.

अर्नब कहते हैं कि मुंबई में हुए आतंकवादी हमले के बाद उन्होंने दिल्ली में सीखा ये उसूल हमेशा के लिए दफ्न कर दिया है. उनके अनुसार पत्रकार अगर सही-गलत के बीच में खड़ा होकर ये कहे कि मैं तो सिर्फ फैक्ट बताऊंगा, बाकी पाठक-दर्शक पर छोड़ दूंगा तो वह अपने पेशे से न्याय नहीं कर रहा है. पत्रकार को स्टैंड तो लेना ही होगा और वो लेते हैं. अर्नब के अनुसार पत्रकारिता में इस बदलाव की बहुत जरूरत है और news के साथ reporter का view दिखाना जरूरी है.

अब सोचिए कि अगर संघ या कांग्रेस या वाम समर्थक कोई पत्रकार अपनी खबर में view दिखाने लगे, स्टोरी प्लांट करने लगे तो भारत की पत्रकारिता किस ओर जाएगी?? मुझे लगता है कि समान्य परिस्थितयों में पत्रकार को -विचार- बताने से अलग ही रखना चाहिए. हां, जैसे मुंबई हमले के समय भी क्योंकि ऐसा ना हो कि -देशभक्ति- के चक्कर में आपकी किसी खबर से किसी का ऐसा बुरा हो कि उसका पूरा जीवन ही बर्बाद हो जाए. खैर ये डिबेट का विषय तो है ही.

और आखिरी बात जो अर्नब ने कही. वो ये कि मुंबई से जल्द दी दुनिया को बीबीसी और सीएनएन को टक्कर देने वाला एक हिन्दुस्तानी अंग्रेजी चैनल मिलने वाला है. और हम दुनिया भर में टीवी न्यूज इंडस्ट्री की परिभाषा बदल कर रख देंगे.

खैर, पूरे भाषण के दौरान कुछ कर गुजरने की अर्नब की छटपटाहट मुझे अच्छी लगी. यही तो है अर्नब की कामयाबी का राज

नोटः पत्रकारिता के विद्यार्थियों (जो हम सब आज भी हैं) को अर्नब का ये लम्बा भाषण जरूर सुनना चाहिए क्योंकि यह उनका News Hour शो नहीं है. इससे आप को पता चलेगा कि अर्नब ऐसे क्यों हैं और टाइम्स नाऊ ऐसा क्यों है.

और एक सवाल मेरे मन में भी है. क्या हम हिंदी में भी टाइम्स नाऊ के तेवर और कलेवर वाला चैनल ला सकते हैं. अगर हां, तो उस दिन देश के टेलिविजन इतिहास में एक नई क्रांति का जन्म होगा.

देखिए, अर्नब का पूरा भाषण.

https://www.youtube.com/watch?v=JBV_FK_x7t8

युवा और तेज-तर्रार पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से. नदीम कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं.

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रवीश कुमार के बहाने कुछ अपनी कहानी

Nadim S. Akhter : मीडिया संस्थान के दफ्तर में बैठकर बड़ी-बड़ी बातें करना यानी पत्रकारिता करना अलग बात है और किसी पत्रकारिता संस्थान के छात्रों को हैंडल करना, उनके सवालों के जवाब देना, उनका कौतूहल शांत करना, उनके सपनों की हकीकत बताना, उन्हें मीडिया की निर्दयी दुनिया से रुबरु कराना और पत्रकारिता के तथाकथित मिशन से जान-पहचान कराना एकदम अलग बात.  मैं खुद को नसीब वाला मानता हूं कि भविष्य के पत्रकारों से संवाद करने का मौका मुझे मिल रहा है. नई पीढ़ी को समझने और गढ़ने का भी. लेकिन मशहूर पत्रकार रवीश कुमार की तरह एक सवाल मुझे भी परेशान करता है कि नई पीढ़ी पत्रकार बनने आई है या स्टार !!! शायद ये चाह और ललक उस समय हमलोगों में भी रही होगी जब वर्ष 2001 में मैं और मेरे बाकी साथी IIMC से पत्रकारिता का डिप्लोमा लेकर नौकरी ढूंढने निकल पड़े थे.

तब इतने सारे चैनल तो नहीं थे लेकिन पत्रकारिता के -स्टार- उस वक्त भी थे. -आज तक- पूरी तरह चौबीस घंटे के चैनल में तब्दील होने जा रहा था, स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज) तब आया नहीं था और आज के दूसरे तमाम चैनलों का भी तब कहीं कोई अता-पता नहीं था. ले-देकर हमारे पास एक ही हिंदी का न्यूज चैनल था- जी न्यूज और तब इसके मुखिया शाजी जमां साहब हुआ करते थे और वे IIMC भी आते थे, पढ़ाने के लिए. मैं प्रिंट पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था लेकिन इंटर्नशिप के लिए मैंने किसी अखबार की बजाय टीवी माध्यम को चुना और पहुंच गया जी न्यूज. वहां की कहानी पर फिर कभी विस्तार से चर्चा करूंगा. लेकिन जी न्यूज के जिन चेहरों को अब तक मैं स्क्रीन पर स्टार की तरह देखता था (उस समय की अपनी समझ के मुताबिक) उन्हें न्यूज रूम में दौड़ते-भागते देखना मेरे लिए एक नया अनुभव था. कई मिथक टूट रहे थे और खबरों की दुनिया से मैं जुड़ता चला जा रहा था. कामकाज के दौरान ही जब जी न्यूज के उस दौर के एक स्टार एंकर ने मुझसे पूछा कि आप कहां से आए हैं तो मैंने कहा- IIMC. उन्होंने तुरंत कहा कि अच्छा, आप वहां से हो तभी तो इतने bright हो. आप तो स्टार हो !!!

ये कहकर वो तो चले गए लेकिन स्टार वाली बात मेरे जेहन में अटक गई. यानी जिसे कल तक मैं स्टार समझता था, वो खुद मुझे स्टार कह रहा था. बड़ा अजीब लग रहा था तब. खैर. तभी वो दौर आया, जब मैंने पहली बार किसी मीडिया संस्थान में सत्ता परिवर्तन देखा. शाजी जमा जी न्यूज से जा रहे थे और उनकी जगह संजय पुगलिया एंड टीम (सौरभ सिन्हा, जहां तक मुझे नाम याद है) आ चुके थे. न्यूज रूम में बदलाव मैं महसूस कर रहा था. कई सीनियर चेहरों पर तनाव दिख रहा था. हालांकि कुछ लोग ऐसे भी थे, जिन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा था और वो पहले की ही तरह खबरों से जूझ रहे थे.

मैं इस बात के लिए भी खुद को खुशकिस्मत मानता हूं कि बॉस का बदलना और उसके बाद संस्थान में होने वाले बदलाव को मैंने अपने कैरियर के बिलकुल शुरुआती दिनों में देख लिया था. थोड़ा बहुत समझ भी लिया था. ऐसी ही एक घटना से प्रिंट में काम करते वक्त उस समय दो-चार हुआ जब नवभारत टाइम्स में मुझे पता चला कि अपने सम्पादक यानी रामकृपाल जी नभाटा छोड़कर जा रहे हैं और शायद -आज तक- ज्वाइन करेंगे. तब नभाटा में कोई सोच भी नहीं सकता था कि रामकृपाल जी यूं ही अचानक हम सबको छोड़कर चले जाएंगे. पर यह सच था. मुझे यह खबर कहीं से पता चली थी लेकिन तब मुझे मालूम नहीं था कि नभाटा में सम्पादकीय के वरिष्ठ लोगों को भी इसका भान नहीं था.

मैंने ये खबर एक वरिष्ठ को बताई जो एक डेस्क के इंचार्ज हुआ करते थे. वो नाराज हो गए और छूटते ही कहा कि क्या बोल रहे हो?? नौकरी चली जाएगी. रामकृपाल जी के जाने की झूठी अफवाह फैला रहे हो !! मैं हतप्रभ था, मुझे लगा कि उन्हें पता होगा. तब ये नहीं जानता था कि सम्पादक अचानक से, ऐसे ही चले जाते हैं और नीचे वालों को अंतिम समय में पता लगता है. मैं चुप हो गया.

फिर शायद उसी दिन शाम को या एक दिन बाद अचानक से रामकृपाल जी ने सम्पादकीय टीम को बताया कि वे नवभारत टाइम्स छोड़कर जा रहे हैं. ये खबर पाते ही वे वरिष्ठ मुझसे पूछने लगे कि यार, तम्हें ये बात पहले कैसे पता लग गई?? कहां से पता चली. तमाम सवाल. अब उन्हें क्या बताता कि कहां से पता चली थी, बस मालूम चल गया था. खैर. मैं रामकृपाल जी से मिलने गया. वहां उनके साथ दूसरे सम्पादक (विचार) मधुसूदन आनंद भी बैठे थे. मैं थोड़ा सकुचाया लेकिन रामकृपाल जी ने बिठा लिया. वो काफी देर तक मुझसे बात करते रहे, समझाते रहे. मुझे बताया कि मेरे यहां होने या नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. आनंद जी हैं, सम्पादक तो आते-जाते रहते हैं. अखबार निकलते रहना चाहिए. आप मन लगाकर काम करते रहिए. उन्होने आनंद जी को भी मेरे बारे में बताया. मधुसूदन आनंद जी चुपचाप सब सुनते रहे.

उसके बाद तो कई सम्पादकों की विदाई देखी. और सब अचानक ही गए. इस विदाई के बाद पूर्व सम्पादक की टीम का हश्र भी देखा.

खैर, तो मैं बात कर रहा था टीवी पत्रकार रवीश कुमार और पत्रकारिता के छात्रों की. पत्रकारिता के छात्रों का एक -मामूली- व्यवहार रवीश को चुभ गया और इसी बात को लेकर उन्होंने अपने ब्लॉग पर कुछ लिखा है. रवीश इस बात से परेशान हैं कि भविष्य के पत्रकार उन्हें इतना भाव क्यों दे रहे हैं. बात सही भी है. आखिर रवीश भी तो मामूली पत्रकार हैं, शुरुआती दिनों में डेस्क पर चिट्ठियां छांटा करते थे. टीवी पर दिखने से ही क्या कोई स्टार हो जाता है??!! और जिन्हें आज वे स्टार समझ रहे हैं, हो सकता है कल वो उनसे कई कदम आगे निकल जाएं. अपनी ईमानदारी और मेहनत के दम पर उनसे भी बड़े तथाकथित स्टार बन जाएं!! क्यों, ऐसा संभव नहीं है क्या !!!

रवीश का लिखा पढ़ने के लिए क्लिक करें…

नए पत्रकारों को मुझ जैसे दो चार लोगों को स्टार मानने की आदत छोड़ देनी चाहिए : रवीश कुमार

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.

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